- तेलंगाना के कागजनगर वन प्रभाग और उसके आस-पास के इलाकों में लंबे समय तक किए गए निगरानी अध्ययन में पाया गया है कि भारतीय गिद्ध (लंबी चोंच वाला गिद्ध) सफलतापूर्वक प्रजनन नहीं कर पा रहे हैं।
- गिद्धों के लिए पानी का मुख्य जरिया नजदीक के कागज कारखाने से निकलने वाले जहरीले कचरे से गंदा हो रहा था और इसे ही प्रजनन में कमी की वजह माना गया।
- शोधकर्ताओं ने भारत में भारतीय गिद्ध के आखिरी इलाकों में से एक को बचाने के लिए सख्त प्रदूषण नियंत्रण, पानी की नियमति टेस्टिंग, शव परीक्षण और “गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र” बनाने का सुझाव दिया है।
तेलंगाना के कागजनगर वन प्रभाग की बलुआ पत्थर की चट्टानों के शिखर पर पर कभी दर्जनों भारतीय गिद्ध (जिप्स इंडिकस) घोंसला बनाया करते थे। आसमान में उनकी लयबद्ध उड़ान वहां के लोगों के लिए जाना-पहचाना नजारा था। लेकिन, आज इनकी तादाद घटकर महज कुछ रह गई है। 14 साल तक किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि गंभीर रूप से संकटग्रस्त इस पक्षी को अब प्रजनन करने में बहुत कम सफलता मिल रही है।
तमिलनाडु के एवीसी कॉलेज में प्राणी विज्ञान एवं वन्यजीव जीवविभाग के शोधकर्ता और इस अध्ययन के पहले लेखक रविकांत मंजिर्याला बताते हैं, “पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में भारतीय गिद्ध की आबादी में बड़ी गिरावट देखी गई है। इसकी वजह डाइक्लोफेनाक (मवेशियों की चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली दवा) का जहरीला दुष्प्रभाव रहा है। यह प्रजाति स्वाभाविक तौर पर धीमी गति से प्रजनन करती है, सामान्य तौर पर साल में सिर्फ एक ही बच्चे को पालती है। उन्होंने आगे कहा, “पहले के कई अध्ययन छोटी अवधि के थे या गिद्धों की कई प्रजातियों पर फोकस थे और इनसे सिर्फ सामान्य जानकारी मिली। लेकिन, इस अध्ययन में खास तौर पर इस प्रजाति की प्रजनन पारिस्थितिकी, घोंसले की सफलता और समय के साथ पर्यावरण से जुड़े कारकों के प्रजनन पर असर को ध्यान में रखा गया।“

धीमी गिरावट पर नजर
शोधकर्ताओं ने साल 2010 और 2023 के बीच, कागजनगर वन प्रभाग और तेलंगाना, महाराष्ट्र व छत्तीसगढ़ राज्यों की सीमा पर दक्क्न के पठार के आस-पास दो चट्टानों पर 23 घोंसलों की निगरानी की। पलारापु और लक्केमेडा के नाम से पहचानी जाने वाली ये चट्टानें पेद्दावगु और प्राणहिता नदी के किनारे हैं। यह ऐसा इलाका है जो कवाल, ताड़ोबा-अंधारी और इंद्रावती बाघ अभयारण्य को जोड़ने वाले गलियारे के रूप में भी काम करता है।
इन चट्टानों से करीब 200 मीटर दूर निगरानी वाली जगह से एक पखवाड़े में होने वाले सर्वे में प्रजनन चक्र के हर चरण का दस्तावेज तैयार किया गया, जिसमें प्रजनन शुरू होने से लेकर बच्चे को पालना तक शामिल था। प्रजनन के नतीजों की तुलना हर साल तापमान, बारिश, हवा की गति और दिशा, सतही दबाव, ओस और स्थानीय पानी की विषाक्तता जैसे पर्यावरण से जुड़े कारकों से की जाती थी। आंकड़ों वाले मॉडल का इस्तेमाल यह पता लगाने के लिए किया गया कि प्रजनन की सफलता पर सबसे ज्यादा असर किन कारकों का हुआ था।
“उनके प्रजनन के बारे में लंबी अवधि के इस डेटासेट से व्यापक में जानकारी मिली। डेटासेट में घोंसले बनाने में सफलता और बच्चों के बचने में सालाना बदलावों को भी दर्ज किया गया,” यूनिवर्सिटी ऑफ एडिलेड के स्कूल ऑफ एनिमल एंड वेटरनरी साइंस के वाइल्डलाइफ बायोलॉजिस्ट और HDR फेलो और अध्ययन के सह-लेखक आमेर सोहेल खान ने कहा। उन्होंने आगे कहा कि इस डेटासेट से कुछ जगहों पर लगातार एक ही स्थान के इस्तेमाल (साइट फिडेलिटी) और उनके लचीलेपन का पैटर्न भी सामने आया।

कागज की कहानी
शोधकर्ताओं को अध्ययन की अवधि के दौरान 161 जोड़ों को पता चला जिन्होंने घोंसले संभाले और प्रजनन की कोशिश की। इन्होंने 116 अंडे दिए, जिनमें से 85 चूजे घोंसले से निकलकर उड़ान भरने की अवस्था तक पहुंच पाए। हालांकि, पिछले कुछ सालों में यह संख्या तेजी से कम हुई: 2019 में 23 घोंसलें संभाले गए, जो 2020 में घटकर 15, 2021 में चार और 2022 और 2023 दोनों में सिर्फ एक रह गया।
सबसे ज्यादा बुरा असर सिरपुर कागज कारखाने से पेड्डावागु नदी में छोड़े गए गंदे पानी में जहरीलेपन का पाया गया। रसायन मिले इस पानी में गहरे काले रंग का तरल पदार्थ होता है, जिससे पर्यावरण को होने वाले खतरे के बारे में पहले से पता है। पिछली जांचों में पाया गया कि इनमें से कई मापदंड भारतीय मानक ब्यूरो की सुरक्षा सीमाओं से अधिक थे।
एवीसी कॉलेज की मैमेलियन बायोलॉजी लैब से जुड़े और इस अध्ययन के लेखक नागराजन बसकरण कहते हैं, “गिद्ध खाने के बाद बहुत सारा पानी पीते हैं। पेड्डावगु नदी का इस्तेमाल इंसान, मवेशी और जंगली जानवर करते हैं और यह उनके पानी का मुख्य जरिया है।” वह कहते हैं कि 2014 से 2017 तक बंद रहने बाद जब सिरपुर पेपर मिल वापस चालू हुई, तो खतरनाक गंदगी फिर से नदी में आने लगी, जिससे शायद व्यस्क गिद्धों की सेहत और अंडों के जिंदा रहने पर दुष्प्रभाव पड़ा। बसकरण आगे कहते हैं, “गिद्धों की लंबी उम्र और शवों को खाने की उनकी आदतें उन्हें लंबे समय तक रसायनों के संपर्क और जैव-संचयन (बायोएक्युमेलेशन) के प्रति खास तौर पर संवेदनशील बनाती हैं।”
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फील्ड टीमों ने 2019 और 2023 के बीच नदी के पास तीन वयस्क शवों का भी दस्तावेजीकरण किया। हालांकि इन पक्षियों पर विष विश्लेषण परीक्षण नहीं किया गया था, लेकिन पहले की गई पानी की जांच से कैडमियम, तांबा, सीसा, निकल और जस्ता की ज्यादा मात्रा का संकेत मिला, जो सभी पक्षियों के लिए विषाक्त हैं।
अध्ययन में पाया गया कि पर्यावरण से जुड़े कारकों ने भी प्रजनन के नतीजों पर असर डाला। ठंडे सालों में अंडों से बच्चों के निकलने (हैचिंग) की सफलता ज्यादा थी, जबकि बहुत अधिक बारिश ने अंडों के बचने की संभावना कम कर दी। दिलचस्प बात यह है कि हवा की गति का भी अच्छा असर हुआ। मंजिर्याला बताते हैं, “हवा की तेज गति से उड़ने की क्षमता बढ़ती है, जिससे व्यस्क गिद्धों के लिए भोजन की खोज में लगने वाली ऊर्जा की खपत कम हो जाती है और वे चूजों को नियमित खाना खिला पाते हैं। बेहतर वायु प्रवाह से घोंसलों में हवा भी आ सकती है, जिससे गर्मी का तनाव और परजीवी का भार कम हो जाता है।”
सूक्ष्म आवास (माइक्रोहैबिटैट) के स्तर पर, घोंसले की गहराई और वनस्पतियों का आवरण मायने रखता था। चट्टानों में गहराई पर या हरियाली में बने घोंसलों में सफलता अधिक थी, जबकि इंसानी गतिविधियों के पास बने घोंसलों में सफलता की दर कम थी।

क्षेत्रीय संरक्षण संकट
भारत में दुनिया भर में पाए जाने वाले भारतीय गिद्धों की आबादी का लगभग 97% हिस्सा पाया जाता है, जिनकी संख्या लगभग 12,000 से अधिक होने का अनुमान है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में कुछ सुधार देखा गया है, लेकिन दक्कन में इसमें कमी दिख रही है।
खान कहते हैं, “वर्तमान में चूजों के घोंसला छोड़ने और उड़ने की दर इतनी धीमी है कि इससे स्थिर आबादी बनाए रखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि यह प्रजाति धीमे प्रजनन चक्र और लंबे विकास चरणों वाली है। लंबी प्रजनन अवधि के कारण पर्यावरण और इंसानों से जुड़े खतरे बढ़ जाते हैं, जिससे प्रजनन में विफलता का खतरा बढ़ जाता है। प्रजनन की सफलता में थोड़ी सी कमी भी आबादी के नुकसान को तेज कर सकती है और इस इलाके में इस प्रजाति के लंबे समय तक जिंदा रहने को खतरे में डाल सकती है।”
शोधकर्ताओं ने इस स्थिति से उबरने के लिए तुरंत कदम उठाने की सलाह दी है जिसमें शवों का परीक्षण (नेक्रॉप्सी), शारीरिक तनाव और प्रजनन हार्मोन की निगरानी, पानी में प्रदूषकों का व्यापक विश्लेषण, उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी पर सख्त निगरानी और राज्य के वन विभागों के सहयोग से “गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र” स्थापित करना शामिल है। बसकरण कहते हैं, “प्रदूषण, आवास का नुकसान और जहरीली दवा जैसे पुराने खतरों को दूर करने वाली लक्षित रणनीतियां बेहद जरूरी हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 4 नवंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: हालिया सालों में गिद्धों के घोसलों की संख्या में तेजी से कमी आई है। जहां 2019 में 23 घोंसले थे, वहीं 2022 और 2023 में इनकी संख्या घटकर महज एक रह गई। यह कागजनगर वन प्रभाग और तेलंगाना, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा पर दक्कन के पठार के आस-पास के हिस्सों में चट्टानों पर घोंसला बनाने वाली दो जगहों में है। तस्वीर – रविकांत मंजिर्याला।