- एक नई स्टडी से पता चला है कि सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व में लाए गए बारहसिंगा की संख्या 98 से बढ़कर 172 हो गई है।
- इन बारहसिंगों को कान्हा टाइगर रिज़र्व से इसलिए लाया गया था ताकि एक ही जगह पर उनकी आबादी होने से उनके खत्म होने का खतरा कम हो सके।
- शोधकर्ताओं का कहना है कि रहने की जगह को बेहतर बनाने, शिकारियों से सुरक्षित बाड़े में उन्हें नए माहौल के अनुकूल बनाने और लंबे समय तक उनकी निगरानी करने से उन्हें दोबारा बसाने का यह काम सफल रहा, जो खतरे में पड़ी दूसरी शाकाहारी प्रजातियों को बचाने के लिए एक मॉडल पेश करता है।
एक नए अध्ययन के मुताबिक, मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिज़र्व से सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व में लाए गए हार्ड-ग्राउंड स्वैम्प डियर यानी बारहसिंगा की आबादी लगातार बढ़ रही है और इनका प्रजनन भी सफलतापूर्वक हो रहा है। यह उपप्रजाति, जो कभी पूरे मध्य भारत में फैली हुई थी, अब सिर्फ़ एक इलाके में बची है और एक दूसरी आबादी बनाने की कोशिशें खत्म होने के खतरे को कम करने के लिए बेहद ज़रूरी हैं।
हार्ड-ग्राउंड स्वैम्प डियर (रूसर्वस डुवाउसेली ब्रैंडेरी) कभी पूरे भारत में बड़े पैमाने पर पाया जाता था, लेकिन आज यह प्राकृतिक रूप से सिर्फ़ कान्हा में ही बचा है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट के मुताबिक, बारहसिंगा को ‘वल्नरेबल’ कैटेगरी में रखा गया है और यह भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की पहली अनुसूची में सूचीबद्ध किया गया है। यह उपप्रजाति की आबादी ऐतिहासिक रूप से अपने आवास में बदलाव, घास के मैदानों के टूटने और शिकार की वजह से कम हुई है। लगभग 1,100 जानवरों की एक ही आबादी के साथ, अब यह प्रजाति बीमारी फैलने या दूसरे खतरों के प्रति संवेदनशील बनी हुई है।
“इस पूरी उपप्रजाति को कान्हा तक ही सीमित रखने से असल में एक ऐसा जोखिम पैदा हो गया कि अगर वहां कुछ हुआ तो पूरी आबादी खत्म हो सकती थी। छोटी और अलग-थलग आबादी को कई तरह के अंदरूनी जोखिमों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि आबादी में उतार-चढ़ाव (औसत विकास दर में बदलाव), जेनेटिक ड्रिफ्ट और इनब्रीडिंग; साथ ही बाहरी खतरे भी होते हैं, जैसे बीमारियों का फैलना या बड़े पैमाने पर पर्यावरण में गड़बड़ी,” इस अध्ययन की मुख्य लेखिका और आईयूसीएन के ‘स्पीशीज़ सर्वाइवल कमीशन’ के ‘डियर स्पेशलिस्ट ग्रुप’ की सदस्य नेहा अवस्थी कहती हैं। यह अध्ययन भारतीय वन्यजीव संस्थान के शोधकर्ताओं और मध्य प्रदेश वन विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
कान्हा में भी घास के मैदानों वाले आवास और वहां जीवों के रहने की क्षमता (कैरिंग कैपेसिटी) को लेकर कुछ प्राकृतिक सीमाएं हैं। अवस्थी कहते हैं, “अगर जीवों को नई जगहों पर फैलने का मौका नहीं मिला, तो आबादी के घनत्व से जुड़े दबावों के कारण समय के साथ आबादी का बढ़ना सीमित हो सकता है।”
हाल के वर्षों में, भारत ने खतरे में पड़ी वन्यजीव प्रजातियों को बचाने और उनकी आबादी को फिर से बढ़ाने के लिए उन्हें दूसरी जगहों पर बसाने (ट्रांसलोकेशन) के तरीके को तेजी से अपनाया है। हालाँकि, ऐसी कोशिशों की सफलता का आकलन करने के लिए लंबे समय के आंकड़ों या सबूतों की कमी है।

दूसरी आबादी बसाना
साल 2015 और 2023 के बीच, मध्य प्रदेश वन विभाग ने सात चरणों में कान्हा से सतपुड़ा तक 98 बारहसिंगा को स्थानांतरित किया। हर जानवर को ‘बोमा’ नाम के फ़नल के आकार के बाड़े का इस्तेमाल करके पकड़ा गया; यह एक ऐसी तकनीक है जिससे जानवरों को बिना केमिकल डार्टिंग के सुरक्षित रूप से होल्डिंग एरिया में ले जाया जा सकता है। पकड़े जाने के बाद, हिरणों को खास तौर पर डिज़ाइन की गई गाड़ियों से सतपुड़ा ले जाया गया।
शुरू में, उन्हें रिज़र्व की बोरी रेंज में 50 हेक्टेयर के शिकारी-रोधी बाड़े में छोड़ा गया, ताकि खुले इलाके में छोड़े जाने से पहले वे वहाँ के माहौल के आदी हो सकें। ज़्यादातर स्थानांतरण दिसंबर और मार्च के बीच किए गए, जब मौसम और सड़क की स्थिति अनुकूल थी।
दोबारा बसाए गए बारहसिंगों की आबादी पर तीन जगहों पर नज़र रखी गई: बोरी एनक्लोज़र, बोरी के पास खुले घास के मैदान और चुरना रेंज में मालिनी घास का मैदान। बारहसिंगों पर नज़र रखने के लिए शोधकर्ताओं ने ज़मीनी स्तर पर लगातार निगरानी की। फ़ॉरेस्ट गार्ड और फ़ील्ड स्टाफ़ की टीमों ने पूरे साल रोज़ाना गिनती की, आम तौर पर सुबह और शाम के समय, जब जानवर सबसे ज़्यादा सक्रिय होते थे।
पानी के स्रोतों, घास के मैदानों और उन जगहों के पास ऑब्ज़र्वेशन पॉइंट बनाए गए जहाँ ये बारहसिंगे अक्सर इकट्ठा होते थे। दूरबीन और स्पॉटिंग स्कोप का इस्तेमाल करके, ऑब्ज़र्वर ने जानवरों की संख्या नोट की और उन्हें उम्र और लिंग के आधार पर बांटा, जिसमें वयस्क नर, वयस्क मादा और बारहसिंगा के बच्चे शामिल थे।
शोधकर्तओं ने बारहसिंगों की शारीरिक स्थिति का भी आकलन किया ताकि यह समझा जा सके कि वे अपने नए माहौल में कितनी अच्छी तरह ढल रहे हैं; इसके लिए उन्होंने शरीर की चमक, मांसपेशियों, शरीर की बनावट और पसलियों व कूल्हे की हड्डियों के दिखने जैसे संकेतों को परखा। इन नतीजों की तुलना कान्हा में मौजूद मूल आबादी के डेटा से की गई।
आबादी में बढ़ोतरी और प्रजनन में सफलता
इस अध्ययन के दौरान, 2023 तक आबादी शुरुआती 98 जानवरों से बढ़कर 172 हो गई। हर साल जंगल में पैदा हुए बच्चे देखे गए, जिससे पता चलता है कि बारहसिंगा अपने नए माहौल में सफलतापूर्वक प्रजनन कर रहे थे।
अवस्थी कहते हैं, “कई स्वतंत्र संकेत बताते हैं कि आबादी सिर्फ़ मैनेजमेंट के सहारे टिके रहने के बजाय मज़बूती से बस रही है।” “हमने इस आबादी में लगातार बढ़ोतरी, बच्चों के जन्म से नई संख्या जुड़ने और उम्र-लिंग के स्थिर ढांचे को देखा, जो आबादी बढ़ने के सकारात्मक रुझान को दिखाता है।”

शोधकर्ताओं ने सतपुड़ा में पैदा हुए दूसरी और तीसरी पीढ़ी के बारहसिंगों के बच्चों को भी देखा, जिससे पता चलता है कि इन जानवरों ने वहाँ के मौसम के हिसाब से अपनी ब्रीडिंग को सफलतापूर्वक ढाल लिया है।
स्टडी के दौरान, दूसरी जगह से लाए गए और वहीं पैदा हुए बारहसिंगों में कुल 29 मौतें दर्ज की गईं। कुछ मौतें तेंदुए, ढोल (जंगली कुत्ते) और बाघों के शिकार बनने की वजह से हुईं, जबकि ज़्यादातर मौतें प्राकृतिक कारणों से हुईं। सबसे ज़्यादा मौतें 2019 में हुईं, जब कई बारहसिंगों को शिकारियों से सुरक्षित बाड़े से निकालकर खुले घास के मैदानों में छोड़ा गया, जहाँ शिकारी मौजूद थे।
हालाँकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि वाइल्डलाइफ ट्रांसलोकेशन (वन्यजीवों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने) में मौतों में ऐसी बढ़ोतरी आम बात है, क्योंकि जानवर नई जगह और शिकारियों के खतरे के हिसाब से खुद को ढालते हैं। अवस्थी कहते हैं, “यह हिरण प्रजाति के जानवरों के ट्रांसलोकेशन से जुड़े ग्लोबल सबूतों से मेल खाता है, जहाँ छोड़ने के तुरंत बाद मौत की दर आमतौर पर ज़्यादा होती है और फिर धीरे-धीरे स्थिर हो जाती है।”
अच्छे तालमेल के संकेत
बारहसिंगों के शरीर की हालत की जांच से पता चला कि दोबारा लाए गए बारहसिंगे आम तौर पर स्वस्थ थे और कान्हा की मूल आबादी वाले जानवरों जैसे ही थे। इससे पता चलता है कि सतपुड़ा के घास के मैदान इस प्रजाति के लिए ज़रूरी चारा, पानी और रहने की जगह देते हैं।
शोधकर्ताओं ने जानवरों में व्यवहार में लचीलापन भी देखा। अवस्थी कहते हैं, “हालाँकि यह प्रजाति आम तौर पर घास के खुले मैदानों में पाई जाती है, लेकिन सतपुड़ा की आबादी ने व्यवहार में लचीलापन दिखाया और अलग-अलग तरह की ज़मीन और किनारों वाले इलाकों का इस्तेमाल किया, खासकर तब जब वे नई जगहों पर फैल रहे थे।”
इसमें रिज़र्व के बारहसिंगा के आवासों के प्रबंधन ने अहम भूमिका निभाई। वन अधिकारियों ने घास के मैदानों को फिर से ठीक किया और चारे के लिए ज़रूरी पौधे जैसे ब्लैक स्पीयरग्रास, कंगारू ग्रास और जंगली गन्ना लगाए ताकि खाने की उपलब्धता बेहतर हो सके। चरने के लिए अच्छी जगह बनाए रखने के लिए लैंटाना और कांग्रेस घास जैसे बाहरी पौधों को भी हटाया गया।
इस प्रोजेक्ट की सफलता के लिए मैनेजमेंट से जुड़े ये कदम बहुत ज़रूरी थे। अवस्थी कहते हैं, “सतपुड़ा में घास के मैदान वाला मौजूदा इलाका ज़्यादातर 49 गांवों के स्वेच्छा से दूसरी जगह बसने के बाद बना। इसके कारण पारिस्थितिकी की बहाली के लिए 10,000 हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन उपलब्ध हो गई।” “इसके बाद, घास के मैदानों को बहाल करने और पानी की उपलब्धता बेहतर बनाने के उपायों के ज़रिए इन इलाकों का सक्रिय रूप से मैनेजमेंट किया गया।”
लोगों के दूसरी जगह बसने से मवेशियों के चरने और संसाधनों के दोहन में भी कमी आई, जिससे वन्यजीवों और मवेशियों के संपर्क वाले इलाकों में आपस में प्रतिस्पर्धा और बीमारियों के फैलने का ख़तरा कम हो गया।

प्रजाति की बहाली का उदाहरण
सतपुड़ा में हुई बारहसिंगे की बहाली ये दर्शाती है कि सुनियोजित संरक्षण उपायों से संकटग्रस्त प्रजातियों को कैसे सुरक्षित किया जा सकता है। इस परियोजना में कई रणनीतियाँ शामिल थीं, जिनमें चरणबद्ध स्थानांतरण, पर्यावास की तैयारी, पशु चिकित्सा निगरानी और पशुओं को छोड़ने के बाद उनकी गहन निगरानी शामिल हैं।
हालाँकि, उन्होंने चेतावनी दी कि इस कदम की दीर्घकालिक सफलता इसके लगातार मैनेजमेंट पर निर्भर करेगी। जैसे-जैसे जानवर खुले इलाकों में फैलेंगे, बाघों, तेंदुओं और ढोल (जंगली कुत्तों) से शिकार का खतरा उनके जीवित रहने की संभावनाओं पर असर डालेगा। मौसम में बदलाव, रहने की जगह की गुणवत्ता और जेनेटिक विविधता बनाए रखने की ज़रूरत भी आबादी के भविष्य पर असर डाल सकती है। फिर भी, इस अध्ययन से पता चलता है कि जो प्रजातियां इन इलाकों से गायब हो गई थीं, वे वापस आ सकती हैं। “सही माहौल, सुरक्षा और सावधानी से मैनेजमेंट करने पर, दशकों से गायब आबादी को भी फिर से बसाया जा सकता है,” अवस्थी कहते हैं।
“यह अनुभव भारत में सीमित क्षेत्र में रहने वाले अन्य शाकाहारी जीवों के लिए एक उपयोगी ढांचा प्रदान करता है,” उन्होंने आगे बताया।
और पढ़ेंः 18 बाघ, 27 तेंदुओं की मौजूदगी के साथ कान्हा-पेंच कॉरिडोर में बालाघाट बना अहम ठिकाना
वाइल्डलाइफ़ कंजर्वेशन ट्रस्ट के प्रेसिडेंट अनीश अंधेरिया ने कहा, “मध्य प्रदेश में बारहसिंगा को दूसरी जगह बसाने का प्रोग्राम इस प्रजाति के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक अहम कोशिश है। यह प्रजाति कभी सिर्फ़ कान्हा टाइगर रिज़र्व तक ही सीमित थी और सीमित दायरे की वजह से इसके खत्म होने का खतरा था।” वे इस अध्ययन से जुड़े नहीं थे। उन्होंने कहा, “बीमारी या किसी खास इलाके के खतरों से बचाने के लिए सतपुड़ा और बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में इनकी अलग-अलग आबादी (सैटेलाइट आबादी) बनाई गई है। साल 2015-2026 के बीच, कान्हा से 135 जानवरों को सतपुड़ा भेजा गया, जहाँ उनकी आबादी बढ़कर 303 हो गई है। हाल ही में बांधवगढ़ में 48 जानवर लाए गए थे और उनकी संख्या बढ़कर 64 हो गई है। यह उनके नए माहौल में ढलने, प्रजनन में सफलता और प्रजाति की संख्या को लंबे समय में बढ़ाने की दिशा में अच्छी प्रगति को दिखाता है।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 28 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व में अपने नए आवास में बारहसिंगा। उन्हें दोबारा बसाने की यह प्रक्रिया दिखाती है कि कैसे सोच-समझकर किए गए संरक्षण के उपाय खतरे में पड़ी प्रजातियों को बचाने में मदद कर सकते हैं। तस्वीर – एल. कृष्णमूर्ति।