- ब्राज़ील में इस साल हुए माइग्रेटरी स्पीशीज़ कॉन्फ्रेंस में, सरकारें धारीदार लकड़बग्घे के संरक्षण के लिए मज़बूत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर सहमत हुईं।
- राजस्थान, गुजरात, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की रिसर्च से पता चलता है कि यह प्रजाति सिर्फ़ संरक्षित क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि खेती, तटीय, औद्योगिक और इंसानों के दबदबे वाले दूसरे इलाकों में भी ज़िंदा रहती है।
- जानकारों का सुझाव है कि भारत सर्वे में सुधार करे, डेनिंग साइट्स और आने-जाने के रास्तों को बचाए, और पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसी जगहों पर बिखरे हुए आवास पर ज़्यादा ध्यान दे।
‘कन्वेंशन ऑन द कंज़र्वेशन ऑफ़ माइग्रेटरी स्पीशीज़ ऑफ़ वाइल्ड एनिमल्स’ (सीएमएस) की एक संधि के तहत धारीदार लकड़बग्घे (स्ट्राइप्ड हायना) के संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा मज़बूती देने का फैसला किया गया है। इसके संरक्षण के लिए उन देशों के बीच बेहतर सहयोग की ज़रूरत है जहाँ ये जानवर पाए जाते हैं। यह फ़ैसला इस साल मार्च में ब्राज़ील के कैम्पो ग्रांडे में हुई सीएमएस कन्वेंशन की 15वीं बैठक (सीएमएस कॉप15) में लिया गया।
सीएमएस, संयुक्त राष्ट्र की एक पर्यावरण संधि है जो प्रवासी वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण और टिकाऊ इस्तेमाल को एक वैश्विक मंच देता है। सीएमएस उन देशों को एक साथ लाता है जिनसे होकर वन्यजीव गुज़रते हैं (जिन्हें ‘रेंज स्टेट्स’ कहा जाता है) और प्रवासी रेंज में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित संरक्षण उपायों के लिए कानूनी आधार तैयार करता है।
भारत में धारीदार लकड़बग्घे की आबादी पर उसके ज़्यादातर इलाकों में अभी भी ठीक से नज़र नहीं रखी जाती है। ऐसे में भारत के लिए इस फ़ैसले का महत्व यह है कि इससे धारीदार लकड़बग्घे की देश में निगरानी बेहतर करने, सुरक्षित इलाकों के बाहर उनके रहने की जगहों और आने-जाने के रास्तों (मूवमेंट कॉरिडोर) की सुरक्षा करने और ऐसी प्रजाति पर संरक्षण के लिए ज़्यादा ध्यान देने का नया अंतरराष्ट्रीय दबाव बनेगा। दुनिया भर के संरक्षण समूहों ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे इस प्रजाति के लिए मज़बूत सुरक्षा और सहयोग को बढ़ावा मिल सकता है, जिस पर लंबे समय से नीतिगत स्तर पर बहुत कम ध्यान दिया गया है।
धारीदार लकड़बग्घे को IUCN की रेड लिस्ट में ‘नियर थ्रेटन्ड’ (विलुप्त होने के खतरे के करीब) की श्रेणी में रखा गया है। वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी का कहना है कि दुनिया भर में इनकी आबादी 10,000 से भी कम वयस्क जीवों की है और इसमें लगातार गिरावट आ रही है।
भारत में, यह प्रजाति पूर्वोत्तर और ज़्यादा बारिश वाले दक्षिणी इलाकों को छोड़कर देश के ज़्यादातर हिस्सों में पाई जाती है। राजस्थान, गुजरात, ओडिशा, कर्नाटका और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से मिले रिकॉर्ड और अध्ययनों से पता चलता है कि ये खेती वाले इलाकों, तटीय क्षेत्रों, झाड़ीदार इलाकों और औद्योगिक इलाकों में भी जीवित रहते हैं।
वाइल्डलाइफ़ कंजर्वेशन सोसाइटी में इंटरनेशनल पॉलिसी की वाइस प्रेसिडेंट, सुसान लिबरमैन ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि इस संधि के तहत धारीदार लकड़बग्घे को अपेंडिक्स I (जंगल में प्रजाति को पूरी सुरक्षा) और अपेंडिक्स II (रेंज वाले देशों को सहयोग करने की ज़रूरत) में शामिल करने का फ़ैसला एक अहम कदम था। उन्होंने कहा, “अब इस प्रजाति के रेंज वाले उन सभी देशों के लिए, जो सीएमएस के सदस्य हैं, इस प्रजाति की सुरक्षा करना और इसके संरक्षण में सहयोग करना ज़रूरी हो गया है। उम्मीद है कि इससे इस लुप्तप्राय प्रजाति के लिए कार्रवाई को बढ़ावा मिलेगा।”

कानूनी से मिली सुरक्षा, निगरानी नदारद
भारत में, धारीदार लकड़बग्घे को ‘वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम’ के तहत सुरक्षा मिली हुई है। साल 2022 में कानून में हुए बदलाव के बाद, इसे ‘अनुसूची I’ में शामिल किया गया है, जिससे इसे सबसे ऊंचे स्तर की कानूनी सुरक्षा मिलती है।
‘नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी’ और ‘वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया’ की ओर से किए गए हालिया सरकारी सर्वे में कई इलाकों में लकड़बग्घों की मौजूदगी दर्ज की गई है। इस सर्वे में उनकी स्थिति का पता लगाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर गिनती करने के बजाय ‘ऑक्यूपेंसी’ (इलाके में मौजूदगी) को मुख्य पैमाना माना गया है। इस सर्वे के मुताबिक, धारीदार लकड़बग्घे शिवालिक पहाड़ियों और गंगा के मैदानी इलाकों में 885 वर्ग किलोमीटर और पश्चिमी घाट के इलाकों में लगभग 3,100 वर्ग किलोमीटर में पाए गए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह अनुमान असल संख्या से कम हो सकता है, क्योंकि ये जानवर अक्सर जंगलों के बाहर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में भी पाए जाते हैं।
लिबरमैन ने कहा कि लकड़बग्घों की निगरानी में अभी भी बड़ी कमी है।
भारत में शोध में डेटा की यह कमी साफ़ दिखती है। राजस्थान, गुजरात, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के शोधों से पता चलता है कि यह प्रजाति खेती वाली ज़मीन, तटीय इलाकों, औद्योगिक क्षेत्रों और इंसानों के कब्ज़े वाली दूसरी जगहों जैसे कई तरह के इलाकों में पाई जाती है। ये स्टडीज़ इस प्रजाति के बारे में अधूरी जानकारी और संरक्षण पर असमान ध्यान दिए जाने की ओर भी इशारा करती हैं।
धारीदार लकड़बग्घे पर अपने काम के लिए जाने जाने वाले वन्यजीव विशेषज्ञ शमशाद आलम ने कहा कि भरोसेमंद जानकारी की कमी गंभीर है, खास तौर पर संरक्षित इलाकों के बाहर जहाँ भारत में ज़्यादातर स्ट्राइप्ड हाइना के पाए जाने की संभावना है। उन्होंने कहा कि सीमित वैज्ञानिक अनुमानों के आधार पर संरक्षित इलाकों में इनकी आबादी “काफी हद तक स्थिर” हो सकती है, लेकिन उनके बाहर, इनकी स्थिति को समझने के लिए अभी भी व्यवस्थित मूल्यांकन के बजाय वन अधिकारियों की सामान्य जानकारी पर ज़्यादा निर्भर रहना पड़ता है।
आलम ने कहा कि यह एक बड़ी चिंता की बात है क्योंकि संरक्षित क्षेत्रों के नेटवर्क के बाहर लकड़बग्घों के रहने की जगहें तेज़ी से कम हो रही हैं या उनमें भारी बदलाव आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि बेहतर संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े फ़ैसलों में मदद के लिए भारत को इस प्रजाति की मौजूदा स्थिति और फैलाव का राष्ट्रीय स्तर पर आकलन करने की ज़रूरत है।

पूर्वी भारत क्यों अहम है
‘वाइल्डलाइफ़ इन्फॉर्मेशन एंड नेचर गाइड सोसाइटी’ के वाइस प्रेसिडेंट मनीष कुमार चट्टोपाध्याय, जो पश्चिम बंगाल में भारतीय धारीदार लकड़बग्घे और भारतीय ग्रे भेड़िये (इंडियन ग्रे वुल्फ) के संरक्षण पर काम कर रहे हैं, ने कहा कि सीएमएस कॉप15 का फ़ैसला भारत में इन प्रजातियों के लिए “काफ़ी व्यावहारिक महत्व” रखता है।
“व्यावहारिक तौर पर, यह फ़ैसला सीमाओं के पार सहयोग, बेहतर रिसर्च और प्रजातियों की आवाजाही व आबादी की स्थिति पर डेटा साझा करने को बढ़ावा देता है, खासकर उन इलाकों में जहाँ उनके रहने की जगहें (हैबिटैट) टुकड़ों में बँटी हुई हैं। यह राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय मैनेजमेंट प्लान में प्रजाति-विशेष संरक्षण उपायों को शामिल करने के लिए पॉलिसी सपोर्ट भी देता है।”
उन्होंने आगे कहा, “भारत के लिए, जहाँ लकड़बग्घे ज़्यादातर सुरक्षित इलाकों के बाहर इंसानों वाले और औद्योगिक इलाकों में रहते हैं, सीएमएस कॉप15 का नतीजा फंडिंग, निगरानी और खतरों (जैसे कि रहने की जगह का बंटवारा और इंसान-जानवर के बीच टकराव) को कम करने के लिए प्राथमिकता तय करने में मदद कर सकता है। साथ ही, यह बड़े इलाके के स्तर पर संरक्षण के तरीकों की ज़रूरत पर ज़ोर देता है और इस प्रजाति के वैश्विक संरक्षण की पहचान को बढ़ाता है।”
ये चिंताएँ पश्चिम बंगाल के आसनसोल-दुर्गापुर इलाके के लिए सीधे तौर पर अहम हैं, जहाँ माइनिंग और उद्योगों के विस्तार ने उस इलाके की बनावट को बदल दिया है जहाँ लकड़बग्घे रहते थे।
खनन, सड़कें और टूटता प्राकृतिक आवास
“आसनसोल और दुर्गापुर के इलाके में लकड़बग्घों के लिए मुख्य खतरा उनके प्राकृतिक आवास के खत्म होने, उसके टुकड़ों में बंटने और बड़े पैमाने पर खनन व उससे जुड़े निर्माण की वजह से होने वाली गड़बड़ी से है। ओपन-कास्ट खदानों, सड़क नेटवर्क और इंसानी बस्तियों के फैलने से उन प्राकृतिक रास्तों में रुकावट आई है, जिनका इस्तेमाल लकड़बग्घे आने-जाने के लिए करते हैं,” चट्टोपाध्याय ने कहा।
उन्होंने आगे कहा कि सड़क दुर्घटनाओं में मौत, कभी-कभार बदले की भावना से की जाने वाली हत्याएं, और छोड़े गए या दोबारा शुरू किए गए खनन वाले इलाकों में लकड़बग्घों की मांद की अस्थिरता से बड़ा खतरा पैदा होता है। “इस प्रजाति की प्रजनन दर कम होने और जैविक सीमाओं को देखते हुए, वयस्क जीवों की मौत में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी से उनकी आबादी पर गंभीर असर पड़ सकता है,” उन्होंने बताया।

“हमारे इलाके में, एक द्वीप के जैव भूगोल का स्पष्ट उदाहरण देखा जा सकता है। पश्चिम बंगाल के खनन और औद्योगिक क्षेत्रों में स्थित आवास खंड पारिस्थितिक ‘द्वीपों’ के रूप में कार्य करते हैं। यह संभव है कि पड़ोसी राज्य झारखंड से लकड़बग्घों की मूल आबादी इन बिखरे इलाकों में फैलती है, जिससे इनकी आबादी छोटी और अलग-थलग बनी रहती है। हालाँकि, बढ़ते विखंडन, खनन, और सड़कों जैसी रैखिक संरचनाएं आवागमन को बाधित कर सकती हैं, जिससे संपर्क कम हो सकता है और आनुवंशिक अलगाव की संभावना बढ़ सकती है।”
पूर्वी भारत में इस प्रजाति पर काम करने वाले चट्टोपाध्याय ने कहा कि इस अंतर्राष्ट्रीय निर्णय में पूर्वी भारत में धारीदार लकड़बग्घे के आवासों पर नीतिगत और संरक्षण संबंधी ध्यान केंद्रित करने की प्रबल क्षमता है। उन्होंने कहा, “सीएमएस जैसे वैश्विक फ्रेमवर्क के तहत मान्यता मिलने से प्रजाति की संरक्षण प्राथमिकता बढ़ जाती है और राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय रणनीतियों को अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप बनाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।”
पूरे इलाके में खतरे
आलम ने यह भी कहा कि भारत में इस प्रजाति के बारे में लोगों की सोच अभी भी ठीक से समझी नहीं गई है। उन्होंने कहा कि क्योंकि धारीदार लकड़बग्घे पूरी तरह से रात में जागते हैं और कम संख्या में पाए जाते हैं, इसलिए बहुत से लोगों को उनकी मौजूदगी के बारे में पता नहीं है, जबकि कुछ इलाकों में उन्हें मुख्य रूप से जानवरों के लिए खतरा माना जाता है।
लिबरमैन ने उन खतरों के बारे में भी बताया जिनका सामना धारीदार लकड़बग्घे अपने पूरे इलाके में करते हैं, जिसमें शहरीकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और खेती के विस्तार के कारण रहने की जगह का नुकसान और गिरावट; शिकार में कमी; इंसान-जानवरों का टकराव, सीधा उत्पीड़न और गैर-कानूनी व्यापार शामिल हैं। कुछ व्यापार जादू के मकसद से होता है।
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बंगाल की फिलहाल की जरूरतों पर बात करते हुए चट्टोपाध्याय ने कहा, “अभी की ज़रूरी बातों में कैमरा ट्रैपिंग और मूवमेंट स्टडी जैसे व्यवस्थित सर्वे के ज़रिए बेसलाइन डेटा को मज़बूत करना; डेनिंग साइट्स (मांदों) की पहचान करना और उन्हें सुरक्षित करना; और ज़रूरी कॉरिडोर की मैपिंग करना शामिल होना चाहिए। वाहनों की गति को नियंत्रित करना, सड़कों पर बोर्ड और चिन्ह, और वाइल्डलाइफ़ क्रॉसिंग जैसे तरीकों से सड़क पर होने वाली मौतों को कम करना भी उतना ही ज़रूरी है।”
आलम ने कहा कि भारत को इस प्रजाति के मौजूदा और पुराने फैलाव का पता लगाने, अलग-अलग जगहों पर खतरों की पहचान करने और केंद्र और राज्य सरकारों को मज़बूत कंज़र्वेशन रिस्पॉन्स बनाने में मदद करने के लिए एक पूरे देश में एक डिटेल्ड प्रोजेक्ट की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि वन विभाग, रिसर्च इंस्टीट्यूशन और संरक्षण वाले समूहों को इस प्रजाति पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 22 अप्रैल 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: धारीदार लकड़बग्घों के रहने की जगह का नुकसान और खराब होना, शिकार की कमी, इंसान-जानवरों का टकराव, सीधे तौर पर परेशान करना और गैर-कानूनी व्यापार जैसे खतरों का सामना करना पड़ता है। तस्वीर – मनीष कुमार चट्टोपाध्याय।