- एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि पास की बहुमंजिला इमारतों में बने गार्डन की तुलना में केरल के पवित्र वनों (ओरण या सेक्रेड ग्रोव) में इल्ली (कैटरपिलर) का शिकार काफी ज्यादा होता है। इससे पता चलता है कि ये छोटे जंगल शिकारी-शिकार के बीच पारस्परिक संबंधों को बनाए रखने में मदद करते हैं।
- पश्चिमी घाट से दूरी बढ़ने के साथ पवित्र वनों के भीतर शिकार में कमी आई, लेकिन उनके आकार ने इन संबंधों को स्पष्ट नहीं किया, जिससे संकेत मिलता है कि आवास की जटिलता इनके बंटे होने के असर को कम कर सकती है।
- नतीजों से पता चलता है कि सांस्कृतिक रूप से संरक्षित छोटे वन क्षेत्र पारिस्थितिकी और मानव-प्रधान जगहों में पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी सेवाओं में मदद करते हैं और इनसे बड़े संरक्षित वनों को मदद मिलती है।
पूरे भारत में फैले हुए पवित्र वनों को अक्सर प्राचीन वनों के बचे-खुचे हिस्सों के रूप में देखा जाता है। सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं के जरिए पीढ़ियों से संरक्षित ये क्षेत्र अक्सर देसी पौधों, पक्षियों और कीटों के लिए आवास का काम करते हैं। अब एक नए अध्ययन में पाया गया है कि नजदीक की बहुमंजिला इमारत में बने बगीचों की तुलना में केरल के पवित्र वनों में इल्लियों का ज्यादा शिकार हुआ। इससे यह संकेत मिलता है कि शाकाहारी कीटों की आबादी को नियंत्रित करने वाली यह पारिस्थितिकी प्रक्रिया पवित्र वनों में ज्यादा बेहतर थी।
केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय की इकोलॉजी लैब की शोधकर्ता और अध्ययन की सह-लेखिका गोपिका विश्वान कहती हैं, “शिकार मूल पारिस्थितिकी प्रक्रिया है जो समुदाय की संरचना और पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाओं को तय करती है।” वह आगे कहती हैं, “शिकार में बदलाव से पारिस्थितिकी तंत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, जिनमें पोषण श्रृंखला (ट्रॉफिक कास्केड यानी खाद्य श्रृंखला में ऊपर से नीचे तक असर) के प्रभाव और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता में बदलाव शामिल हैं।”
वह बताती हैं, “प्रजातियों की विविधता या प्रचुरता से जुड़े अध्ययन सिर्फ पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना को दिखाते हैं। इनसे यह पता नहीं चलता कि वे कैसे काम करते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र सिर्फ प्रजातियों की मौजूदगी से नहीं, बल्कि शिकार और शिकारी के बीच की अंतःक्रियाओं जैसे पारस्परिक संबंधों से कायम रहते हैं।”
आवास के बंटे होने का आकलन
यह अध्ययन केरल के कासरगोड जिले के उत्तरी मालाबार क्षेत्र में किया गया, जहां कम से कम 117 पवित्र वन कृषि क्षेत्रों और घरेलू बगीचों के मिले-जुले परिवेश में हैं। ये पश्चिमी घाट से अरब सागर तक फैले हुए हैं।
शोधकर्ताओं ने पश्चिमी घाट से 8 किलोमीटर से 44 किलोमीटर के बीच स्थित 12 जगहें चुनी। प्रत्येक जगह पर उन्होंने पास में स्थित एक पवित्र वन और बहुमंजिला इमारत में बने गार्डन को जोड़ी के रूप में चुना। ये जगहें एक-दूसरे से एक से दो किमी की दूरी पर थी। इससे आवासों और जैव-विविधता हॉटस्पॉट से दूरी के अलग-अलग स्तरों के बीच शिकारी-शिकार के पारस्परिक संबंधों की तुलना करने में मदद मिली। अध्ययन का काम 2024 और 2025 में जनवरी और फरवरी महीनों में किया गया, क्योंकि इस दौरान क्षेत्र में कीटभक्षी पक्षियों की गतिविधियां चरम पर होती हैं।

केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय की इकोलॉजी लैब के एसोसिएट प्रोफेसर और अध्ययन के संबंधित लेखक पलट्टी अलेश सिनू कहते हैं, “पवित्र वन और घरेलू बगीचे मानव-प्रधान भू-दृश्यों में मौजूद ऐसे आवास हैं जो पूरी तरह अलग हैं। दोनों की दूरी पश्चिमी घाट से अलग-अलग है और ये प्रजातियों के लिए स्रोत क्षेत्र के रूप में काम करते हैं।” “पवित्र वन खास तौर पर वन क्षेत्रों के छोटे-छोटे द्वीप हैं। इससे हमें द्वीप जैव-भूगोल के सिद्धांत के कुछ पहलुओं खास तौर पर दूरी के प्रभाव का पता लगाने का अवसर मिला।”
शिकार की घटनाओं को मापने के लिए शोधकर्ताओं ने दोनों आवासों में गैर-विषैले, न सख्त होने वाले और न सूखने वाले प्लास्टिसीन से बने 1,296 कृत्रिम इल्लियां लगाई। प्लास्टिसीन इल्लियों का पारिस्थितिक अध्ययनों में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि शिकारी इन नरम मॉडलों पर काटने के खास निशान छोड़ते हैं। इससे शोधकर्ताओं को शिकार की घटनाओं को सीधे देखे बिना हमलों के लिए जिम्मेदार जीवों के व्यापक समूहों की पहचान करने में मदद मिलती है। इन जगहों पर देखे गए सबसे सामान्य रंगों का प्रतिनिधित्व करने वाली हरी और लाल-भूरी रंग की कृत्रिम इल्लियों को पेड़ों की पत्तियों, शाखाओं और तनों पर रखा गया और 48 घंटे बाद वापस इकट्ठा किया गया।
दूसरे साल के दौरान, टीम ने कृत्रिम चिपकने वाले पदार्थ में लिपटे 864 फ्रीज-किल्ड मीलवर्म भी लगाए, जिनके सिर और पूंछ खुले छोड़े गए थे। इसका मकसद शिकारियों को आकर्षित करना और इसमें शामिल कीटों की पहचान करना था। शोधकर्ताओं ने सामान्यीकृत रैखिक मिले-जुले प्रभाव मॉडल का इस्तेमाल करके आंकड़ों का विश्लेषण किया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आवास का प्रकार, पश्चिमी घाट से दूरी, इल्लियों का रंग और इल्लियों को रखने की जगह शिकार की घटनाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं, जबकि जगहों और सालों के बीच के अंतर को ध्यान में रखा गया।
छोटे वन, बड़ी भूमिका
कुल मिलाकर, बगीचों की तुलना में पवित्र वनों में शिकार की दर काफी ज्यादा थी। आर्थ्रोपोड में खास तौर पर चींटियां प्रमुख शिकारी थी और उन्होंने लगभग आधे हमले (57-61%) किए। वहीं पक्षियां दूसरी सबसे बड़ा शिकारी समूह थी, जिनका योगदान 22-35% था। अध्ययन में यह भी पाया गया कि भूरी इल्लियों की तुलना में हरी इल्लियों पर कम हमले हुए। इसकी मुख्य वजह यह थी कि आर्थ्रोपोडों ने उनका कम शिकार किया। इल्लियों को पवित्र वनों और घरेलू गार्डन दोनों में पत्तियों, शाखाओं और तनों पर रखा गया था और पत्तियों पर शिकार की दर शाखाओं या तनों की तुलना में कम थी।
कुछ नतीजों ने शोधकर्ताओं की उम्मीदों को चुनौती दी। “सबसे हैरान करने वाले नतीजों में से एक यह था कि पारंपरिक विखंडन सिद्धांत के उलट पश्चिमी घाट से दूरी बढ़ने के साथ शिकार की घटनाओं में अपेक्षित और एक जैसी गिरावट नहीं आई। हमने शुरू में अनुमान लगाया था कि जैव-विविधता के इस स्रोत से बढ़ती दूरी दोनों आवासों में शिकारियों की गतिविधि को कम कर देगी। यह उम्मीद पवित्र वनों में सही साबित हुई, जहां दूरी बढ़ने के साथ शिकार की घटनाओं में कमी आई, लेकिन घरेलू बगीचों में इसके उलट नतीजे मिले, जहां कुल शिकार और पक्षियों द्वारा किया जाने वाले शिकार दोनों बढ़ गए,” सिनू कहते हैं।

विपरीत प्रतिक्रियाएं संकेत देती हैं कि विखंडन के पारिस्थितिकी प्रभाव एक जैसे होने के बजाए आवास के प्रकार पर काफी हद तक निर्भर कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि पवित्र वनों का आकार देखे गए पैटर्न को स्पष्ट नहीं करता था, जिससे संकेत मिलता है कि सिर्फ क्षेत्र के आकार के बजाय आवास की गुणवत्ता और संरचनात्मक जटिलता शिकारियों की गतिविधि को प्रभावित कर रही थी।
अध्ययन में पिछले कई उष्णकटिबंधीय अध्ययनों की तुलना में पक्षियों ने ज्यादा शिकार भी किया। विश्वान के अनुसार, प्रयोग में इस्तेमाल किए गए कृत्रिम इल्लियों का अपेक्षाकृत बड़ा आकार और क्षेत्र में कीटभक्षी पक्षियों के विविध समुदाय ने शायद ज्यादा मजबूत पक्षी शिकार में मदद की।
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पवित्र उपवनों के छोटे आकार और बंटे होने के बावजूद, उनमें लगातार ज्यादा शिकार देखा गया। “इस प्रभाव की मजबूती और निरंतरता ने इस बात को रेखांकित किया कि छोटे वन भी ज्यादा पारिस्थितिकी महत्व रखते हैं। अलग-थलग और आकार में सीमित होने के बावजूद पवित्र वन सभी प्रमुख शिकारी समूहों (आर्थ्रोपोड, पक्षी और छोटे स्तनधारी)-में शिकार का ऊंचा स्तर बनाए रखते हैं। यह दिखाता है कि आवास की जटिलता बंटे होने के नकारात्मक असर को कम कर सकती है,” केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय की इकोलॉजी लैब की शोधकर्ता और एक अन्य सह-लेखक भाव्या लक्ष्मी कहती हैं।
ये नतीजे छोटे वन क्षेत्रों के संरक्षण के महत्व को और मजबूत करते हैं। सिनू कहते हैं, “हमारे अध्ययन का व्यापक नतीजा यह है कि बंटे हुए इलाकों में संरक्षण सिर्फ बड़े, पुराने वनों की सुरक्षा पर निर्भर नहीं रह सकता। पवित्र वन जैसे छोटे, सांस्कृतिक रूप से संरक्षित वन क्षेत्र मानव-प्रधान भू-दृश्यों में अलग-थलग होने के बावजूद पारिस्थितिकी से जुड़े कामों को बनाए रख सकते हैं और इससे जुड़ी सेवाएं दे सकते हैं।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 1 सितंबर, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कासरगोड में एक पवित्र वन और प्लास्टिसीन इल्ली पर शिकारियों के काटने के निशान। तस्वीर: भाव्या लक्ष्मी।