[वीडियो] क्या शुक्लापुर मॉडल उत्तराखंड के धधकते जंगल को बचा सकता है!

जंगल में पानी रोकने और भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए बनाए गए इन छोटे-छोटे चेकडैम का असर यहां की छोटी आसन नदी पर भी दिखा। छोटी आसन नदी में वर्ष 2010 में 90 लीटर प्रति मिनट बचा था। आज ये 1200 लीटर प्रति मिनट है। चरम गर्मियों में भी नदी का पानी नहीं रुकता था। तस्वीर- वर्षा सिंह।

कितना कारगर है शुक्लापुर जंगल का यह मॉडल!

 देहरादून के करीब बहने वाली अन्य नदियों जैसे रिस्पना, बिंदाल और सुसवा के मुकाबले आसन नदी स्वच्छ दिखती है। बड़ी आसन नदी के किनारे ही उत्तराखंड का एकमात्र रामसर साइट घोषित आर्द्रभूमि है।

कुमाऊं विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और फॉरेस्ट हाइड्रोलॉजी विशेषज्ञ प्रोफेसर जेएस रावत बताते हैं कि जंगल की ज़मीन की कई परतें होती हैं। 10-15 सेंटीमीटर सूखी पत्तियों का कचरा होता है। उसके नीचे भी तकरीबन 10 सेंटीमीटर का आशिंक तौर पर सड़ा-गला पत्तियों का कचरा होता है। उस परत के नीचे मिट्टी में मिल गई खाद की मोटी परत होती है। मिट्टी के उपर की ये सतहें स्पंज का सा काम करती हैं। बारिश के पानी को मिट्टी के अंदर तक ले जाती हैं। जंगल स्वस्थ होता है तो 90 फीसदी तक बारिश का पानी धरती में समाता है। लेकिन जंगल की आग से पेड़, झाड़ियां, घास के साथ-साथ सूखी पत्तियों का कचरा, गीला कचरा, खाद, मिट्टी तक सब कुछ जल जाता है। ऐसी जगह 90 फीसदी तक बारिश का पानी बह जाता है। धरती में नहीं समाता। जंगल से निकलने वाली नदियों के सूखने की भी यही वजह है। जंगल की आग सिर्फ पेड़-पौधों को नहीं जलाती बल्कि वन के पारिस्थितकीय तंत्र को नुकसान पहुंचाती है।

शुक्लापुर के जंगल में बना चेकडैम। वन विभाग ने भी जंगल में छोटे-छोटे चेकडैम बनाकर जंगल में पानी का इंतज़ाम किया। तस्वीर- वर्षा सिंह
शुक्लापुर के जंगल में बना चेकडैम। वन विभाग ने भी जंगल में छोटे-छोटे चेकडैम बनाकर जंगल में पानी का इंतज़ाम किया। तस्वीर- वर्षा सिंह
जंगल में पानी रोकने के लिए बनाए गए जलछिद्र और पौध रोपण से मिट्टी की नमी लौटी। तस्वीर- वर्षा सिंह
जंगल में पानी रोकने के लिए बनाए गए जलछिद्र और पौध रोपण से मिट्टी की नमी लौटी। तस्वीर- वर्षा सिंह
जंगल में पानी रोकने के लिए इस तरह के स्ट्रक्चर बनाए गए। तस्वीर- वर्षा सिंह
जंगल में पानी रोकने के लिए इस तरह के स्ट्रक्चर बनाए गए। तस्वीर- वर्षा सिंह

शुक्लापुर के वन में पानी रोकने के लिए किए गए प्रयोग को प्रोफेसर रावत कारगर मानते हैं। वह कहते हैं कि मिट्टी में नमी होगी तो आग तेज़ी से नहीं फैलेगी।

हालांकि सिर्फ ऐसा करने से जंगल की आग पूरी तरह नहीं रुक सकती। इसके लिए हमें आग लगने की वजहों पर भी काम करना होगा। जंगल की आग की सबसे बड़ी वजह खेतों में जलाया जाने वाला सूखा कचरा ही है। इसको रोकने की जरूरत है और इसके लिए समुदाय को जागरूक करने की जरूरत है, प्रोफेसर रावत कहते हैं।

समुदाय की भागीदारी से पिछले दस वर्षों में शुक्लापुर जंगल एक बेहतरीन वन मॉडल बन गया है। शुक्लापुर के कारगर मॉडल को राज्य में रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा समेत अन्य जगहों पर भी अपनाया गया। वन विभाग ने भी जंगल में छोटे-छोटे चेकडैम बनाकर जंगल में पानी का इंतज़ाम किया।

देहरादून के डीएफओ राजीव धीमान भी शुक्लापुर वन मॉडल को सबसे उत्तम मॉडल बताते हैं। उनके मुताबिक पिछले दस वर्षों में वहां जंगल और लोगों के बीच एक घनिष्ठ रिश्ता बना है। पिछले 11 वर्षों में जंगल की सूरत बदल गई है। इस बार जब तेज़ गर्मी में राज्य के अधिकांश हिस्सों में जंगल जल रहे हैं, शुक्लापुर के जंगल बेहतर स्थिति में हैं।

वर्ष 2016 में उत्तराखंड के जंगल में लगी भयावह आग के बाद वन विभाग ने शुक्लापुर मॉडल से सबक लेते हुए जंगल में छोटे-छोटे कंटूर ट्रेंचेस (पहाड़ पर पानी रोकने के लिए एक के बाद एक बनाए गए छोटे-छोटे तालाब) बनाना, खाल-चाल बनाने जैसे कार्य पर फोकस किया, राजीव बताते हैं।

“2016 में हमने जो कार्य उसके अच्छे नतीजे 2017 में देखने को मिले। चीड़ के जंगलों में हरियाली बढ़ गई और आग की घटनाएं काफी कम हुई,” वह कहते हैं।   

उत्तराखंड वन विभाग में अपर प्रमुख वन संरक्षक पर्यावरण एसएस रसायली भी मानते हैं कि जब जंगल में नमी होगी तो आग लगने की आशंका कम होगी। आग लगने पर उसके फैलने की दर कम होगी और आग पर काबू पाना आसान होगा। इसलिए जंगल में नमी को बनाए रखना बेहद जरूरी है।

बढ़ता तापमान, जलते जंगल, घटते पानी के बीच जल स्रोतों और नदियों का पानी लगातार घट रहा है। ऐसे में शुक्लापुर के हरे जंगल और उसके बीच बहती छोटी आसन नदी आग से बचाव और हरियाली से एक उम्मीद तो जागती ही है।

 

बैनर तस्वीरः छोटी आसन नामक स्थानीय जंगली नदी सूखने की कगार पर पहुंच गई थी। इन प्रयासों के बाद नदी का जलस्तर बढ़ा। तस्वीर- वर्षा सिंह

(यह स्टोरी सोल्यूशन जर्नलिज्म नेटवर्क ‘लीड’ फेलोशिप के सहयोग से की गयी है। इस फेलोशिप का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर सोल्यूशन जर्नलिज़म का विस्तार करना है।)

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