- केरला में मच्छरों की 100 से अधिक प्रजातियों पर किए गए एक अध्ययन में 14 ऐसी प्रजातियां मिली हैं जो बीमारियां फैलाती हैं।
- केरला में पिछले कुछ वर्षों में डेंगू और चिकनगुनिया के मामले काफी तेजी से बढ़े हैं।
- एक साथ कई बीमारियां फैलाने वाले मच्छर एक ही भौगोलिक क्षेत्र में पाए गए, जिससे भविष्य में बीमारियों के प्रकोप से निपटना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
एक नए अध्ययन के मुताबिक, केरला में बीमारियां फैलाने वाले मच्छरों की कई प्रजातियां अब एक साथ रहती हैं। ये मच्छर खासतौर पर इंसानों द्वारा फेंकी गई चीजों, जैसे पुराने टायरों या प्लास्टिक के डिब्बों में अपना घर बना रहे हैं।
राज्य के पांच जिलों में किए गए एक जमीनी सर्वे में मच्छरों की कुल 108 प्रजातियां पाई गईं, जिनमें से 14 प्रजातियां ऐसी हैं जो मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां फैलाती हैं। इस अध्ययन में पाया गया कि कुछ मच्छर एक साथ कई बीमारियां फैलाने में सक्षम हैं। जब एक ही इलाके में बीमारी फैलाने वाली ऐसी कई प्रजातियां एक साथ मौजूद होती हैं, तो वहां बीमारियों के प्रकोप को संभालना और रोकना बहुत चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यह स्थिति केरला के लिए एक बड़ी चेतावनी है। अगस्त 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, पूरे भारत में डेंगू से हुई कुल 42 मौतों में से 31 मौतें यानी लगभग 75% मौतें अकेले केरला में हुई हैं। साथ ही, डेंगू के कुल मरीजों (8,259 केस) की संख्या के मामले में भी यह राज्य देश में दूसरे नंबर पर है।
डेंगू और मलेरिया से दुनियाभर में लाखों मौतें
मच्छर इंसानों में मलेरिया और फाइलेरिया (परजीवियों के कारण), डेंगू, चिकनगुनिया, ज़ीका व जापानी इंसेफेलाइटिस (वायरस के कारण) जैसी कई तरह की बीमारियां फैलाते हैं। पूरी दुनिया में हर साल मलेरिया के करीब 24.9 करोड़ मामले सामने आते हैं और लगभग 6 लाख से ज्यादा लोगों की मौत होती है। इसी तरह, डेंगू के करीब 9.6 करोड़ मामले आते हैं और हर साल लगभग 40,000 लोगों की जान जाती है। केरला में 2017 में डेंगू का प्रकोप फैला था। पिछले कुछ सालों में यहां डेंगू और चिकनगुनिया के मामलों में फिर से बढ़ोतरी देखी जा रही है, जो एक बड़े ग्लोबल ट्रेंड को दर्शाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, डेंगू के खतरे का बढ़ना मच्छरों के प्रजनन के बदलते पैटर्न, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और अन्य सामाजिक-आर्थिक कारणों से जुड़ा हो सकता है।

अशोका यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर फॉर हेल्थ एनालिटिक्स रिसर्च एंड ट्रेंड्स’ की निदेशक डॉ. पूर्णिमा प्रभाकरन कहती हैं, “भारत में पिछले कुछ वर्षों में मच्छरों से होने वाली बीमारियों के रुझान में बदलाव आया है। यह बदलाव अलग-अलग इलाकों में बीमारियों के फैलने के तरीकों, बीमारियों के बढ़ते बोझ और मच्छरों के व्यवहार व उनके पनपने के तौर-तरीकों में साफतौर पर देखा जा सकता है।”
बेंगलुरु के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ जेनेटिक्स एंड सोसाइटी में बीमारियों के पारिस्थितिकी तंत्र का अध्ययन करने वाली फराह इश्तियाक समझाती हैं, “भारत में बीमारी फैलाने वाले मच्छरों की बहुत सारी किस्में मौजूद हैं, लेकिन हमारे पास इस बात का सटीक डेटा नहीं है कि वे किन जगहों पर रहना और प्रजनन करना पसंद करते हैं। जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण मच्छरों के भौगोलिक वितरण क्षेत्र और विभिन्न प्रजातियों के बीच अंतर्संबंधों में बड़ा बदलाव आया है।”
विविध प्रजातियां और उनकी मौजूदगी
केरला के पश्चिमी घाट के जंगल उनकी जैव विविधता के लिए मशहूर हैं। साथ ही, इस राज्य में बड़े पैमाने पर खेत, बागान और रिहायशी इलाके भी हैं। जंगलों के करीब इन अलग-अलग तरह के क्षेत्रों की मौजूदगी और भारी बारिश के कारण, यह पूरा इलाका मच्छरों के पनपने के लिए सबसे अनुकूल जगह बन जाता है। मच्छरों की विभिन्न प्रजातियों, उनके फैलने के तरीके और उनके आवासों के बारे में पता लगाने के लिए चेन्नई की आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मलेरिया रिसर्च की एक टीम ने केरला के पांच जिलों — वायनाड, एर्नाकुलम, पतनमथिट्टा, इडुक्की और तिरुवनंतपुरम में एक सर्वे किया। टीम ने प्राकृतिक और मानव-निर्मित, दोनों तरह की जगहों पर पानी के स्रोतों और पेड़-पौधों वाले इलाकों से अपरिपक्व (लार्वा और प्यूपा) और वयस्क मच्छरों को इकट्ठा किया। इसके बाद लैब में इनकी बारीकी से जांच कर इनकी प्रजातियों की पहचान की गई।
अध्ययन में मच्छरों की 108 प्रजातियां सामने आईं, जिनमें से 14 प्रजातियां ऐसी हैं जो मुख्य रूप से मलेरिया, फाइलेरिया और अर्बोवायरस जैसी बीमारियां फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं।
सबसे अधिक संख्या में पाई जाने वाली प्रजाति एडिस एल्बोपिक्टस है, जो डेंगू और चिकनगुनिया फैलाने के लिए जिम्मेदार है। यह प्रजाति सर्वे किए गए सभी पांचों जिलों में पाई गई, लेकिन इनकी सबसे अधिक मौजूदगी तिरुवनंतपुरम जिले में देखी गई। यह मच्छर किसी भी तरह के वातावरण में खुद को ढालने और जीवित रहने के लिए जाना जाता है। हालाँकि, दूसरी सबसे प्रमुख प्रजातियां (जैसे क्यूलेक्स क्विनक्वेफैसिएटस, फ्रेडवर्ड्सियस विटाटस और हुलेकोएटियोमिया क्राइसोलिनियाटा) हर जिले में अलग-अलग थीं। यह शोध क्षेत्र-विशेष के आधार पर मच्छरों पर नियंत्रण की रणनितियां बनाने की जरूरत को उजागर करता है।
दूसरी ओर, सबसे ज्यादा बीमारी फैलाने वाले मच्छरों (वेक्टर) की संख्या सभी जिलों में काफी कम पाई गई। उदाहरण के लिए डेंगू फैलाने वाला मुख्य मच्छर (एडीज एजिप्टी) सर्वे में पकड़े गए कुल मच्छरों का सिर्फ 1.43% ही था। इसी तरह दिमागी बुखार (जापानी इंसेफेलाइटिस), मलेरिया और फाइलेरिया फैलाने वाले मच्छरों की संख्या इससे भी कम थी। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि भले ही इन मच्छरों की संख्या अभी कम है, लेकिन ये अपने भीतर रोगाणुओं को सुरक्षित रख सकते हैं, और वातावरण के इनके अनुकूल होने पर बीमारियों के बड़े प्रकोप का कारण बन सकते हैं।
बीमारी फैलाने वाले मच्छरों के फैलाव को समझना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि हाल ही में हुए एक अध्ययन में केरला के लगभग एक-तिहाई बच्चों में डेंगू एंटीबॉडी पाए जाने की बात सामने आई है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि संक्रमण का असर अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग था, इसमें वायरस के कई प्रकार शामिल थे और अक्सर इन संक्रमणों का पता भी नहीं चल पाता था। ये जानकारी क्षेत्रीय स्तर पर सर्वे करने और बचाव के ठोस कदम उठाने की ज़रूरत को और भी महत्वपूर्ण बना देती है।

केरला का यह अध्ययन बताता है कि मलेरिया फैलाने वाले मुख्य वेक्टर के साथ-साथ उसे फैलाने वाले अन्य सहायक मच्छर (एनोफेलेस वरुणा) भी एक ही जगह पर रह रहे हैं। इन दोनों का एक साथ होना बीमारी के संक्रमण को और लंबा या और गंभीर बना सकता है। ज्ञात प्रजातियों के अलावा, रिसर्च टीम ने बीमारियां फैलाने वाली कुछ अन्य प्रजातियों को लेकर भी चेतावनी दी है। इनमें स्टेगोमिया क्रोम्बेनी और स्टेगोमिया एल्बोपिक्टा से निकटता से संबंधित एल्बोपिक्टस उपसमूह (एस. सबएल्बोपिक्टा, एस. नोवेल्बोपिक्टा, एस. स्यूडोएल्बोपिक्टा) की कुछ अन्य प्रजातियां शामिल हैं, जिन्हें सर्वे किए गए इलाकों में पहली बार देखा गया था।
इस अध्ययन में मच्छरों की कुछ ऐसी दुर्लभ प्रजातियों (हीज़मैनिया और वेरैलिना) में इंसानों की ओर आकर्षित होने का व्यवहार भी देखा गया, जो आमतौर पर केवल जंगलों और बागानों में ही पाई जाती हैं। इंसानों के साथ उनके इस बढ़ते जुड़ाव और इससे बीमारी फैलने की संभावनाओं पर विस्तार से अध्ययन करने की जरूरत है।
जलवायु परिवर्तन और आवास की पसंद में बदलाव
फील्ड सर्वे से पता चला है कि तालाबों, झीलों, चट्टानों के गड्ढों या पेड़ों के खोखले हिस्सों जैसी प्राकृतिक जगहों की तुलना में इंसानी बस्तियों के आसपास मच्छरों की कहीं अधिक किस्में मौजूद हैं। ये मच्छर प्राकृतिक आवासों के बजाय कृत्रिम आवासों में अधिक पाए गए, जैसे फेंके गए प्लास्टिक के डिब्बों, टायरों, घर के बर्तनों या खेती के लिए जमा किए गए पानी में। मच्छरों का कृत्रिम आवासों के प्रति यह लगाव अन्य अध्ययनों में भी देखा गया है, जिसमें केरला के तट के पास लक्षद्वीप द्वीपों में मच्छरों की विविधता पर किया गया एक सर्वे भी शामिल है।

सर्वे में सबसे अधिक पाई गई मच्छर प्रजाति स्टेगोमिया एल्बोपिक्टा 77 प्रकार के आवासों में प्रजनन करती पाई गई। ये पेड़ों के खोखले हिस्सों जैसे प्राकृतिक आवासों के अलावा मुख्य रूप से पुराने टायरों, घर के बर्तनों और बागानों में रबर इकट्ठा करने वाले कपों जैसी कृत्रिम जगहों का इस्तेमाल कर रही है। वहीं, एस. एजिप्टी प्रजाति ज्यादातर शहरी इलाकों में पानी के बर्तनों और फेंके गए कचरे में पाई गई। गौर करने वाली बात यह है कि हीज़मैनिया चंडी जैसी कुछ प्रजातियां, जो आमतौर पर केवल पेड़ों के खोखले हिस्सों में प्रजनन करने के लिए जानी जाती हैं, वे भी अब पुराने टायरों में देखी जा रही हैं; इससे साफ जाहिर होता है कि मच्छर अब मानव निर्मित आवासों के अनुसार खुद को तेजी से ढाल रहे हैं।
इश्तियाक कहती हैं, “स्टेगोमिया एल्बोपिक्टा और स्टेगोमिया एजिप्टी जैसी कुछ प्रजातियां अपने आवासों के चयन में बहुत विविधतापूर्ण होती हैं और दूसरे आवासों में भी फैल सकती हैं। ऐसा मुख्य रूप से इसलिए हुआ है क्योंकि अब जंगलों और शहरी क्षेत्रों के बीच का अंतर कम हो गया है। इन प्रजातियों के आवास तेजी से बदल रहे हैं। यह समझना बेहद जरूरी है कि अलग-अलग प्रजातियां वातावरण के इन बदलावों के अनुसार खुद को कैसे ढाल रही हैं। इस नज़रिए से ऐसे अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।”
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हाल के एक रिसर्च मॉडल से पता चला है कि डेंगू, चिकनगुनिया और ज़ीका जैसी बीमारियों के फैलने के लिए एक जैसा वातावरण और भौगोलिक क्षेत्र ज़िम्मेदार हैं। वहीं एक अन्य अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण मच्छरों के प्रजनन के तरीके और उनकी संख्या में बदलाव आ सकता है। इस साल पुणे में हुए एक अध्ययन के अनुसार, डेंगू से होने वाली मौतों पर तापमान, बारिश और नमी का काफी असर पड़ता है। इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ते तापमान और बारिश के बदलते मिजाज के कारण डेंगू से होने वाली मौतों में 40% तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
डॉ. प्रभाकरन कहती हैं, “मच्छरों के व्यवहार और उनकी बढ़ती संख्या का एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है, जो इनके फैलने और बढ़ने के लिए बहुत अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर रहा है। यही वजह है कि अब भारत के उन हिस्सों में भी मच्छरों से होने वाली बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है, जो पहले सुरक्षित माने जाते थे। उच्च तापमान की वजह से मच्छरों के भीतर वायरस के विकसित होने का समय कम हो जाता है, जिससे वे बहुत तेज़ी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं। वहीं, बारिश के बदलते पैटर्न और बढ़ती नमी उनके प्रजनन और प्रसार के लिए अधिक अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं।”
इश्तियाक ने जोर देते हुए कहा, “बीमारियों का अध्ययन करते समय, मच्छरों के स्वभाव और उनके पर्यावरण को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। सारा ध्यान सिर्फ रोगाणुओं पर रहता है। लेकिन हमें मच्छरों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है और भारत के अन्य हिस्सों से भी इस तरह के आंकड़ों की आवश्यकता है। सरकारी नीतियों को बेहतर बनाने और उन्हें प्रभावित करने के लिए हमें ठोस सबूतों पर आधारित अध्ययनों की जरूरत है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 दिसंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर- मच्छरों को खत्म करने के लिए फॉग मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। बीमारी फैलाने वाले मच्छरों का फैलाव और उनकी बढ़ती संख्या, भूमि उपयोग और जलवायु परिवर्तन से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। तस्वीर- क्रोकोडिल, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 3.0)