- भारत का इथेनॉल प्रोग्राम अब गन्ने और शीरे से आगे बढ़ते हुए अनाज से बनने वाले इथेनॉल की और तेजी से बढ़ रहा है।
- पानी और जलवायु के जानकारों का कहना है कि E20 से आगे बढ़ने से पहले भारत को भूजल पर दबाव और खाद्य सुरक्षा जैसे पहलुओं के आधार पर इथेनॉल प्रोग्राम का आकलन करना चाहिए।
- जानकार चेतावनी देते हैं कि ब्राज़ील का इथेनॉल मॉडल भले ही सीखने लायक हो, लेकिन भारत में पानी की कमी, आबादी का दबाव और खाद्य सुरक्षा की ज़रूरतों के कारण इसे हूबहू अपनाना मुश्किल है।
यह रिपोर्ट भारत और ब्राज़ील के इथेनॉल ट्रांज़िशन (बदलाव) की तुलना करने वाली सीरीज़ का तीसरा और अंतिम भाग है। इस भाग में देखा गया है कि भारत का इथेनॉल मॉडल किस तरह तेज़ी से गन्ने और शीरे (मोलासेस) पर आधारित उत्पादन से आगे बढ़कर अनाज की ओर बढ़ रहा है, जिससे पशुओं के चारे और फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री पर पड़ने वाले दबाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं। दूसरे भाग में इथेनॉल की खरीद, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट और क्वालिटी कंट्रोल से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की गई थी।
पिछले साल दिसंबर में, राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले के राठीखेड़ा गाँव में एक निर्माणाधीन इथेनॉल प्लांट के पास किसानों की भीड़ जमा हो गई। यह प्लांट इथेनॉल बनाने के लिए अनाज का इस्तेमाल करने वाला था। लोगों को डर था कि इस प्लांट से स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव पड़ेगा, भूजल प्रदूषित होगा और खेती की ज़मीन को नुकसान पहुँचेगा। वहीं दूसरी तरफ कंपनी का दावा था कि इस प्लांट में ज़ीरो-लिक्विड-डिस्चार्ज टेक्नोलॉजी और प्रदूषण-नियंत्रण सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। इस विरोध प्रदर्शन के उग्र होने के बाद इस प्लांट के निर्माण कार्य को रोक दिया गया।
हनुमानगढ़ का आंदोलन देश भर में बनाए जा रहे नए इथेनॉल और डिस्टिलरी प्रोजेक्ट के खिलाफ़ हो रहे कई विरोध प्रदर्शनों में से एक था। मध्य प्रदेश, पंजाब और तेलंगाना में भी ऐसे ही विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जहाँ लोगों ने पानी के इस्तेमाल, प्रदूषण और खेती की ज़मीन पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई है।
ये विवाद तब सामने आ रहे हैं जब भारत का इथेनॉल उद्योग कच्चे माल के लिए गन्ने की जगह अनाज की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। ज़ुआरी इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर अथर शहाब के मुताबिक, सरकारी तेल कंपनियों के हालिया टेंडर में खरीदे गए इथेनॉल का 70% से ज़्यादा हिस्सा अनाज से इथेनॉल बनाने वाली डिस्टिलरीज़ से आया है। ज़ुआरी इंडस्ट्रीज़ एक भारतीय कंपनी है जिसका कारोबार कृषि, चीनी और जैव ईंधन (बायोफ्यूल), और रियल-एस्टेट जैसे क्षेत्रों में फैला है। एक दशक पहले, भारत में इथेनॉल की सप्लाई में गन्ने के शीरे (मोलासिस) का दबदबा था। अब यह स्थिति बदल गई है। शीरा या मोलासिस, जिसे राब भी कहते हैं, गन्ने या चुकंदर के रस से चीनी बनाने की प्रक्रिया के दौरान निकलने वाला एक गाढ़ा, चिपचिपा और गहरे भूरे रंग का तरल उपोत्पाद है।
भारत अब अपना लगभग 65-70% इथेनॉल अनाज से बनाता है, जिसमें मुख्य रूप से ‘फूड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया’ के गोदामों से मिलने वाली मक्का और चावल शामिल है। गन्ने के शीरे से बनने वाले इथेनॉल का हिस्सा लगभग 30-35% है। दुनिया में सबसे ज़्यादा गन्ना पैदा करने वाला देश ब्राज़ील अपने इथेनॉल का लगभग 80% गन्ने से और बाकी हिस्सा मक्के से बनाता है।
यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि गन्ने के शीरे के उलट, मक्के का इस्तेमाल पोल्ट्री, पशु-आहार और फूड-प्रोसेसिंग उद्योगों में भी होता है। जैसे-जैसे इथेनॉल की मांग बढ़ रही है, ईंधन बनाने वाली कंपनियाँ उसी अनाज के लिए इन सेक्टरों से ज़्यादा होड़ कर रही हैं।
इथेनॉल के मामले में भारत अक्सर ब्राज़ील का उदाहरण देता है, लेकिन वहाँ इसके उत्पादन का तरीका अलग है। ब्राज़ील की गन्ना उद्योग संस्था, युनिका (UNICA) के अध्यक्ष इवांड्रो गस्सि ने बताया कि देश का ज़्यादातर इथेनॉल गन्ने से बनता है। यह गन्ना मुख्य रूप से देश के मध्य-दक्षिणी इलाके में उगाया जाता है। इस इलाके की फसल सिंचाई के बजाय प्राकृतिक बारिश पर निर्भर होती है।

सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी (CSTEP) के क्लाइमेट, एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी प्रोग्राम की रिसर्च साइंटिस्ट, राम्या नटराजन ने कहा, “कई अध्ययनों से यह बात साफ़ हो गई है कि भारत में पहली पीढ़ी के इथेनॉल के सामने पानी के इस्तेमाल, कच्चे माल की उपलब्धता और लंबे समय तक चलने की क्षमता (सस्टेनेबिलिटी) से जुड़ी अहम चुनौतियां हैं।” “इस प्रोग्राम का सबसे मज़बूत कारण ऊर्जा सुरक्षा और किसानों की आमदनी है। हालाँकि, जैसे-जैसे ब्लेंडिंग के लक्ष्य बढ़ेंगे, यह पक्का करना ज़रूरी होगा कि कच्चे माल की मांग से भोजन और पोषण सुरक्षा के साथ कोई अनचाहा टकराव न हो।”
वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर फैबियो वी. स्कार्पारे, जो ब्राज़ील में सस्टेनेबल बायोएनर्जी सिस्टम पर रिसर्च करते हैं, ने चेतावनी दी कि ब्राज़ील के हालात को सीधे तौर पर भारत में लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि भारत में देश के जल संसाधनों पर पहले से ही दबाव है और इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली फसलें सिंचाई और भूजल पर ज़्यादा निर्भर करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ़ रेगुलेटरी सुरक्षा उपायों से पर्यावरण से जुड़े जोखिम खत्म नहीं होते; ये जोखिम इस बात पर निर्भर करते हैं कि फसलें कहाँ बढ़ाई जा रही हैं, पानी कहाँ से लिया जा रहा है और नियमों को कितने असरदार तरीके से लागू किया जा रहा है।
कच्चे माल के बदलते विकल्प
ज़ुआरी इंडस्ट्रीज़ के अथर शहाब के अनुसार, अनाज का बढ़ता इस्तेमाल कुछ हद तक गन्ने पर निर्भरता को कम करता है और गन्ने से बनने वाले इथेनॉल में पानी की ज़्यादा खपत से जुड़ी चिंताओं को भी दूर करता है। इससे पॉलिसी के स्तर पर एक नई चुनौती भी पैदा होती है क्योंकि मक्के का इस्तेमाल मुर्गी पालन, पशु-आहार, स्टार्च बनाने और फ़ूड-प्रोसेसिंग उद्योगों में किया जाता है।
शहाब ने कहा, “इसलिए, इस बहस को ‘भोजन बनाम ईंधन’ के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या भारत खेती की उत्पादकता बढ़ाते हुए इथेनॉल का उत्पादन भी बढ़ा सकता है।”
उन्होंने कहा कि अगर भारत के बायोफ्यूल प्रोग्राम में मक्के की बड़ी भूमिका की उम्मीद है, तो पॉलिसी में ज़्यादा पैदावार, बीजों की बेहतर तकनीक, बेहतर एक्सटेंशन सर्विस, भण्डारण की सुविधा और कुशल खरीद सिस्टम पर ध्यान देना होगा।
शहाब ने कहा, “नहीं तो, पशु आहार के बाज़ार पर दबाव बन सकता है और आखिरकार इसका असर ग्राहकों पर भी पड़ सकता है।”
पानी और जलवायु का टेस्ट
फ्लेम यूनिवर्सिटी में पब्लिक पॉलिसी के फैकल्टी अंचल प्रकाश ने कहा कि भारत में इथेनॉल के विस्तार को सिर्फ़ ऊर्जा सुरक्षा या उत्सर्जन में कमी के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
प्रकाश ने कहा कि फसल से बनने वाले इथेनॉल के विस्तार के लिए “इंटीग्रेटेड लाइफ़ साइकल वॉटर अकाउंटिंग, क्षेत्रीय भूजल-तनाव की जांच, और बारिश पर निर्भर खेती वाली ज़मीन या प्राकृतिक इकोसिस्टम को बदलने पर सख़्त पाबंदियों” की ज़रूरत होगी।

उन्होंने कहा कि भारत को “शीरे और कृषि अवशेषों से बनने वाले इथेनॉल” को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि छोटे किसानों को शामिल करने वाली विकेंद्रीकृत सप्लाई चेन, पानी के कुशल इस्तेमाल, माइक्रो-इरिगेशन अपनाने और भूजल रिचार्ज के पक्के वादों से जुड़े सशर्त इंसेंटिव पर जोर दिया जाना चाहिए।
प्रकाश ने कहा कि भारत के E20 से आगे बढ़ने से पहले, देश को पानी, खाद्य सुरक्षा और कमज़ोर समुदायों की सुरक्षा के लिए एहतियाती उपाय करने चाहिए। उन्होंने कहा, “हमें सिंचाई वाले इलाकों में बदलाव पर राष्ट्रीय सीमाएँ तय करनी चाहिए, पानी की भारी कमी वाले बेसिन को फीडस्टॉक विस्तार से बाहर रखना चाहिए, और शीरे, कृषि अवशेषों और बेकार फीडस्टॉक को प्राथमिकता देनी चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा कि “अनाज से बनने वाले किसी भी इथेनॉल के लिए खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले असर का स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए।”
‘पीएलओएस वन’ नामक पत्रिका में छपे एक नए रिसर्च आर्टिकल से इन चिंताओं को और बल मिलता है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, अहमदाबाद (IIM-A) के रिसर्चर चंदन कुमार झा की अगुवाई में हुए इस अध्ययन में पाया गया कि भारत की इथेनॉल पॉलिसी में तेल आयात घटाने के अलावा भी कई गंभीर चुनौतियां और समझौते शामिल हैं। इसमें कहा गया है कि सभी स्थितियों में खाद्य सुरक्षा, खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें और संसाधनों के लिए होड़ जैसी चुनौतियां सामने आती हैं। हालाँकि, इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (फीडस्टॉक) के मिश्रण के आधार पर इनकी गंभीरता अलग-अलग हो सकती है।
शीरा भले ही चीनी बनाने की प्रक्रिया का एक उपोत्पाद है, लेकिन इस अध्ययन के अनुसार इसका पर्यावरण पर असर काफी हद तक गन्ने की खेती के लिए ज़रूरी ज़मीन, पानी और खाद से जुड़ा होता है। इस मॉडल में गन्ने से बनने वाला इथेनॉल बेहतर प्रदर्शन करता है; इसमें कम पानी और खाद की ज़रूरत होती है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है, लेकिन इससे खाद्य सुरक्षा और संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चिंताएं खत्म नहीं होतीं।
इस स्टडी का अनुमान है कि मौजूदा हालात की तुलना में, इथेनॉल से जुड़े जिन अलग-अलग तरीकों का मॉडल बनाया गया है, उनमें 2030 तक पानी की खपत 21-118% और 2050 तक 49-138% बढ़ जाएगी। इसमें ज़्यादा शीरे वाले तरीकों में उर्वरक के इस्तेमाल में भी तेज़ी से बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है, साथ ही नाइट्रोजन की मात्रा और उत्सर्जन में भी वृद्धि होगी। रिसर्चर पानी के इस्तेमाल, उर्वरक की मांग, ज़मीन के इस्तेमाल और उत्सर्जन पर पड़ने वाले अतिरिक्त असर का अंदाज़ा लगाने के लिए इथेनॉल के विस्तार से जुड़े अलग-अलग तरीकों की तुलना मौजूदा हालात (बेसलाइन) से करते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इथेनॉल विस्तार को खाद्य सुरक्षा और संसाधनों की उपलब्धता के साथ संतुलित करने के लिए फीडस्टॉक और पानी के इस्तेमाल की सावधानी से योजना बनानी होगी।

खाद्य सुरक्षा या ऊर्जा सुरक्षा?
खेती-बाड़ी की नीति के जानकार देविंदर शर्मा इथेनॉल पर चल रही बहस को एक अलग नज़रिए से देखते हैं। शर्मा कई दशकों से खेती, खाद्य सुरक्षा और खेती से जुड़ी नीतियों पर लिखते आ रहे हैं। उनका कहना है कि भारत की इथेनॉल नीति को लोगों का पेट भरने की ज़िम्मेदारी से अलग नहीं किया जा सकता।
“ब्राज़ील एक बड़ा देश है जिसकी आबादी कम है। भारत भी एक बड़ा देश है, लेकिन यहाँ आबादी बहुत ज़्यादा है। इतनी जल्दबाज़ी क्यों है? ऐसा संकट क्यों है?” शर्मा ने कहा।
शर्मा ने तर्क दिया कि गन्ने और दूसरी खाद्य फसलों को इथेनॉल बनाने की ओर मोड़ने से ईंधन उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के बीच तनाव पैदा हो सकता है।
शर्मा ने किसानों को ‘अन्नदाता’ की जगह ‘ऊर्जा दाता’ के तौर पर पेश किए जाने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “देश को अपने लोगों का पेट भरने के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने पर ध्यान देना चाहिए।” “इसके बजाय, हम बहुत खुशी-खुशी अपने संसाधनों को गाड़ियों को ईंधन देने में लगाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर हम गाड़ियों को ईंधन देने लगेंगे, तो अपने लोगों का पेट कैसे भरेंगे?”
उन्होंने कहा कि इथेनॉल पर होने वाली बहस में पानी के इस्तेमाल को मुख्य मुद्दा बनाया जाना चाहिए, खासकर ऐसे देश में जहां सिंचाई वाली फसलें पहले से ही भूजल पर दबाव डाल रही हैं। “पानी की खपत के कारण गन्ना खुद भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए नुकसानदेह है,” शर्मा ने कहा।
ब्राज़ील का अनुभव और उसकी सीमाएं
ब्राज़ील ने पिछले कई दशकों में एक बड़ी इथेनॉल अर्थव्यवस्था बनाई है और इसी कारण उसे इथेनॉल के लिए एक आदर्श के तौर पर देखा जाता है। इसके अनुभव में गन्ने से बनने वाला इथेनॉल, फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां, एक बेहतर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम और एक ऐसा बाज़ार शामिल है जहाँ ग्राहक कीमत और उपलब्धता के आधार पर इथेनॉल और पेट्रोल के बीच चुनाव कर सकते हैं।
युनिका के गस्सि ने ब्राज़ील के मौजूदा गन्ने से इथेनॉल बनाने वाले मॉडल का बचाव करते हुए कहा, “ब्राज़ील में गन्ने की खेती के लिए जो जमीन इस्तेमाल की गई वो पहले ही खराब हो चुके चारागाह थे।”

उन्होंने ब्राज़ील के ‘सेकंड-क्रॉप सिस्टम’ (साल में दूसरी फ़सल उगाने के तरीके) को एक और वजह बताया कि क्यों ब्राज़ील का इथेनॉल बनाने का तरीका उन देशों से अलग है जहाँ फ़सल का दायरा बढ़ाने से भोजन या पानी की ज़रूरतों के लिए सीधा मुकाबला हो सकता है। उन्होंने कहा, “ब्राज़ील में हम एक ही ज़मीन पर एक ही साल में दो बार, और कभी-कभी तीन फ़सल उगा सकते हैं।”
गस्सि ने कहा, “हमारा सारा मक्का वाला इथेनॉल इसी दूसरी फ़सल से मिलता है।”
और पढ़ेंः इथेनॉल मिश्रण से प्रदूषण घटा या गाड़ी मालिकों की परेशानी बढ़ी?
वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के स्कार्पारे ने कहा कि ब्राज़ील के इथेनॉल के टिकाऊपन का अंदाज़ा सिर्फ़ पंप या डिस्टिलरी के गेट पर नहीं लगाया जा सकता।
“ब्राज़ील में, गन्ने से इथेनॉल बनाना अपेक्षाकृत कारगर हो सकता है जब उत्पादकता अधिक हो, फसल का अधिकांश भाग वर्षा आधारित हो, और भूमि उपयोग विस्तार को नियंत्रित किया जाए। लेकिन ब्राज़ील यह भी दर्शाता है कि स्थिरता का आकलन केवल पेट्रोल पंप या डिस्टिलरी के गेट पर नहीं किया जा सकता,” स्कार्पारे ने कहा।
स्कार्पारे के अनुसार ‘ब्राज़ील में गन्ने का उत्पादन मुख्य रूप से चरागाहों या पहले से साफ की गई भूमि पर होता है’, ये तर्क आंशिक रूप से सही, लेकिन अधूरा है। “ब्राज़ील की इथेनॉल की कहानी मुख्य रूप से अमेज़न वनों की कटाई की कहानी नहीं है, लेकिन यह भूमि उपयोग प्रबंधन की कहानी जरूर है,” उन्होंने कहा।
स्कार्पारे ने कहा, “भारत को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इथेनॉल के उत्पादन को बढ़ाने की कोशिश को सिर्फ़ ईंधन के विकल्प के तौर पर न देखा जाए। यह ज़मीन, पानी, फ़सल चुनने और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी नीति भी है।”

सबक, शॉर्टकट नहीं
ब्राज़ील के बायोएनर्जी एक्सपर्ट और वहां की ऑयल एजेंसी के पूर्व डायरेक्टर लुइज़ ऑगस्टो होर्टा नोगुएरा ने कहा कि इथेनॉल एक ज़रूरी ईंधन बना हुआ है क्योंकि इसे रिन्यूएबल कार्बन साइकल से बनाया जाता है।
लेकिन होर्टा ने यह भी चेतावनी दी कि बायोफ्यूल को बढ़ावा देने के चक्कर में भोजन और पानी से जुड़ी प्राथमिकताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “ईंधन बनाने का मौका, भोजन के उत्पादन और जल संसाधनों के संरक्षण जैसे ज़्यादा अहम और ज़रूरी मुद्दों पर हावी नहीं होना चाहिए।”
स्कार्पारे ने भारत के विकल्पों के बारे में भी ऐसी ही बात कही। उन्होंने कहा, “अगर इथेनॉल की ज़्यादा मांग से उन इलाकों में गन्ने की सिंचाई वाली खेती को बढ़ावा मिलता है जहाँ पहले से ही पानी की कमी है, तो उत्सर्जन संबंधी फ़ायदे, पानी की कमी, पंपिंग में लगने वाली ऊर्जा, खाद के नुकसान और भोजन/चारे के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धा के चलते नगण्य हो सकते हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 28 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने की फसल को ले जाया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि भारत को इथेनॉल के उत्पादन को बढ़ाने पर सिर्फ़ ईंधन के विकल्प के तौर पर ही नहीं, बल्कि ज़मीन, पानी, फ़सल के चुनाव और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी नीति के तौर पर भी विचार करना चाहिए। तस्वीर: मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे।