- सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड के सारंडा वन प्रभाग के एक-तिहाई से ज्यादा हिस्से को तीन महीने के अंदर वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का आदेश दिया है। देश में शायद यह पहला मौका है जब कोई अभयारण्य शीर्ष अदालत के आदेश से अस्तित्व में आएगा।
- हाथी और दुर्लभ वन्यजीवों और वनस्पतियों से भरपूर होने के साथ-साथ इस इलाके में लौह-अयस्क भी प्रचुर मात्रा में है जिस वजह से यहां की जैव-विविधता पर बुरे असर को लेकर चिंता जताई जाती रही है।
- सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में बदलाव करते हुए संरक्षित क्षेत्रों के एक किलोमीटर के दायरे में खनन पर पाबंदी को गोवा से बढ़ाकर पूरे देश में लागू करने का आदेश भी दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने दुनिया में साल के सबसे प्राचीन जंगलों में एक सारंडा के 31,468.25 हेक्टेयर (करीब 314 वर्ग किलोमीटर) क्षेत्रफल को वन्यजीव अभयारण्य बनाने का आदेश दिया है। 13 नवंबर को 71 पेज के विस्तृत आदेश में अदालत ने कहा कि ओडिशा और छत्तीसगढ़ राज्यों के जंगलों से जुड़े हुए सारंडा में भरपूर जैव-विविधता है जहां वन्यजीवों खासकर हाथियों की आवाजाही के लिए कई गलियारे हैं। इस वन क्षेत्र में कई दुर्लभ वनस्पतियां और वन्यजीव भी पाए जाते हैं।
इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने वाले वन्यजीव जीवविज्ञानी दया शंकर श्रीवास्तव की वकील शिबानी घोष ने मोंगाबे हिंदी से कहा, “हमने अपनी दलीलों में कहा कि झारखंड सरकार वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा का अपना संवैधानिक दायित्व पूरा करने में विफल रही है। सारंडा में खनन गतिविधियों से पर्यावरण और कोइना नदी पर बुरा असर पड़ा है।“
झारखंड सरकार की दलीलें खारिज
700 पहाड़ियों से घिरे सारंडा वन प्रभाग का कुल क्षेत्रफल 816 किमी से अधिक है। एकीकृत बिहार में 16 फरवरी, 1968 को इसका 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र सारंडा गेम सेंचुरी घोषित किया गया था। झारखंड गठन के बाद भी इसे इको-सेंसेटिव जोन घोषित नहीं करने पर प्रतिष्ठित वन्यजीव वैज्ञानिक डॉ आरके सिंह ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की पूर्वी बेंच में याचिका दायर की। एनजीटी ने 2022 में अपने आदेश में राज्य से यह विचार करने को कहा कि क्या इसे अभयारण्य घोषित करने की जरूरत है, क्योंकि राज्य ने अपने अलग-अलग हलफनामों में कहीं भी यह नहीं कहा है कि यहां वन्यजीव नहीं हैं।
इस फैसले के बाद भी अभयारण्य घोषित नहीं होने से यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। राज्य सरकार ने 10 नवंबर, 2024 से 17 अक्टूबर, 2025 तक शीर्ष अदालत में सात बार हलफनामा देकर अपना पक्ष कई बदला। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी भी जताई और राज्य के सबसे बड़े अधिकारी यानी मुख्य सचिव को हाजिर होने का आदेश दिया।

कोर्ट ने कहा, “झारखंड ने यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि 1968 की अधिसूचना में अधिसूचित 126 कंपार्टमेंट में ना तो कभी खनन किया गया है और ना ही इन उद्देश्यों के लिए वन भूमि आवंटित की गई है। इसके बाद, (झारखंड) ने अपना रुख बदला जिसमें 31,468.25 हेक्टेयर की जगह 57,519.41 हेक्टेयर को अभयारण्य घोषित करने पर विचार करने की बात कही गई। राज्य सरकार ने एक बार फिर अपनी राय बदलते हुए महज 24,941.64 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने का प्रस्ताव रखा।”
घोष कहती हैं, “ इस आदेश के जरिए यह सख्त संदेश भी दिया गया है कि राज्य सरकारें बार-बार अपना पक्ष बदलकर अदालतों को हल्के में नहीं ले सकती हैं।”
सुनवाई के दारान अदालत ने एमिक्स क्यूरी के परमेश्वर की यह दलील मानी कि वन्यजीव (संरक्षण) कानून के तहत सारंडा में अभयारण्य घोषित करने का दायित्व राज्य सरकार पर है। प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की अगुवाई वाली खंडपीठ ने कहा, “इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि सारंडा को वन्यजीव (संरक्षण) कानून की धारा 26A के तहत संरक्षण की जरूरत है।“
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा, “हम निर्देश देते हैं कि राज्य सरकार 1968 की अधिसूचना में अधिसूचित 126 कंपार्टमेंट वाले क्षेत्रों को (छह कंपार्टमेंट यानी केपी-2, केपी-10, केपी-11, केपी-12, केपी-13 और केपी-14 को छोड़कर) इस फैसले की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर वन्यजीव अभयारण्य के रूप में अधिसूचित करे।” जिन कंपार्टमेंट को आदेश से बाहर रखा गया है, उनका कुल क्षेत्रफल 4.31 हेक्टेयर है और यहां खनन से जुड़ी गतिविधियां होती हैं।

डॉ सिंह ने कहा, “हमने जितने भू-भाग को अभयारण्य बनाने की मांग की थी, कोर्ट ने उसे मान लिया है। लेकिन, हमें इस बात का मलाल है कि सारंडा का इससे भी बड़ा इलाका अभयारण्य बन सकता है और इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।“
सुप्रीम कोर्ट ने गोवा फाउंडेशन से जुड़े मामले में गोवा में संरक्षित क्षेत्रों की सीमा के एक किलोमीटर के दायरे में खनन गतिविधियों पर रोक लगाई थी। शीर्ष अदालत ने इस फैसले को संशोधित कर पूरे देश में लागू कर दिया, “अब राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य के भीतर और ऐसे राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य की सीमा से एक किलोमीटर के क्षेत्र में खनन की अनुमति नहीं होगी।”
टिकाऊ खनन पर जोर
सारंडा में लौह-अयस्क का भी बड़ा भंडार है। इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस के मुताबिक अच्छी श्रेणी के लौह-अयस्क हेमेटाइट के मामले में ओडिशा के बाद झारखंड दूसरे पायदान पर है। 2022-23 में राज्य में लौह-अयस्क की 14 खदानें चल रही थी और कुल उत्पादन 23,091 टन था। इस क्षेत्र का लगभग सम्पूर्ण लौह समृद्ध खनन क्षेत्र घने जंगलों के भीतर है।
शीर्ष अदालत में राज्य सरकार के वकील कपिल सिब्ब्ल ने दलील दी कि पूरे क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने से खनन रुक जाएगा और रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे।
लेकिन,कोर्ट ने अपने आदेश में देहरादून स्थित भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) की रिपोर्ट पर बने मैनेजमेंट प्लान फॉर सस्टेनेबल माइनिंग (MPSM) का हवाला दिया और कहा, “उपरोक्त क्षेत्र में साल के पेड़ और उससे जुड़ी दूसरी वनस्पतियां पहले ही नष्ट हो चुकी हैं और इससे पर्यावरण प्रभावित हुआ है। इसलिए, हर खदान में उत्पादन की सीमा तय करना जरूरी है।”
कोर्ट ने सारंडा में अवैध खनन पर जस्टिस एमबी शाह रिपोर्ट के हवाले से कहा, “इस पर गंभीरता से विचार किया जाए कि जिस प्राकृतिक वन को इस शानदार स्थिति तक पहुंचने में लाखों साल लगे हैं, उसे 12-13 साल तक चलने वाली एक खदान के लिए खत्म कर दिया जाए।”
दरअसल, एमपीएसएम में जिन कंपार्टमेंट को संरक्षित क्षेत्र/गैर-खनन क्षेत्र (यानी टीके-8, टीके-9, टी-4, टी-5, टी-6, टी-25 से टी-32) के रूप में पहचाना गया है, राज्य सरकार ने उन्हें भी वन्यजीव अभयारण्य से बाहर रखने की मांग की गई थी जिसे शीर्ष अदालत ने नहीं माना।

सारंडा में नए खनन पट्टों के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले और जमशेदपुर पश्चिम से विधायक सरयू राय इस आदेश के दूरगामी असर की तरफ इशारा करते हैं, “एमपीएसएम में सारंडा और खनन और गैर-खनन क्षेत्र में बांटा गया है। अभयारण्य बनने के बाद बाकी बचे इलाके में भी एमपीएसएम के प्रावधान लागू होंगे। इसलिए गैर-खनन क्षेत्र में भी खनन नहीं हो सकता है।
दूसरी तरफ, एमपीएसएम का हवाला देते हुए डॉ सिंह कहते हैं, “पट्टाधारक अभी तक हर साल 25 मिलियन टन भी खनन नहीं कर पा रहे हैं, जबकि रिपोर्ट कहती है कि इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करके मौजूदा खदानों से ही 100 मिलियन टन लौह-अयस्क का खनन किया जा सकता है। एमपीएसएम के मुताबिक अभी लौह-अयस्क का इतना भंडार है कि अगले 50 साल तक की जरूरतें पूरी हो सकती हैं और कोई नया वन क्षेत्र तोड़ने की जरूरत नहीं है।”
श्रीवास्तव भी खनन पट्टाधारकों की दलील को नामंजूर करते हुए कहते हैं, “सेल जैसी महारत्न कंपनी को जैव-विविधता से भरपूर सारंडा में पर्यावरण का पूरा ध्यान रखन चाहिए, ताकि आसपास की नदियों में इनके वाशरी का प्रदूषित पानी नहीं जाए। लौह-अयस्क की ढुलाई रोड की जगह कन्वेयर बेल्ट से की जानी चाहिए और ग्रामीणों के बीच पर्यावरण के प्रबंधन की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए।”
घोष इस फैसले को नए नजरिए से भी देखती हैं, “इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हितधारकों से चर्चा के बाद एक्सपर्ट की ओर से तैयार एमपीएसएम और भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट को अहमियत दी है। पर्यावरण से जुड़े मामलों में आगे भी ऐसी पेचीदा परिस्थितियां बन सकती हैं। इसलिए, अगर पहले से कोई रिपोर्ट उपलब्ध है, कोई एक्सपर्ट संस्था है, तो कोर्ट उनके सुझाव पर भी गौर करेगा।”
विस्थापन होने की दलील नामंजूर
सारंडा के घने जंगलों के बीच में कई गांव भी बसे हुए हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां करीब 50 हजार लोग रहते थे।
झारखंड सरकार के वकील कपिल सिब्ब्ल ने दलील दी कि सारंडा संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत अधिसूचित है। इस क्षेत्र में सदियों से हो, मुंडा, उरांव और संबंधित आदिवासी समुदाय निवास करते रहे हैं, जिनका जीवनयापन और सांस्कृतिक परंपराएं मूल रूप से वनोपज से जुड़ी हैं।
इस मसले पर झारखंड सरकार ने भी सारंडा में अभयारण्य बनाने पर ग्रामीणों की राज्य जानने के लिए वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की अगुवाई में पांच सदस्यों का मंत्रीसमूह गठित किया था।
झारखंड सरकार ने यह भी दलील दी कि हाल में इलाके के दौरों के दौरान, मूल निवासी और जंगल पर गुजर-बसर करने वाले समुदायों के बीच अपनी पैतृक भूमि से संभावित विस्थापन के संबंध में वास्तविक आशंकाएं दर्ज की गई थीं।
लेकिन, शीर्ष अदालत ने इन दलीलों को वन्यजीव (संरक्षण) कानून और वनाधिकार कानून में दी गई छूट का हवाला देकर खारिज कर दिया।

घोष ने मोंगाबे-हिंदी से इसकी वजह बताई, “सारंडा वन प्रभाग पहले से ही रिजर्व फॉरेस्ट है, वहां सभी अधिकार पहले से ही तय हैं। इसलिए, राज्य सरकार यह नही कह सकती थी कि हमें नोटिस जारी करके अधिकार तय करने होंगे। वनाधिकार कानून से जुड़े अधिकार पूरी तरह अलग हैं।”
अभयारण्य बनने से कथित विस्थापन के खिलाफ पिछले कुछ महीनों से आंदोलन कर रहे कोल्हन-पोड़ाहाट सारंडा बचाओ समिति ने कहा कि विस्थापन को लेकर राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत में हमारी बात रखी और कोर्ट ने इसे माना। संगठन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सारंडा के निवासियों के हित में बड़ी जीत बताया।
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श्रीवास्तव भी मानते हैं कि मूल निवासियों के बिना सारंडा को बचाना संभव नहीं होगा। उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “सारंडा के दुलर्भतम जीव-जंतुओं को वन विभाग नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय बचाता है। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि स्थानीय समुदायों को मजबूत कर इस जंगल का संरक्षण किया जाए।”
सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश का व्यापक प्रचार करने का भी निर्देश दिया, “हम झारखंड राज्य को इस तथ्य का व्यापक प्रचार करने का निर्देश देते हैं कि इस फैसले से उक्त क्षेत्र के आदिवासियों और वनवासियों के ना तो व्यक्तिगत अधिकार और न ही सामुदायिक अधिकार प्रभावित होंगे। राज्य इस तथ्य का भी व्यापक प्रचार करेगा कि वन अधिकार कानून की धारा 4 की उप-धारा (1) के साथ धारा 3 के प्रावधान के मद्देनजर आदिवासियों और वनवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों अधिकार सुरक्षित रहेंगे।”
बैनर तस्वीरः झारखंड में एक खनन क्षेत्र। राज्य ने हाल ही में लोगों पर कोयला खदानों के बंद होने के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया है। तस्वीर- मनीष कुमार / मोंगाबे