- मार्च के आखिर में चार एक-सींग वाले गैंडों को एक घिरे हुए पुनर्वास क्षेत्र से निकालकर दुधवा नेशनल पार्क के कोर घास वाले इलाके में छोड़ा गया।
- दुधवा में गैंडों को बसाने की यह योजना 1984-85 में शुरू हुई थी, जब असम और नेपाल से गैंडों को यहां लाया गया था। उस समय तराई के बड़े हिस्से से यह प्रजाति गायब हो चुकी थी।
- स्वतंत्र विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले कुछ महीने बहुत अहम होंगे। इसी दौरान पता चलेगा कि छोड़े गए गैंडे नए इलाके में ठीक से बस पा रहे हैं या नहीं, अपना दायरा तय कर पा रहे हैं या नहीं, और क्या वे खतरे वाले इलाकों में जाने से बचते हैं।
वन विभाग के कर्मचारी, पशु चिकित्सकों, महावतों और हाथियों की मौजूदगी में ट्रांसपोर्ट बॉक्स का दरवाजा खोला गया। टीम के पीछे हटते ही उसमें से एक विशाल गैंडा खुले जंगल की ओर बढ़ा। यह मार्च 2026 में चले दो दिन के अभियान का हिस्सा था, जिसमें चार एक-सींग वाले गैंडों को घिरे हुए पुनर्वास क्षेत्र से निकालकर उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व के कोर इलाके में छोड़ा गया।
इन गैंडों में एक नर और तीन मादा शामिल थीं, जिनकी उम्र 15 से 25 साल के बीच है। इन्हें पहले बेहोश कर रेडियो कॉलर लगाए गए, स्वास्थ्य जांच की गई और फिर रिजर्व के भीतर बिना बाड़ वाले घास के इलाके में छोड़ दिया गया।
मार्च में इन चार गैंडों के छोड़े जाने के बाद अब दुधवा में खुले जंगल में घूमने वाले गैंडों की संख्या आठ हो गई है। यह काम उत्तर प्रदेश वन विभाग और WWF-India की संयुक्त टीम ने किया। इससे पहले नवंबर 2024 और मार्च 2025 में भी इसी तरह गैंडों को छोड़ा गया था। अब इन जानवरों पर नजर रखने के लिए टीम ने एक मॉनिटरिंग सिस्टम और कंट्रोल रूम भी बनाया है, जहां से VHF और सैटेलाइट की मदद से उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। VHF कॉलर यानी रेडियो सिग्नल वाला कॉलर, जिससे वन विभाग गैंडों की गतिविधि और जगह का पता लगाता है।
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर एच. राजामोहन ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि रिजर्व में चार गैंडों को छोड़ना गैंडा संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा, “दशकों की मेहनत के बाद भारत के तराई क्षेत्र में गैंडों की वापसी की कोशिशें अब रंग लाने लगी हैं। यह अभियान ग्रेटर वन-हॉर्न्ड गैंडों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए उत्तर प्रदेश वन विभाग की प्रतिबद्धता को दिखाता है।”
WWF-India में जैव विविधता संरक्षण के सीनियर डायरेक्टर दीपांकर घोष ने कहा, “गैंडे घास वाले इलाकों की सेहत बताने वाले अहम जानवरों में से एक हैं। उन्हें अक्सर ‘इकोलॉजिकल इंजीनियर’ कहा जाता है, क्योंकि वे लगातार चरकर लंबी और कम काम की घास को फैलने नहीं देते।” उन्होंने कहा कि अगर खुले जंगल में गैंडों की अच्छी और टिकाऊ संख्या बनती है, तो इससे पूरे तराई आर्क इलाके को फायदा होगा।

दुधवा के गैंडों को बाड़े में क्यों रखा गया था
दुधवा में गैंडों को बसाने की योजना आज की नहीं, बल्कि करीब 40 साल पुरानी है।
1984 के एक शोधपत्र में बताया गया था कि एक-सींग वाला गैंडा कभी सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदानों में बड़े इलाके में पाया जाता था। लेकिन शिकार और जंगल-घासभूमि खत्म होने की वजह से यह नेपाल, पश्चिम बंगाल और असम के कुछ इलाकों तक सिमट गया।
इसके बाद विशेषज्ञों ने सलाह दी कि गैंडों की पुरानी रेंज वाले इलाकों में उनकी नई आबादी बसाई जाए। इसी सोच के तहत दुधवा को चुना गया। यहां गैंडों के लिए उपयुक्त घासभूमि, पानी और सुरक्षा उपलब्ध थी।
बाद में सर्वे में पाया गया कि दक्षिण सोनारीपुर रेंज के करीब 27 वर्ग किलोमीटर इलाके में गैंडों को बसाया जा सकता है। इसी इलाके को राइनो री-इंट्रोडक्शन एरिया बनाया गया। गैंडों को सुरक्षित रखने के लिए यहां बिजली की बाड़ लगाई गई और पार्क की सीमा पर खाई भी बनाई गई, ताकि वे गलती से बाहर न निकल जाएं।
इसी ऐतिहासिक विवरण में यह भी बताया गया है कि मार्च-अप्रैल 1984 के दौरान असम के पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य के पास से गैंडों को पकड़कर दुधवा लाया गया था। इस स्थानांतरण के शुरुआती दौर में कुछ गैंडे जीवित नहीं बच सके। इसके बाद 1985 में नेपाल के चितवन नेशनल पार्क के पास से कुछ और मादा गैंडों को दुधवा लाया गया। इन्हीं जानवरों ने मिलकर दुधवा में गैंडों को फिर से बसाने की योजना की शुरुआती आबादी तैयार की।
मोंगाबे-इंडिया से बातचीत में WWF-India के ईस्टर्न टेराई, टेराई आर्क लैंडस्केप के लैंडस्केप लीड मुदित गुप्ता ने कहा कि यह घिरा हुआ इलाका शुरू से ही संरक्षण योजना का हिस्सा था।
उन्होंने कहा, “ये गैंडे करीब 40 साल तक इस घिरे हुए पुनर्वास क्षेत्र में रहे। यह एक सावधानी भरा फैसला था, क्योंकि भारत-नेपाल सीमा के पास होने से मानव-गैंडा संघर्ष और शिकार का खतरा बना रहता है। मकसद यह था कि उन्हें छोड़ने से पहले एक स्थिर और संख्या के लिहाज से स्वस्थ आबादी तैयार की जाए।”

गैंडों को छोड़ने का आधार
दुधवा में गैंडों को लंबे समय तक बाड़े में रखने के बाद अब उन्हें खुले जंगल में छोड़ने की तैयारी कई सालों से चल रही थी।
गुप्ता ने कहा कि हाल की रिहाई से पहले गैंडों का वैज्ञानिक तरीके से चयन किया गया। उन्होंने कहा, “इसमें उनकी सेहत की जांच शामिल थी और सिर्फ अच्छे स्वास्थ्य वाले, बड़े हो चुके गैंडों को चुना गया। उनका व्यवहार भी देखा गया, जैसे वे स्वाभाविक तरीके से घूम रहे हैं, चर रहे हैं और दूसरे गैंडों के साथ सामान्य व्यवहार कर रहे हैं या नहीं। इसके अलावा, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के RhoDIS India कार्यक्रम के तहत डीएनए जांच की गई, ताकि ऐसे गैंडों को चुना जाए जिनमें आपसी करीबी रिश्ता कम हो और बाद में इनब्रिडिंग का खतरा न बढ़े।”
उन्होंने यह भी कहा कि अगर गैंडों को बाड़े से बाहर भी घूमने दिया जाए, तो दुधवा का इलाका कहीं ज्यादा गैंडों को संभाल सकता है। उनके मुताबिक, “2012 के वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, दुधवा टाइगर रिजर्व की करीब 500 वर्ग किलोमीटर घासभूमि और आर्द्रभूमि में 80 से 100 एक-सींग वाले गैंडे रह सकते हैं।”
कैसे पता चलेगा कि गैंडे ठीक से बस रहे हैं
आरन्यक के राइनो रिसर्च एंड कंजर्वेशन डिवीजन के डिप्टी डायरेक्टर डी. के. दत्ता ने कहा कि गैंडों को छोड़ने के बाद के पहले कुछ हफ्ते और महीने बहुत अहम होंगे। दत्ता इस परियोजना का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने दुधवा में गैंडों की रिहाई पर एक स्वतंत्र विशेषज्ञ के तौर पर अपनी राय दी।
दत्ता ने मोंगाबे-इंडिया से कहा, “गैंडों को छोड़ने के बाद उनकी प्रतिक्रिया उनकी उम्र और नर-मादा होने पर निर्भर कर सकती है। आम तौर पर शुरुआत में वे छोड़ने वाली जगह के पास ही रहते हैं, खासकर अगर वहां पानी और चरने के लिए अच्छी घास हो। समय के साथ बड़े नर और कुछ कम उम्र के अकेले गैंडे कोर इलाके से बाहर आसपास के हिस्सों में भी जाने लग सकते हैं, जिसमें बाड़े के आसपास का इलाका भी शामिल है।”
उन्होंने कहा, “लगातार चरना इस बात का अहम संकेत है कि गैंडा नए माहौल में ठीक से ढल रहा है। बार-बार पानी या कीचड़ में जाना भी एक जरूरी संकेत है। आम तौर पर गैंडों को इस इलाके में अपना तय दायरा बनाने और वहां बसने में करीब 90 दिन लग सकते हैं।”
दत्ता ने यह भी कहा कि बहुत बड़ी पारिस्थितिक दिक्कत की उम्मीद नहीं है, क्योंकि गैंडों को उसी बड़े इलाके में छोड़ा जा रहा है, जहां वे पहले से रह रहे थे। उनके मुताबिक, “लंबे समय तक बाड़े में रहे गैंडों को खुले इलाके में छोड़ने पर बड़ी पारिस्थितिक चुनौती आम तौर पर नहीं आती, खासकर जब उन्हें उसी बड़े आवास के भीतर छोड़ा जाए। चूंकि ये जानवर पहले से इस इलाके की परिस्थितियों से परिचित हैं, इसलिए बहुत बड़ी अनुकूलन समस्या की उम्मीद नहीं है।”
हालांकि, उन्होंने जोड़ा कि “आवास लगभग वही है, फिर भी जानवरों को चरने के अच्छे इलाके पहचानने और अपना पसंदीदा क्षेत्र तय करने में कुछ समय लग सकता है। इस दौरान थोड़ी प्रतिस्पर्धा या एक-दूसरे को हटाने जैसी स्थिति बन सकती है।”

छोड़े जाने के बाद के खतरे
अब निगरानी का ध्यान गैंडों को पकड़ने और छोड़ने से हटकर उनकी आवाजाही, आपसी व्यवहार और टकराव रोकने पर है। दत्ता ने कहा कि बड़े नर गैंडे और कुछ अकेले रहने वाले कम उम्र के गैंडे धीरे-धीरे अपना इलाका बढ़ा सकते हैं और कभी-कभी सुरक्षित सीमा से बाहर भी जा सकते हैं।
दत्ता ने कहा कि इससे इंसान और गैंडे के बीच टकराव का खतरा बढ़ सकता है और शिकार का जोखिम भी बढ़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि नर गैंडों के बीच इलाके को लेकर टकराव हो सकता है, जिससे कुछ जानवर सुरक्षित जगहों से दूर चले जाएं। वहीं बड़े नर और कम उम्र की मादा के बीच आक्रामक मुठभेड़ से चोट, मौत या दूर तक भटकने की स्थिति बन सकती है।
WWF-India के गुप्ता ने कहा कि गैंडों को छोड़ने के बाद जिन मुख्य खतरों की पहचान की गई है, उनमें टकराव, शिकार और आवास पर दबाव शामिल हैं। उन्होंने कहा, “सबसे बड़ी चिंता मानव-गैंडा संघर्ष की है, खासकर यह कि गैंडे खेतों या गांवों की तरफ भटक सकते हैं। इसे रोकने के लिए गैंडों को ऐसे सुरक्षित कोर इलाकों में छोड़ा गया है जो बस्तियों से दूर हैं। इसके साथ ही पहले से चेतावनी देने वाली व्यवस्था, तुरंत कार्रवाई करने वाली टीमें और प्रशिक्षित हाथी दल भी तैयार रखे गए हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर दखल दिया जा सके।”
उन्होंने आगे कहा, “बाड़े से बाहर आने के बाद शिकार का खतरा बना रहता है। इससे निपटने के लिए ज़मीन पर गश्त बढ़ाई गई है, खुफिया जानकारी के आधार पर सुरक्षा व्यवस्था की जा रही है, रेडियो ट्रैकिंग से गैंडों पर लगातार नजर रखी जा रही है और सीमा पार की एजेंसियों के साथ तालमेल रखा जा रहा है। इसके अलावा, हाथियों जैसे बड़े शाकाहारी जानवरों के साथ जगह और संसाधनों के दबाव को भी ध्यान में रखा गया है। इसके लिए वैज्ञानिक तरीके से घासभूमि और आर्द्रभूमि का प्रबंधन, बाहरी पौधों पर नियंत्रण और चरणबद्ध रिहाई की योजना अपनाई गई है, ताकि जानवर और उनका आवास धीरे-धीरे इस बदलाव के साथ तालमेल बिठा सकें।”
सफलता का पता कैसे चलेगा
दत्ता के मुताबिक, सिर्फ गैंडों को छोड़ देना ही सफलता नहीं है। असली सफलता तब मानी जाएगी, जब गैंडे नए इलाके में ठीक से बस जाएं, अपना एक तय इलाका बना लें और लंबे समय तक वहां टिके रहने के संकेत दें।
उन्होंने कहा कि अगर गैंडे सुरक्षित इलाके के भीतर ही रहें, ज्यादा दूर न भटकें, और उनका आपसी व्यवहार व प्रजनन सामान्य रहे, तो इसे अच्छा संकेत माना जाएगा। मादा गैंडों का गर्भवती होना और बच्चों को जन्म देना इस बात का मजबूत संकेत होगा कि आबादी धीरे-धीरे बस रही है।
दत्ता ने कुछ खतरे के संकेत भी बताए। जैसे गैंडों का लंबे समय तक इधर-उधर भटकना, बार-बार सुरक्षित इलाके से बाहर निकल जाना, आपस में लड़ाई होना, स्वास्थ्य खराब होना, प्रजनन न होना, आसपास के लोगों में जागरूकता की कमी, कॉलर से जुड़ी दिक्कतें, और बाघ के हमले का खतरा।
गुप्ता ने कहा कि दुधवा में गैंडों के संरक्षण के लिए एक चरणबद्ध और विज्ञान पर आधारित योजना चल रही है। इसका मकसद खुले जंगल में गैंडों की ऐसी आबादी तैयार करना है जो लंबे समय तक अपने दम पर टिक सके। उन्होंने कहा कि पहले चरण में 10 गैंडों को पुनर्वास क्षेत्र से बाहर छोड़ने की योजना है। इसके बाद उनकी संख्या, व्यवहार और पर्यावरण पर असर को देखकर आगे का फैसला लिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि गैंडों की अच्छी और विविध आबादी बनाए रखने के लिए डीएनए के आधार पर चयन करना जरूरी है।
बैनर तस्वीर: दुधवा टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया एक गैंडा। तस्वीर: विपिन कपूर सैनी।