- केरल के एर्नाकुलम जिले के थुरुथिक्कारा गाँव के लोगों ने मौसमी जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और पानी की गुणवत्ता की जांच जैसी पहलों को एक साथ अपनाया है।
- घरों और सार्वजनिक संस्थानों में लगाई गई कम लागत वाली रूफटॉप वर्षा जल संचयन प्रणालियाँ फिल्टर किए गए बारिश के पानी को सीधे खुले कुओं में पहुंचाती हैं, जिससे अब ग्रामीणों को बाहर से पानी खरीदने की जरूरत कम हो गई है।
- इसके अलावा, ग्रामीणों ने गाँव में एक विज्ञान और प्रौद्योगिकी केंद्र की भी स्थापना की है, जो अब जल संरक्षण से जुड़े अभियानों का एक प्रमुख केंद्र बन गया है।
केरल के एर्नाकुलम जिले के थुरुथिक्कारा गाँव में जनवरी की एक ठंडी सुबह, 53 वर्षीय विद्या मंजुश अपने खुले कुएं के पास खड़ी होकर उसमें पानी के स्तर को देख रही हैं। राहत की बात यह है कि पिछले वर्षों के मुकाबले इस बार जलस्तर स्थिर बना हुआ है। लेकिन कुछ साल पहले तक ऐसा नहीं था। बारिश खत्म होते ही भूजल का स्तर तेजी से गिरने लगता था और गाँव के कुएं सूखने लगते थे।
उस दौर को याद करते हुए विद्या मंजुश बताती हैं कि पानी के लिए उन्हें टैंकरों का दो से तीन दिन तक इंतजार करना पड़ता था। और जब टैंकर आता भी था, तो उसका पानी पीने लायक नहीं होता था। वह कहती हैं, “पानी में अक्सर काले कण तैरते रहते थे। मुझे हर बार उसे कपड़े से छानकर उबालना पड़ता था।”
वैसे तो एर्नाकुलम जिले में अच्छी खासी बारिश होती है। जिले में साल भर में लगभग 3000 मिमी बारिश होती है, जो मुख्य रूप से मार्च से अक्टूबर के बीच होती है। लेकिन थुरुथिक्कारा में बारिश का मौसम खत्म होते ही कुएं जवाब देने लगते थे और जनवरी आते-आते पूरी तरह सूख जाते थे। इसके चलते यहां के लोगों को पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर होना पड़ता था।
टैंकरों पर इस मौसमी निर्भरता से पार पाने के लिए, ग्रामीणों ने वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, वर्षा मापन और पानी की गुणवत्ता के परीक्षण जैसी तकनीकों को अपनाया। घरों और सार्वजनिक संस्थानों में कम लागत वाली रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग यानी वर्षा जल संचयन प्रणालियां स्थापित कीं, ताकि बारिश के पानी का बेहतर उपयोग किया जा सके और जल संबंधी परेशानियों को कम किया जा सके।

जब ग्रामीण एकजुट हुए
थुरुथिक्करा मुलंथुरुथी ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है और इसके एक तरफ मुवातुपुझा नदी बहती है। यहां कृषि और उससे जुड़े कार्य ही आजीविका का मुख्य साधन हैं।
इस गांव में जल संरक्षण की पहल का इतिहास साल 2012 के एक विवाद से जुड़ा है, जब एक रियल एस्टेट कंपनी ने थुरुथिक्करा में स्थित मनाक्कमला नामक एक लेटेराइट पहाड़ी की खुदाई करने का प्रयास किया था। निवासियों को डर था कि पहाड़ी को हटाने से मिट्टी का स्थिरता और भू-जल पुनर्भरण पर असर पड़ेगा।
इस खुदाई के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले एक निर्माण श्रमिक मुरूकेशान एम.के. बताते हैं, “हम पहाड़ी की तलहटी में रहते थे। खुदाई का हमारे जल स्रोतों पर सीधा असर पड़ता।”
केरल की एक विज्ञान और साहित्य संस्था, केरल शास्त्र साहित्य परिषद (KSSP) की स्थानीय इकाई ने कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (CUSAT) और सेंटर फॉर वाटर रिसोर्सेज़ डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट (CWRDM) के शोधकर्ताओं तथा स्थानीय निवासियों के साथ मिलकर इस पहाड़ी की जल-भूगर्भीय भूमिका पर अध्ययन किया। अध्ययन में सामने आया कि मनाक्कमला में मिट्टी का खनन भू-जल के पुनर्भरण को बेहद गंभीर रूप से प्रभावित करेगा और इस कारण आसपास की घाटी में भीषण जल संकट पैदा हो जाएगा।”
इसके बाद, कई स्थानीय संगठनों को मिलाकर एक संघर्ष समिति का गठन किया गया और कानूनी कार्रवाई शुरू की गई। एक साल बाद, खुदाई का वह प्रस्ताव वापस ले लिया गया।

लगभग छः साल बाद, 2018 में यहां के निवासियों ने ग्रामीण विज्ञान और प्रौद्योगिकी केंद्र की स्थापना की, जो आगे चलकर गाँव में जल से जुड़े अभियानों का मुख्य केंद्र बन गया। हर शाम ग्रामीण पानी के पुनर्चक्रण, कचरा प्रबंधन और आजीविका से जुड़े छोटे-मोटे कार्यों पर चर्चा और प्रशिक्षण के लिए इस केंद्र पर इकट्ठा होते हैं। इन बैठकों में अक्सर ग्रे-वाटर (घरेलू उपयोग के बाद बचा हुआ पानी) के दोबारा इस्तेमाल और रसोई व कपड़ों की धुलाई वाले पानी को साफ करने जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा की जाती है।
साल 2018 में ही केरल सरकार के ‘हरिता केरल मिशन’ के तहत थुरुथिक्करा को अक्षय ऊर्जा, कचरा प्रबंधन और जल संरक्षण के बेहतरीन कामों के लिए ऊर्जा निर्मला हरित ग्राम के रूप में सम्मानित किया गया था। अब इसी तरह के मॉडल को आसपास की पंचायतों में भी अपनाया जा रहा है।
उसी साल पानी की गुणवत्ता की जांच करने का एक कार्यक्रम भी शुरू किया गया था। CUSAT की मदद से, लगभग 50 प्रशिक्षित स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर दौरा किया और पानी के 12 रासायनिक पैमानों जैसे कठोरता, अम्लता और क्षारकता पर स्थानीय जल स्रोतों की जांच की। अब इस विज्ञान केंद्र से लगभग 300 स्वयंसेवक जुड़े हुए हैं, जिनमें से मुख्य रूप से दो लोग पानी की गुणवत्ता की जांच का जिम्मा संभालते हैं।
विज्ञान केंद्र में एक छोटा वाटर क्लिनिक भी बनाया गया है। यहां प्रशिक्षित स्वयंसेवक ग्रामीणों द्वारा लाए गए पानी के नमूनों की जांच करते हैं और उन्हें उसके परिणामों के बारे में समझाते हैं। यह क्लिनिक ग्रामीणों को मुफ्त में अपनी सेवाएं देता है।


वर्षा जल संचयन और कुओं का पुनर्जीवित होना
भूजल को फिर से बढ़ाने के लिए थुरुथिक्करा में रूफटॉप वर्षा जल संचयन पर मुख्य रूप से ध्यान दिया गया है। छतों पर गिरने वाले बारिश के पानी को एक कम लागत वाले फिल्टर से गुजार कर सीधे खुले कुओं में पहुंचाया जाता है। यहां आमतौर पर दो तरह के फिल्टर उपयोग किए जाते हैं: एक पीवीसी आधारित मल्टी-लेयर फिल्टर और दूसरा एक सरल ड्रम फिल्टर।
पीवीसी आधारित इस प्रणाली की लागत लगभग 4,000 रुपये है, जिसका भुगतान इसे लगवाने के इच्छुक परिवार खुद करते हैं। गाँव के विज्ञान केंद्र के अनुमान के मुताबिक, 1,000 वर्ग फीट की छत वाला घर हर साल करीब 3,00,000 लीटर बारिश का पानी जमा कर सकता है, जो एक औसत परिवार की साल भर की लगभग 2,00,000 लीटर पानी की जरूरत से कहीं ज्यादा है।
इस पीवीसी प्रणाली को निजी घरों के साथ-साथ मंदिरों, चर्चों और वृद्धाश्रमों जैसे सार्वजनिक संस्थानों में भी लगाया गया है।
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ग्रिड-दर-ग्रिड बारिश की निगरानी
वर्षा जल संचयन को और बेहतर बनाने के लिए थुरुथिक्करा में बारिश मापने की एक व्यवस्था भी बनाई गई है। पड़ोसी गाँव अंबल्लूर में, जहां ओरुक्कम विकास कार्यक्रम के तहत ऐसे ही प्रयास किए जा रहे हैं, वहां 11 भौगोलिक ग्रिडों में प्लूटोमीटर (वर्षा मापी यंत्र) लगाए गए हैं।
हर ग्रिड में एक घर को बारिश रिकॉर्ड करने की जिम्मेदारी दी गई है। स्वयंसेवक रोज सुबह 8 बजे से पहले व्हाट्सएप ग्रुप पर अपने आंकड़े भेज देते हैं और फिर इस डेटा को मिलाकर एक ग्राफ तैयार किया जाता है जिससे पूरे गाँव में बारिश के वितरण का पता चलता है। स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित करने वाली KSSP की सदस्य सुमी मोल कहती हैं, “इस प्रक्रिया से हमें यह समझने में मदद मिली कि थोड़ी-थोड़ी दूरी पर भी बारिश की मात्रा अलग-अलग होती है। कुछ इलाकों में दूसरों की तुलना में अधिक बारिश होती है, जिससे पानी की उपलब्धता पर असर पड़ता है।”
एर्नाकुलम जिला प्रशासन ने हरित केरल मिशन के सहयोग से थुरुथिक्करा समेत जिले के विभिन्न हिस्सों में वर्षा मापी यंत्र स्थापित करने की योजना भी बनाई है।

चुनौतियां अभी भी बरकरार
हालाँकि, कुछ समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं। कुछ परिवारों के लिए फिल्टर का रखरखाव करना मुश्किल है और इस्तेमाल की जाने वाली प्रणाली के आधार पर लागत भी अलग-अलग होती है। इसे अपनाने का तरीका भी एक जैसा नहीं है; कुछ परिवार पीवीसी आधारित प्रणालियों के बजाय सस्ते ड्रम फिल्टर चुनते हैं।
थुरुथिक्करा के एक कम्युनिटी फैसिलिटेटर सुरेश कहते हैं, “स्वयंसेवक जितना काम संभाल सकते हैं, उसकी भी अपनी सीमाएं हैं। हम कुछ ही समर्पित लोगों के एक छोटे समूह पर निर्भर हैं।”
इस बीच, विज्ञान केंद्र का लक्ष्य वाटर क्लिनिक में जांच की क्षमताओं का विस्तार करना और हालिया अध्ययनों के निष्कर्षों को प्रकाशित करना है।
लेकिन थुरुथिक्करा के लिए जल संरक्षण का केंद्र बिंदु आज भी स्थानीय स्तर पर ही है। पहले के आंदोलनों में भाग लेने वाली मंजूश कहती हैं, “हमने सीखा है कि पानी को बचाना घर से ही शुरू होता है। एक बार जब लोग परिणाम देख लेते हैं, तो उन्हें समझाने की जरूरत नहीं पड़ती।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 27 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: CUSAT और विज्ञान केंद्र थुरुथिक्करा के शोधकर्ता विद्या मंजूश के आवास पर कुएं के पानी में माइक्रोप्लास्टिक तत्वों की जांच कर रहे हैं। तस्वीर- सुरेश थुरुथिक्करा