- हाल ही में सामने आए एक अध्ययन से भारतीय सुंदरबन में जंगली बिल्ली और मछली पकड़ने वाली बिल्ली (फिशिंग कैट) के मल में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी का पता चला है।
- जंगली बिल्लियों के मल में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा ज्यादा पाई गई। इन प्लास्टिक में कपड़ों, मछली पकड़ने के उपकरणों और पैकेजिंग से जुड़े रेशों का हिस्सा सत्तर फीसदी से अधिक था।
- इन नतीजों से पर्यावरण से सीधे संपर्क और प्रदूषित शिकार के जरिए खान-पान में प्लास्टिक के पहुंचने का संकेत मिलता है जिससे सुंदरबन क्षेत्र में प्लास्टिक प्रबंधन को और मजबूत करना जरूरी हो जाता है।
सुंदरबन के पारिस्थितिकी तंत्र में लंबे समय से बोतलों, खाने के रैपर, मछली पकड़ने के जाल और दूसरे सामान जैसे कचरे के रूप में प्लास्टिक प्रदूषण दिखाई देता रहा है। लेकिन, जो पहलू बहुत हद तक अनदेखा रहा है, वह है माइक्रोप्लास्टिक (5 मिमी से छोटे कण) और मेसोप्लास्टिक (5–25 मिमी आकार के कण) की इन आवासों के भीतर और उनके बीच होने वाली आवाजाही।
पिछले साल ‘एनवायरनमेंटल रिसर्च’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन से जंगली बिल्ली (फीलिस चाउस) और मछली पकड़ने वाली बिल्ली (प्रियोनाइलुरस विवेरिनस) के मल में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी का पता चला है। इससे अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य-श्रृंखला के विभिन्न स्तरों के बीच प्लास्टिक के प्रसार को लेकर चिंता बढ़ गई है।
शोधकर्ताओं ने भारतीय सुंदरबन और उससे लगे तटीय क्षेत्रों में छोटी बिल्ली की इन प्रजातियों के मल में माइक्रोप्लास्टिक और मेसोप्लास्टिक की मौजूदगी के बारे में बताया है।

यह अध्ययन क्षेत्र के मैंग्रोव-मुहाना (एस्टुअराइन) प्रणालियों में प्लास्टिक पर सालों के शोध के बाद सामने आया है।
इस अध्ययन के मुख्य लेखक और पश्चिम बंगाल के रहारा स्थित रामकृष्ण मिशन विवेकानंद शताब्दी कॉलेज के डॉक्टोरल फेलो श्रयन भट्टाचार्य कहते हैं, “हम पहले ही मिट्टी, पानी और मुहानों के पास मिलने वाली मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक की पहचान कर चुके थे। इसी ने हमें इस पारिस्थितिकी तंत्र में ऊपर के मांसाहारी जीवों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की जांच करने के लिए प्रेरित किया।”
जंगली बिल्ली और मछली पकड़ने वाली बिल्ली मध्यम आकार के मांसाहारी जीव हैं। ये मुख्य रूप से मछलियों, केकड़ों, कृन्तकों (रोडेंट), उभयचरों, पक्षियों और सरीसृपों को खाते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र में इनकी अहमियत के बावजूद, इन दोनों प्रजातियों पर बहुत कम अध्ययन हुए हैं और ऐसा उभरते हुए प्रदूषकों के दुष्प्रभावों के संदर्भ में ज्यादा है। भट्टाचार्य कहते हैं, “हमने पाया कि गंगा का मुहाना इन दो अहम बिल्ली-प्रजाति के जीवों के लिए साझा आवास क्षेत्र है और माइक्रोप्लास्टिक पर वैज्ञानिक कामों की कमी थी। मछली पकड़ने वाली बिल्ली के लिए अकेला तुलनात्मक अध्ययन श्रीलंका से उपलब्ध था।”
मल से मिली जानकारी
शोधकर्ताओं ने मल विश्लेषण (स्कैट एनालिसिस) का सहारा लिया जो गैर-आक्रामक तरीका है। इसका इस्तेमाल खान-पान तथा निगरानी संबंधी अध्ययनों में तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने भारतीय सुंदरबन के पश्चिमी गैर-संरक्षित क्षेत्र से फरवरी से जुलाई 2023 के बीच नमूने एकत्र किए। इस इलाके में पर्यटन, मछली पालन और अनियंत्रित कचरा निपटान जैसी मानवीय गतिविधियां बहुत अधिक हैं। अध्ययन में बताया गया है, “यह शोध सुंदरबन बायोस्फीयर रिजर्व के गैर-संरक्षित क्षेत्रों में किया गया, क्योंकि सुंदरबन के पूर्वी हिस्से को टाइगर रिजर्व के तौर पर सख्ती से नियंत्रित किया जाता है।”
मल के सभी नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए। मछली पकड़ने वाली बिल्ली के मल (10.5 ± 2.12 MP/g d.w) की तुलना में जंगली बिल्लियों (12.6 ± 1.93 MP/g d.w) के नमूनों में इनकी मात्रा अधिक थी। यही नहीं, प्लास्टिक के थोड़े बड़े टुकड़े (मेसोप्लास्टिक) भी पाए गए। ये खास तौर पर मछली पकड़ने वाली बिल्ली के मल में मिले जहां हर नमूने में दो से चार तक कण मिले और माइक्रोप्लास्टिक के रेशे सबसे ज्यादा पाए गए। इनकी संख्या जंगली बिल्ली की तुलना में फिशिंग कैट में अधिक थी और ये पाए गए कुल माइक्रोप्लास्टिक का 70% से भी ज्यादा हिस्सा थे। इनमें से अधिकतर रेशे पारदर्शी, नीले या लाल रंग के थे। ये रंग ऐसे हैं जो आमतौर पर कपड़ों, मछली पकड़ने के सामान और पैकेजिंग सामग्री में इस्तेमाल होते हैं।
भट्टाचार्य कहते हैं, “रेशा खास तौर पर चिंतित करने वाला है, क्योंकि ये पानी में लंबी दूरी तय करते हैं, आसानी से निगले जाते हैं और संभवतः शिकार प्रजातियों से होते हुए शिकारी तक पहुंचते हैं।”
इन पॉलीमर कणों का जब जोखिम मूल्यांकन किया गया, तो नतीजे और चौंकाने वाले थे। इनसे पॉलीएथिलीन और एथिलीन विनाइल अल्कोहल की पहचान हुई। इन पॉलीमर का इस्तेमाल पैकेजिंग, मछली पकड़ने के उपकरणों और औद्योगिक उत्पादों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। उनके रासायनिक विषाक्तता स्कोर के आधार पर जंगली बिल्लियों में पाए जाने वाले माइक्रोप्लास्टिक को पॉलीमर खतरा सूचकांक में ‘बहुत ज्यादा खतरे वाली’ जबकि मछली पकड़ने वाली बिल्लियों के माइक्रोप्लास्टिक को ‘खतरनाक’ श्रेणी में रखा गया।

संपर्क मार्ग और इसके नतीजे
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि संपर्क के दो मुख्य रास्ते एक साथ काम कर रहे हैं: पहला, प्रदूषित पर्यावरण से सीधे ग्रहण और दूसरा, शिकार के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से निगलना।
कलकत्ता विश्वविद्याल के प्राणीशास्त्र विभाग और ग्लोबल फिशिंग कैट डिस्ट्रीब्यूशन के आईयूसीएन रेड लिस्ट में आकलनकर्ता सम्राट चक्रवर्ती और कहते हैं, “माइक्रोप्लास्टिक अब आर्द्रभूमि के पानी, तलछट और शिकार बनने वाली प्रजातियों (मछलियां, उभयचर, पक्षी और कृंतकों) में बड़े पैमाने पर फैल चुके हैं। ये भोजन के जरिए शरीर में पहुंचते हैं, लेकिन दूषित पानी, हवा में मौजूद कणों को सांस के जरिए अंदर लेने और जहरीले रसायन वाले प्लास्टिक के संपर्क में आने से भी इसका असर हो सकता है। “ये रास्ते तुरंत मौत का कारण बनने के बजाय, लंबे समय में सेहत पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता पैदा करते हैं।”
भट्टाचार्य कहते हैं, “यहां माइक्रोप्लास्टिक मुख्य रूप से तीन अलग-अलग रास्तों से पहुंचता है। पहला, ऊपर की ओर बहने वाली नदियों द्वारा मुहाने तक लाया और जमा किया गया कचरा; दूसरा, समुद्र के रास्ते आया कचरा और सबसे अहम है तीसरा जिसमें स्थानीय स्तर पर पैदा हुआ प्लास्टिक कचरा है जो घरेलू इस्तेमाल, पर्यटन और मछली पकड़ने की गतिविधियों से आता है।”
यह अध्ययन इन नतीजों को इस क्षेत्र में प्रदूषण से जोड़कर व्यापक स्तर पर देखता है। हिमालय से बंगाल की खाड़ी तक बहने वाली गंगा नदी ऊपरी इलाकों में पैदा होने वाले प्लास्टिक कचरे (ज्यादातर रेशे) के लिए बड़े कन्वेयर बेल्ट के तौर पर काम करती है। यह नदी बड़ी मात्रा में ऐसे कचरे को भी अपने साथ बहाकर ले जाती है जो न तो बायोडिग्रेडेबल है और न ही खनिज-आधारित। भट्टाचार्य बताते हैं, “हमने इन सभी को मिलाकर ‘मानव-जनित गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरा’ (ANBW) नाम दिया है और यह प्लास्टिक, रबर, सिंथेटिक रेजिन और औद्योगिक रसायनों से मिलकर बना होता है।”
अनुमान है कि हर दिन एक से तीन अरब माइक्रोप्लास्टिक के कण बंगाल की खाड़ी में पहुँचते हैं जो चिंताजनक है। एक बार जब ये गंगा के मुहाने में प्रवेश कर जाते हैं, तो ज्वार-भाटा के कारण ये और अधिक सघन हो जाते हैं या इधर-उधर आवाजाही करते हैं और मैंग्रोव के भीतर फंस जाते हैं।

छोटी बिल्ली की ये प्रजातियां कृंतकों, उभयचरों, मछलियों और पक्षियों जैसे जानवरों का शिकार करती है। यह ऐसी प्रजातियां हैं जिनके बारे में पहले से पता है कि वे प्रदूषित वातावरण में माइक्रोप्लास्टिक को निगलती हैं और अपने शरीर में जमा करती हैं।
भट्टाचार्य कहते हैं, “बाघ या शेर जैसे बड़े मांसाहारी जानवरों के विपरीत, ये छोटी बिल्लियां अक्सर अपने शिकार को उनके पेट और आंतों समेत पूरा का पूरा खा जाती हैं जहां अक्सर माइक्रोप्लास्टिक जमा हो जाते हैं। इसलिए, अगर शिकार पहले से ही दूषित है, तो वह सारा प्रदूषण उस बिल्ली के शरीर में चला जाता है।” यह स्थिति खाद्य-श्रृंखला में स्थानांतरण और जैव-वृद्धि को लेकर चिंता बढ़ाती है: खाद्य श्रृंखला के हर अगले स्तर पर जानवरों में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ती जाती है, क्योंकि बड़े शिकारी जानवर छोटे जानवरों का शिकार करते हैं। अन्य अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करते हैं। इनके नतीजों से पता चलता है कि शाकाहारी जानवरों की तुलना में मांसाहारी जानवरों में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा ज्यादा होती है।
इसके अलावा, बिल्लियों का आवास कहां है, यह बात भी उतनी ही मायने रख सकती है। चक्रवर्ती बताते हैं, “जंगली बिल्ली का खान-पान और इलाका ज्यादा बड़ा होता है, जिससे उनके दूषित शिकार के संपर्क में आने की संभावना बढ़ जाती है; लेकिन मछली पकड़ने वाली बिल्ली का खान-पान अधिक खास होने के बावजूद, वे भी उतनी ही या उससे ज्यादा जोखिम में हो सकती हैं, क्योंकि पानी में मिलने वाले शिकार में अक्सर माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बहुत अधिक होती है।”
वैसे, इस अध्ययन में ऊतकों की सीधे जांच नहीं की गई, लेकिन बहुत छोटे माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी शरीर के अंदर जमा होने की संभावना पर सवाल उठाती है। 150 माइक्रोमीटर से छोटे कणों के बारे में बताया गया है कि वे आंतों की बाधा को पार कर सकते हैं, जिससे सूजन, ऑक्सीडेटिव तनाव और कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है।
हालांकि, यह अध्ययन शीर्ष शिकारी बंगाल टाइगर में संभावित जैव-वृद्धि और संचय को लेकर चिंता जताता है, लेकिन सह-लेखक और पश्चिम बंगाल के रहारा स्थित रामकृष्ण मिशन विवेकानंद शताब्दी कॉलेज में सहायक प्रोफेसर अरुणव मुखर्जी सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। वह कहते हैं, “हमें घबराना नहीं चाहिए। लंबी अवधि के संपर्क से कोशिकीय विषाक्तता, प्रजनन संबंधी असामान्यताएं और शारीरिक तनाव हो सकता है, लेकिन जठरांत्र मार्ग के जरिए माइक्रोप्लास्टिक का संचय उच्च स्तनधारियों में अभी तक अच्छी तरह स्थापित नहीं हुआ है।”
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संरक्षण के उपाय
मछली पकड़ने वाली बिल्ली और जंगली बिल्ली जैसे मेसोकार्निवोर (खान-पान में 70 फीसदी तक मांस और बाकी रेंगने वाले जीव और फल ) उन मानव-जनित दबावों को दिखाते हैं जो उनके आवास को खराब करते हैं। नेचर एनवायरनमेंट एंड वाइल्डलाइफ सोसाइटी (NEWS) की संयुक्त सचिव और प्रोग्राम डायरेक्टर और आईयूसीएन कमीशन ऑन इकोसिस्टम्स मैनेजमेंट (IUCN-CEM) की सदस्य अजंता डे कहती हैं, “हम मछली पकड़ने वाली बिल्ली को आर्द्रभूमि इकोसिस्टम की सेहत का पैमाना मानते हैं। ऐसा खास तौर पर उस जगह के लिए है, जो उससे जुड़े पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं को सहारा देती है और बदले में आर्द्रभूमि पर निर्भर समुदायों की आजीविका और जीवन का आधार बनती है।”
भट्टाचार्य और मुखर्जी दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि इन नतीजों का असर जंगली और मछली पकड़ने वाली बिल्लियों से आगे तक जाता है वे अलग-अलग साफ-सफाई अभियानों या सिर्फ प्रतिबंधों की बजाय पूरे परिदृश्य पर आधारित नीतिगत कदमों और उनके सख्त क्रियान्वयन पर जोर देते हैं।
चक्रवर्ती जोड़ते हैं, “आवास के नुकसान, संघर्ष और शिकार की कमी के साथ-साथ माइक्रोप्लास्टिक आंतरिक संपर्क का ऐसा रूप है, जिस पर संरक्षण की योजना बनाते समय शायद ही कभी विचार किया जाता है।”
लेखकों का सुझाव है कि मैंग्रोव पर्यटन क्षेत्रों को प्लास्टिक-मुक्त घोषित किया जाए, आस-पास के गांवों में कचरा प्रबंधन को मजबूत किया जाए और पश्चिम बंगाल के गांवों में पहले से इस्तेमाल हो रहे प्लास्टिक-मुक्त विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए। मुखर्जी संरक्षित क्षेत्रों को फिर से परिभाषित करने की दलील देते हैं। वह कहते हैं, “संरक्षित वन प्लास्टिक-मुक्त क्षेत्र होने चाहिए। सुंदरबन इस मामले में मिसाल बन सकता है, जहां माइक्रोप्लास्टिक की नियमित निगरानी हो और प्लास्टिक के इस्तेमाल पर सख्त नियंत्रण हो।”

डे ज्यादा से ज्यादा प्राथमिक डेटा इकट्ठा करने की अहमियत को विस्तार से समझाती हैं। वह कहती हैं, “स्रोत की जगहों से पड़ने वाले असर के स्तरों का पता लगाने से प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के बारे में बेहतर जागरूकता पैदा की जा सकती है। इस क्षेत्र में नियमों को लागू करना और व्यावहारिक रूप से अमल में लाने के साथ ही लगातार निगरानी रखना हमेशा चुनौती रहा है।”
मुखर्जी कहते हैं, “बड़े जमीनी स्तनधारियों में माइक्रोप्लास्टिक के प्रदूषण पर अभी भी कम अध्ययन हुए हैं। पूरे देश में मिलकर शोध करने की तुरंत जरूरत है। हम बंगाल टाइगर और सुंदरबन के अन्य अहम स्तनधारियों पर आगे और अध्ययन करना चाहते हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 14 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: गोदावरी में मछली पकड़ने वाली बिल्ली। प्रतिनिधि तस्वीर: श्रीचक्र प्रणव\विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0)।