- पश्चिमी राजस्थान में कुमट के पेड़ से मिलने वाले गोंद पर जलवायु परिवर्तन का असर साफ दिख रहा है। बेमौसम और मॉनसूनी बारिश में इजाफे से प्रति पेड़ गोंद का उत्पादन घट रहा है।
- जानकारों का मानना है कि नमी बढ़ने पर कुमट से गोंद का उत्पादन धीरे-धीरे और कम होगा क्योंकि इससे पेड़ कम तनाव महसूस करेगा।
- गोंद का उत्पादन बढ़ाने के लिए पेड़ में लगाए जाने वाले इंजेक्शन को लेकर राय बंटी हुई है। किसानों का कहना है कि शुरुआती सालों में उत्पादन तेजी से बढता है, लेकिन बाद में पैदावार कम हो जाती है।
अभी तक आपने इंसानों और जानवरों को ही सुई या इंजेक्शन लगते हुए देखा होगा। पेड़ों को कभी नहीं। पश्चिमी राजस्थान के जाखड़ा गांव में मार्च-अप्रैल के महीने में ठेठ राजस्थानी परिधान पहने रेखाराम चारण आपको कुमट या कुमटिया (अकेशिया सेनेगल/Acacia senegal) के पेड़ में इंजेक्शन लगाते हुए दिख जाएंगे जो इस पेड़ से गोंद (अरबी गोंद/Gum Arabic) इकट्ठा करने के लिए यह काम करते हैं।
राजस्थान समेत पूरे भारत में खान-पान में गोंद के इस्तेमाल की लंबी परंपरा रही है। ठंड के मौसम में गोंद के लड्डू लगभग हर घरों में बनाए और खाए जाते हैं। इसका इस्तेमाल औषधि के रूप में भी किया जाता है। नवजात को जन्म देने के बाद जच्चा को भी गोंद से बनी चीजें दी जाती हैं, ताकि उनकी सेहत अच्छी बनी रहे।
लेकिन, अब इस गोंद के उत्पादन पर पश्चिमी राजस्थान में हो रही सामान्य से ज्यादा बारिश के दुष्प्रभाव स्पष्ट दिखने लगे हैं।
ज्यादा बारिश से कम उत्पादन
कोई भी पौधा जब स्ट्रेस या तनाव में होता है, तो वह अपने तनों और शाखाओं से रस निकालता है। यही रस धूप के असर से सूखकर गोंद बन जाता है। पश्चिमी राजस्थान में शीशम, नीम, बबूल, खेजड़ी और यहां तक कि सहजन के पेड़ से भी गोंद जमा किया जाता है।
अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर प्रचलित पेड़ों से गोंद निकाला जाता है। केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) में डिवीजन ऑफ इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम के प्रमुख धीरज सिंह मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “पश्चिमी राजस्थान में कुमट के पेड़ से निकलने वाला गोंद किसानों को सबसे ज्यादा कमाई देता है।”


यही वजह है कि 55 साल के रेखाराम पिछले 40 सालों से कुमटिया के पेड़ से गोंद निकालने का पुश्तैनी काम कर रहे हैं। उनके 80 बीधा खेत में इस प्रजाति के 500 पेड़ हैं। लेकिन, हाल के सालों में बेमौसम बारिश, आंधी और ज्यादा मॉनसूनी बारिश ने उनकी चिंता बढ़ा दी है।
रेखाराम अपने अनुभव से मोंगाबे-हिंदी को बताते हैं, “अब बारिश ज्यादा होने लगी है, जिससे पेड़ से मिलने वाले गोंद की मात्रा धीरे-धीरे घटती जा रही है।”
गोंद निकालने का काम गर्म और सूखे मौसम में किया जाता है, क्योंकि इसके लिए तेज गर्मी और पेड़ों में तनाव के लिए डिहाइड्रेशन की जरूरत होती है। काजरी में वरिष्ठ वैज्ञानिक अर्चना वर्मा मोंगाबे-हिंदी से कहती हैं, “गोंद की बेहतर पैदावार के लिए 35 से 40 डिग्री सेल्सियस का तापमान अच्छा माना जाता है। लेकिन, इस दौरान ज्यादा गर्मी पड़ने से अगर बारिश हो जाए, तो उत्पादन पर असर पड़ना स्वाभाविक है।” वह कहती हैं कि अगर बारिश ज्यादा होती है, तो प्रति पेड़ मिलने वाले गोंद की मात्रा घट जाएगी। आमतौर पर गोंद मार्च से जून के बीच इकट्ठा किया जाता है।
रेखाराम इसी साल का उदाहरण देते हैं, जब 18 और 19 मार्च को आई आंधी और बारिश से पेड़ के तनों पर आया गोंद गलकर नष्ट हो गया। इसके बाद अप्रैल के पहले हफ्ते में हुई जोरदार बारिश ने रही-सही कसर पूरी कर दी।
उन्होंने कहा, “इस साल मौसम के मिजाज को देखते हुए शायद ही गोंद इकट्ठा हो पाए। हमने इस साल मार्च के आखिर में गोंद जमा किया था। यानी चार महीने की अवधि के मुकाबले महज एक महीना ही यह काम कर पाए। इतनी बारिश के बाद अब शायद ही हमें कुमटिया से गोंद मिले। पिछले साल 50 किलो गोंद जमा हुआ था। इस साल यह आंकड़ा घटकर पांच किलो पर आ गया है।”
शुष्क वन अनसंधान संस्थान (आफरी) में मुख्य तकनीकी अधिकारी विलास सिंह भी मानते हैं कि थार रेगिस्तान में बारिश 80 से 100 मिलीमीटर तक बढ़ गई है। इसका गोंद के उत्पादन पर क्या असर हो रहा है, इसके लिए लंबे अध्ययन की जरूरत है।
आंकड़े भी रेखाराम और अन्य विशेषज्ञों की बातों की तस्दीक करते हैं। रेखाराम का जाखड़ा गांव जिस बालोतरा जिले में आता है वहां मॉनसून की बारिश लगातार बढ़ती जा रही है। पहले रेखाराम का गांव बाडमेर जिले में था जिससे पिछले साल काटकर बालोतरा को नया जिला बनाया गया है, इसलिए बारिश के आंकड़े बाडमेर जिले से लिए गए हैं। साल 2023 में बाड़मेर में सामान्य से लगभग दोगुनी (272.7 मिमी के मुकाबले 501.3 मिमी) बारिश हुई। साल 2024 में भी वर्षा (272.7 मिमी के मुकाबले 448.6 मिमी) बहुत ज्यादा रिकॉर्ड की गई। साल 2025 में भी सामान्य से करीब डेढ़ गुना (272 मिमी के सामान्य के मुकाबले ) बारिश हुई।
धीरज सिंह भी मानते हैं, “ठंड के घटते दिन, गर्मी की लंबी अवधि और बारिश का ज्यादा होना जलवायु परिवर्तन का ही असर है। कुमटिया का पौधा सूखी जलवायु में अच्छी तरह पनपता है। बारिश बढ़ने पर ये अपने प्राकृतिक वातावरण से विमुख हो जाते हैं और इनसे होने वाला गोंद का उत्पादन भी घट जाता है।” वह कहते हैं कि बारिश बढ़ने से नमी बढ़ रही है। यह इसका संकेत है कि पौधा इतना तनाव महसूस नहीं कर रहा है जितना पहले करता था।

आफरी में रिसर्च की ग्रुप कॉर्डिनेटर के पद से सेवानिवृत्त रंजना आर्य के मुताबिक बारिश के साथ आर्द्रता बढ़ने से भी गोंद का उत्पादन घटता है। वह मोंगाबे-हिंदी से कहती हैं, “इस स्थिति में पेड़ अपनी ऊर्जा अपने विकास (पत्तियां, तना विकसित करने में) में ज्यादा खर्च करने लग जाता है। गोंद एक तरह का रिजर्व फूड है। जब पेड़ के पास संसाधन (पानी) की कमी नहीं है, तो उसकी अधिकांश ऊर्जा वेजिटेटिव ग्रोथ में लगती है।”
रेखाराम का दावा है कि अधिक बारिश होने से अब इस पेड़ पर कीड़े ज्यादा लगने लगे हैं जो इसके रस को चूस लेते हैं। इससे भी गोंद का उत्पादन कम होने लगा है।
रेखाराम का दावा है कि अधिक बारिश होने से अब इस पेड़ पर कीड़े ज्यादा लगने लगे हैं जो इसके रस को चूस लेते हैं। इससे भी गोंद का उत्पादन कम होने लगा है।
इंजेक्शन पर अलग-अलग राय
भारत में खपत के मुकाबले उत्पादन कम होने से सूडान समेत कई देशों से गोंद आयात किया जाता है। साल 2024 में भारत ने 44,272 टन (4,42,72,200 किलोग्राम) गोंद आयात किया और दुनिया भर में इस मामले में वह चौथे पायदान पर था।
साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर के संस्थापक भागीरथ चौधरी का मानना है कि राजस्थान में गोंद उत्पादन के लिए बेहतरीन परिस्थितियां होने के बावजूद, इस क्षेत्र में अभी भी समर्पित गैर-सरकारी संस्थाओं या कृषि-व्यापार तंत्र की कमी है, जो ‘कुमट गोंद’ के लिए किसानों को संगठित करने, ब्रैंडिंग, घरेलू और निर्यात बाजार के विकास पर खास तौर पर केंद्रित हो। अगर भारत को गोंद के आयात को कम करने में सफलता हासिल करनी हैं तो उसे राजस्थान में ‘कुमट-आधारित गोंद’ की अपार संभावनाओं को नियोजित तरीक़े से विकसित करना होगा।
दरअसल, इस सदी की शुरुआत तक भारत में प्राकृतिक तरीके से गोंद इकट्ठा किया जाता था। इसमें पेड़ पर चीरा लगाया जाता था। इस विधि से हर पेड़ से अधिकतम 50 ग्राम तक ही गोंद मिल पाता था और किसानों को बहुत कम आमदनी होती थी। चीरा लगाने से कई पेड़ सूख भी जाते थे।
इसलिए, इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए काजरी ने गम इंड्यूसर तकनीक विकसित की। इसमें कुमटिया के पेड़ में तनाव बढ़ाने के लिए एथेफोन का इंजेक्शन लगाया जाता है और फिर पांच से 14 दिनों के बाद गोंद का उत्पादन शुरू हो जाता है। जानकारों के मुताबिक इस तकनीक के बाद करीब एक महीने तक गोंद मिलता रहता है। एथेफोन एक प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर है जो पौधों में एथिलीन हार्मोन का उत्पादन बढ़ाता है। यह हार्मोन पौधों में तनाव पैदा करता है, जिससे विशेष प्रकार के पेड़ों जैसे कुमट में गोंद का उत्पादन बढ़ जाता है।

साल 2002 से लगातार इंजेक्शन लगा रहे रेखाराम मानते हैं कि इससे गोंद का उत्पादन बढ़ने से उनकी कमाई बढ़ी है।हालांकि, वह कहते हैं, “शुरुआत में इंजेक्शन के बाद एक पेड़ से डेढ़ किलो तक गोंद निकल जाता था। अब यह मात्रा घटकर एक किलो पर आ गई है।”
जाखड़ा गांव से सटे हीरा की ढाणी के रावता राम इस तकनीक से बहुत खुश नहीं हैं। वह मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “इंजेक्शन से आपको पहले साल दो किलो तक गोंद मिल जाएगा। लेकिन, पांच साल तक लगातार इंजेक्शन लगा देने से गोंद आना ही बंद हो जाएगा।”
हालाँकि, धीरज सिंह इंजेक्शन लगाते समय तकनीकी बातों का ध्यान रखने का सुझाव देते हैं। वह कहते हैं, “जो किसान सही तरीके से इंजेक्शन लगाते हैं, उन्हें दिक्कत नहीं होती। आपको यह भी देखना होता है कि इंजेक्शन किस समय लगाना है, दवा की मात्रा कितनी रखनी है। पौधे के किस हिस्से में चीरा लगाकर इंजेक्शन देना है। इन बातों को हम किसानों को समझाते और बताते भी हैं।”
किसान रेखा राम का कहना है कि काजरी समय-समय पर इंजेक्शन को लेकर किसान मेले और प्रशिक्षण शिविर का आयोजन करता है। इसमें किसानों को इंजेक्शन से जुड़ी तकनीकी और इसे लगाने के तरीके के बार में जानकारी दी जाती है। किसानों को इंजेक्शन की खुराक भी बांटी जाती है।
अर्चना वर्मा के मुताबिक काजरी हर साल इंजेक्शन के छह से सात हजार डोज बांटता है और अनुमान है कि इससे तीन से साढ़े तीन टन गोंद का उत्पादन होता है।
उनकी नजर में इंजेक्शन के चलते गोंद के उत्पादन में कमी की वजह कुछ और है, “हम किसानों को हर दूसरे साल (एक साल छोड़कर) इंजेक्शन लगाने का सुझाव देते हैं। अगर ज्यादा उत्पादन के लिए हर साल इंजेक्शन लगाया जाएगा, तो निश्चित तौर पर पैदावार घट जाएगी और पेड़ों को भी नुकसान होगा।“
वहीं बाड़मेर के गुड़ामालानी स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक और अध्यक्ष प्रदीप पगारिया का सुझाव है कि किसानों को हर दो साल पर ही इंजेक्शन लगाना चाहिए और इसकी मात्रा चार एमएल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। वह मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “यह इंजेक्शन एक तरह क ग्रोथ हर्मोन है। अगर हर साल इंजेक्शन लगाया जाता है, तो नेचुरल ग्रोथ हार्मोन इनऐक्टिव हो जाएगा और इससे धीरे-धीरे पड़े सूख जाएगा। साथ ही, इंजेक्शन पेड़ में फूल आने के समय यानी फरवरी में ही लगाया जाना चाहिए।”
हर साल करीब दो हजार पेड़ में इंजेक्शन लगाने वाले जाखड़ा गांव के ही प्रमेंद्र कुमार कहते हैं, “इंजेक्शन लगाने के बाद पेड़ कुछ कमजोर तो होता है। लेकिन, ये दुष्परिणाम शुरुआती सालों में नहीं, बल्कि 10 सालों के बाद दिखाई देते हैं।”

हालाँकि, इंजेक्शन वाले और बिना इंजेक्शन वाले गोंद की कीमत में भी भारी अंतर देखा जाता है। हीरा की ढाणी में गोंद का व्यापार करने वाले ओमप्रकाश माहेश्वरी मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “इंजेक्शन वाला गोंद एक हजार रुपए प्रति किलो तक बिकता है। बिना इंजेक्शन वाले की कीमत 2,000-2,500 रुपए किलो तक है।”
रेखाराम भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। वह कहते हैं कि बिना सुई वाला उनका गोंद घर से ही बिक जाता है और लोग उसे औषधि के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए ले जाते हैं।
माहेश्वरी यह भी जोड़ते हैं कि इंजेक्शन के बाद गोंद की गुणवत्ता में सुधार हुआ है और अब बड़े आकार वाला गोंद बाजार में आ रहा है और उत्पादन भी बढ़ा है, क्योंकि पहले से ज्यादा लोग गोंद निकाल रहे हैं।
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जलवायु परिवर्तन का असर
गोचर, ओरण या बंजर जमीन में तेजी से बढ़ने वाला कुमट खेजड़ी की तरह ही पश्चिमी राजस्थान की मुख्य प्रजाति है जिसका आर्थिक और सामाजिक महत्व है। राजस्थान की मशहूर पंचकुटा (सूखी सब्जियां यानी केर, सांगरी, कुमट के बीज, गोंदा और काचरी) की सब्जी में सबसे ज्यादा प्रोटीन इसके बीज से ही मिलता है। इसकी लकड़ी से औजार बनते हैं। पत्तियां पशु खा लाते हैं। इन बीजों को बड़े पैमाने पर सुखाकर रखा जाता है और गर्मियों के पंचकुटा और अन्य सब्जियों में इस्तेमाल किया जाता है।
माना जाता है कि कुमट के पेड़ पर पत्ते आने के बाद गोंद निकालने का काम बंद हो जाता है। रेखा राम का दावा है कि पहले पेड़ पर एक बार पत्तियां आती थी, अब दो बार ऐसा हो रहा है, क्योंकि बारिश ज्यादा होने से पेड़ को पर्याप्त नमी मिल रही है और इससे भी गोंद का उत्पादन घट रहा है। उनकी नजर में इंजेक्शन भी इसकी वजह हो सकती है।
आर्या लंबी अवधि तक मौसम की इन स्थितियों से आने वाले बदलावों पर कहती हैं, “अभी कुमट के पेड़ की लंबाई कम होती है और वह झाड़ी जैसा दिखता है। अगर बारिश इसी तरह जारी रही, तो कुमट का पेड़ लंबा होने लगेगा। उससे बीजों का उत्पादन तो बढ़ जाएगा, लेकिन गोंद का उत्पादन घट जाएगा।”

ऐसा भी नहीं है कि उत्पादन की कमी सिर्फ इंजेक्शन वाले गोंद पर ही दिख रही है। बिना इंजेक्शन की मदद से गोंद निकालने वाले नेतासर गांव (जैसलमेर जिला) के किसान जबर सिंह मोंगाबे-हिंदी से पैदावार में भारी गिरावट की बात स्वीकार करते हैं। वह कहते हैं, “जब मैं छोटा था, तो हमारा परिवार तीन-चार किलो तक गोंद जमा कर लेता था। लेकिन, अब उत्पादन घटकर एक किलो से भी कम रह गया है। इस साल तो इतना गोंद भी नहीं मिल पाया है।”
गोंद को जीआई टैग दिलाने के लिए भी काम कर रहे पगारिया ज्यादा बारिश के दुष्प्रभावों को अलग नजरिए से भी देखते हैं। वह कहते हैं, “ज्यादा बारिश होने और पानी की उपलब्धता बढ़ने से लोग नकदी फसलों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। जुताई के लिए ट्रेक्टर चलाने के मकसद से भी लोग इसे खेतों से हटा रहे हैं। चूंकि, कुमट सूखे क्षेत्र की वनस्पति है, इसलिए ज्यादा बारिश होने से इसके पेड़ की जड़ें गलने लगती हैं। इसलिए, पश्चिमी राजस्थान की इस विरासत को बचाने के लिए संरक्षण उपायों पर ज्यादा ध्यान के लिए गोंद को जीआई टैग दिलाना जरूरी है। यह टैग मिलने से गोंद के अनौपचारिक बाजार को औपचारिक बनाने में मदद मिलेगी और संरक्षण से जुड़ी कोशिशों को बढ़ावा मिलेगा।”
चौधरी का भी मानना है कि अगर समय रहते उचित कोशिशें शुरू नहीं की गई, तो कुमट को भी खेजड़ी जैसी ही गिरावट का सामना करना पड़ सकता है। वह कहते हैं कि गोंद उत्पादन में शामिल किसानों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए सही वैज्ञानिक हस्तक्षेपों, अनुकूल कृषि-वानिकी मॉडलों और नए आर्थिक प्रोत्साहनों की जरूरत होगी, ताकि इस अमूल्य रेगिस्तानी वृक्ष को बचाया जा सके।
बैनर तस्वीरः कुमट के पेड़ से गोंद निकालते रेखा राम चारण। तस्वीर – विशाल कुमार जैन\मोंगाबे