- किसी आपदा का मानसिक असर अक्सर आपदा खत्म होने के बाद भी काफी समय तक बना रहता है। पुनर्वास के दौरान जब लोगों में अपनों को खोने का दुख और दोबारा आपदा आने का डर मन मैं बैठ जाता है, तो उनकी मानसिक स्थिति और बिगड़ जाती है।
- 2024 में वायनाड में आए भूस्खलन के बाद लोगों की मानसिक स्थिति पर किए गए एक नए अध्ययन में यह पाया गया है कि मदद मिलने में देरी, विस्थापन और असमान रूप से मिलने वाली सहायता लोगों के मानसिक तनाव को और गहरा कर देती है। इससे उनमें लाचारी और पर्यावरण को लेकर चिंता जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
- अध्ययन में यह सुझाव दिया गया है कि आपदा प्रबंधन के हर चरण में मनोवैज्ञानिक सहायता को शामिल किया जाना चाहिए। सिर्फ कुछ समय के लिए दी जाने वाली काउंसलिंग के बजाय, ऐसे तंत्र विकसित करने की ज़रूरत है जो लंबे समय तक मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक सहारा दे सकें।
किसी आपदा में फंसने का अनुभव क्या होता है? यह केवल जान-माल का नुकसान नहीं है, बल्कि यह एक गहरा मानसिक आघात भी है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। वायनाड, केरला में 2024 में आए भीषण भूस्खलन के बाद किए गए हाल ही के एक अध्ययन ने आपदा के बाद के मानसिक स्वास्थ्य की एक छिपी हुई तस्वीर पेश की है।
दो साल पहले 2024 में वायनाड में आए विनाशकारी भूस्खलन के बाद, राहत और पुनर्वास कार्यों के दौरान किए गए फील्ड वर्क पर आधारित यह अध्ययन, सभी आयु वर्गों और समुदायों पर पड़ने वाले अल्पकालिक और दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक प्रभावों को बारीकी से देखता है। यह भूस्खलन इतना भयानक था कि इसमें 300 से अधिक लोगों की जान चली गई, उतने ही लोग घायल हुए और हजारों लोग बेघर हो गए थे।
हाल ही में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, आपदा के तुरंत बाद मची अफरा-तफरी, डर और रात के समय हुई घटना के कारण लोगों में उपजी घबराहट तो बस शुरुआत थी। इसके लंबे समय तक रहने वाले प्रभाव कहीं अधिक गंभीर रहे। भूस्खलन के डर से लोग को हर समय जरूरत से ज्यादा सतर्क (हाइपरविजिलेंस) रहने लगे, तो वहीं छोटी-मोटी घटनाएं भी उनके पुराने सदमे को दोबारा ताजा कर देती हैं।
अध्ययन के मुख्य लेखक डॉ. सी. जयकुमार कहते हैं, “इस शोध का एक मुख्य निष्कर्ष यह है कि मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाला असर आपातकालीन स्थिति के बाद समाप्त नही होता है। ये समस्याएं लंबे समय तक बनी रहती हैं और अक्सर पुनर्वास के दौरान और अधिक गंभीर हो जाती हैं।”
डॉ. जयकुमार, निमहांस (NIMHANS) के आपदा प्रबंधन में मनोसामाजिक सहायता विभाग में एडिशनल प्रोफेसर हैं और भारत सरकार के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में पूर्व वरिष्ठ सलाहकार रह चुके हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
डॉ. जयकुमार बताते हैं कि आपदा का असर कई चरणों में सामने आता है। पुनर्वास के चरण में, जहां भूस्खलन से बचे लोग रह रहे होते हैं, वहां मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाला असर बाहरी लोगों को कम दिखाई देता है क्योंकि ये बहुत सूक्ष्म तरीके से सामने आता है। वह बताते हैं, “उदाहरण के लिए, लोगों का स्वास्थ्य गिरने लगता है, उनमें काम करने की प्रेरणा खत्म हो जाती है, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होती है, या दूसरों के साथ घुलने-मिलने की क्षमता कम हो जाती है। कई लोग अपनी रोजाना के कामों में भी रुचि लेना बंद कर देते हैं। इन्हें हमेशा मानसिक समस्या के रूप में नहीं पहचाना जाता, लेकिन ये सब गहरे सदमे और लंबे समय तक चले तनाव से जुड़े होते हैं।” अपनों को खोने का अनसुलझा दुख भी एक ऐसा कारक है जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
दरअसल, ज्यादातर मदद के प्रयास केवल उन्हीं लोगों पर केंद्रित होते हैं जिनमें स्पष्ट लक्षण दिखाई देते हैं, जबकि प्रभावित समुदाय का एक बड़ा हिस्सा चुपचाप भावनात्मक संकट से जूझ रहा होता है। इससे सामूहिक रूप से ठीक होने की प्रक्रिया रुक जाती है और बहुत से लोग अपने सदमे से उबरने का रास्ता नहीं ढूंढ पाते।

पुनर्वास की प्रक्रिया बहुत धीमी और थका देने वाली होती है। इसमें हजारों घरों का पुनर्निर्माण करना पड़ता है, लेकिन जमीन से जुड़े विवादों, कानूनी मंजूरी मिलने में देरी, फंड की कमी और अन्य व्यावहारिक बाधाओं के कारण यह प्रक्रिया और भी लंबी हो जाती है। भविष्य को लेकर अनिश्चितता बचे हुए लोगों के लिए बहुत भारी पड़ सकती है। डॉ. जयकुमार कहते हैं, “लोग इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि कल उनके साथ क्या होगा। लाचारी और निराशा की यह भावना उनके विचारों, भावनाओं और रोजमर्रा के कामों को करने की क्षमता पर गहरा नकारात्मक असर डालती है।”
इस अध्ययन में अलग-अलग तरह के लोगों पर पड़ने वाले प्रभावों को भी देखा गया है। बच्चों को अपनी दिनचर्या बिगड़ने, याददाश्त कमज़ोर होने और अकेलेपन का सामना करना पड़ता है; बुजुर्ग लोग हाथ-पैरों के सुन्न होने, अपराधबोध और अपनी देखभाल को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। दिव्यांग व्यक्तियों को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है, जबकि बचाव कार्यों में जुटे लोग बिना किसी परामर्श या ‘डिब्रीफिंग’ के ‘सेकेंडरी ट्रॉमा’ (दूसरे के सदमे से उपजा तनाव) का शिकार हो जाते हैं।
डिजास्टर रिस्क रिडक्शन और रेस्पॉन्स मैनेजर प्रवीण सुरेश का कहना है कि पालतू जानवरों को खोना भी बचे हुए लोगों के लिए सदमे जैसा होता है। वह बताते हैं कि भूस्खलन के दौरान वे लगातार जानवरों के बचाव कार्य में लगे हुए थे। उन्हें याद है कि कुछ बच्चों ने अपने पसंदीदा पालतू जानवरों को खोने के बाद बहुत दुख और अनिद्रा की शिकायत की थी। उन्होंने साझा किया, “हम कई दिनों तक एक पालतू कुत्ते को तलाशते रहे और अंत में उसके मालिक ने हमारे द्वारा बचाई गई एक बिल्ली को गोद लेने का फैसला किया। उसने उसका नाम ‘रियो’ रखा। उनका मानना था कि वह बिल्ली नदी का दिया हुआ एक उपहार है।”
राहत और पुनर्वास
पुनर्वास, विस्थापन और आजीविका को लेकर बनी अनिश्चितता लोगों में अस्थिरता पैदा करती है। मदद के असमान वितरण से उनमें ‘अन्याय’ की भावना घर कर जाती है। इसके अलावा, जबरन विस्थापन के कारण लोग ‘साइकोटेरेटिक’ समस्याओं का सामना करने लगते हैं, जैसे इको-एंग्जायटी, प्रकृति को नुकसान पहुंचने पर गहरा दु:ख और जलवायु परिवर्तन से जुड़ा सदमा।
शोध पत्र में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि अगर समय पर सही सहयोग न मिले, तो लोग नशा करना या खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे गलत रास्ते अपना सकते हैं। साथ ही, उन्हें नए और कम कुशल कामों में ढलने में जो संघर्ष करना पड़ता है, वह उनकी समस्याओं को और गहरा कर देता है। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि पश्चिमी घाट का इलाका पर्यावरण के नुकसान, घनी आबादी और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती भारी बारिश की वजह से काफी संवेदनशील है और खतरे की चपेट में है।
लेखकों का सुझाव है कि मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक सहायता को राहत और पुनर्वास के सभी कार्यक्रमों का स्थायी हिस्सा बनाया जाना चाहिए। थोड़े समय के लिए दी जाने वाली अतिरिक्त मदद काफी नहीं है।
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डॉ. जयकुमार कहते हैं, “मनोसामाजिक सहायता आमतौर पर आपदा के कुछ शुरुआती दिनों तक ही दी जाती है। शुरुआत में काउंसलिंग टीमें आती हैं और काफी ध्यान दिया जाता है, लेकिन यह मदद लंबे समय तक जारी नहीं रहती। केवल पैसे और सामान का मुआवज़ा देना काफी नहीं है। लोगों के विचारों, भावनाओं, डर, दुख और हताशा को समझने और उन्हें संभालने के लिए लंबे समय तक सहारा देने की ज़रूरत है।”
अध्ययन में यह पाया गया है कि आपदाओं का मानसिक प्रभाव घटना के खत्म होने के साथ समाप्त नहीं होता, बल्कि पुनर्वास के दौरान और अधिक गहरा हो जाता है। अध्ययन के अनुसार, मदद में देरी, विस्थापन और अनिश्चित भविष्य लोगों में लाचारी, तनाव और इको-एन्जाइटी जैसी समस्याएं पैदा करते हैं।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि केवल कुछ समय की काउंसलिंग के बजाय, मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक सहायता को बचाव, राहत और पुनर्वास के हर चरण का स्थायी हिस्सा बनाया जाना चाहिए। अध्ययन में यह भी जोर दिया गया है कि प्रभावित समुदायों में बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगों जैसी अलग-अलग श्रेणियों की जरूरतों को समझते हुए, एक केंद्रीकृत प्रणाली विकसित की जाए और स्थानीय संस्कृति व सामुदायिक मंचों का उपयोग करके लोगों के बीच आपसी जुड़ाव और आपदाओं से लड़ने की हिम्मत फिर से कायम की जाए।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 16 जनवरी 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीरः साल 2024 में वायनाड भूस्खलन वाली जगह पर बचाव कार्य करते कर्मी। तस्वीर-
अहमद जेवाध, विकिमीडिया कॉमन्स (CC0 1.0)