- पश्चिम बंगाल की रूपनारायण नदी में गंगा नदी डॉल्फिन की निगरानी के लिए शोधकर्ताओं ने लगभग एक महीने तक पानी के भीतर उनकी आवाजें रिकॉर्ड कीं।
- डॉल्फिन की आवाजें सुबह और शाम सबसे ज्यादा दर्ज हुईं। आवाज दर्ज होने की दर का सबसे मजबूत संबंध ज्वार के दौरान जलस्तर से मिला।
- अध्ययन में सिर्फ एक चंद्र चक्र शामिल था और डॉल्फिन के शिकार की उपलब्धता नहीं मापी गई। फिर भी, इसके नतीजे भविष्य में डॉल्फिन के सर्वेक्षण को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की रूपनारायण नदी के ज्वार वाले जलक्षेत्र में गंगा नदी डॉल्फिन लगातार बदलते जलस्तर, लहरों और परिस्थितियों के बीच रहती हैं।
नदी में किए गए एक नए अध्ययन में पाया गया कि ज्वार, दिन का समय और चंद्र चक्र इस बात को प्रभावित करते हैं कि डॉल्फिन कब दिखेगी। एक्वाटिक मैमल्स में प्रकाशित एक महीने तक चले इस अध्ययन में इन कारकों का एक साथ गंगा नदी डॉल्फिन की ध्वनि-आधारित पहचान (आवाजों के जरिए निगरानी) के संदर्भ में स्टडी की गई।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की प्रधान परियोजना सहयोगी और स्टडी की प्रथम लेखिका गार्गी रॉय चौधरी कहती हैं कि अध्ययन वाली जगह पर दिन में दो बार ज्वार आता और उतरता है। कभी-कभी ज्वार के दौरान लहरें भी उठती हैं, जिससे जलस्तर और लहरों में बड़े बदलाव होते हैं।
वह कहती हैं, “मानव गतिविधियों से इस क्षेत्र में कई बदलाव हुए हैं, जहां बड़े पैमाने पर मोटर से चलने वाली नावों से मछली पकड़ी जाती है। इसके निचले हिस्से में औद्योगिक गतिविधियां होती हैं और अध्ययन वाली जगह से नीचे की ओर कोलाघाट ताप विद्युत संयंत्र स्थित है। इसके बावजूद, यहां डॉल्फिन की अच्छी-खासी आबादी है।” हालांकि, यहां बड़े जहाजों की आवाजाही सीमित है।
ज्वार से आकार लेती नदी
रूपनारायण नदी हुगली की 85 किलोमीटर लंबी सहायक नदी है। इस पर लगभग 220 किलोमीटर दूर स्थित बंगाल की खाड़ी से आने वाले ज्वार का प्रभाव पड़ता है। इसके ऊपरी हिस्सों में नदी की धारा संकरी है, जबकि निचले हिस्सों में यह चौड़ी हो जाती है। नदी में समय-समय पर ज्वार के चलते लहरें भी उठती हैं और इसका प्रवाह मौसमी तथा ज्वारीय, दोनों तरह की शक्तियों से प्रभावित होता है।
अध्ययन वाली जगह पर टीम ने F-POD यानी फुल वेवफॉर्म कैप्चर पॉड का इस्तेमाल किया। यह पानी के भीतर आवाज रिकॉर्ड करने वाला उपकरण है, जो डॉल्फिन की इकोलोकेशन क्लिक (प्रतिध्वनि के जरिए दिशा और वस्तुओं का पता लगाने के लिए निकाली जाने वाली ध्वनियां) को सुनता है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की वैज्ञानिक-ई और अध्ययन से जुड़ी हुई लेखिका विष्णुप्रिया कोलिपाकम कहती हैं, “तकनीकी चुनौती यह थी कि F-POD को तेज ज्वारीय धाराओं के बीच, ऐसी जगह पर मजबूती से बांधकर रखना था जहां धारा की दिशा बदलती रहती है, ताकि वह बहकर दूर न चला जाए।”

यह उपकरण 4 से 31 जनवरी, 2024 तक लगातार रिकॉर्डिंग करता रहा। इस दौरान कुल 651 घंटे की रिकॉर्डिंग हुई। इसके बाद सॉफ्टवेयर की मदद से इन रिकॉर्डिंग का विश्लेषण किया गया। यह सॉफ्टवेयर डॉल्फिन की क्लिक ध्वनियों के क्रम की पहचान करता है और पृष्ठभूमि के शोर को हटाता है। डॉल्फिन क्लिक ट्रेन अलग-अलग क्लिक ध्वनियों का तेज और लगातार चलने वाला क्रम है, जिसका इस्तेमाल डॉल्फिन मुख्य रूप से इकोलोकेशन यानी प्रतिध्वनि के जरिए अपने आसपास की वस्तुओं का पता लगाने के लिए करती हैं।
इसके बाद टीम ने डिटेक्शन पॉजिटिव मिनट्स (DPM) की गणना की। इससे आशय हर घंटे में उन एक-एक मिनट की अवधियों की संख्या से है, जिनमें डॉल्फिन की कम से कम एक क्लिक ट्रेन दर्ज की गई। टीम ने यह भी अध्ययन किया कि डॉल्फिन की मौजूदगी दर्ज किए जाने में दिन के समय, ज्वार की ऊंचाई और चंद्र चक्र के अनुसार कोई बदलाव होता है या नहीं।
सुबह, शाम ज्यादा डॉल्फिन
रिकॉर्डिंग में डॉल्फिन की मौजूदगी दर्ज किए जाने के दो स्पष्ट चरम समय सामने आए: सुबह 4 से 6 बजे के बीच और शाम 6 से 8 बजे के बीच। दिन के मध्य में, खासकर सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच, उनकी मौजूदगी सबसे कम देखी गई।
पहले किए गए ध्वनि संबंधी अध्ययन में पाया गया था कि गंगा नदी डॉल्फिन दिन के अलग-अलग समय में अपनी गतिविधियों के अलग-अलग पैटर्न दिखाती हैं। इनमें रात और शाम होने से पहले उनकी आवाजाही बढ़ना शामिल है, जबकि दिन के समय वे अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्रों में ही रहती हैं। कोलिपाकम कहती हैं, “दिन-रात के 24 घंटे के व्यवहार संबंधी पैटर्न पिछले प्रकाशित शोध से मेल नहीं खाते।” उन्होंने बताया कि अध्ययन में सुबह और शाम के समय डॉल्फिन की मौजूदगी दर्ज किए जाने के दो स्पष्ट चरम समय सामने आए।
लेकिन सिर्फ आवाज की रिकॉर्डिंग के आधार पर यह पता नहीं लगाया जा सकता कि डॉल्फिन क्या कर रही हैं। भारतीय विज्ञान संस्थान के सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज में स्कॉलर और स्वतंत्र विशेषज्ञ इमरान समद बताते हैं, “समुद्री डॉल्फिन के विपरीत, गंगा नदी डॉल्फिन आवाजाही, सामाजिक मेलजोल और भोजन की तलाश जैसी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पूरी तरह इकोलोकेशन पर निर्भर रहती हैं। इसका मतलब है कि वे शायद पूरे दिन इकोलोकेशन करती रहती हैं। हालांकि, उनकी गतिविधियों के अनुसार इसकी तीव्रता अलग-अलग हो सकती है।”
वह कहते हैं कि क्लिक ध्वनियों का तेज क्रम डॉल्फिन की मौजूदगी का उपयोगी संकेत हो सकता है और इसका संबंध भोजन की तलाश से भी हो सकता है। लेकिन, इससे यह शर्तिया तौर पर पता नहीं लगाया जा सकता कि डॉल्फिन वास्तव में क्या कर रही हैं। इसलिए, DPM ध्वनि के आधार पर डॉल्फिन की मौजूदगी का संकेतक है, न कि इससे सीधे तौर पर उनके व्यवहार का पता चलता है।

ज्वार, ध्वनि के आधार पर मौजूदगी
सबसे स्पष्ट पैटर्न ज्वार की ऊंचाई से जुड़ा था। ध्वनि के आधार पर डॉल्फिन की मौजूदगी लगभग 1.5 से 2 मीटर की ज्वारीय ऊंचाई पर सबसे अधिक दर्ज की गई और जलस्तर बढ़ने के साथ इसमें गिरावट आई। लगभग चार मीटर से अधिक जलस्तर होने पर डॉल्फिन की मौजूदगी दर्ज किए जाने की अनुमानित संख्या काफी कम थी।
चौधरी कहती हैं, “कम से मध्यम जलस्तर डॉल्फिन के लिए इस क्षेत्र का उपयोग करने के लिहाज से ज्यादा अनुकूल हो सकता है, क्योंकि यहां शिकार अधिक मात्रा में होता है और भोजन की तलाश में ऊर्जा भी कम खर्च करनी पड़ती है।”
जलस्तर अधिक होने पर एक संभावना यह है कि डॉल्फिन डूबे हुए बड़े क्षेत्र में फैल जाती हैं और रिकॉर्डर की ध्वनि पहचानने की सीमा से बाहर चली जाती हैं। पानी की गहराई में बदलाव से ध्वनि के प्रसार पर भी असर पड़ सकता है। वह आगे कहती हैं, “इन दोनों ही स्थितियों में डॉल्फिन के व्यवहार में कोई बदलाव आए बिना DPM में गिरावट आ सकती है।”
समद भी आगाह करते हैं कि ज्वार और पर्यावरण से जुड़ी परिस्थितियां डॉल्फिन के दिखने की संभावना को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, उनका मानना है कि एक महीने की अवधि में इस तरह का बदलाव अपेक्षाकृत कम रहने की उम्मीद है।
चांद का चक्र
अध्ययन में चंद्र चक्र के दौरान भी एक पैटर्न दिखा। अमावस्या के करीब आने के साथ डॉल्फिन की मौजूदगी दर्ज किए जाने में कमी आई और चंद्रमा के बढ़ते चरण में प्रवेश करने के साथ इसमें बढ़ोतरी हुई। हालांकि, यह नतीजा अभी शुरुआती है। अध्ययन में सिर्फ एक चंद्र चक्र को शामिल किया गया था, इसलिए इससे यह स्थापित नहीं किया जा सकता कि यह पैटर्न लंबी अवधि में भी बना रहता है।
कोलिपाकम बताती हैं, “दूसरी सीमा यह है कि निष्क्रिय ध्वनिक निगरानी में उपकरण की ध्वनि पहचानने की सीमा के भीतर ही मौजूदगी दर्ज की जाती है। इसके अलावा, डॉल्फिन के मौजूद होने की संभावना दूरी, दिशा, ध्वनि और शोर के अनुपात तथा जलमार्ग की परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है।”
अध्ययन में शिकार की उपलब्धता का भी पता नहीं लगाया गया। समद कहते हैं, “ज्वार से जुड़े कारक, दिन-रात तथा चंद्र चक्र शायद शिकार के व्यवहार या गतिविधियों को दिखाते हैं, जिन पर डॉल्फिन नजर रखती होंगी।” यह इसकी एक संभावित व्याख्या है, लेकिन अध्ययन में इसकी जांच नहीं की गई।

समय की अहमियत
इस अध्ययन के नतीजों का गंगा नदी की डॉल्फिन की निगरानी पर असर पड़ सकता है। अगर डॉल्फिन की मौजूदगी दर्ज किए जाने में ज्वारीय परिस्थितियों और दिन के समय के अनुसार बदलाव होता है, तो अलग-अलग परिस्थितियों में किए गए सर्वेक्षणों के नतीजे भी अलग हो सकते हैं। चौधरी कहती हैं, “डॉल्फिन की आबादी का आकलन करने वाले सभी सर्वेक्षणों में ज्वार की स्थिति को एक समान रखा जाना चाहिए। समय से जुड़े बदलावों को नजरअंदाज करने का मतलब है कि उनसे पैदा होने वाले अंतर को क्षेत्रीय या आबादी में बदलाव के रूप में देखा जाएगा।”
और पढ़ेंः मानवीय हस्तक्षेप से सैंक्चुअरी में भी सिमट रहा गंगा डॉल्फ़िन का दायरा
जहाज की गतिविधियों का समय भी अहम है। वह आगे कहती हैं, “डॉल्फिन की ध्वनि के आधार पर मौजूदगी और जहाजों की आवाजाही के समय में काफी हद तक समानता थी। हालांकि, यह समानता जहाजों के आकार के अनुसार अलग-अलग थी। डॉल्फिन और सबसे बड़े तथा सबसे अधिक शोर करने वाले जहाज दिन के लगभग एक ही समय में सक्रिय रहते हैं। व्यावसायिक नौकाओं की आवाजाही ज्वार के उच्च स्तर के आसपास केंद्रित रहती है। इसलिए, ज्वार डॉल्फिन की मौजूदगी और जहाज के संपर्क में आने, दोनों को प्रभावित करता है। इसका मतलब है कि समय के लिहाज से ये दोनों स्वतंत्र रूप से वितरित नहीं हैं और जोखिम की संभावना कुछ पहचाने जा सकने वाली अवधियों में ज्यादा केंद्रित रहती है।”
अध्ययन यह नहीं दिखाता कि ज्वार या चंद्रमा डॉल्फिन के व्यवहार में बदलाव लाते हैं। इसमें पाया गया है कि इन पर्यावरणीय चक्रों के साथ ध्वनि के आधार पर डॉल्फिन की मौजूदगी में बदलाव होता है। कई चंद्र चक्रों के दौरान लंबे समय तक निगरानी करने, शिकार की उपलब्धता तथा नदी की परिस्थितियों से जुड़े आंकड़े जुटाने से इन पैटर्न को समझने में मदद मिल सकती है।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 12 अक्टूबर, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: रूपनारायण नदी में गंगा नदी डॉल्फिन। तस्वीर: अब्दुल वाकिद।