- केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित कई परिवारों का आरोप है कि उनका नाम मुआवजा सूची में शामिल नहीं है, जबकि कुछ परिवार सूची में होने के बावजूद भुगतान का इंतजार कर रहे हैं।
- प्रभावित परिवार कथित गड़बड़ियों को लेकर लंबे समय से विरोध कर रहे हैं। हाल के महीनों में यह विरोध चिता, जल, मिट्टी, फांसी और चूल्हा बंद आंदोलन तक पहुंचा।
- आंदोलन के बाद प्रशासन ने छूटे हुए परिवारों के दोबारा सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन प्रभावित गांवों में अब भी कई सवाल और मांगें लंबित हैं।
- इसी बीच परियोजना का निर्माण आगे बढ़ रहा है। कुछ प्रभावित गांवों में घर तोड़े जा चुके हैं और कई परिवार भविष्य, मुआवजे और पुनर्वास को लेकर अनिश्चितता में हैं।
बराना नदी के किनारे वह जगह अब शांत है, जहां जुलाई में केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित लोगों का पंचतत्व सत्याग्रह चल रहा था। नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद आंदोलन स्थल का काफी हिस्सा बह चुका है, लेकिन चिता और फांसी सत्याग्रह के कुछ निशान अब भी दिखाई देते हैं। पास के पुल के नीचे मशीनों के चलने की आवाज लगातार सुनाई देती है। पुल के पास एक जगह बड़ी संख्या में चप्पलें भी पड़ी हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इनमें से कुछ चप्पलें 19 जुलाई को पुलिस की कार्रवाई के दौरान छूट गई थीं।
छतरपुर जिले के मैनारी गांव की 60-वर्षीया भागवती सौर भी इस आंदोलन में शामिल थीं। वह अपने गांव से करीब 30 किलोमीटर दूर कूपी गांव में बराना नदी के किनारे चल रहे सत्याग्रह में 4 जुलाई को पहुंची थीं। भागवती के मुताबिक, 19 जुलाई को पुलिस द्वारा आंदोलन स्थल खाली कराए जाने के बाद वह गांव वापस लौटीं।
भागवती बताती हैं कि उनके परिवार में पति-पत्नी और छः बच्चे हैं। परिवार के पास पांच कमरों का घर और करीब पांच एकड़ कृषि भूमि है, जहां आम, महुआ और अमरूद के पेड़ लगे हैं। उनका दावा है कि परियोजना से प्रभावित होने के बावजूद अब तक न उन्हें घर और जमीन का मुआवजा मिला है और न ही इससे जुड़ा कोई नोटिस।
“उचित मुआवजे के लिए हमने छतरपुर से भोपाल तक गुहार लगाई। जब सुनवाई नहीं हुई तो आंदोलन के जरिए आवाज उठानी पड़ी,” भागवती कहती हैं।
भागवती की शिकायत अकेली नहीं है। प्रभावित गांवों में कुछ परिवारों का नाम मुआवजा सूची से बाहर है, कुछ भुगतान का इंतजार कर रहे हैं, जबकि कई लोग मुआवजे की दर और सर्वे पर सवाल उठा रहे हैं। इन्हीं मुद्दों को लेकर अप्रैल और जुलाई 2026 में विरोध हुआ, जिसके बाद प्रशासन ने छूटे परिवारों के दोबारा परीक्षण का आदेश दिया।
इस परियोजना में 7,193 परिवार प्रभावित होंगे। प्रभावित 21 गांवों में भू-अर्जन की बात की गयी है। जिसमें 14 गांव छतरपुर जिले के और सात पन्ना जिले के हैं।

सूची से बाहर परिवार
छतरपुर जिले के पलकोंहाँ गांव के 75-वर्षीय अयोध्या अहिरवार कहते हैं कि उनके दो मंजिला, चार कमरों वाले घर, करीब दो एकड़ जमीन और विशेष पैकेज का मुआवजा नहीं मिला। उनके मुताबिक, उनका नाम मुआवजा सूची में नहीं है। वे सर्वे की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हैं।
“सर्वे घर-घर जाकर होना चाहिए था, लेकिन लोगों को एक जगह बुलाया गया। गांव में कई परिवार छूट गए,” अयोध्या कहते हैं। उनका यह भी दावा है कि सरकारी पट्टे वाली जमीन रखने वाले कुछ परिवारों को उसका मुआवजा नहीं मिला।
मैनारी गांव के 25-वर्षीय गणेश सौर भी सर्वे की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं। उन्हें छः कमरों के मकान के लिए करीब दो लाख रुपये का मुआवजा मिला है, जिसे वे कम मानते हैं। गणेश के मुताबिक, सर्वे के दौरान अधिकारी शुरुआत में उनके घर पहुंचे ही नहीं। बार-बार कहने और बहस के बाद एक अधिकारी उनका मकान देखने आया, लेकिन उनका आरोप है कि इसके बाद भी मकान और दूसरे संसाधनों का पूरा आकलन नहीं किया गया।
गणेश का कहना है कि गांव के दूसरे परिवारों ने भी ऐसी शिकायतें की हैं। उनके मुताबिक, कुछ मामलों में अधिकारी लोगों के घर और संपत्ति देखने के बजाय गांव के चबूतरे जैसी सार्वजनिक जगहों पर बैठकर दूसरे लोगों से जानकारी लेकर विवरण दर्ज कर रहे थे। गणेश का दावा है कि इस प्रक्रिया में कई परिवारों की जमीन, मकान और पेड़ों का सही विवरण दर्ज नहीं हुआ। प्रभावित परिवार इसी आधार पर दोबारा सर्वे की मांग कर रहे हैं।
दाऊधन गांव के 30-वर्षीय भज्जू कोदर की शिकायत अलग है। वे कहते हैं कि उन्हें घर और विशेष पैकेज का मुआवजा नहीं मिला। उनके मुताबिक, करीब दो साल पहले आई 429 लोगों की सूची में शामिल 29 लोगों को भी भुगतान नहीं हुआ था।

मुआवजे की दर और सर्वे पर सवाल
सुकवाहा गांव के 25-वर्षीय सोनू सौर बताते हैं कि उनकी करीब दो एकड़ जमीन के लिए 10 लाख रुपये का मुआवजा मिला। उनका कहना है कि आसपास जमीन करीब 12 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से बिक रही है। वे अपने घर पर करीब पांच लाख रुपये खर्च करने और उसके बदले लगभग दो लाख रुपये मुआवजा मिलने का दावा भी करते हैं।
कई ग्रामीणों की शिकायत का केंद्र सर्वे है। उनका कहना है कि परिवार, मकान, जमीन और दूसरे संसाधनों का आकलन ठीक से नहीं हुआ। सुकवाहा के सरपंच भगवान गोंड भी सर्वे को अव्यवस्थित बताते हैं। हालांकि, सर्वे में कितने परिवार छूटे, कितने नाम बाद में जोड़े गए और किन आधारों पर पात्रता तय हुई, इसका गांववार आधिकारिक आंकड़ा अभी मोंगाबे-हिंदी को नहीं मिला है।
छतरपुर के बिजावर तहसील के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) विजय द्विवेदी सर्वे के संबंध में कहते हैं कि, “परियोजना प्रभावित छतरपुर के 14 गांव में सर्वे किया जा चुका है। उसकी रिपोर्ट अभी सबमिट नहीं की गयी है। सर्वे की लिस्टिंग की जा रही है। कुछ दिन में रिपोर्ट सबमिट की जा सकती है। मुआवजे के संबंध में शासन के पास कोई आश्वासन नहीं था। मुआवजा वयस्क को एक पैकेज के रूप में 12 लाख 50 हजार स्वीकृत था। जबकि, जमीन का मुआवजा 12 लाख 50 हजार रुपये हेक्टेयर की स्वीकृति थी। वहीं, अन्य प्रापर्टी का मुआवजा उसकी वैल्यू के हिसाब से दिया गया।”
मकान की कीमत तय करने पर सवाल
कदवारा गांव के 36-वर्षीय विनोद अहिरवार अपने मकान के लिए तय मुआवजे को लेकर सवाल उठाते हैं। उनके पास चार कमरों का पक्का मकान है, जिसमें शौचालय और बाउंड्री भी बनी हुई है। विनोद के मुताबिक, मकान बनाने में करीब 10 लाख रुपये खर्च हुए थे, जबकि उन्हें मिले मुआवजा नोटिस में 1,31,187 रुपये की राशि दर्ज है।
इसी परिवार में विनोद के भाई दिनेश अहिरवार के दो कमरों और शौचालय वाले मकान के लिए नोटिस में 99,533 रुपये का मुआवजा दर्ज है। उनके पिता आनंदी अहिरवार के दो मंजिला मकान के लिए 1,13,845 रुपये की राशि तय की गई है।
विनोद का दावा है कि एसडीएम स्वयं उनका मकान देखने आए थे और उन्होंने भी मुआवजा कम होने की बात कही थी। हालांकि, इस दावे की पुष्टि प्रशासन से होना बाकी है।
केन-बेतवा परियोजना के लिए केंद्र सरकार के मुताबिक, अधिग्रहित जमीन का मुआवजा भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के तहत तय राशि या 12.50 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर, इनमें जो अधिक हो, उसके आधार पर दिया जा रहा है। मकान, पेड़, कुएं और दूसरी संपत्तियों की कीमत अलग से तय की जाती है। पात्र परिवारों के लिए ग्रामीण प्लॉट के मद में सात लाख रुपये और प्लॉट नहीं लेने वालों के लिए 12.50 लाख रुपये की एकमुश्त सहायता का भी प्रावधान है।
मकान के लिए कोई एक तय प्रति कमरा दर नहीं है। कानून के अनुसार उसका मूल्यांकन संबंधित विशेषज्ञ या इंजीनियर के जरिए किया जाना है।

आंदोलन के बाद दोबारा सर्वे, लेकिन मुआवजे पर इंतजार
मुआवजा और पुनर्वास को लेकर विरोध कई वर्षों से चल रहा है। आंदोलन से जुड़े हिसाबी राजपूत के मुताबिक, ज्ञापन और स्थानीय प्रदर्शन से शुरू हुआ विरोध बाद में रैलियों और अनशन तक पहुंचा। वर्ष 2023 में प्रभावितों ने 18 दिन तक चिता आंदोलन और आमरण अनशन किया। सुकवाहा, घूघरी, भौरखुवा, कदवारा और पलकोंहाँ सहित प्रभावित गांवों में अधिकारियों और कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई। आदेश में कहा गया कि पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन पैकेज से जुड़े आवेदन लगातार आ रहे थे और कुछ पात्र परिवारों के नाम सूची में शामिल नहीं थे।
एसडीएम द्विवेदी के अनुसार, अब तक इन 14 गांवों में आबादी क्षेत्र के लिए 84 करोड़ रुपये और निजी जमीन के लिए 267 करोड़ रुपये का मुआवजा वितरित किया जा चुका है। इसके अलावा 3,718 परिवारों को कुल 464 करोड़ रुपये की पैकेज राशि दी गई है।
हालांकि, हाल ही में जनसंपर्क छतरपुर के फेसबुक पेज पर वीडियो सहित कलेक्टर मृणाल मीणा द्वारा दी गयी केन-बेतवा लिंक परियोजना संबंधित जानकारी को साझा किया गया है। जिसमें कलेक्टर ने जानकारी दी है कि, केन-बेतवा लिंक परियोजना से संबंधित 5 गांवों के 59 प्रभावित व्यक्तियों के लिए 7.37 करोड़ की राशि की स्वीकृत की गई है। वहीं, प्रभावितों 14 ग्रामों में पुनः सर्वे करने हेतु राजस्व की टीम को निर्देशित किया है। कोई भी पात्र हितग्राही मुआवजा से छूटे नहीं, इसके लिए दोबारा सर्वे किया जाएगा।
पुनर्वास के वादे और जमीन पर हकीकत
रिपोर्ट के मुताबिक, 4 अक्टूबर 2023 के एक आदेश में पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन के तहत प्रभावित परिवारों के लिए विभिन्न भत्तों और बुनियादी सुविधाओं का प्रावधान बताया गया है। इनमें परिवहन, मकान, पानी, स्वास्थ्य, स्कूल जैसी सुविधाओं का जिक्र किया गया।
मुआवजे की गणना में केवल जमीन, मकान और विशेष पैकेज ही शामिल हैं या फलदार पेड़, कुएं, पशु शेड, आजीविका के दूसरे साधन और सामुदायिक संसाधनों के लिए भी अलग प्रावधान है। भागवती जैसे परिवार पेड़ों और अन्य संसाधनों के नुकसान की बात कर रहे हैं, लेकिन इनके मूल्यांकन का आधार स्पष्ट नहीं है।
एसडीएम द्विवेदी के अनुसार, मुआवजा प्रापर्टी के वैल्यू के आधार पर दिया गया है। केवल ज़मीन का मुआवजा 12 लाख 50 हजार रुपए हेक्टेयर दिया गया है।
मई 2026 में तत्कालीन छतरपुर कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने मोंगाबे-हिन्दी से बातचीत में कहा था कि प्रभावितों को जमीन, मकान और प्रति वयस्क सदस्य 12.50 लाख रुपये के विशेष पैकेज के रूप में मुआवजा दिया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा था कि छूटे हुए नामों की जांच के लिए टीमें काम कर रही हैं और प्रभावितों की मांगें वरिष्ठ कार्यालयों को भेजी गई हैं।
कलेक्टर आफिस छतरपुर के फेसबुक पेज पर 13 मई 2026 को तत्तकालीन कलेक्टर जैसवाल का वीडियो साझा किया गया है। वीडियो के जरिए कलेक्टर ने 700 करोड़ रुपये मुआवजा वितरण की जानकारी दी।

अब कौन-सी मांगें बाकी हैं
आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि उनकी कई प्रमुख मांगें अब भी पूरी नहीं हुई हैं। इनमें भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास कानून, 2013 का पूरा पालन, उचित पुनर्वास के बिना किसी परिवार को न हटाना, प्रत्येक विस्थापित परिवार को तीन एकड़ जमीन देना और पात्रता की कट-ऑफ-डेट को 2026 तक बनाए रखना शामिल है। आंदोलनकारी परियोजना और मुआवजा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच की भी मांग कर रहे हैं। इसके साथ उनका कहना है कि परियोजना के लाभ और नुकसान पर सार्वजनिक स्तर पर विस्तृत चर्चा हो और जल, जंगल, जमीन तथा पर्यावरण से होने वाले नुकसान को भी पुनर्वास और मुआवजे की प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर का कहना है कि मामला केवल मुआवजे की रकम तक सीमित नहीं है। प्रभावित परिवारों की आजीविका, जमीन और भविष्य भी इससे जुड़े हैं। उनके मुताबिक, पुनर्वास नीति के पालन और अलग-अलग परिवारों को मिले मुआवजे में अंतर को लेकर अब भी सवाल बने हुए हैं।
और पढ़ेंः केन-बेतवा परियोजना आगे बढ़ी, लेकिन नदियों को जोड़ने से सूखे की आशंका
करीब एक साल से आंदोलन से जुड़े ध्रुव पांडे अमित भटनागर की टीम से जुड़े हैं और सर्वे का दायित्व संभाल रहे हैं। वे पहले डेटा साइंटिस्ट के तौर पर काम करते थे। वे गांव-गांव सर्वे करने जा रहे हैं। अब तक प्रभावित 14 में से 9 गांव में 65 प्रतिशत मुआवजा का सर्वे कर चुके हैं। इसके अलावा वे टीम में दस्तावेजीकरण का कार्य भी करते हैं। पांडे कहते हैं, “प्रभावित परिवार पीढ़ियों से खेती और जंगल पर निर्भर रहे हैं। बहुत से लोगों के पास खेती के अलावा आजीविका का कोई दूसरा साधन नहीं है। इसलिए कई परिवार जमीन के बदले जमीन की मांग कर रहे हैं। अगर जमीन नहीं दी जाती है, तो उनकी मांग है कि ऐसा मुआवजा मिले जिससे वे दूसरी जगह अपनी आजीविका दोबारा शुरू कर सकें।”
एलएलबी की छात्रा दिव्या अहिरवार की भूमिका आंदोलन में महिलाओं को एकजुट करने और महिलाओं को मुआवजा कम मिलने ना मिलने के तथ्यों को जुटाने में है। साथ में वे महिलाओं को मुआवजे के कानूनी अधिकारों के प्रति भी जागरूक कर रही है। उनका कहना है कि कई परिवारों के लिए सवाल केवल घर या जमीन की कीमत का नहीं, बल्कि विस्थापन के बाद दोबारा जीवन और आजीविका स्थापित करने का भी है।
तस्वीरः कदवारा गांव में बैठे केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित कुछ ग्रामीण। तस्वीर- सतीश भारतीय