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		<description>प्रकृति से प्रेरित समाचार</description>
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	<title>Mongabay हिन्दी</title>
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					<title>जैसलमेर में लौट रहे घास के मैदान, गोडावण के संरक्षण को नई उम्मीद</title>
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					<pubDate>02 नवम्बर 2026 11:01:21 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Vishal Kumar Jain]]>
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							<category><![CDATA[समाधान]]></category>
		<category><![CDATA[Biodiversity]]></category>
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							<![CDATA[जल संरक्षण, नई प्रजातियां, नेशनल पार्क, पक्षी, पर्यावरण कानून, पर्यावरण की राजनीति, पहल, पौधे, प्राकृतिक संसाधन, भूमि अधिकार, वन, वन अधिकार, वन कटाई, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, विलुप्त होती प्रजातियां, और समाधान]]>
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							<![CDATA[<p>भारत में गंभीर रूप से लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (जीआईबी) यानी गोडावण के संरक्षण की कोशिशों को इस साल 18 अप्रैल को बड़ा झटका लगा। जैसलमेर से 770 किलोमीटर की दूरी तय करके इस पक्षी के अंडे को गुजरात के कच्छ लाया गया, और 26 मार्च को जंपस्टार्ट तकनीक से चूजे का जन्म हुआ। इस [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[भारत में गंभीर रूप से लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (जीआईबी) यानी गोडावण के संरक्षण की कोशिशों को इस साल 18 अप्रैल को बड़ा झटका लगा। जैसलमेर से 770 किलोमीटर की दूरी तय करके इस पक्षी के अंडे को गुजरात के कच्छ लाया गया, और 26 मार्च को जंपस्टार्ट तकनीक से चूजे का जन्म हुआ। इस चूजे की 18 अप्रैल के बाद से कोई खोज-खबर नहीं मिली और वन विभाग के अधिकारियों ने उसके किसी दुसरे जीवों का शिकार हो जाने का अंदेशा जताया। यह घटना बताती है कि गोडावण के संरक्षण के लिए इसके प्रजनन को बढ़ाने अलावा भी बहुत से दुसरे कारकों पर ध्यान देना जरुरी है, जिसमें इनके खत्म होते घास के मैदान वाले प्राकृतिक आवास शामिल हैं। ऐसे में राजस्थान के जैसलमेर जिले में संरक्षित क्षेत्र से बाहर गोडावण के संरक्षण के लिए पंचायत और निजी स्तर पर घास के मैदान फिर से विकसित किए जा रहे हैं। पांच साल पहले शुरू हुई इस पहल के सकारात्मक नतीजे धीरे-धीरे दिख रहे हैं। ऐसे शुरू हुई पहल घास के मैदानों और सूखे क्षेत्रों में पाया जाने वाला गोडावण (Ardeotis nigriceps) मूल रूप से दक्षिणी और पश्चिमी भारत का पक्षी है। कभी यह राजस्थान सहित भारत के 11 राज्यों में आबाद था। लेकिन, आज यह अपने 90% क्षेत्र से पूरी तरह खत्म हो गया है और अब जैसलमेर के कुछ इलाकों तक ही सिमट गया है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर (आईयूसीएन) के मुताबिक इनकी आबादी महज 50 से 249 के बीच है। घास के मैदानों के खत्म&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/11/02/jaisalmer-sewan-grassland-restoration-great-indian-bustard-conservation/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>अनियमित इको-टूरिज़्म से मध्य प्रदेश के जैव विविधता वाले क्षेत्रों पर बढ़ता दबाव</title>
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					<pubDate>30 अक्टूबर 2026 08:36:18 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Pallav JainRajeev Tyagi]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
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		<category><![CDATA[Conservation]]></category>
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							<![CDATA[मध्य प्रदेश]]>
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							<![CDATA[आदिवासी, कचरा प्रबंधन, जल प्रदूषण, झील, नदियां, नदी, नेशनल पार्क, पर्यटन, पर्यावरण कानून, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधन, राष्ट्रीय उद्यान, और वन कटाई]]>
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							<![CDATA[<p>पचमढ़ी छावनी में चंपक झील किनारे बने मध्य प्रदेश पर्यटन (एमपीटी) रिसॉर्ट ‘चंपक बंग्लो’ के डायनिंग एरिया से हर 15 मिनट में झील के ऊपर ज़िपलाइन और हर दो मिनट में मोटर बोट से गुज़रते लोगों को देखा जा सकता था। यहां एमपीटी द्वारा सौंदर्यीकरण के काम भी करवाए जा रहे थे। इसमें झील किनारे [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[पचमढ़ी छावनी में चंपक झील किनारे बने मध्य प्रदेश पर्यटन (एमपीटी) रिसॉर्ट ‘चंपक बंग्लो’ के डायनिंग एरिया से हर 15 मिनट में झील के ऊपर ज़िपलाइन और हर दो मिनट में मोटर बोट से गुज़रते लोगों को देखा जा सकता था। यहां एमपीटी द्वारा सौंदर्यीकरण के काम भी करवाए जा रहे थे। इसमें झील किनारे कंक्रीट की रिटेनिंग दीवार और इससे सटा एक पैदल मार्ग बनाया जा रहा था। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने 11 सितंबर 2026 को चंपक झील के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को देखते हुए सभी गतिविधियों को वेटलैंड (संरक्षण और प्रबंधन) नियम 2017 के अनुरुप नियंत्रित करने का आदेश दिया है। पेट्रोल-डीज़ल से चलने वाली मोटर बोट के संचालन और बिना सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के झील के आसपास विकास कार्य करने पर रोक लगा दी है। पचमढ़ी, पचमढ़ी बायोस्फीयर रिज़र्व और सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व का हिस्सा है, इसलिए पर्यटकों को यह जगह जितना अपनी ओर खींचती है, उतनी ही पर्यावरण के लिहाज़ से नाज़ुक भी है। पिछले पांच सालों में मध्य प्रदेश के पर्यटन क्षेत्र में हर साल हुई औसतन 66.65% की वृद्धि को देखते हुए राज्य का पर्यटन विभाग स्थापित पर्यटन स्थलों से आगे इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा रहा है। इसके लिए पर्यावरण के लिहाज़ से संवेदनशील क्षेत्रों में ईको पर्यटन का सहारा लिया जा रहा है। मध्य प्रदेश 27 राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के लिए इको-सेंसिटिव ज़ोन मास्टर प्लान बनाने वाला देश का पहला राज्य है। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या संरक्षण और पारिस्थितिक बहाली से पहले इन जगहों पर पर्यटन का विकास किया&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/30/pachmarhi-champak-lake-ngt-ecotourism/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>मार्बल्ड कैट के संरक्षण के लिए गांवों ने बदले शिकार के नियम</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/10/29/northeast-india-communities-marbled-cat-conservation/</link>
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					<pubDate>29 अक्टूबर 2026 13:30:32 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Barasha Das]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, और विलुप्त होती प्रजातियां]]>
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							<![CDATA[<p>अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में संरक्षण से जुड़े लोगों और संगठनों ने इस साल 1 मार्च को पहली बार &#8216;अंतर्राष्ट्रीय मार्बल्ड कैट दिवस&#8217; मनाया। इसका उद्देश्य एशिया की सबसे रहस्यमयी और बहुत कम समझी जाने वाली जंगली बिल्ली प्रजातियों में से एक, &#8216;मार्बल्ड कैट&#8217; की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना था। &#8216;ईस्टर्न हिमालय मार्बल्ड [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में संरक्षण से जुड़े लोगों और संगठनों ने इस साल 1 मार्च को पहली बार &#8216;अंतर्राष्ट्रीय मार्बल्ड कैट दिवस&#8217; मनाया। इसका उद्देश्य एशिया की सबसे रहस्यमयी और बहुत कम समझी जाने वाली जंगली बिल्ली प्रजातियों में से एक, &#8216;मार्बल्ड कैट&#8217; की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना था। &#8216;ईस्टर्न हिमालय मार्बल्ड कैट प्रोजेक्ट&#8217; (EHMCP) द्वारा इन दोनों राज्यों के वन विभागों के सहयोग से शुरू किए गए इस दिवस का मुख्य उद्देश्य स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रयासों में शामिल करना और आपसी समझ और जानकारी के लिए एक मंच तैयार करना था। संरक्षणवादी और इस प्रोजेक्ट के संस्थापक गिरिधर मल्ला कहते हैं, “यह समय जानबूझकर चुना गया था। यह मौसम के बदलाव का संकेत है। वसंत के आगमन के साथ जब जंगलों में बदलाव आने लगता है, तो प्रकृति में नई जान आ जाती है, और स्थानीय समुदाय भी बुआई की तैयारी शुरू कर देते हैं। हमने इसे एक ऐसे महत्वपूर्ण पल के रूप में देखा, जब लोग पारिस्थितिक बदलावों पर विचार कर सकें और प्रकृति के इस नए रूप को पूर्वोत्तर भारत में मार्बल्ड कैट को याद रखने और उसके संरक्षण के महत्व से जोड़ सकें।” समुदाय-आधारित संरक्षण इस प्रोजेक्ट द्वारा 2022 और 2025 के बीच किए गए एक कैमरा-ट्रैप सर्वेक्षण से अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मेघालय के कुछ हिस्सों में मार्बल्ड कैट (पार्डोफेलिस मार्मोराटा) की छिटपुट मौजूदगी की पुष्टि हुई। जिन गांवों में यह प्रजाति कैमरे में कैद हुई, वहां के निवासियों ने इसके संरक्षण के लिए कदम उठाने का फैसला किया। इन गांवों&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/29/northeast-india-communities-marbled-cat-conservation/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>महाराष्ट्र के समुद्री तट पर चट्टानों का हिस्सा बन रहा प्लास्टिक कचरा</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/10/28/plastic-rock-formation-maharashtra-coast/</link>
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					<pubDate>28 अक्टूबर 2026 11:37:16 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Ananya Singh]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
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		<category><![CDATA[चट्टान]]></category>
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							<![CDATA[<p>मई 2024 में, एक रिसर्च ग्रुप महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में दिवेआगर बीच के किनारे चट्टानों की कुछ अनोखी संरचनाओं की तलाश में निकला। इस दौरान उन्होंने चट्टानों के उन हिस्सों से सैंपल इकट्ठा किए, जिनमें प्लास्टिक का कचरा फंसा हुआ था। बाद में, इन सैंपलों को एनालिसिस के लिए लैब ले जाया गया। इनमें [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/28/plastic-rock-formation-maharashtra-coast/" data-wpel-link="internal">महाराष्ट्र के समुद्री तट पर चट्टानों का हिस्सा बन रहा प्लास्टिक कचरा</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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						</description>
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							<![CDATA[मई 2024 में, एक रिसर्च ग्रुप महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में दिवेआगर बीच के किनारे चट्टानों की कुछ अनोखी संरचनाओं की तलाश में निकला। इस दौरान उन्होंने चट्टानों के उन हिस्सों से सैंपल इकट्ठा किए, जिनमें प्लास्टिक का कचरा फंसा हुआ था। बाद में, इन सैंपलों को एनालिसिस के लिए लैब ले जाया गया। इनमें से एक सैंपल में चट्टान के अंदर प्लास्टिक की एक हरी जाली फंसी हुई थी। हाल ही में, इस टीम ने इसे भारत के पश्चिमी तट से &#8216;प्लास्टिस्टोन&#8217; (प्लास्टिक और चट्टान से बनी संरचना) का पहला सबूत दिया है। प्लास्टिक-चट्टान संरचनाएं दुनिया भर में देखी गई हैं, जिनमें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा तमिलनाडु के तट भी शामिल हैं। भारत में पहले मिली ऐसी संरचनाएं मुख्य रूप से &#8216;प्लास्टिगलोमरेट&#8217; (plastiglomerates) और &#8216;पायरोप्लास्टिक&#8217; (pyroplastics) थीं, जो इंसानों द्वारा प्लास्टिक जलाने से बनती हैं। इसके विपरीत, शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि &#8216;प्लास्टिस्टोन&#8217; प्राकृतिक प्रक्रियाओं से बना है। इसमें पराबैंगनी (UV) किरणों, उच्च तापमान और लहरों के कारण प्लास्टिक के कचरे का तलछट और जैविक घटकों के साथ जुड़ाव हो गया। &#8216;डिस्कवर ओशन्स&#8217; में प्रकाशित इस अध्ययन में यह भी पता चला है कि चट्टान से बाहर निकला प्लास्टिक का तंतु पॉलियामाइड (polyamide) था। इससे संकेत मिलता है कि यह नायलॉन के किसी फेंके गए मछली पकड़ने वाले जाल से आया है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (IISER), कोलकाता के प्रोफेसर और इस अध्ययन के संबंधित लेखक पुण्यश्लोक भादुड़ी ने बताया कि प्लास्टिस्टोन संभवतः &#8220;अवसादी चट्टान (सेडिमेंट्री रॉक) का एक नया रूप&#8221; है। उन्होंने आगे&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/28/plastic-rock-formation-maharashtra-coast/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>दिखने में दूसरे मेंढकों जैसा, लेकिन डीएनए से अलग निकला &#8216;काली नाइट फ्रॉग&#8217;</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/10/27/new-kali-night-frog-western-ghats/</link>
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					<pubDate>27 अक्टूबर 2026 06:29:30 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Arathi Menon]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[Biodiversity]]></category>
		<category><![CDATA[जैव-विविधता]]></category>
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							<![CDATA[कर्नाटक]]>
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							<![CDATA[नई प्रजातियां और .वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
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							<![CDATA[<p>कर्नाटका के मध्य पश्चिमी घाट में स्थित काली नदी बेसिन में, मेंढकों की एक नई प्रजाति, निक्तिबैट्राकस काली, की पहचान की गई है। काली नाईट फ्रॉग के नाम से भी जानी जाने वाली इस प्रजाति की पहचान के लिए मॉर्फोलॉजी, जेनेटिक्स और बायो-अकॉस्टिक्स तीनों की मदद ली गई है। इसकी वजह से यह प्रजाति एक [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/27/new-kali-night-frog-western-ghats/" data-wpel-link="internal">दिखने में दूसरे मेंढकों जैसा, लेकिन डीएनए से अलग निकला &#8216;काली नाइट फ्रॉग&#8217;</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[कर्नाटका के मध्य पश्चिमी घाट में स्थित काली नदी बेसिन में, मेंढकों की एक नई प्रजाति, निक्तिबैट्राकस काली, की पहचान की गई है। काली नाईट फ्रॉग के नाम से भी जानी जाने वाली इस प्रजाति की पहचान के लिए मॉर्फोलॉजी, जेनेटिक्स और बायो-अकॉस्टिक्स तीनों की मदद ली गई है। इसकी वजह से यह प्रजाति एक ‘विशिष्ट विकासवादी वंश’ या ‘डिस्टिंक्ट एवोलुशनरी लीनिएज’ के रूप में स्थापित हो गई है। पश्चिमी घाट, जो विश्व के प्रमुख जैव विविधता केंद्रों में से एक है, उभयचरों की असाधारण रूप से उच्च विविधता का घर है। इस अध्ययन के अनुसार, वर्तमान में इस क्षेत्र में उभयचरों की 253 प्रजातियां ज्ञात हैं, जिनमें से लगभग 94% स्थानिक हैं। निक्तिबैट्राकस वंश के नाईट फ्रॉग पश्चिमी घाट के स्थानिक हैं, और इनमें से लगभग 70% प्रजातियों का वितरण बहुत ही सीमित है। कई &#8216;निक्टिबैट्राकस&#8217; (Nyctibatrachus) मेंढकों की तरह, &#8216;काली नाइट फ्रॉग&#8217; भी एक ऐसी प्रजाति है जो बाहर से देखने में दूसरी प्रजातियों जैसी ही लगती है, लेकिन आनुवंशिक रूप से उनसे बिल्कुल अलग है। शोधकर्ताओं को यह मेंढक 2021 में उत्तर कन्नड़ा जिले के कैसलरॉक इलाके में, काली नदी के जलग्रहण क्षेत्र (catchment area) में किए गए फील्ड सर्वे के दौरान मिला था। वैज्ञानिक के.वी. गुरुराजा, जो इस अध्ययन का हिस्सा थे, बताते हैं, “काली नाइट फ्रॉग की खोज आम नागरिकों के प्रयासों का नतीजा थी, जिसमें वन विभाग के सदस्यों ने भी अहम भूमिका निभाई।” वे आगे कहते हैं, “शुरुआत में, इसे पहले से ज्ञात कुंबारा नाइट फ्रॉग (निक्टीबैट्राकस कुंबारा) समझा गया था, जिसकी खोज&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/27/new-kali-night-frog-western-ghats/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>दुधवा से मिला &#8216;ईस्टर्न ब्रॉन्जबैक ट्री स्नेक&#8217; सांप का उत्तर प्रदेश का पहला रिकॉर्ड</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/10/26/uttar-pradeshs-dudhwa-gets-first-record-of-eastern-bronzeback-tree-snake/</link>
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					<pubDate>26 अक्टूबर 2026 10:03:05 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[<p>पिछले साल 10 जुलाई की सुबह करीब साढ़े नौ बजे विपिन कपूर सैनी उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व के कोर ज़ोन में नियमित गश्त पर थे। दुधवा-गौरीफंटा वन सड़क पर बंकटी-पिपरोला जंक्शन के पास उनकी नजर सड़क पर पड़े एक सांप पर गई। सांप मर चुका था। उसकी लंबाई करीब एक मीटर थी। शरीर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/26/uttar-pradeshs-dudhwa-gets-first-record-of-eastern-bronzeback-tree-snake/" data-wpel-link="internal">दुधवा से मिला &#8216;ईस्टर्न ब्रॉन्जबैक ट्री स्नेक&#8217; सांप का उत्तर प्रदेश का पहला रिकॉर्ड</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[पिछले साल 10 जुलाई की सुबह करीब साढ़े नौ बजे विपिन कपूर सैनी उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व के कोर ज़ोन में नियमित गश्त पर थे। दुधवा-गौरीफंटा वन सड़क पर बंकटी-पिपरोला जंक्शन के पास उनकी नजर सड़क पर पड़े एक सांप पर गई। सांप मर चुका था। उसकी लंबाई करीब एक मीटर थी। शरीर का बीच का हिस्सा वाहन से कुचला हुआ था और सड़क पर टायर के निशान थे। सैनी ने रुककर उसकी तस्वीरें लीं, लोकेशन दर्ज की और आगे बढ़ गए। उस सुबह उन्हें यह कोई खास रिकॉर्ड नहीं लगा। उत्तर प्रदेश और दुधवा से इससे पहले कॉमन ब्रॉन्जबैक (डेंड्रेलैफिस ट्रिस्टिस &#8211; Dendrelaphis tristis) दर्ज किया जा चुका था। सैनी ने भी पहली नजर में मान लिया कि सड़क पर पड़ा सांप उसी प्रजाति का है। उन्होंने तस्वीरें बाकी रोडकिल (सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए जानवर) रिकॉर्ड के साथ अपने फील्ड आर्काइव में रख दीं। कहानी यहीं खत्म हो सकती थी। लेकिन कुछ महीने बाद वही तस्वीरें दोबारा उनके सामने आईं। तस्वीर में दिखीं दो अलग धारियां सैनी के डिप्टी डायरेक्टर ने उन्हें वन्यजीवों की सड़क पर होने वाली मौतों से जुड़ी जानकारी एक प्रेजेंटेशन के लिए तैयार करने को कहा था। पुरानी रोडकिल तस्वीरें छांटते हुए उन्होंने इस सांप की तस्वीरें फिर खोलीं। इस बार कुछ अलग दिखा। सांप के शरीर के किनारों पर मोटी काली पट्टी थी। उसके नीचे चमकीली पीली-सफेद पट्टी और फिर एक पतली काली लाइन दिखाई दे रही थी। ये निशान उस कॉमन ब्रॉन्जबैक से मेल नहीं खा रहे थे, जिसे सैनी&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/26/uttar-pradeshs-dudhwa-gets-first-record-of-eastern-bronzeback-tree-snake/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>पक्षियों को घर देने के लिए बढ़ता बर्ड टॉवर का चलन, समाधान से ज़्यादा नुकसान</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/10/22/bird-towers-ecological-concerns-india/</link>
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					<pubDate>22 अक्टूबर 2026 08:45:34 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Amarpal Singh Verma]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<![CDATA[पक्षी, पहल, वन्य जीव एवं जैव विविधता, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, और विलुप्त होती प्रजातियां]]>
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							<![CDATA[<p>पंजाब के बठिंडा शहर की सीमा से सटे अपने पैतृक खेत में दीपेन्द्र सिंह ने दो साल पहले एक मल्टी स्टोरी बर्ड टॉवर का निर्माण करवाया। करीब सात लाख रुपये की लागत वाले इस 70 फीट ऊंचे टॉवर में गुजरात से आए कारीगरों ने 350 खांचे बनाए जो करीब 700 पक्षियों के रहने के लिए [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[पंजाब के बठिंडा शहर की सीमा से सटे अपने पैतृक खेत में दीपेन्द्र सिंह ने दो साल पहले एक मल्टी स्टोरी बर्ड टॉवर का निर्माण करवाया। करीब सात लाख रुपये की लागत वाले इस 70 फीट ऊंचे टॉवर में गुजरात से आए कारीगरों ने 350 खांचे बनाए जो करीब 700 पक्षियों के रहने के लिए उपयुक्त होंगे। कंस्ट्रक्शन मटेरियल का कारोबार करने वाले दीपेन्द्र सिंह ने काम के सिलसिले में राजस्थान के अपने दौरे के समय बाड़मेर और आसपास के गाँवों में बर्ड टॉवर देखे थे। उन्हें इन टॉवरों को देखकर अच्छा लगा और उन्होंने सोचा कि बठिंडा में भी ऐसा टॉवर बनवाना चाहिए। वह कहते हैं, ‘‘मैं यह नहीं कहता कि हर कोई ऐसा टॉवर बनाए। मैं यह भी नहीं कहता कि यह टॉवर एक पेड़ का विकल्प है। मुझे बाड़मेर में बर्ड टॉवर देखकर अच्छा लगा और मैंने भी बहुत ही पॉजिटिव सोच के साथ अपने शहर में इसे बनवा दिया।’’ दीपेन्द्र सिंह कहते हैं, ‘‘टॉवर पर ज्यादातर कबूतर ही आते हैं, कुछ कौए और चिड़िया भी होती हैं।” उनका कहना है कि इस टॉवर में कबूतरों ने अंडे दिए और उनसे बच्चे भी निकले हैं। उन्हें यह सब देखकर खुशी महसूस होती है। दीपेन्द्र सिंह की ही तरह बाड़मेर में विवेकानंद सर्कल पर 40 फीट ऊंचा बर्ड टॉवर स्थानीय व्यवसायी बाबूलाल धारीवाल की स्मृति में उनके परिजनों ने बनवाया है। स्वर्गीय धारीवाल के पुत्र संजीव धारीवाल बताते हैं, ‘‘हम लोगों ने ऐसा टॉवर सबसे पहले गुजरात में देखा था। हमें वह पर्यावरण संरक्षण और जीव दया का&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/22/bird-towers-ecological-concerns-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>समुद्र तक पहुंचने से पहले पुराने जालों में फंस रहे ऑलिव रिडली कछुओं के बच्चे</title>
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					<pubDate>21 अक्टूबर 2026 10:28:50 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Phalguni Ranjan]]>
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							<![CDATA[ओडिशा]]>
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							<![CDATA[जल प्रदूषण, जल संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, नई प्रजातियां, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधन, मछली, महासागर, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, विलुप्त होती प्रजातियां, और समुद्र तट]]>
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							<![CDATA[<p>ओडिशा के गंजम जिले में स्थित रुशिकुल्या रूकरी दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण कछुआ प्रजनन स्थलों में से एक है। हर साल, लाखों ऑलिव रिडली समुद्री कछुए (लेपिडोचेलीस ओलिवेशिया) यहां सामूहिक रूप से अंडे देने के लिए आते हैं, जिसे &#8216;अरिबाडा&#8217; कहा जाता है। अकेले फरवरी 2025 में लगभग 7,00,000 ऑलिव रिडली कछुए अंडे देने के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/21/olive-ridley-turtles-ghost-nets-odisha/" data-wpel-link="internal">समुद्र तक पहुंचने से पहले पुराने जालों में फंस रहे ऑलिव रिडली कछुओं के बच्चे</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[ओडिशा के गंजम जिले में स्थित रुशिकुल्या रूकरी दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण कछुआ प्रजनन स्थलों में से एक है। हर साल, लाखों ऑलिव रिडली समुद्री कछुए (लेपिडोचेलीस ओलिवेशिया) यहां सामूहिक रूप से अंडे देने के लिए आते हैं, जिसे &#8216;अरिबाडा&#8217; कहा जाता है। अकेले फरवरी 2025 में लगभग 7,00,000 ऑलिव रिडली कछुए अंडे देने के लिए तट पर पहुंचे थे। हालाँकि, भारत के पूर्वी तट पर फैला यह 10 किलोमीटर लंबा महत्वपूर्ण इलाका इन दिनों प्लास्टिक प्रदूषण और उससे जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है। गोवा स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशियनग्राफी (NIO) के एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि रुशिकुल्या के चारों प्रजनन तटों पर प्लास्टिक कचरा और कबाड़ हो चुके मछली पकड़ने के जाल भारी मात्रा में मौजूद हैं। यह तस्वीर दुनियाभर में बढ़ते समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण के संकट को सामने लाती है। प्लास्टिक के बीच अंडे देते कछुए साल 2025 के मुख्य प्रजनन सीजन के दौरान चार तटों न्यू पोदामपेटा, पुरूनबंधा, सिद्धांतनगर और प्रयागी- पर किए गए सर्वे में 1,100 से अधिक कबाड़ हो चुकी वस्तुएं दर्ज की गईं, जिनमें से 85% से ज्यादा हिस्सा केवल प्लास्टिक का था। प्लास्टिक की बोतलें, रैपर और थैलियां इस बात का संकेत देती हैं कि जमीन से बहकर आने वाला कचरा और इंसानी गतिविधियां इसके मुख्य स्रोत हैं। मछली पकड़ने की गतिविधियों से जुड़ा कचरा सभी जगहों पर कुल दर्ज कचरे का 41% हिस्सा था। इस कचरे में टूटे और फटे हुए जाल, थर्माकोल और नायलॉन की रस्सी के टुकड़े शामिल हैं। इन सभी चीज़ों को सामूहिक रूप से&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/21/olive-ridley-turtles-ghost-nets-odisha/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>कभी मानस से गायब हो गए थे गैंडे, अब नई पीढ़ी बढ़ा रही आबादी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/10/20/manas-rhino-reintroduction-breeding-conservation/</link>
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					<pubDate>20 अक्टूबर 2026 06:20:27 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Sneha Mahale]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[Biodiversity]]></category>
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		<category><![CDATA[एक-सींग वाला गैंडा]]></category>
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							<![CDATA[नई प्रजातियां, नेशनल पार्क, पहल, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, विलुप्त होती प्रजातियां, और समाधान]]>
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							<![CDATA[<p>एक समय असम के मानस नेशनल पार्क से एक सींग वाले गैंडे पूरी तरह खत्म हो गए थे, जो संरक्षण के प्रयासों के लिए एक बड़ा झटका था। हालाँकि, &#8216;इंडियन राइनो विजन 2020&#8217; (IRV2020) और गैंडा पुनर्वास कार्यक्रमों के तहत, गैंडों को दूसरे जंगल से लाकर यहाँ उनकी आबादी को फिर से बसाया गया। साल [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/20/manas-rhino-reintroduction-breeding-conservation/" data-wpel-link="internal">कभी मानस से गायब हो गए थे गैंडे, अब नई पीढ़ी बढ़ा रही आबादी</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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						</description>
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							<![CDATA[एक समय असम के मानस नेशनल पार्क से एक सींग वाले गैंडे पूरी तरह खत्म हो गए थे, जो संरक्षण के प्रयासों के लिए एक बड़ा झटका था। हालाँकि, &#8216;इंडियन राइनो विजन 2020&#8217; (IRV2020) और गैंडा पुनर्वास कार्यक्रमों के तहत, गैंडों को दूसरे जंगल से लाकर यहाँ उनकी आबादी को फिर से बसाया गया। साल 2012 से 2021 के बीच दो तरीकों, अन्य संरक्षित क्षेत्रों से गैंडों को यहाँ लाना, और पुनर्वास के बाद उन्हें जंगल में छोड़ना, से यहाँ फिर से बसाई गई गैंडों की आबादी पर हाल ही में एक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन से पता चलता है कि ये गैंडे अपने पुराने प्राकृतिक आवास में अच्छी तरह ढल रहे हैं, जो एक सकारात्मक संकेत है। इस अध्ययन में मानस में पैदा हुई गैंडों की पहली पीढ़ी (F1) पर भी नज़र रखी गई। मानस नेशनल पार्क पूर्वोत्तर भारत में असम के चिरांग और बक्सा जिलों में स्थित है और उत्तर की ओर भूटान के रॉयल मानस नेशनल पार्क से सटा हुआ है। पार्क में गैंडों की आबादी को फिर से बढ़ाने के प्रयासों के तहत, 2008 से 2021 के बीच काजीरंगा नेशनल पार्क और पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य से 22 एक सींग वाले गैंडों को यहाँ स्थानांतरित किया गया। इसके अलावा, 2006 से 2021 के बीच &#8216;सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ रिहैबिलिटेशन एंड कंजर्वेशन&#8217; से 20 पुनर्वासित किए गए गैंडों को इस पार्क में छोड़ दिया गया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि इन गैंडों को पुनर्वास केंद्रों में रखने के बजाय, मानस को उनके लिए एक अधिक उपयुक्त प्राकृतिक आवास&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/20/manas-rhino-reintroduction-breeding-conservation/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>विलुप्त होने के खतरे से जूझ रही नीली मकड़ी के संरक्षण की नई पहल</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/10/19/rare-peacock-tarantula-gets-dedicated-conservation-survey/</link>
					<comments>https://hindi.mongabay.com/2026/10/19/rare-peacock-tarantula-gets-dedicated-conservation-survey/?noamp=mobile#respond</comments>
					<pubDate>19 अक्टूबर 2026 11:21:55 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Arathi Menon]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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		<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
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							<![CDATA[आंध्र प्रदेश]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[नई प्रजातियां, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, और विलुप्त होती प्रजातियां]]>
						</topic-tags>
					
					
											<description>
							<![CDATA[<p>आंध्र प्रदेश वन विभाग ने, गैर-लाभकारी संस्था &#8216;ईस्टर्न घाट्स वाइल्डलाइफ सोसाइटी&#8217; के साथ मिलकर, नागार्जुनसागर-श्रीशैलम टाइगर रिज़र्व में मकड़ियों की एक गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजाति &#8216;पीकॉक टेरेंटुला&#8217; के संरक्षण के लिए एक सर्वेक्षण शुरू किया है। साल 1899 में आंध्र प्रदेश के गूती (Gooty) में पहली बार देखी गई &#8216;पीकॉक टेरेंटुला&#8217; या &#8216;गूती ऑर्नामेंटल [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/19/rare-peacock-tarantula-gets-dedicated-conservation-survey/" data-wpel-link="internal">विलुप्त होने के खतरे से जूझ रही नीली मकड़ी के संरक्षण की नई पहल</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[आंध्र प्रदेश वन विभाग ने, गैर-लाभकारी संस्था &#8216;ईस्टर्न घाट्स वाइल्डलाइफ सोसाइटी&#8217; के साथ मिलकर, नागार्जुनसागर-श्रीशैलम टाइगर रिज़र्व में मकड़ियों की एक गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजाति &#8216;पीकॉक टेरेंटुला&#8217; के संरक्षण के लिए एक सर्वेक्षण शुरू किया है। साल 1899 में आंध्र प्रदेश के गूती (Gooty) में पहली बार देखी गई &#8216;पीकॉक टेरेंटुला&#8217; या &#8216;गूती ऑर्नामेंटल सफायर टेरेंटुला&#8217; (पोइकिलोथेरिया मेटालिका) को IUCN रेड लिस्ट में &#8216;गंभीर रूप से लुप्तप्राय&#8217; (critically endangered) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। इसका मतलब यह है कि प्राकृतिक आवास में इसके विलुप्त होने का बहुत अधिक खतरा है। अपने शानदार मेटालिक नीले रंग और पेट व पैरों पर मौजूद पीले और सफेद निशानों के लिए जानी जाने वाली यह मकड़ी, &#8216;पोइकिलोथेरिया&#8217; (Poecilotheria) प्रजाति समूह की एकमात्र नीली प्रजाति है। यह मुख्य रूप से नांदयाल और गुडलूर वन प्रभागों के साथ-साथ दक्षिणी आंध्र प्रदेश की शेषचलम पहाड़ियों के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। दुनिया में सबसे ज़्यादा तस्करी की जाने वाली मकड़ियों में से एक, पीकॉक टेरेंटुला को अवैध वन्यजीव व्यापार के साथ-साथ पेड़ों की कटाई से इसके आवास को होने वाले नुकसान का भी खतरा है। ईस्टर्न घाट वाइल्डलाइफ सोसाइटी के सीईओ मूर्ति कांतिमाहंती ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि यह प्रजाति बड़े और परिपक्व पेड़ों वाले शुष्क पर्णपाती जंगलों को पसंद करती है जो विशेष सूक्ष्म आवास प्रदान करते हैं। वे कहते हैं, “ये टेरेंटुला पूरी तरह से पेड़ों पर निर्भर हैं, पेड़ों के खोखले हिस्सों और दरारों में रहते हैं। ये इस भूभाग में पहाड़ी ढलानों, घाटियों और मैदानों में पाए जाते हैं,&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/19/rare-peacock-tarantula-gets-dedicated-conservation-survey/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>पवन ऊर्जा और चमगादड़ों का संरक्षण, दोनों के बीच कैसे बनेगा संतुलन</title>
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					<pubDate>15 अक्टूबर 2026 12:19:46 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Aisiri Amin]]>
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										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
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							<![CDATA[<p>जैसे-जैसे भारत के अक्षय ऊर्जा बाजार में विविधता बढ़ रही है, पवन ऊर्जा के बड़े प्रोजेक्ट चमगादड़ों के लिए एक ऐसे खतरे के रूप में उभरे हैं जिस पर अभी तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। वैश्विक स्तर पर, पवन चक्कियों (विंड टर्बाइन) से टकराकर हर साल लाखों चमगादड़ अपनी जान गंवा देते हैं। [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[जैसे-जैसे भारत के अक्षय ऊर्जा बाजार में विविधता बढ़ रही है, पवन ऊर्जा के बड़े प्रोजेक्ट चमगादड़ों के लिए एक ऐसे खतरे के रूप में उभरे हैं जिस पर अभी तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। वैश्विक स्तर पर, पवन चक्कियों (विंड टर्बाइन) से टकराकर हर साल लाखों चमगादड़ अपनी जान गंवा देते हैं। प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण से जुड़े सम्मेलन या कन्वेंशन ऑफ़ माइग्रेटरी स्पीशीज (CMS) की 2025 की एक फैक्ट शीट के मुताबिक, वर्तमान में दुनिया भर में चमगादड़ों की प्रजातियों को वनों की कटाई और कृषि के कारण आवास के नुकसान, उत्पीड़न, शिकार, शहरीकरण, ऊर्जा उत्पादन और जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद, जैव विविधता के खतरों पर होने वाली चर्चाओं में शायद ही कभी इस बात को स्वीकार किया जाता है कि जलवायु समाधान जैसे नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना स्वयं जैव विविधता के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं। स्टेट ऑफ इंडियन बैट्स की नवीनतम रिपोर्ट भी चमगादड़ की प्रजातियों को प्रभावित करने वाले खतरों में से एक के रूप में पवन चक्कियों की ओर ध्यान आकर्षित करती है। चमगादड़ों पर शोध कर रहे रोहित चक्रवर्ती ने बताया कि तीन प्रमुख क्षेत्रों में डेटा की भारी कमी है। वह समझाते हैं, “पहला यह कि कौन सी प्रजातियां सबसे अधिक प्रभावित होती हैं; दूसरा, उनकी मृत्यु दर कितनी है; और तीसरा, क्या विभिन्न प्रजातियों की मृत्यु दर में कोई मौसमी पैटर्न है।” लगभग 135 चमगादड़ प्रजातियों के साथ, भारत में वैश्विक चमगादड़ विविधता का लगभग 10% हिस्सा पाया जाता है।&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/15/wind-turbines-threaten-bats-in-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>गोवा में रियल एस्टेट का विस्तार, खेतों और पहाड़ियों पर बढ़ा दबाव</title>
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					<pubDate>14 अक्टूबर 2026 10:29:31 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Hagen DesaSimrin Sirur]]>
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										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<![CDATA[खनन, गाँव, जल प्रदूषण, जल संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, नई प्रजातियां, पर्यावरण कानून, पर्यावरण की राजनीति, पानी, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधन, भूजल, भूमि अधिकार, भूमि विवाद, महासागर, लोग, और समुद्र तट]]>
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							<![CDATA[<p>सिरिदाओ गाँव में तुषार गवास के घर के पीछे एक पहाड़ी पर हरा-भरा बाग है, जहां मिर्च, काजू और कई तरह के औषधीय पौधे उगते हैं। इस पहाड़ी को कभी निर्माण कार्य के लिए बहुत ज्यादा ढलान वाला और असुरक्षित माना जाता था। लेकिन 26 जनवरी को सरकार ने इस जमीन का दर्जा बदलकर इसे [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/14/goa-land-use-change-section-39a-farmland-hills/" data-wpel-link="internal">गोवा में रियल एस्टेट का विस्तार, खेतों और पहाड़ियों पर बढ़ा दबाव</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[सिरिदाओ गाँव में तुषार गवास के घर के पीछे एक पहाड़ी पर हरा-भरा बाग है, जहां मिर्च, काजू और कई तरह के औषधीय पौधे उगते हैं। इस पहाड़ी को कभी निर्माण कार्य के लिए बहुत ज्यादा ढलान वाला और असुरक्षित माना जाता था। लेकिन 26 जनवरी को सरकार ने इस जमीन का दर्जा बदलकर इसे आवासीय क्षेत्र में पुनर्वर्गीकृत कर दिया, जिससे यहां कंक्रीट के जंगल बनने का रास्ता साफ हो गया है। गवास ने इसके खिलाफ आपत्ति भी दर्ज कराई, लेकिन सरकार ने यह कहकर उसे खारिज कर दिया कि उनकी आपत्ति में पर्याप्त विवरण नहीं है। गोवा के सिरिदाओ का यह बाग अकेला नहीं है। राज्यभर में ऐसे सैकड़ों बाग, धान के खेत और पहाड़ी ढलानें हैं (जो कुल मिलाकर 133 फुटबॉल के मैदानों के बराबर हैं) जिन्हें बदलकर आवासीय क्षेत्र घोषित किया जा रहा है ताकि वहां हाउसिंग प्रोजेक्ट, बड़ी इमारतें और अन्य बुनियादी ढांचे खड़े किए जा सकें। गोवा के भूगोल को इस तरह बड़े पैमाने पर बदलने की छूट देने वाला यह प्रावधान शहर एवं ग्रामीण नियोजन अधिनियम की धारा 39 (A) है। सरकार इस धारा को मौजूदा लैंड-यूज प्लान में गलतियों को सुधारने वाला एक जरिया बताती है। शहर एवं ग्रामीण नियोजन विभाग की कमान कैबिनेट मंत्री विश्वजीत राणे के हाथ में है। मंत्री पद संभालने के साथ-साथ वे करापुर एस्टेट्स नाम की एक रियल एस्टेट फर्म के डायरेक्टर के रूप में भी सूचीबद्ध हैं, जिसका ज़ोन बदलवाने के लिए आवेदन करने का पुराना इतिहास रहा है। बड़े महानगरों से गोवा आकर बसने वाले&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/14/goa-land-use-change-section-39a-farmland-hills/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>सुबह-शाम ज्यादा दर्ज हुईं गंगा डॉल्फिन की आवाजें, ज्वार से भी मिला संबंध</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/10/13/ganges-river-dolphin-activity-tides-moon-study/</link>
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					<pubDate>13 अक्टूबर 2026 11:04:10 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Sneha Mahale]]>
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						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
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							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[पश्चिम बंगाल]]>
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							<![CDATA[जल प्रदूषण, जल संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, नदी, पर्यावरण कानून, पानी, प्राकृतिक संसाधन, मछली, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, और विलुप्त होती प्रजातियां]]>
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<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/13/ganges-river-dolphin-activity-tides-moon-study/" data-wpel-link="internal">सुबह-शाम ज्यादा दर्ज हुईं गंगा डॉल्फिन की आवाजें, ज्वार से भी मिला संबंध</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[पश्चिम बंगाल की रूपनारायण नदी के ज्वार वाले जलक्षेत्र में गंगा नदी डॉल्फिन लगातार बदलते जलस्तर, लहरों और परिस्थितियों के बीच रहती हैं। नदी में किए गए एक नए अध्ययन में पाया गया कि ज्वार, दिन का समय और चंद्र चक्र इस बात को प्रभावित करते हैं कि डॉल्फिन कब दिखेगी। एक्वाटिक मैमल्स में प्रकाशित एक महीने तक चले इस अध्ययन में इन कारकों का एक साथ गंगा नदी डॉल्फिन की ध्वनि-आधारित पहचान (आवाजों के जरिए निगरानी) के संदर्भ में स्टडी की गई। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की प्रधान परियोजना सहयोगी और स्टडी की प्रथम लेखिका गार्गी रॉय चौधरी कहती हैं कि अध्ययन वाली जगह पर दिन में दो बार ज्वार आता और उतरता है। कभी-कभी ज्वार के दौरान लहरें भी उठती हैं, जिससे जलस्तर और लहरों में बड़े बदलाव होते हैं। वह कहती हैं, “मानव गतिविधियों से इस क्षेत्र में कई बदलाव हुए हैं, जहां बड़े पैमाने पर मोटर से चलने वाली नावों से मछली पकड़ी जाती है। इसके निचले हिस्से में औद्योगिक गतिविधियां होती हैं और अध्ययन वाली जगह से नीचे की ओर कोलाघाट ताप विद्युत संयंत्र स्थित है। इसके बावजूद, यहां डॉल्फिन की अच्छी-खासी आबादी है।” हालांकि, यहां बड़े जहाजों की आवाजाही सीमित है। ज्वार से आकार लेती नदी रूपनारायण नदी हुगली की 85 किलोमीटर लंबी सहायक नदी है। इस पर लगभग 220 किलोमीटर दूर स्थित बंगाल की खाड़ी से आने वाले ज्वार का प्रभाव पड़ता है। इसके ऊपरी हिस्सों में नदी की धारा संकरी है, जबकि निचले हिस्सों में यह चौड़ी हो जाती है। नदी में&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/13/ganges-river-dolphin-activity-tides-moon-study/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>केरल के गाँव ने सामुदायिक प्रयासों से निकाला गिरते भूजल का समाधान</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/10/12/community-led-water-conservation-revives-groundwater/</link>
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					<pubDate>12 अक्टूबर 2026 06:10:49 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Anjana V.]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[समाधान]]></category>
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							<![CDATA[केरल]]>
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							<![CDATA[क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन, क्लाईमेट चेंज एडैप्टेशन, खनन, गाँव, जल प्रदूषण, जल संरक्षण, नदियां, नदी, पहल, पानी, प्राकृतिक संसाधन, बाढ़, भूजल, और समाधान]]>
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							<![CDATA[<p>केरल के एर्नाकुलम जिले के थुरुथिक्कारा गाँव में जनवरी की एक ठंडी सुबह, 53 वर्षीय विद्या मंजुश अपने खुले कुएं के पास खड़ी होकर उसमें पानी के स्तर को देख रही हैं। राहत की बात यह है कि पिछले वर्षों के मुकाबले इस बार जलस्तर स्थिर बना हुआ है। लेकिन कुछ साल पहले तक ऐसा [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/12/community-led-water-conservation-revives-groundwater/" data-wpel-link="internal">केरल के गाँव ने सामुदायिक प्रयासों से निकाला गिरते भूजल का समाधान</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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						</description>
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							<![CDATA[केरल के एर्नाकुलम जिले के थुरुथिक्कारा गाँव में जनवरी की एक ठंडी सुबह, 53 वर्षीय विद्या मंजुश अपने खुले कुएं के पास खड़ी होकर उसमें पानी के स्तर को देख रही हैं। राहत की बात यह है कि पिछले वर्षों के मुकाबले इस बार जलस्तर स्थिर बना हुआ है। लेकिन कुछ साल पहले तक ऐसा नहीं था। बारिश खत्म होते ही भूजल का स्तर तेजी से गिरने लगता था और गाँव के कुएं सूखने लगते थे। उस दौर को याद करते हुए विद्या मंजुश बताती हैं कि पानी के लिए उन्हें टैंकरों का दो से तीन दिन तक इंतजार करना पड़ता था। और जब टैंकर आता भी था, तो उसका पानी पीने लायक नहीं होता था। वह कहती हैं, &#8220;पानी में अक्सर काले कण तैरते रहते थे। मुझे हर बार उसे कपड़े से छानकर उबालना पड़ता था।&#8221; वैसे तो एर्नाकुलम जिले में अच्छी खासी बारिश होती है। जिले में साल भर में लगभग 3000 मिमी बारिश होती है, जो मुख्य रूप से मार्च से अक्टूबर के बीच होती है। लेकिन थुरुथिक्कारा में बारिश का मौसम खत्म होते ही कुएं जवाब देने लगते थे और जनवरी आते-आते पूरी तरह सूख जाते थे। इसके चलते यहां के लोगों को पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर होना पड़ता था। टैंकरों पर इस मौसमी निर्भरता से पार पाने के लिए, ग्रामीणों ने वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, वर्षा मापन और पानी की गुणवत्ता के परीक्षण जैसी तकनीकों को अपनाया। घरों और सार्वजनिक संस्थानों में कम लागत वाली रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग यानी वर्षा जल&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/12/community-led-water-conservation-revives-groundwater/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>वनों की असली कीमत को समझना क्यों है जरूरी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/10/08/understanding-the-true-value-of-forest-ecosystem-services/</link>
					<comments>https://hindi.mongabay.com/2026/10/08/understanding-the-true-value-of-forest-ecosystem-services/?noamp=mobile#respond</comments>
					<pubDate>08 अक्टूबर 2026 10:40:41 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Sharmila Vaidyanathan]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[जंगल]]></category>
		<category><![CDATA[वन]]></category>
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							<![CDATA[भारत]]>
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							<![CDATA[पौधे, प्राकृतिक संसाधन, वन, वन कटाई, और वन्य जीव]]>
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							<![CDATA[<p>भारत के जंगल हर साल 2.5 ट्रिलियन डॉलर (करीब 220 लाख करोड़) के बराबर की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। यह बात मेटा-रिग्रेशन तरीके का इस्तेमाल करते हुए ‘भारत में वन पारिस्थितिकी सेवाओं का योगदान’ शीर्षक से प्रकाशित नए अध्ययन में सामने आई है। इसके मुताबिक भारत के जंगलों से मिलने वाले पारिस्थितिकी तंत्र [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/08/understanding-the-true-value-of-forest-ecosystem-services/" data-wpel-link="internal">वनों की असली कीमत को समझना क्यों है जरूरी</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[भारत के जंगल हर साल 2.5 ट्रिलियन डॉलर (करीब 220 लाख करोड़) के बराबर की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। यह बात मेटा-रिग्रेशन तरीके का इस्तेमाल करते हुए ‘भारत में वन पारिस्थितिकी सेवाओं का योगदान’ शीर्षक से प्रकाशित नए अध्ययन में सामने आई है। इसके मुताबिक भारत के जंगलों से मिलने वाले पारिस्थितिकी तंत्र लाभों की प्रति हेक्टेयर कीमत लगभग 31,000 डॉलर (28 लाख रुपए से अधिक) सालाना है। जंगलों के प्रकारों में उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन का सालाना आर्थिक मूल्य सबसे ज्यादा 703 अरब डॉलर (65 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा) है। इन लाभों को मानव कल्याण और अस्तित्व को बढ़ावा देने वाले प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभों के रूप में परिभाषित किया गया है। इन्हें आगे प्रावधान, विनियमन, सांस्कृतिक और सहायक सेवाओं में बांटा गया है। वनों के संदर्भ में प्रावधान सेवाओं में लकड़ी, भोजन और औषधीय पौधे जैसे वन भूमि से मिलने वाली वस्तुएं आती हैं। विनियमन सेवाओं में कार्बन सोखने की क्षमता और मिट्टी का संरक्षण शामिल है। सांस्कृतिक सेवाओं में मनोरंजन से मिलने वाले लाभ और पवित्र वन या ओरण वगैरह शामिल हैं। सहायक सेवाओं में विभिन्न प्रजातियों के लिए आवास उपलब्ध कराने जैसी सेवाएं आती हैं। लेखकों ने अलग-अलग सेवाओं की कीमत का भी आकलन किया और पाया कि भारत के वन हर साल लगभग 9.64 अरब डॉलर (89 हजार करोड़ रुपए से अधिक) की प्रावधान सेवाएं, 12.15 अरब डॉलर (एक लाख 12 हजार करोड़ रुपए से अधिक) की विनियमन सेवाएं और 17.17 अरब डॉलर (एक लाख 59 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा) की&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/08/understanding-the-true-value-of-forest-ecosystem-services/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>सौर-सिंचाई में मिल सकता है झारखंड को तिलहन उत्पादन, पलायन का समाधान</title>
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					<pubDate>06 अक्टूबर 2026 11:22:54 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Vishal Kumar Jain]]>
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										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[समाधान]]></category>
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<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/06/solar-irrigation-could-offer-jharkhand-a-solution-to-oilseed-production-and-migration/" data-wpel-link="internal">सौर-सिंचाई में मिल सकता है झारखंड को तिलहन उत्पादन, पलायन का समाधान</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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						</description>
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							<![CDATA[झारखंड के गुमला जिले के अंबाटोली गाँव के 47 वर्षीय मंगा उरांव पिछले कुछ सालों तक अपनी पत्नी और बच्चों को गाँव में छोड़कर देश के कई इलाकों में आजीविका की तलाश में जाते थे और राजमिस्त्री का काम करते थे। घर के अंदर खूंटी पर टंगे एक लाल बैग की तरफ इशारा करते हुए मंगा कहते हैं, “कभी इसी बैग को कंघे पर टांगकर, पत्नी और तीन छोटे बच्चों को गाँव में छोड़कर मैं बंगाल, त्रिपुरा और हिमाचल तक कमाने जाता था।” अंबाटोली से करीब सात किलोमीटर दूर खोरा गाँव के भकवाटोली के बुद्धदेव उरांव (32) भी घर चलाने के लिए हैदराबाद में ड्राइवरी का काम करते थे। दरअसल, झारखंड में आज भी ज्यादातर खेती मॉनसून यानी खरीफ के सीजन में होती है। भौगोलिक समस्याओं और पठारी भूभाग होने के कारण यहां सिंचाई एक बड़ी समस्या है। राज्य में शुद्ध बुआई क्षेत्र (25.32 लाख एकड़) का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा असिंचित है। मॉनसून के अलावा अन्य मौसम में सिंचाई की सुविधा नहीं होने से मंगा और बुद्धदेव जैसे राज्य के कई लोगों को अपने परिवारों को पीछे छोड़ हजारों किलोमीटर दूर काम खोजने जाना पड़ा है। हालाँकि, पिछले कुछ सालों में सौर ऊर्जा की मदद से रबी और अन्य सीजन में सिंचाई की स्थाई व्यवस्था होने से मंगा और बुद्धदेव अपने गाँव वापस लौटकर खेती को अपनी आजीविका बनाने में सफल हो सके हैं। जहां मंगा उरांव के खेतों तक पानी सोलर लिफ्ट सिंचाई से पहुँचता है, वहीं बुद्धदेव सोलर पंप के जरिये सिंचाई करते हैं। बुद्धदेव कहते&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/06/solar-irrigation-could-offer-jharkhand-a-solution-to-oilseed-production-and-migration/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>प्रदूषण, खराब बुनियादी ढांचा भारत में साइकिल चालकों के लिए बड़ी चुनौती</title>
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					<pubDate>05 अक्टूबर 2026 15:12:27 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Aisiri Amin]]>
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										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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							<![CDATA[<p>वर्ष 2025 में एक जिला कलेक्टर, एक केंद्रीय मंत्री और साइकिल के इस्तेमाल का प्रचार करने वाले एक समूह, तीनों की सोच एक ही थी: प्रदूषण-मुक्त भविष्य के लिए साइकिल का इस्तेमाल। साल की शुरुआत में, साइकिल को बढ़ावा देने वाले संगठन बी.वाय.सी.एस. (BYCS) इंडिया फाउंडेशन ने प्रमुख राजनीतिक दलों से आग्रह किया था कि [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/05/pollution-and-poor-infrastructure-remain-barriers-to-cyclists-in-india/" data-wpel-link="internal">प्रदूषण, खराब बुनियादी ढांचा भारत में साइकिल चालकों के लिए बड़ी चुनौती</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[वर्ष 2025 में एक जिला कलेक्टर, एक केंद्रीय मंत्री और साइकिल के इस्तेमाल का प्रचार करने वाले एक समूह, तीनों की सोच एक ही थी: प्रदूषण-मुक्त भविष्य के लिए साइकिल का इस्तेमाल। साल की शुरुआत में, साइकिल को बढ़ावा देने वाले संगठन बी.वाय.सी.एस. (BYCS) इंडिया फाउंडेशन ने प्रमुख राजनीतिक दलों से आग्रह किया था कि वे दिल्ली को साइकिल-अनुकूल शहर बनाने को प्राथमिकता दें। अगस्त में, केंद्रीय युवा मामले और खेल मंत्री मनसुख मंडाविया ने भी इसी बात को दोहराते हुए साइकिल को &#8220;प्रदूषण का समाधान&#8221; बताया। इसके बाद दिसंबर में, आंध्र प्रदेश के एन.टी.आर. जिले के कलेक्टर जी. लक्ष्मीश ने न सिर्फ व्यक्तिगत फिटनेस, बल्कि कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए भी साइकिल चलाने पर जोर दिया। जैसे-जैसे शोध यह साबित कर रहे हैं कि साइकिल चलाने से प्रदूषण घटता है और नेट-जीरो कार्बन लक्ष्यों की ओर बढ़ने में मदद मिलती है, वैसे-वैसे इस आम शौक को जलवायु संकट के समाधान के रूप में अपनाने पर जोर दिया जाने लगा है। नेचर सिटीज नामक पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने चार विकासशील देशों के शहरी इलाकों (भारत के दिल्ली और चेन्नई, बांग्लादेश के ढाका और घाना के अकरा) की साइकिल संस्कृति का जायजा लिया। इसमें सामने आया कि बुनियादी ढांचे की कमी के अलावा नीतिगत, उसे लागू करने और लैंगिक स्तर पर भी कई कमियां व बाधाएं मौजूद हैं। आईक्यू एयर की विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया का छठा सबसे प्रदूषित देश है, जबकि दिल्ली दुनिया भर में चौथे सबसे प्रदूषित शहर के रूप में दर्ज&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/05/pollution-and-poor-infrastructure-remain-barriers-to-cyclists-in-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>योजनाओं, प्रस्तावों, कागज़ों तक सिमटी यूपी की विस्थापित कछुआ सैंक्चुअरी</title>
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					<pubDate>01 अक्टूबर 2026 15:10:30 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Rahul Singh]]>
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										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[<p>उत्तर प्रदेश में संकटग्रस्त कछुओं को बचाने का कार्य कछुओं की ही गति से चल रहा है। वाराणसी से देश की इकलौती कछुआ सैंक्चुअरी को डिनोटिफाई यानि विस्थापित करके इसे नई जगह पर बसाने की आधिकारिक घोषणा को छः साल से भी ज़्यादा का समय हो चूका है पर अभी तक मूलभूत कार्य भी पूरे [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/01/ups-displaced-turtle-sanctuary-confined-to-plans-proposals-and-paperwork/" data-wpel-link="internal">योजनाओं, प्रस्तावों, कागज़ों तक सिमटी यूपी की विस्थापित कछुआ सैंक्चुअरी</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[उत्तर प्रदेश में संकटग्रस्त कछुओं को बचाने का कार्य कछुओं की ही गति से चल रहा है। वाराणसी से देश की इकलौती कछुआ सैंक्चुअरी को डिनोटिफाई यानि विस्थापित करके इसे नई जगह पर बसाने की आधिकारिक घोषणा को छः साल से भी ज़्यादा का समय हो चूका है पर अभी तक मूलभूत कार्य भी पूरे नहीं हुए हैं। कछुआ सैंक्चुअरी के लिए नोटिफाई किए गए नए इलाके में ना तो संरक्षित क्षेत्र की सीमा तय की गयी है, ना प्रजनन स्थलों की सुरक्षा की जाती है, और ना ही कछुओं के लिए हानिकारक गतिविधियों पर रोक लग पायी है। पिछले कुछ दशकों में गंगा नदी में पाए जाने वाले कछुओं की संख्या और उनके हैबिटैट यानी रहने की जगहों की भौगोलिक सीमा में भारी गिरावट आई है। अवैध बाज़ार में कछुओं की बहुत माँग रहती है—इनके माँस के लिये और पालतू पशु के रूप में रखने के लिये भी। जल प्रदूषण, नदियों से रेत खनन, व मछली पकड़ने के जाल में फँसना अन्य कारण हैं जिनकी वजह से यह जीव, जो कभी गंगा में प्रचुरता में पाए जाते थे, अब ना के बराबर दिखते हैं। अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संस्था इंटरनैशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर की रेड लिस्ट के अनुसार गंगा में बसने वाले कछुओं की प्रजातियाँ असुरक्षित (vulnerable), संकटग्रस्त (endangered), व गंभीर रूप से संकटग्रस्त (critically endangered) श्रेणियों में आती हैं। कछुओं को भारत का वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, भी सर्वोच्च सुरक्षा प्रदान करता है और स्वीकारता है कि संरक्षण के बिना यह विलुप्त हो सकते हैं। इनके बचाव के&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/10/01/ups-displaced-turtle-sanctuary-confined-to-plans-proposals-and-paperwork/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>फिशिंग कैट के लिए कमाल का घर है काज़ीरंगा</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/09/30/kaziranga-hosts-a-healthy-population-of-fishing-cats-finds-survey/</link>
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					<pubDate>30 सितम्बर 2026 15:03:59 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Nabarun Guha]]>
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										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[<p>असम के काज़ीरंगा नेशनल पार्क (केएनपी) और टाइगर रिज़र्व में फिशिंग कैट (Prionailurus viverrinus) का पहला वैज्ञानिक सर्वे किया गया, जिसमें 57 बिल्लियाँ देखी गईं। इस सर्वे से मिली जानकारियों से इस बात की पुष्टि होती है कि यह प्रजाति काज़ीरंगा के बाढ़ वाले मैदानों (फ्लडप्लेन) में बड़े पैमाने पर फैली हुई है और वहाँ [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[असम के काज़ीरंगा नेशनल पार्क (केएनपी) और टाइगर रिज़र्व में फिशिंग कैट (Prionailurus viverrinus) का पहला वैज्ञानिक सर्वे किया गया, जिसमें 57 बिल्लियाँ देखी गईं। इस सर्वे से मिली जानकारियों से इस बात की पुष्टि होती है कि यह प्रजाति काज़ीरंगा के बाढ़ वाले मैदानों (फ्लडप्लेन) में बड़े पैमाने पर फैली हुई है और वहाँ सक्रिय रूप से प्रजनन कर रही है। काज़ीरंगा के टाइगर सेल ने &#8216;फिशिंग कैट प्रोजेक्ट&#8217; के साथ मिलकर यह सर्वे किया और इसकी रिपोर्ट 22 फरवरी – यानी &#8216;इंटरनेशनल फिशिंग कैट डे&#8217; के दिन जारी की। “मीठे पानी वाले बाढ़ के मैदानों में यह (फिशिंग कैट की) संख्या सबसे ज़्यादा है, जो काज़ीरंगा को इनके लिए सबसे अच्छे आवासों में से एक के तौर पर फिर से स्थापित करती है। हमारे लिए यह जानना ज़रूरी है कि ये फिशिंग कैट के लिए अच्छे आवास हैं,&#8221; काज़ीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिज़र्व की डायरेक्टर सोनाली घोष ने मोंगाबे-इंडिया को बताया। कैमरा ट्रैप तस्वीरों का विश्लेषण इस सर्वे में जिन कैमरा ट्रैप के डेटा का इस्तेमाल किया गया, उन्हें असल में बाघों की निगरानी के लिए लगाया गया था। “केएनपी में पाई जाने वाली हर प्रजाति के लिए अलग से सर्वे करना मुमकिन नहीं है, क्योंकि इसके लिए संसाधनों और समय की सीमाएं होती हैं। हमें कैमरा ट्रैप से मिली 14 लाख से ज़्यादा तस्वीरों का अध्ययन करना पड़ा,&#8221; घोष ने बताया। &#8216;फिशिंग कैट प्रोजेक्ट&#8217; की को-फाउंडर और वाइल्ड लाइफ़ बायोलॉजिस्ट तियासा आध्या कहती हैं कि इन तस्वीरों का विश्लेषण करने में कुछ चुनौतियां आईं। वे कहती&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/30/kaziranga-hosts-a-healthy-population-of-fishing-cats-finds-survey/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>सोशल मीडिया पर आपराधिक सामग्री से खतरे में वन्यजीव</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/09/28/crime-content-on-social-media-threatens-wildlife-safety/</link>
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					<pubDate>28 सितम्बर 2026 14:17:10 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Vandana K.]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[<p>बात साल 2025 की है। पी.एम. मुथन्ना की नजर इंस्टाग्राम पर एक ऐसी रील पर गई, जिसमें किसी व्यक्ति को जंगली जानवरों को पकड़ने का तरीका बताते हुए दिखाया गया था। यह ऐसी गतिविधि थी, जिससे न सिर्फ वन्यजीवों को नुकसान पहुंच सकता था, बल्कि वन्यजीव संरक्षण कानूनों का उल्लंघन भी हो सकता था। कर्नाटका [&#8230;]</p>
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]]>
						</description>
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							<![CDATA[बात साल 2025 की है। पी.एम. मुथन्ना की नजर इंस्टाग्राम पर एक ऐसी रील पर गई, जिसमें किसी व्यक्ति को जंगली जानवरों को पकड़ने का तरीका बताते हुए दिखाया गया था। यह ऐसी गतिविधि थी, जिससे न सिर्फ वन्यजीवों को नुकसान पहुंच सकता था, बल्कि वन्यजीव संरक्षण कानूनों का उल्लंघन भी हो सकता था। कर्नाटका में स्थित वन्यजीव संगठन सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज (CWS) में फील्ड कंजर्वेशन की अगुवाई करने वाले मुथन्ना उस रील को नजरअंदाज नहीं कर सके जो जानवरों को अवैध तरीके से पकड़ने और उनके साथ व्यवहार को सामान्य दिखाती प्रतीत होती थी। वह कहते हैं, “मैंने और मेरे सहकर्मियों ने सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम पर प्रसारित हो रहे ऐसे वीडियो की जांच और उनका संकलन शुरू किया।” उन्हें मिली रील्स में एक ऐसी रील भी थी, जिसमें जबड़े वाले फंदे में फंसी कस्तूरी बिल्ली दिखाई गई थी। उस रील को 25,000 से ज्यादा लाइक मिले थे। इसके अलावा, कुछ रील में लोग मॉनिटर लिज़र्ड या गोह का शिकार करते, जबड़े वाले फंदे बनाने की कार्यशाला और ऐसी ही अन्य गतिविधियां दिखा रहे थे। फरवरी 2026 में उन्होंने वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) को चिट्ठी लिखी। यह सरकारी निकाय है, जो संगठित वन्यजीव अपराध से निपटता है। पत्र में उन्होंने आठ इंस्टाग्राम अकाउंट के खिलाफ कार्रवाई का आग्रह किया, जो जानवरों को घायल या नुकसान पहुंचाने वाले उपकरण दिखाते और बेचते हैं और गोह के अवैध शिकार का प्रदर्शन करते हैं। गोह वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के तहत संरक्षित हैं। पूरे भारत में ऐसी&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/28/crime-content-on-social-media-threatens-wildlife-safety/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>50 लाख बाढ़ प्रभावित, सिर्फ 13 राहत शिविर: कैसे बदली बिहार की राहत व्यवस्था?</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/09/24/bihar-flood-relief-camps-community-kitchens-cash-transfer/</link>
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					<pubDate>24 सितम्बर 2026 08:48:15 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Pushyamitra]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[लोग]]></category>
		<category><![CDATA[ग्रामीण बाढ़]]></category>
		<category><![CDATA[बाढ़]]></category>
		<category><![CDATA[बाढ़ की रिपोर्ट]]></category>
		<category><![CDATA[बाढ़ की समस्या]]></category>
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							<![CDATA[<p>सितंबर की 16 तारीख, सुबह साढ़े आठ बजे का वक्त है। बिहार की राजधानी पटना के दीघा गंगा घाट के पास बने बाढ़ राहत केंद्र के टेंट खोले और सामान समेटा जा रहा है। इस शिविर में रहने वाले नकटा दियारा के बाढ़ पीड़ित अपना झोला-झपटा उठाए सपरिवार अपने घरों को लौट रहे हैं। ये [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/24/bihar-flood-relief-camps-community-kitchens-cash-transfer/" data-wpel-link="internal">50 लाख बाढ़ प्रभावित, सिर्फ 13 राहत शिविर: कैसे बदली बिहार की राहत व्यवस्था?</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[सितंबर की 16 तारीख, सुबह साढ़े आठ बजे का वक्त है। बिहार की राजधानी पटना के दीघा गंगा घाट के पास बने बाढ़ राहत केंद्र के टेंट खोले और सामान समेटा जा रहा है। इस शिविर में रहने वाले नकटा दियारा के बाढ़ पीड़ित अपना झोला-झपटा उठाए सपरिवार अपने घरों को लौट रहे हैं। ये परिवार पिछले 10-12 दिनों से इस शिविर में थे, मगर आज शिविर के बंद होने की घोषणा कर दी गई। ये सब ऐसे समय में हो रहा है जब बाढ़ का पानी इन लोगों के इलाकों में पूरी तरह से उतरा भी नहीं है। “अभी कम से कम चार-पांच दिन रिलीफ कैंप को रहने देना चाहिए था। पांच रोज बाद तो हमलोग खुद चले जाते। अभी तक घर के पास जगह-जगह पानी अटका हुआ है। कई जगह पांच फीट से अधिक पानी है। बच्चा लोगों के डूबने का खतरा बना रहेगा। सबसे बड़ा दिक्कत है कि जानवर कहां रखेंगे, हम लोग तो चौकी पर चौकी डाल कर कैसे भी रह लेंगे,” राहत शिविर में एक कुर्सी पर बैठे रामा राय ने कहा। इस शिविर से लगभग तीन किमी दूर जेपी गंगा पथ (जिसे पटना वाले मरीन ड्राइव कहते हैं) के किनारे-किनारे अभी भी पॉलिथीन का छप्पर लगाये 100 से अधिक बाढ़ पीड़ित परिवार दिख जाते हैं। वे पड़ोस के मोहल्ले बिंद टोली से आए हैं। कुछ दिन पहले सरकार ने इनके खाने की व्यवस्था के लिए वहीं पर एक कम्युनिटी किचन यानी सामूहिक रसोई शुरू की थी, जो अब बंद हो चुकी है। वहां मौजूद&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/24/bihar-flood-relief-camps-community-kitchens-cash-transfer/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>झींगा उद्योग की बढ़ती मांग बदल रही पॉलीकीट कृमियों की दुनिया</title>
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					<pubDate>23 सितम्बर 2026 11:06:43 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Nikhil Sreekandan]]>
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						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
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							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[पॉलीकीट कृमि पृथ्वी पर पाए जाने वाले समुद्री अकशेरुकी (बिना मेरुदंड वाले) जीवों के सबसे विविध समूहों में से एक हैं। वर्ल्ड रजिस्टर ऑफ मरीन स्पीशीज के अनुसार वर्तमान में पॉलीकीट की लगभग 13,148 मान्य प्रजातियां पहचानी गई हैं। कुछ शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस सदी के आखिर तक यह तादाद बढ़कर 16,700 तक पहुंच सकती है। विशाखापत्तनम में राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र (NCCR) की वैज्ञानिक E और समुद्र-तल पारिस्थितिकी की विशेषज्ञ सनिथा शिवदास ने कहा “ये (पॉलीकीट कृमि) लगभग सभी समुद्री आवासों में पाए जाते हैं जिनमें मुहने, मैंग्रोव, रेतीले तट, प्रवाल भित्तियां और समुद्री घास के मैदान से लेकर महाद्वीपीय शेल्फ और गहरे जल तक शामिल हैं।” शिवदास आगे बताती हैं, “पॉलीकीट की कुछ प्रजातियां कम लवणता वाले और अंतर्देशीय जल के वातावरण के अनुकूल भी हो गई हैं।” ग्रीक में पॉलीकीटा का मतलब “बहुत अधिक बाल वाला” होता है। यह उनके शरीर पर मांसल, पैर जैसी उभरी हुई संरचनाओं पर मौजूद बालनुमा चीजों के बारे में बताता है, जिससे उन्हें उनका दूसरा नाम ब्रिसल वर्म भी मिला है। इन कृमियों की लंबाई कुछ मिलीमीटर से लेकर एक मीटर से ज्यादा तक होती है और इनके रंग फीके भूरे से लेकर चमकीले पीले और नारंगी-लाल तक होते हैं। भारत में अपनी विशाल विविधता के बावजूद पॉलीकीट कृमियों पर अभी भी बहुत कम अध्ययन हुए हैं। मोंगाबे-इंडिया ने हमारे समुद्रों में पाए जाने वाले चमकीले रंगों और बालनुमा संरचनाओं वाले इन कृमियों के बारे में ज्यादा जानने के लिए पॉलीकीट विशेषज्ञों और टैक्सोनॉमिस्ट से बात की। भारत की&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/23/polychaete-worms-shrimp-hatcheries-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>हाथी कॉरिडोर, जंगल और कोयला: हसदेव के तारा कोल ब्लॉक की नीलामी पर क्यों छिड़ी बहस?</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/09/22/tara-coal-block-auction-hasdeo-arand-chhattisgarh/</link>
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					<pubDate>22 सितम्बर 2026 11:50:13 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Alok Prakash Putul]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<category><![CDATA[ऊर्जा]]></category>
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							<![CDATA[<p>छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित हसदेव अरण्य के जंगल में एक और नई कोयला खदान तारा की नीलामी को लेकर हसदेव से लेकर राजधानी रायपुर तक हंगामा मचा हुआ है। तारा कोयला खदान की व्यावसायिक नीलामी हो चुकी है। खदान अभी शुरू नहीं हुई है, लेकिन इसकी नीलामी ने हसदेव में खनन को लेकर सरकार के बदलते [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/22/tara-coal-block-auction-hasdeo-arand-chhattisgarh/" data-wpel-link="internal">हाथी कॉरिडोर, जंगल और कोयला: हसदेव के तारा कोल ब्लॉक की नीलामी पर क्यों छिड़ी बहस?</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित हसदेव अरण्य के जंगल में एक और नई कोयला खदान तारा की नीलामी को लेकर हसदेव से लेकर राजधानी रायपुर तक हंगामा मचा हुआ है। तारा कोयला खदान की व्यावसायिक नीलामी हो चुकी है। खदान अभी शुरू नहीं हुई है, लेकिन इसकी नीलामी ने हसदेव में खनन को लेकर सरकार के बदलते रुख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। असल में तीन साल पहले ही राज्य सरकार ने केंद्रीय कोयला मंत्रालय से तारा इलाके की जैव विविधता का हवाला देते हुए, इसे नीलामी की प्रक्रिया से बाहर रखने का अनुरोध किया था। इसके बाद केंद्र ने तारा समेत उन सभी कोयला खदानों को नीलामी से बाहर कर दिया था, जो छत्तीसगढ़ के लेमरु हाथी कॉरिडोर के दायरे में आ रही थीं। लेकिन इस साल तारा कोयला खदान की नीलामी कर दी गई। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि हसदेव अरण्य में ऐसा क्या बदला है कि तारा की बोली लगा दी गई? केंद्र सरकार के मुताबिक तारा कोयला खदान की 2026 में हुई वाणिज्यिक नीलामी में नौ बोलियां मिलीं और इसे 37.5 प्रतिशत राजस्व हिस्सेदारी पर अडानी समूह की सीजी सिनगैस एंड केमिकल्स लिमिटेड को दे दिया गया। लेकिन तारा की कहानी 2026 की नीलामी से शुरू नहीं होती। इसके पीछे 15 साल से अधिक पुराना विवाद है, जो वन संरक्षण, कोयले की जरूरत, हाथियों के आवागमन, आदिवासी अधिकार, खेती के लिए पानी और सरकारी नीतियों के बदलते रुख से जुड़ा हुआ है। तारा क्षेत्र की ओर जाने वाली सड़क। तारा कोल ब्लॉक की नीलामी ने&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/22/tara-coal-block-auction-hasdeo-arand-chhattisgarh/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>हॉर्नबिल के जीनोम ने खोले अतीत के राज, हिम युग में घटी थी आबादी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/09/21/asian-hornbill-genome-population-conservation/</link>
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					<pubDate>21 सितम्बर 2026 05:52:00 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Nikhil Sreekandan]]>
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							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[<p>वैज्ञानिकों ने चार संकटग्रस्त एशियाई हॉर्नबिल प्रजातियों के लिए संदर्भ जीनोम यानी आनुवंशिक संरचना का मॉडल तैयार किया है। मैसूर स्थित नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन और हैदराबाद के सीएसआईआर-सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) के शोधकर्ताओं ने ग्रेट हॉर्नबिल (बड़ा धनेश), रुफस-नेक्ड हॉर्नबिल (लाल-गर्दन धनेश), मालाबार-पाइड हॉर्नबिल (मालाबार धनेश) और रीथेड हॉर्नबिल (मुकुटधारी धनेश) के अच्छी गुणवत्ता वाले जीनोम असेंबली तैयार किए हैं। शोधपत्र की लेखिका पूजा पवार कहती हैं, “मेरी [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[वैज्ञानिकों ने चार संकटग्रस्त एशियाई हॉर्नबिल प्रजातियों के लिए संदर्भ जीनोम यानी आनुवंशिक संरचना का मॉडल तैयार किया है। मैसूर स्थित नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन और हैदराबाद के सीएसआईआर-सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) के शोधकर्ताओं ने ग्रेट हॉर्नबिल (बड़ा धनेश), रुफस-नेक्ड हॉर्नबिल (लाल-गर्दन धनेश), मालाबार-पाइड हॉर्नबिल (मालाबार धनेश) और रीथेड हॉर्नबिल (मुकुटधारी धनेश) के अच्छी गुणवत्ता वाले जीनोम असेंबली तैयार किए हैं। शोधपत्र की लेखिका पूजा पवार कहती हैं, “मेरी शोध दिलचस्पी यह समझने में है कि वन्यजीव अपने बदलते पर्यावरण में किस तरह खुद को बचाए रखते हैं।” पवार ने संरक्षित क्षेत्रों और कॉफी के बागानों में ग्रेट हॉर्नबिल (ब्यूसेरॉस बिकॉर्निस\Buceros bicornis) का अध्ययन किया है। अपनी मास्टर डिग्री के शोध प्रबंध के लिए पवार ने अनामलाई पहाड़ियों के संरक्षित क्षेत्रों और तमिलनाडु के वलपराई में इंसानी दबाव से परिवर्तित इलाकों में इन बड़े, शानदार पक्षियों के व्यवहार और प्रजनन जीव-विज्ञान की तुलना की। इसके बाद नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन और मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन में अपनी पीएचडी के दौरान पवार ने अपने शोध का दायरा बढ़ाते हुए जलवायु, भौगोलिक और मानवजनित कारकों से अलग-अलग क्षेत्रों और भू-वैज्ञानिक युगों में हॉर्नबिल की आबादी पर हुए असर का पता लगाने की कोशिश की। इन सवालों के जवाब खोजने में मदद के लिए, व्यवहार जीव-विज्ञानी ने जीनोमिक्स का रुख किया जो किसी जीव की संपूर्ण आनुवंशिक संरचना का अध्ययन है। पवार कहती हैं, “जीनोमिक्स ने मुझे इन सवालों को बहुत बड़े कालखंडों और भौगोलिक क्षेत्रों के पैमाने पर समझने का अवसर दिया। मैं समय में पीछे जाकर यह पता लगा सकती थी कि प्रजाति की उत्पत्ति कब हुई या वह अपनी नजदीकी प्रजाति से कब अलग हुई। इस तरह, उन्हें अपने शोध को सिर्फ पश्चिमी घाट या पूर्वोत्तर भारत तक सीमित रखने की जरूरत नहीं थी।” हालांकि, ऐसा करने से पहले पवार को सबसे पहले एशियाई हॉर्नबिल प्रजातियों के लिए आधारभूत जीनोमिक डेटा तैयार करना था। लेकिन, संरक्षण के लिहाज से अहम प्रजाति होने के बावजूद इसकी काफी कमी थी। 32 एशियाई हॉर्नबिल प्रजातियों में से सिर्फ दो, ग्रेट हॉर्नबिल और राइनोसिरस हॉर्नबिल, के लिए ही&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/21/asian-hornbill-genome-population-conservation/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>पेड़ों की कटाई शुरू, केन-बेतवा परियोजना से पन्ना के जंगल पर क्या असर होगा?</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/09/18/ken-betwa-project-panna-forest-river-impact/</link>
					<comments>https://hindi.mongabay.com/2026/09/18/ken-betwa-project-panna-forest-river-impact/?noamp=mobile#respond</comments>
					<pubDate>18 सितम्बर 2026 08:41:55 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Satish Bhartiya]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[नदियां, नदी, नेशनल पार्क, पक्षी, पर्यावरण कानून, पर्यावरण की राजनीति, पानी, प्राकृतिक संसाधन, बाघ, बाढ़, बाँध, भूमि अधिकार, भूमि विवाद, राष्ट्रीय उद्यान, लोग, वन, वन अधिकार, वन कटाई, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम]]>
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							<![CDATA[<p>मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में पन्ना टाइगर रिजर्व के पास केन नदी के किनारे बसा दौधन गाँव जंगल और नदी से घिरा इलाका है। अब इसी गाँव के पास केन-बेतवा लिंक परियोजना का दौधन बाँध बन रहा है। गाँव की 50 वर्षीय पूना गोंड के लिए जंगल केवल आसपास फैली हरियाली नहीं है। परिवार [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/18/ken-betwa-project-panna-forest-river-impact/" data-wpel-link="internal">पेड़ों की कटाई शुरू, केन-बेतवा परियोजना से पन्ना के जंगल पर क्या असर होगा?</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में पन्ना टाइगर रिजर्व के पास केन नदी के किनारे बसा दौधन गाँव जंगल और नदी से घिरा इलाका है। अब इसी गाँव के पास केन-बेतवा लिंक परियोजना का दौधन बाँध बन रहा है। गाँव की 50 वर्षीय पूना गोंड के लिए जंगल केवल आसपास फैली हरियाली नहीं है। परिवार के खाने, जलाऊ लकड़ी और घर बनाने की सामग्री से लेकर कई रोजमर्रा की जरूरतें इसी जंगल से पूरी होती रही हैं। “जंगल हमारा ईश्वर है। भूख मिटाने से घर बनाने तक के साधन हमें जंगल ने दिए हैं। हमारा जीवन इसी से जुड़ा है,” पूना कहती हैं। दौधन गाँव के ग्रामीण पास के जिस इलाके में जंगल होने की बात करते हैं, वहां अब बाँध के निर्माण के चलते साफ़ की गई जमीन, और खुदे हुए हिस्से दिखाई देते हैं और भारी मशीनों की आवाज सुनाई देती है। दौधन और आसपास के गाँवों के कई परिवारों की चिंता है कि परियोजना आगे बढ़ने के साथ जंगल तक उनकी पहुंच और उससे मिलने वाले संसाधन कम होते जाएंगे। केन-बेतवा लिंक परियोजना प्राधिकरण के मुताबिक, जुलाई 2026 के अंत तक दौधन बाँध स्थल पर कई निर्माण गतिविधियां चल रही थीं। पहले चरण के कॉफरडैम (अस्थाई संरचना) के तटबंध का करीब 98 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था, जबकि मुख्य बाँध के कुछ हिस्सों में कंक्रीट डालने का काम मई 2026 में शुरू हुआ था। बाँध की नींव की खुदाई, स्पिलवे और अप्रोच चैनल पर भी काम जारी है। केन-बेतवा देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना है।&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/18/ken-betwa-project-panna-forest-river-impact/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>कान्हा के बाद सतपुड़ा बना बारहसिंगा का घर, बढ़ रही आबादी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/09/17/barasingha-second-population-satpura-tiger-reserve/</link>
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					<pubDate>17 सितम्बर 2026 04:07:02 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Sneha Mahale]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[नेशनल पार्क, पहल, प्राकृतिक संसाधन, बाघ, राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव, और वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
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							<![CDATA[<p>एक नए अध्ययन के मुताबिक, मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिज़र्व से सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व में लाए गए हार्ड-ग्राउंड स्वैम्प डियर यानी बारहसिंगा की आबादी लगातार बढ़ रही है और इनका प्रजनन भी सफलतापूर्वक हो रहा है। यह उपप्रजाति, जो कभी पूरे मध्य भारत में फैली हुई थी, अब सिर्फ़ एक इलाके में बची है [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/17/barasingha-second-population-satpura-tiger-reserve/" data-wpel-link="internal">कान्हा के बाद सतपुड़ा बना बारहसिंगा का घर, बढ़ रही आबादी</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[एक नए अध्ययन के मुताबिक, मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिज़र्व से सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व में लाए गए हार्ड-ग्राउंड स्वैम्प डियर यानी बारहसिंगा की आबादी लगातार बढ़ रही है और इनका प्रजनन भी सफलतापूर्वक हो रहा है। यह उपप्रजाति, जो कभी पूरे मध्य भारत में फैली हुई थी, अब सिर्फ़ एक इलाके में बची है और एक दूसरी आबादी बनाने की कोशिशें खत्म होने के खतरे को कम करने के लिए बेहद ज़रूरी हैं। हार्ड-ग्राउंड स्वैम्प डियर (रूसर्वस डुवाउसेली ब्रैंडेरी) कभी पूरे भारत में बड़े पैमाने पर पाया जाता था, लेकिन आज यह प्राकृतिक रूप से सिर्फ़ कान्हा में ही बचा है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट के मुताबिक, बारहसिंगा को ‘वल्नरेबल’ कैटेगरी में रखा गया है और यह भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की पहली अनुसूची में सूचीबद्ध किया गया है। यह उपप्रजाति की आबादी ऐतिहासिक रूप से अपने आवास में बदलाव, घास के मैदानों के टूटने और शिकार की वजह से कम हुई है। लगभग 1,100 जानवरों की एक ही आबादी के साथ, अब यह प्रजाति बीमारी फैलने या दूसरे खतरों के प्रति संवेदनशील बनी हुई है। &#8220;इस पूरी उपप्रजाति को कान्हा तक ही सीमित रखने से असल में एक ऐसा जोखिम पैदा हो गया कि अगर वहां कुछ हुआ तो पूरी आबादी खत्म हो सकती थी। छोटी और अलग-थलग आबादी को कई तरह के अंदरूनी जोखिमों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि आबादी में उतार-चढ़ाव (औसत विकास दर में बदलाव), जेनेटिक ड्रिफ्ट और इनब्रीडिंग; साथ ही बाहरी खतरे भी होते हैं,&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/17/barasingha-second-population-satpura-tiger-reserve/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>क्या नेपाल की बाढ़ से हो सकेगी क्लाइमेट फंड की परख?</title>
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					<pubDate>16 सितम्बर 2026 14:10:22 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Kundan Pandey]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
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							<![CDATA[नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ के बाद, 12 सितंबर तक 1,386 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 5,130 से ज़्यादा लोग लापता हैं। भोटे कोशी नदी के किनारे मलबे के बीच दो अनसुलझे सवाल हैं: क्या इस आपदा का संबंध जलवायु परिवर्तन से है? और, क्या ऐसे संकटों में कमज़ोर देशों की मदद के लिए बनाया गया नया वैश्विक कोष या ग्लोबल फंड असल में काम आ सकता है? इस बाढ़ के तुरंत बाद, नेपाल सरकार ने &#8216;लॉस एंड डैमेज&#8217; (नुकसान और क्षति) से निपटने के लिए बने इस ‘फंड फॉर रेस्पोंडिंग तो लॉस एंड डैमेज’ (FRLD) के बोर्ड को एक पत्र लिखा। यह फंड संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) का एक वित्तीय तंत्र है, जिसे 2022 में कमज़ोर देशों को जलवायु आपदाओं से निपटने में मदद करने के लिए बनाया गया था। नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले और कृषि, वन एवं पर्यावरण मंत्री गीता चौधरी के हस्ताक्षर वाले इस पत्र में, नेपाल ने बोर्ड से जल्दी, सीधे और प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने के लिए विशेष निर्णय लेने का अनुरोध किया। 31 अगस्त वाले इस पत्र में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि बोर्ड की त्वरित कार्रवाई से &#8220;यह साबित होगा कि यह फंड अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को कमज़ोर देशों और समुदायों के लिए समय पर मिलने वाली मदद में बदल सकता है, जब उन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो।&#8221; दुनिया भर में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का हिस्सा लगभग 0.027% है। यह पहाड़ी देश संयुक्त राष्ट्र की&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/16/nepals-flood-claim-tests-whether-a-nascent-climate-fund-can-deliver/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>धारीदार लकड़बग्घे को अंतरराष्ट्रीय संरक्षण, भारत में संरक्षित क्षेत्रों के बाहर बढ़ते खतरे</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/09/15/striped-hyena-global-protection-india-conservation/</link>
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					<pubDate>15 सितम्बर 2026 09:26:49 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ]]></category>
		<category><![CDATA[कंजर्वेशन]]></category>
		<category><![CDATA[जंगल]]></category>
		<category><![CDATA[लकड़बग्घा]]></category>
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							<![CDATA[&#8216;कन्वेंशन ऑन द कंज़र्वेशन ऑफ़ माइग्रेटरी स्पीशीज़ ऑफ़ वाइल्ड एनिमल्स&#8217; (सीएमएस) की एक संधि के तहत धारीदार लकड़बग्घे (स्ट्राइप्ड हायना) के संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा मज़बूती देने का फैसला किया गया है। इसके संरक्षण के लिए उन देशों के बीच बेहतर सहयोग की ज़रूरत है जहाँ ये जानवर पाए जाते हैं। यह फ़ैसला इस साल मार्च में ब्राज़ील के कैम्पो ग्रांडे में हुई सीएमएस कन्वेंशन की 15वीं बैठक (सीएमएस कॉप15) में लिया गया। सीएमएस, संयुक्त राष्ट्र की एक पर्यावरण संधि है जो प्रवासी वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण और टिकाऊ इस्तेमाल को एक वैश्विक मंच देता है। सीएमएस उन देशों को एक साथ लाता है जिनसे होकर वन्यजीव गुज़रते हैं (जिन्हें &#8216;रेंज स्टेट्स&#8217; कहा जाता है) और प्रवासी रेंज में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित संरक्षण उपायों के लिए कानूनी आधार तैयार करता है। भारत में धारीदार लकड़बग्घे की आबादी पर उसके ज़्यादातर इलाकों में अभी भी ठीक से नज़र नहीं रखी जाती है। ऐसे में भारत के लिए इस फ़ैसले का महत्व यह है कि इससे धारीदार लकड़बग्घे की देश में निगरानी बेहतर करने, सुरक्षित इलाकों के बाहर उनके रहने की जगहों और आने-जाने के रास्तों (मूवमेंट कॉरिडोर) की सुरक्षा करने और ऐसी प्रजाति पर संरक्षण के लिए ज़्यादा ध्यान देने का नया अंतरराष्ट्रीय दबाव बनेगा। दुनिया भर के संरक्षण समूहों ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे इस प्रजाति के लिए मज़बूत सुरक्षा और सहयोग को बढ़ावा मिल सकता है, जिस पर लंबे समय से नीतिगत स्तर पर बहुत कम ध्यान&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/15/striped-hyena-global-protection-india-conservation/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>इथेनॉल के लिए बढ़ रहा अनाज का इस्तेमाल, पानी और भोजन पर क्या होगा असर?</title>
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					<pubDate>14 सितम्बर 2026 10:37:01 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
						</dc:creator>
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							<category><![CDATA[ऊर्जा]]></category>
		<category><![CDATA[इथेनॉल]]></category>
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							<![CDATA[ऊर्जा, कृषि, क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन, क्लाईमेट चेंज, क्लाईमेट चेंज एडैप्टेशन, ग्रीनहाउस उत्सर्जन, जल प्रदूषण, जल संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण कानून, पर्यावरण की राजनीति, प्रदूषण, भूजल, और वायु प्रदूषण]]>
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							<![CDATA[<p>यह रिपोर्ट भारत और ब्राज़ील के इथेनॉल ट्रांज़िशन (बदलाव) की तुलना करने वाली सीरीज़ का तीसरा और अंतिम भाग है। इस भाग में देखा गया है कि भारत का इथेनॉल मॉडल किस तरह तेज़ी से गन्ने और शीरे (मोलासेस) पर आधारित उत्पादन से आगे बढ़कर अनाज की ओर बढ़ रहा है, जिससे पशुओं के चारे [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/14/ethanol-grain-groundwater-food-security-india/" data-wpel-link="internal">इथेनॉल के लिए बढ़ रहा अनाज का इस्तेमाल, पानी और भोजन पर क्या होगा असर?</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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						</description>
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							<![CDATA[यह रिपोर्ट भारत और ब्राज़ील के इथेनॉल ट्रांज़िशन (बदलाव) की तुलना करने वाली सीरीज़ का तीसरा और अंतिम भाग है। इस भाग में देखा गया है कि भारत का इथेनॉल मॉडल किस तरह तेज़ी से गन्ने और शीरे (मोलासेस) पर आधारित उत्पादन से आगे बढ़कर अनाज की ओर बढ़ रहा है, जिससे पशुओं के चारे और फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री पर पड़ने वाले दबाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं। दूसरे भाग में इथेनॉल की खरीद, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट और क्वालिटी कंट्रोल से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की गई थी। पिछले साल दिसंबर में, राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले के राठीखेड़ा गाँव में एक निर्माणाधीन इथेनॉल प्लांट के पास किसानों की भीड़ जमा हो गई। यह प्लांट इथेनॉल बनाने के लिए अनाज का इस्तेमाल करने वाला था। लोगों को डर था कि इस प्लांट से स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव पड़ेगा, भूजल प्रदूषित होगा और खेती की ज़मीन को नुकसान पहुँचेगा। वहीं दूसरी तरफ कंपनी का दावा था कि इस प्लांट में ज़ीरो-लिक्विड-डिस्चार्ज टेक्नोलॉजी और प्रदूषण-नियंत्रण सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। इस विरोध प्रदर्शन के उग्र होने के बाद इस प्लांट के निर्माण कार्य को रोक दिया गया। हनुमानगढ़ का आंदोलन देश भर में बनाए जा रहे नए इथेनॉल और डिस्टिलरी प्रोजेक्ट के खिलाफ़ हो रहे कई विरोध प्रदर्शनों में से एक था। मध्य प्रदेश, पंजाब और तेलंगाना में भी ऐसे ही विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जहाँ लोगों ने पानी के इस्तेमाल, प्रदूषण और खेती की ज़मीन पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई है। ये विवाद तब सामने आ रहे हैं&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/14/ethanol-grain-groundwater-food-security-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>न बीज, न बाज़ार: मध्य प्रदेश में जैविक कपास से क्यों दूर हो रहे किसान</title>
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					<pubDate>11 सितम्बर 2026 06:29:38 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Mithilesh Dhar Dubey]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[agriculture]]></category>
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<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/11/organic-cotton-farmers-madhya-pradesh-seeds-market-certification/" data-wpel-link="internal">न बीज, न बाज़ार: मध्य प्रदेश में जैविक कपास से क्यों दूर हो रहे किसान</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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						</description>
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							<![CDATA[वैश्विक बाज़ार में भले ही जैविक कपास की माँग बढ़ रही है, लेकिन इसे उगाने से लेकर बेचने तक की राह में इतने काँटे हैं कि इस फ़सल के लिए मशहूर मध्य प्रदेश में किसान इस से मुँह मोड़ रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार के अनुसार विश्व का 24% और देश का 40% जैविक कपास इस राज्य में उगता है। कपास की खेती और उस से संबंधित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ₹1,660 करोड़ की लागत से राज्य में एक टेक्सटाइल पार्क का निर्माण कर रही है। सरकार का कहना है कि धार ज&#x200d;िले में 2,177 एकड़ में बन रहे इस पी.एम. म&#x200d;ित्रा पार्क में कपास से धागा व धागे से कपड़ा तो बनाया ही जाएगा, साथ ही साथ उस कपड़े की बिक्री और निर्यात का भी संचालन होगा। दूसरी तरफ़ राज्य में जैविक कपास का उत्पादन पिछले कुछ वर्षों से लगातार गिर रहा है। वर्ष 2022-23 में उत्पादन 8.78 लाख मेट्रिक टन था; 2023-24 में यह घट कर 6.3 लाख मेट्रिक टन हुआ; और 2024-25 में 5.6 लाख मेट्रिक टन। किसानों, व्यापारियों, और विशेषज्ञों ने मोंगाबे हिंदी को इस गिरते उत्पादन के कई कारण बताए। जैविक कपास की प्रति एकड़ उपज कम हो रही है और दाम भी ऊँचे नहीं, बल्कि सामान्य कपास जितने ही मिल रहे हैं। ना फसल के जैविक होने का प्रमाण पत्र सरलता से मिलता है और ना ही बीज। रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है और फलस्वरूप कीटनाशक पर खर्च भी बढ़ रहा है। इन व्यावहारिक और आर्थिक समस्याओं से हताश&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/09/11/organic-cotton-farmers-madhya-pradesh-seeds-market-certification/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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