- भारत के जंगल महत्वपूर्ण आर्थिक और आजीविका संबंधी लाभ उपलब्ध कराते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो भोजन, रोजगार और संसाधनों के लिए जंगलों के पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर हैं।
- जंगल पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी कई सेवाएं देते हैं, जिन्हें अक्सर बाजार के मानकों पर आधारित आकलनों में नजरअंदाज किया जाता है।
- जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का मूल्यांकन संरक्षण को मजबूत कर सकता है। लेकिन, शोधकर्ता इस मूल्यांकन के लिए ज्यादा बेहतर तरीकों को जरूरी बताते हैं और चाहते हैं कि इसकी जानकारी वनों पर आश्रित समुदायों, इससे जुड़े नीति निर्माताओं और युवा पीढ़ी तक पहुंचे।
भारत के जंगल हर साल 2.5 ट्रिलियन डॉलर (करीब 220 लाख करोड़) के बराबर की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। यह बात मेटा-रिग्रेशन तरीके का इस्तेमाल करते हुए ‘भारत में वन पारिस्थितिकी सेवाओं का योगदान’ शीर्षक से प्रकाशित नए अध्ययन में सामने आई है। इसके मुताबिक भारत के जंगलों से मिलने वाले पारिस्थितिकी तंत्र लाभों की प्रति हेक्टेयर कीमत लगभग 31,000 डॉलर (28 लाख रुपए से अधिक) सालाना है। जंगलों के प्रकारों में उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन का सालाना आर्थिक मूल्य सबसे ज्यादा 703 अरब डॉलर (65 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा) है।
इन लाभों को मानव कल्याण और अस्तित्व को बढ़ावा देने वाले प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभों के रूप में परिभाषित किया गया है। इन्हें आगे प्रावधान, विनियमन, सांस्कृतिक और सहायक सेवाओं में बांटा गया है। वनों के संदर्भ में प्रावधान सेवाओं में लकड़ी, भोजन और औषधीय पौधे जैसे वन भूमि से मिलने वाली वस्तुएं आती हैं। विनियमन सेवाओं में कार्बन सोखने की क्षमता और मिट्टी का संरक्षण शामिल है। सांस्कृतिक सेवाओं में मनोरंजन से मिलने वाले लाभ और पवित्र वन या ओरण वगैरह शामिल हैं। सहायक सेवाओं में विभिन्न प्रजातियों के लिए आवास उपलब्ध कराने जैसी सेवाएं आती हैं।
लेखकों ने अलग-अलग सेवाओं की कीमत का भी आकलन किया और पाया कि भारत के वन हर साल लगभग 9.64 अरब डॉलर (89 हजार करोड़ रुपए से अधिक) की प्रावधान सेवाएं, 12.15 अरब डॉलर (एक लाख 12 हजार करोड़ रुपए से अधिक) की विनियमन सेवाएं और 17.17 अरब डॉलर (एक लाख 59 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा) की सांस्कृतिक सेवाएं प्रदान करते हैं। अध्ययन में सहायक सेवाओं का विश्लेषण नहीं किया गया।
दरअसल, वन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के आर्थिक प्रभावों को समझने में दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है। यह मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन को रोकने और जैव-विविधता के संरक्षण में वनों की भूमिका के बारे में बढ़ती जागरूकता से प्रेरित है। यह अध्ययन बेहतर नतीजों के लिए इन सेवाओं को नीतियों और वन संरक्षण उपायों में शामिल करने की जरूरी पर रोशनी डालता है।
बेंगलुरु स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज (ISEC) के सेंटर फॉर इकोलॉजिकल इकोनॉमिक्स एंड नेचुरल रिसोर्सेज (CEENR) में एसोसिएट प्रोफेसर एम. बालासुब्रमण्यन कहते हैं, “नीति-निर्माता तेजी से यह मान रहे हैं कि कार्बन भंडारण, जलग्रहण क्षेत्र और सूखे से सुरक्षा जैसे वनों से मिलने वाले कई लाभ पारंपरिक आर्थिक संकेतकों या बाजार मूल्यों में दिखाई नहीं देते हैं। इसके चलते, विकास की योजना बनाते समय अक्सर वनों की वास्तविक कीमत कम आंकी गई है। समय-समय पर ऐसे फैसले लिए गए हैं जिनमें उनके लंबी अवधि के आर्थिक और सामाजिक योगदान की अनदेखी होती है।” बालासुब्रमण्यन इस शोध पत्र के प्रमुख लेखक हैं।
वह कहते हैं, “अब प्राकृतिक पूंजी और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को राष्ट्रीय विकास रणनीतियों में शामिल करने की दिशा में वैश्विक स्तर पर बदलाव हो रहा है। देश यह समझ रहे हैं कि टिकाऊ आर्थिक विकास स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने पर निर्भर करता है। इससे ऐसे मजबूत वैज्ञानिक सबूतों की मांग बढ़ी है, जो वन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के आर्थिक मूल्य को आंक सकें।”

वनों के योगदान को समझना
इस अध्ययन में शामिल बालासुब्रमण्यन और अन्य शोधकर्ताओं ने 2000 से 2024 के बीच भारत में वन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर किए गए 45 अध्ययनों का मेटा-रिग्रेशन विश्लेषण किया। चूंकि अतीत में अलग-अलग वन प्रकारों में अलग-अलग सेवाओं का मूल्यांकन करने के लिए अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया गया था, इसलिए मेटा-रिग्रेशन तरीके ने शोधकर्ताओं को अध्ययनों के बीच मौजूद अंतरों को ध्यान में रखते हुए भारतीय वनों से मिलने वाली सेवाओं का व्यापक अनुमान लगाने में मदद की।
विश्लेषण से यह भी पता चला कि पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं से संबंधित आंकड़े व्यापक दायरे में फैले हुए थे। लेखकों ने शोध पत्र में कहा है कि विश्लेषण में शामिल अध्ययनों में इस्तेमाल किए गए अलग-अलग तरीकों के कारण मूल्यों में अंतर रहा, जिससे विश्लेषण सीमित होता है।
बालासुब्रमण्यन कहते हैं, “हमारे तरीके ने हमें उन मुख्य कारकों की पहचान करने में मदद की, जो वन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के मूल्य को प्रभावित करते हैं। इससे ज्यादा मजबूत तथा राष्ट्रीय स्तर पर संबंधित अनुमान तैयार करने में मदद मिली। यह दशकों के शोध को एक ही विश्लेषणात्मक ढांचे में एक साथ लाता है और वन प्रकारों, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं, मूल्यांकन के तरीकों तथा क्षेत्रीय विशेषताओं के बीच अंतर को ध्यान में रखता है। इससे हमें स्थानीय अंतरों को व्यापक राष्ट्रीय रुझानों से अलग करने में मदद मिली।”
अध्ययन से यह भी पता चलता है कि समय के साथ वन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के मूल्यांकन में बदलाव आया है। अध्ययन की शुरुआती अवधि (2000-2010) में इन सेवाओं पर केंद्रित मूल्यांकन कम थे और पारंपरिक तरीकों की वजह से उनके द्वारा तय मूल्य भी कम थे। इस अवधि के अध्ययनों से यह भी पता चला कि कार्बन सोखने जैसी विनियमन सेवाओं के प्रति जागरूकता और उनकी मांग की कमी थी।
लेखकों के अनुसार, 2016 से 2020 के बीच नए और बेहतर तरीके सामने आए और अध्ययनों में सख्त मौद्रिक आकलन से हटकर वन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के ज्यादा गुणात्मक विश्लेषण पर जोर दिया गया। हाल के अध्ययनों में उनके मूल्यांकन के आकलनों में अधिक विविधता दिखाई देती है, जो इन सेवाओं की जांच के लिए किसी बेहतर ढांचे के बिना वनों की अहमियत को समझने में बढ़ती दिलचस्पी को दिखाती है।

आंकड़ों से अधिक
ऑस्ट्रेलिया की चार्ल्स डार्विन यूनिवर्सिटी में पारिस्थितिकी अर्थशास्त्र की प्रोफेसर और अध्ययन की सह-लेखक कमलजीत के. सांघा का कहना है कि अध्ययन में सामने आए मूल्य भारत की अर्थव्यवस्था में वनों के अहमियत के बारे में बताते हैं। लगभग 30 करोड़ लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है जो वन संसाधनों पर निर्भर हैं। सांघा जोर देते हुए कहती हैं, “यह भी मोटा-मोटी अनुमान है, क्योंकि कई आदिवासी, कृषि और ग्रामीण समुदायों का भोजन, रोजगार और संसाधनों के लिए रोजाना वनों में जाते हैं। देश की लगभग 65% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और इस प्रतिशत को ध्यान में रखते हुए वनों की भूमिका हमारे अनुमान से कहीं ज्यादा बड़ी होगी।”
शोधकर्ता आगे कहती हैं कि समय की मांग है कि इन आबादी के जीवन और आजीविका में वनों की भूमिका को समग्र रूप से समझा जाए और उन्हें संरक्षण की कोशिशों में शामिल किया जाए।
सांघा के विचारों की पुष्टि संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की वन क्षेत्र में रोजगार पर हालिया रिपोर्ट से भी होती है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में 4.2 करोड़ लोग वन क्षेत्र में रोजगार पाते हैं, जिसमें एशिया इस मामले में सबसे आगे है।
उन्होंने आगे कहा, “भारत के कई प्राकृतिक इलाके वास्तव में सांस्कृतिक-आध्यात्मिक परिदृश्य हैं, जिनसे लोगों का खास नाता है और ये संबंध लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण में अहम भूमिका निभाते हैं। हमें इन जुड़ावों को फिर से जीवंत करने की जरूरत है। पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाले कल्याणकारी लाभों को ध्यान में रखने के लिए और अधिक काम किए जाने की जरूरत है। वन जैव-विविधता के संरक्षण, मिट्टी और जल प्रणालियों की सुरक्षा तथा हमारी कृषि पद्धतियों को सहारा देते हैं। फिर भी, मुख्य रूप से उसी बड़े पैमाने पर लकड़ी जैसी चीज को मापा जाता है जो बाजार में आती-जाती है।”
विश्लेषण में बालासुब्रमण्यन और उनकी टीम ने पाया कि बाजार में खरीदे और बेचे जाने वाले वन से संबंधित उत्पादों और सेवाओं के आर्थिक मूल्य को मापने वाली बाजार मूल्य पद्धति अध्ययनों में मूल्यांकन के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका है।
नई दिल्ली स्थित दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के अर्थशास्त्र विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार का कहना है कि वन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर किए गए अध्ययनों में अक्सर इन सेवाओं के कुल आर्थिक मूल्य को समझने के लिए लोगों से किसी खास सेवा के लिए उनकी भुगतान करने की इच्छा के बारे में पूछा जाता है।
अध्ययन से जुड़े नहीं रहे कुमार कहते हैं, “हमें यह समझने की जरूरत है कि किसी मानक के बिना लोग बाजार में बिकने वाली उन वस्तुओं की भी उचित कीमत नहीं बता सकते, जिनसे वे परिचित हैं। लोग वन-आधारित सेवाओं से नियमित रूप से जुड़े हुए नहीं होते हैं, इसलिए अनुमान लगाना और भी चुनौतीपूर्ण होगा। यही एक कारण है कि अध्ययनों में इनके मूल्यों में अंतर दिखाई देता है।”
कुमार बताते हैं कि ज्यादा असरदार तरीका यह होगा कि वनों के खत्म होने पर जो नुकसान होता है उसका आकलन किया जाए। “अध्ययन वनों को समग्र रूप से देखने के बजाय एक एकड़ वन भूमि पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं और उससे मिलने वाली सभी सेवाओं का आकलन कर सकते हैं।” इससे वनों से मिलने वाली पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का उचित अनुमान मिल सकेगा और यह भी स्पष्ट रूप से समझा जा सकेगा कि अगर वन भूमि मौजूद नहीं होती, तो क्या-क्या नुकसान होता।

बेंगलुरु स्थित अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) के संरक्षण जीवविज्ञानी हरीशा आर.पी. कहते हैं कि ये मूल्य जितना वन संरक्षण और नीति निर्माण की दिशा तय करने में मदद करते हैं, उतना ही अन्य हितधारकों, खासकर इन संसाधनों पर निर्भर समुदायों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए भी अहम हैं। हरीशा भी इस अध्ययन से जुड़े नहीं हैं।
अपने काम के तहत हरीशा ने कर्नाटक के आदिवासी समुदायों के पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को दर्ज करते हैं। वह कहते हैं, “मेरे काम का बड़ा हिस्सा पारंपरिक तौर-तरीकों और आदिवासी ज्ञान को दर्ज करना है। इसे स्थानीय भाषा में भी अनुवादित किया जाता है, ताकि समुदाय इनका लाभ उठा सकें। इसी तरह, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं के लिए प्रकृति से जुड़ी ऐसी जानकारियां और उनका मूल्यांकन भी अन्य संबंधित लोगों तक पहुंचना चाहिए।”
हरीशा आगे कहते हैं कि इन समुदायों की युवा पीढ़ी धीरे-धीरे पारंपरिक प्रथाओं और संरक्षण कोशिशों से दूर होती जा रही है। इसलिए, उसे विभिन्न सेवाओं में वनों की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। उन्हें उम्मीद है कि एक बार जब युवा यह समझ जाएंगे कि वन कितने अमूल्य हैं, तो वे पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने और उन देसी प्रथाओं को संरक्षित करने के लिए अधिक प्रोत्साहित होंगे, जो वनों से प्राप्त संसाधनों को बनाए रखती हैं।
हरीशा कहते हैं, “मूल बात यह है कि हम वास्तव में प्रकृति की सेवाओं का मूल्यांकन नहीं कर सकते। यह बहुत जटिल है और इसका कोई आंकड़ा तय करना आसान नहीं है।” शोधकर्ता को उम्मीद है कि इन मूल्यांकनों का इस्तेमाल संरक्षण को “बढ़ावा देने, संरक्षित करने और व्यवहार में लाने” के लिए किया जा सकता है। साथ ही, लोगों और पर्यावरण के लिए वनों के सभी योगदानों को समझा जा सके।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 20 अगस्त, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कर्नाटक के चिकमगलुरु में पश्चिमी घाट के जंगलों में सांभर हिरण। तस्वीर: अनिल शर्मा\ Pexels।