- असम और नागालैंड में आई भारी बाढ़ से 100 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई है।
- बाढ़ और भूस्खलन में कई घर और मवेशी बह गए और लोगों को सही खाना, पानी, हेल्थकेयर और रहने की जगह नहीं मिल पा रही है।
- भारी बारिश के अलावा, जानकार और स्थानीय लोग वेटलैंड के खराब होने, अवैध खनन, और बढ़ती निर्माण परियोजनाओं को ब्रह्मपुत्र बेसिन में बढ़ती बाढ़ का कारण मानते हैं।
जुलाई महीने में 18 और 19 तारीख की दरमियानी रात जब दुनिया भर के फुटबॉल फैन विश्व कप का फाइनल मैच देखने के लिए तैयार हो रहे थे। लगभग उसी समय, नेपालीखुटी गांव के घरों में इस कदर पानी घुसना शुरू हुआ कि लोगों को अपनी छतों और इमारतों पर चढ़ना पड़ा। असम के शिवसागर जिले का एक गांव नेपालीखुटी, आस-पास के कुछ गांवों के साथ, राज्य में हाल ही में आई बाढ़ से सबसे ज़्यादा प्रभावित गांवों में से थे।
नेपालीखुटी के लगभग 60-65 परिवारों के घर इस बाढ़ में बह जाने के कारण इन परिवारों के सदस्यों ने एक दो-मंज़िला ईमारत में शरण ली, यह बात सामाजिक कार्यकर्त्ता शुभ्राजीत दास ने बताई, जो राहत काम के लिए नेपालीखुटी गए थे।
नेपालीखुटी से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर, संतक पांचाली इलाके में, सौरव चौधरी 19 जुलाई के अपने अनुभव के बारे में बताते हैं। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “पानी दोपहर करीब 1 बजे हमारे गांव में घुसा और बीस मिनट में यह हमारे सीने तक पहुंच गया। मेरे परिवार को, 40 दूसरे परिवारों के साथ, हमारे गांव के लोअर प्राइमरी स्कूल की दो-मंज़िला ईमारत में पनाह लेनी पड़ी।” “नेपालीखुटी में, तबाही बहुत बड़ी है क्योंकि वहां करीब 10 लोग मारे गए हैं। मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है क्योंकि कई लाशें कीचड़ में फंसी हो सकती हैं। साथ ही, करीब 5,000 गायें बह गई हैं। वे वहां के लोगों की रोजी-रोटी का मुख्य ज़रिया थीं।”
असम में बाढ़ से मरने वालों की संख्या 10 अगस्त तक 100 हो गई है।
असम स्टेट डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (ASDMA) के 9 अगस्त के बाढ़ बुलेटिन के मुताबिक, 10 ज़िले और 28 रेवेन्यू सर्कल प्रभावित हुए हैं। प्रभावित 456 गांवों में से 145 गोलाघाट और 110 शिवसागर के हैं, जो दो सबसे ज़्यादा प्रभावित ज़िले हैं।

बाढ़ से हज़ारों लोग सीधे और परोक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं। अभी, 9 अगस्त के बुलेटिन के मुताबिक, राज्य में 52 रिलीफ कैंप चल रहे हैं, जहाँ 8,000 से ज़्यादा लोग रह रहे हैं। बाढ़ में लगभग 119,000 हेक्टेयर खेती की ज़मीन डूब गई है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बयान में कहा कि बाढ़ भारी बारिश और नागालैंड में बादल फटने की वजह से आई। हालाँकि, भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने बादल फटने की खबरों को खारिज कर दिया, जिससे पता चलता है कि भारी बारिश के अलावा और भी वजहें हो सकती हैं, जिनकी वजह से बाढ़ आई।
‘ऐसी बाढ़ पहले नहीं देखी’
शिवसागर ज़िले के बेतबारी गांव के रहने वाले अशोक कोटोकी ने इस बाढ़ का असर खुद देखा। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “19 जुलाई को शाम करीब 7.30 बजे, सब कुछ डूब गया था। डिकहो नदी का पानी डोरिका नदी में गिरा जिससे बेतबारी में बाढ़ आ गई। यहां 99% घर प्रभावित हुए। जो लोग बांध के पास रहते थे, वे कुछ हद तक बच गए। मैंने अपनी ज़िंदगी में ऐसी बाढ़ कभी नहीं देखी।” उनके गांव के कई लोग अभी मीठापुखुरी लोअर प्राइमरी स्कूल में रह रहे हैं, जहां कोटोकी पढ़ाते हैं। उन्होंने कहा, “भले ही पानी कम हो गया है, लेकिन लोग घुटनों तक कीचड़ और गाद होने की वजह से अपने घरों में वापस नहीं जा सकते।”

राजोर दल पार्टी की सदस्य ज्ञानश्री बोरा ने इस बाढ़ को “ज़िंदगी की सबसे बुरी बाढ़” बताया। बोरा ने इस साल हुए विधानसभा चुनावों में जोरहाट जिले की मरियानी सीट से चुनाव लड़ा था। मरियानी के सेलेनघाट गांव के बारे में बात करते हुए बोरा ने कहा, “यहां 63 घरों का सारा सामान डूब गया है। इस बाढ़ ने किसी को भी तैयारी करने का टाइम नहीं दिया। जब पानी उनके आंगन तक पहुंचा, तो लोग ज़्यादा घबराए नहीं। लेकिन 15 मिनट के अंदर, यह सीने तक पहुंच गया। बचने की कोई जगह नहीं थी।” उन्होंने कहा कि सरकारी मदद और राहत लोगों तक लगभग तीन दिन बाद पहुंची, जबकि प्राइवेट लोगों, गैर सरकारी संगठनों और अलग-अलग पार्टियों की मदद सरकारी राहत से पहले पहुंची।
जोरहाट में मौजूद मानवीय और विकास संगठन, नॉर्थ-ईस्ट अफेक्टेड एरिया डेवलपमेंट सोसाइटी (NEADS) के डायरेक्टर तीर्थ प्रसाद सैकिया ने कहा कि दूर-दराज के गांवों में लोगों की जरूरतों के आकलन के लिए टीमों को तुरंत तैनात किया गया ताकि सबसे ज़रूरी मानवीय ज़रूरतों की पहचान की जा सके। सैकिया ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “असेसमेंट में पीने के साफ़ पानी, सफ़ाई की सुविधाओं, खाने, इमरजेंसी शेल्टर, हेल्थ केयर, घरेलू ज़रूरी चीज़ों और रोज़ी-रोटी के सपोर्ट की भारी कमी का पता चला।” उन्होंने कहा कि तब से, NEADS कमज़ोर परिवारों को खाने का सामान, महिलाओं और लड़कियों के लिए हाइजीन और डिग्निटी किट, टेम्पररी शेल्टर का सामान और दूसरी ज़रूरी राहत की चीज़ें बांट रहा है और उनका संगठन अब तक 20,000 प्रभावित परिवारों तक पहुंच चुका है।

इस बाढ़ ने पानी और गाद की समस्या के आलावा साँप और कीड़ों के काटने की घटनाओं को भी बढ़ा दिया। डिमोव मॉडल हॉस्पिटल के एनेस्थिसियोलॉजिस्ट डॉ. सुरजीत गिरी, जो ऐसे मामलों के इलाज में माहिर हैं, ने कहा कि जब बाढ़ के दौरान लोग अस्पताल नहीं पहुँच पा रहे थे, तो उन्होंने फ़ोन पर ही 10-15 मरीज़ों का इलाज किया। बैंडेड क्रेट के काटे हुए दो मरीज़ों को नेशनल डिज़ास्टर रिस्पॉन्स फ़ोर्स की मदद से निकाला गया और उन्हें समय पर इलाज मिला। हालाँकि, पानी कम होने के बाद, हॉस्पिटल में कीड़ों के काटने के लगभग 150 मामले आए हैं। यह मामले हर जगह कीचड़ और गंदगी की वजह से बढ़ गए हैं।
इस बीच, फेसबुक पर एक लाइव बयान में, मुख्यमंत्री सरमा ने प्रभावित परिवारों को 3 अगस्त से बांटे जाने वाली ₹15,000 की अंतरिम राहत की घोषणा की। सरमा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कहा, “शिवसागर और चराईदेव में हर प्रभावित परिवार को 10 अगस्त को अतिरिक्त ₹10,000 दिए जाएंगे। साथ ही, चराईदेव और शिवसागर में जुलाई महीने का 300 यूनिट तक का बिजली बिल माफ कर दिया गया है। साथ ही, बीमा कंपनियां कम से कम डॉक्यूमेंटेशन के आधार पर क्लेम स्वीकार करेंगी।”
राज्य की सीमाओं पर असर
असम का पड़ोसी राज्य नागालैंड भी बाढ़ और भूस्खलन से बुरी तरह प्रभावित हुआ, जहाँ 13 लोगों की मौत हो गई।
नागालैंड के मोन, मोकोकचुंग और वोखा इलाकों में 19 जुलाई को भारी बारिश के कारण डिकहो, डिसांग और धनसिरी जैसी दक्षिणी छोर की सहायक नदियों के उफान पर आने से भी असम में बाढ़ की स्थिति बढ़ गई। नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने कुछ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वे किया और नागालैंड सरकार ने मरने वालों के परिवार को ₹4,00,000 और घायलों को ₹74,000 की अंतरिम मदद देने की घोषणा की।
मोन शहर के रहने वाले और कोन्याक स्टूडेंट्स यूनियन (KSU) के मीडिया सेक्रेटरी, काइबो कोन्याक, जो राहत और पुनर्वास के काम में मदद कर रहे हैं, ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “19 और 20 जुलाई के दौरान, बहुत ज़्यादा बारिश हुई जिससे मोन में बड़े पैमाने पर लैंडस्लाइड और मडस्लाइड हुआ, जिससे सड़क कट गई और बिजली चली गई। यहां के लोगों ने अपनी बचत से लेकर रोजी-रोटी तक सब कुछ खो दिया है।”

बारिश के अलावा और भी वजहें
नागिनिमोरा, एक सब-डिवीजनल शहर है जो नागालैंड के मोन जिले के सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों में से एक है। नागिनिमोरा के एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर (EAC) न्यामोक कोन्याक ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “हमें सबसे ज़्यादा तबाही अचानक आई बाढ़ से हुई, साथ ही नागिनिमोरा शहर के किनारे डिकहो नदी में भी बाढ़ आ गई। हमने 250 बेघर हुए परिवारों को तुरंत राशन दिया।”
नागिनिमोरा एक सीमावर्ती शहर भी है, जो असम के शिवसागर जिले में बिहुबोर से 10 km से भी कम दूरी पर है। यह इलाका कोयला खनन के लिए जाना जाता है।
असम विधानसभा विधायक और इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेता देबब्रत सैकिया ने बाढ़ को “बहुत सोच-समझकर इंसानों की बनाई आपदा” बताया, और इसके लिए बिना रोक-टोक के रेत, पत्थर और कोयले के खनन को ज़िम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि नागालैंड में गैर-कानूनी ओपन-कास्ट कोयला माइनिंग से गड्ढे खाली रह जाते हैं, जिससे कृत्रिम तालाब बन जाते हैं, जबकि डिकहो नदी के किनारे गैर-कानूनी तरीके से रेत और पत्थर के खनन से हालात और खराब हो गए हैं। सैकिया ने कहा कि उन्होंने 2019 में नदी के किनारे अवैध खनन को लेकर गुवाहाटी हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, लेकिन कोर्ट के ऑर्डर पर राज्य सरकार ने अभी तक टास्क फोर्स नहीं बनाई है।
हालाँकि, नागिनिमोरा के EAC, न्यामोक कोन्याक ने खनन और बाढ़ के बीच के सम्बन्ध पर सवाल उठाते हुए कहा कि मोन जिले में भारी बारिश और ऊपर की तरफ पानी की वजह से बाढ़ आई, जबकि शहर और खदानें निचले इलाकों में थीं।
इस बीच, बाढ़ के कारणों पर बात करते हुए, ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन पर रिसर्चर मिर्ज़ा ज़ुल्फ़िकुर रहमान ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “हाल के सालों में असम में बाढ़ का एक अलग पैटर्न और कैरेक्टर रहा है, बस ज्योग्राफ़िकल लोकेशन बदली है। बड़े पैमाने पर और लगातार वेटलैंड का खराब होना और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स ब्रह्मपुत्र की कई सहायक नदियों के नैचुरल ड्रेनेज फ्लो में रुकावट डाल रहे हैं, उत्तरी और दक्षिणी दोनों किनारों पर। जिन लोगों ने मुआवज़े के बदले इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए अपनी ज़मीन दी थी, वे अब प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि वे ऐसे प्रोजेक्ट्स की प्लानिंग में शामिल नहीं थे और भविष्य में इसका उनके लिए क्या मतलब होगा। जिस इकोनॉमिक कनेक्टिविटी के नाम पर हाईवे जैसे निर्माण किए गए, उससे इकोलॉजिकल कनेक्टिविटी बुरी तरह प्रभावित हुई।”
उन्होंने बताया कि नागालैंड और असम दोनों राज्यों में बिना वैज्ञानिक तरीके से और बिना नियम के खनन हो रहा था। उन्होंने कहा, “यह आपदा सबका नतीजा है, और यह रातों-रात नहीं हुई है,” उन्होंने ब्रह्मपुत्र के बाढ़ के मैदानों के एक व्यवस्थित अध्ययन, एक बायो-रीजनल गवर्नेंस फ्रेमवर्क और जुड़े हुए बेसिन की बड़ी इकोलॉजी को देखने की ज़रूरत का सुझाव दिया।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 11 अगस्त, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: अपर असम के तेओक गांव में अपने डूबे हुए घर के पास से गुजरता एक आदमी। (AP फोटो/परिक्षित सैकिया)