- वर्ष 1946 से अब तक भारत, नेपाल, और बांग्लादेश में घड़ियाल की आबादी में 94 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
- 2014–15 में शुरू हुआ गंडक घड़ियाल रिकवरी प्रोजेक्ट, आज इस नदी में लगभग एक हज़ार घड़ियाल हैं।
- चंबल नदी के बाद गंडक भारतीय घड़ियालों का सबसे बड़ा ठिकाना है, वे यहां प्रजनन भी करते हैं।
- बिहार सरकार यहां क्रोकोडाइल रिहैबिलिटेशन एंड इंटरप्रिटेशन सेंटर खोलने की तैयारी में है, जानकार इसे संरक्षित क्षेत्र बनाने की जरूरत बता रहे।
संरक्षण प्रयासों से बिहार में मगरमच्छ की एक विलुप्तप्राय प्रजाति की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वर्ष 2010 में जहाँ मात्र 10–15 घड़ियाल पाए गए थे, वहीं अब इन जीवों की संख्या लगभग एक हज़ार पहुँच गयी है।
प्रकृति संरक्षण में जुटी संस्था इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर (आई.यू.सी.एन.) की रेड लिस्ट के अनुसार भारतीय घड़ियाल (गैवियालिस गैंगेटिकस) गंभीर रूप से लुप्तप्राय है। इस श्रेणी में उन प्रजातियों को रखा जाता है जिनकी प्रभावी संरक्षण के बिना विलुप्त होने की प्रबल सम्भावना है। आई.यू.सी.एन. रेड लिस्ट ने वर्ष 1982 में घड़ियाल को लुप्तप्राय और 2007 में गंभीर रूप से लुप्तप्राय घोषित किया था।
वर्ष 2010 में जब गैर सरकारी संगठन वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने इस घड़ियाल का सर्वेक्षण किया, तो बिहार में लगभग 300 कि.मी. की लंबाई में बहने वाली गंडक नदी में सिर्फ 10 घड़ियाल दिखे थे। सर्वेक्षणकर्ताओं का अनुमान था कि नदी में अधिक से अधिक पांच ही घड़ियाल और होंगे।
इन चिंताजनक आंकड़ों को देख कर बिहार सरकार और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने संरक्षण के प्रयास चालू किये और 2014–15 में पटना के संजय गांधी जैविक उद्यान से 30 किशोर घड़ियालों को लाकर गंडक नदी में छोड़ा।

अब गंडक नदी में वयस्क घड़ियालों की संख्या 433 हो गई है। किशोर और शिशु घड़ियालों को मिला कर यह संख्या एक हज़ार के करीब पहुंच रही है। यह जानकारी वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया की 2026 रिपोर्ट में सामने आयी है। इस संख्या के हिसाब से अब गंडक नदी घड़ियालों के लिहाज से चंबल के बाद देश की दूसरी सबसे प्रमुख नदी बन गई हो गई है।
गंडक घड़ियाल रिकवरी प्रोजेक्ट को लीड कर रहे वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के चीफ इकॉलॉजिट समीर कुमार सिन्हा ने मोंगाबे हिंदी को बताया कि 2007–08 में दुनिया भर में घड़ियालों की आबादी में काफ़ी कमी दर्ज की गयी थी और मात्र 200–250 प्रजनन-योग्य वयस्क रह गए थे। उन्होंने कहा कि ये घड़ियाल सिर्फ भारत और नेपाल में पाए गये थे, और पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार जैसे देशों से यह जीव विलुप्त हो गया था।
सिन्हा ने कहा कि लगातार चल रहे संरक्षण अभियान से घड़ियाल की स्थिति बेहतर हुई है। अब यह भारत और नेपाल में 14 जगहों पर दिखते हैं और सात जगहों पर प्रजनन करते हैं। इस मामले में चंबल नदी सबसे आगे है। उन्होने बताया कि बिहार में गंडक के अलावा कोसी, घाघरा, और महानंदा नदियों में भी कभी-कभार घड़ियाल दिखते हैं।
सिन्हा शुरुआत से ही गंडक घड़ियाल रिकवरी प्रोजेक्ट से जुड़े हैं। वे बताते हैं कि 1975 में भी एक बार गंडक नदी में घड़ियाल छोड़े गये थे, मगर उनका कहीं अता-पता नहीं चला। “इसलिए 2014–15 में जब इस नदी में घड़ियाल छोड़े गये, तो हम बहुत आश्वस्त नहीं थे। मगर जल्द हमें वहाँ एक–दो साल की उम्र के घड़ियाल दिखने लगे और 2016 में जब पहली बार हमें उस इलाके में घड़ियाल के अंडों का घोंसला मिला, तब लगा कि अब हमारा प्रयास कारगर हो गया है।”


सतत प्रयास
इस सफ़लता के पीछे इस परियोजना से जुड़े लोगों की कड़ी मेहनत है। यह टीम हर साल फरवरी महीने में गंडक के 180 कि.मी. लंबे उस तटीय इलाके की कड़ी निगरानी करती है जहाँ घड़ियालों की आबादी अधिक है। वहाँ घड़ियाल फरवरी में मेटिंग करते हैं और मार्च–अप्रैल में अंडे देते हैं। नदी के कटाव, पानी के बहाव, और मानव एवं जानवरों से इन अंडों को नुकसान होने का खतरा रहता है। ऐसे में टीम उन्हें ढूँढ कर सुरक्षित स्थान पर रखती है। जून के मध्य तक इन अंडों से घड़ियाल के बच्चे निकलते हैं, जिन्हें फिर नदी में छोड़ा जाता है।
इस प्रयास की सफलता को देखते हुए पश्चिमी चंपारण में बिहार सरकार एक क्रोकोडाइल रिहैबिलिटेशन एंड इंटरप्रिटेशन सेंटर खोलने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए बिहार सरकार के वन, पर्यावरण, एवं जलवायु परिवर्तन विभाग और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के बीच समझौता हुआ है।
सिन्हा मानते हैं कि यह एक महत्वपूर्ण कदम है, मगर इसके साथ-साथ इस पूरे इलाके को भी संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए। वे कहते हैं, “घड़ियालों के संरक्षण में बिहार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार को भी इसे प्रोत्साहन देना चाहिए। 3 मार्च, 2025, को गुजरात के जूनागढ़ में नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्डलाइफ की सातवीं बैठक में भी घड़ियालों के संरक्षण का मुद्दा उठा और पी.एम. मोदी की मौजूदगी में इसके लिए नई परियोजना की घोषणा हुई है। मगर यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि इसमें बिहार की क्या भागीदारी सुनिश्चित हुई है।”

फ़िलहाल बिहार सरकार का वन, पर्यावरण, एवं जलवायु परिवर्तन विभाग अपनी इस सफलता से उत्साहित है। राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक अभय कुमार ने मोंगाबे हिंदी को बताया, “घड़ियाल के संरक्षण के मामले में बिहार ने काफ़ी अच्छा काम किया है। यह कार्यक्रम लगभग एक दशक पहले गंडक नदी में 30 घड़ियाल के बच्चों को छोड़े जाने के साथ शुरू हुआ था। धीरे-धीरे, हमारी सच्ची संरक्षण कोशिशों से इनकी संख्या 10 गुना से ज़्यादा बढ़ गई है। अब हम बेतिया में क्रोकोडाइल रिहैबिलिटेशन एंड इंटरप्रिटेशन सेंटर बनाने की तैयारी में हैं। इससे हमारे संरक्षण के प्रयासों को बहुत बढ़ावा मिलेगा। घड़ियाल संरक्षण के मामले में देश में चंबल के बाद गंडक का ही स्थान है।”
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बहुतायत से बचाव तक
भारतीय उप-महाद्वीप में घड़ियाल कभी बहुतायत में पाया जाता था। वर्ष 1946 के बाद से अब तक भारत, नेपाल, और बांग्लादेश में घड़ियाल की आबादी में 94 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, मगर हाल के वर्षों में घड़ियालों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। नमामि गंगे कार्यक्रम एवं भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा वर्ष 2025 में प्रकाशित आंकलन के अनुसार नवंबर 2020 से मार्च 2023 के बीच देश की 22 नदियों में सर्वेक्षणों के दौरान 3,037 घड़ियाल पाए गए। हालाँकि इन में से केवल 13 नदियों में ही घड़ियाल मिले, जिससे मालूम होता है कि अधिकांश नदियों की स्थिति इस जीव के संरक्षण के लिए अनुकूल नहीं हैं।
घड़ियाल मात्र नदियों के प्रदूषण-मुक्त और मानवीय हस्तक्षेप-मुक्त हिस्सों में बसते हैं, अतः जब घड़ियालों के लिए नदी के किसी भाग को संरक्षित किया जाता है, तो वह भाग कछुओं, डॉल्फ़िन, और मछलियों की विभिन्न प्रजातियों के लिए भी अनुकूल बन जाता है।
घड़ियाल मगरमच्छ प्रजाति का ही एक जीव है। इसके नर प्रजाति के सिर पर घड़े जैसी आकृति होती है, जिसकी वजह से इसे घड़ियाल कहते हैं। घड़ियाल का मानव से संघर्ष नहीं के बराबर होता है और वह सिर्फ़ मछली खाता है। यह कमज़ोर और बीमार मछलियों को खा कर मछलियों में बीमारियों का फ़ैलाव रोकता है और साथ ही नदियों में मछलियों की संख्या और उनकी प्रजातियों में भी संतुलन बनाये रखता है।

बैनर तस्वीरः गंडक नदी के रेतीले तट पर घड़ियाल। लंबा और पतला जबड़ा इस प्रजाति की प्रमुख पहचान है। तस्वीर- वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया से साभार