- अरावली रेंज पश्चिम में थार रेगिस्तान से आने वाली धूल के सामने एक प्राकृतिक ढ़ाल का काम करती है, लेकिन बढ़ते खनन और इंसानों के दखल के चलते यह ढ़ाल लगातार कमजोर होती जा रही है।
- जानकारों का कहना है कि ज़मीन के इस्तेमाल की सख्त पॉलिसी न होने से अरावली जैसे हरे-भरे इलाके, जिनसे धूल और प्रदूषण कम हो सकता है, कम हो रहे हैं।
- जंगलों की कटाई या हरियाली कम होने से हवा और मिट्टी के बीच का संपर्क बढ़ जाता है, जिससे बीमारी फैलाने वाले माइक्रोब्स धूल के साथ बने रहते हैं और फैलते हैं।
भारत में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में हर साल सर्दियों में धुंध और प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है। दिल्ली सरकार राजधानी में धूल को नियंत्रित करने के कई तरीके अपना रही है, वहीं सिकुड़ती अरावली रेंज की पहाड़ियाँ सुरक्षा के लिए कानूनी लड़ाई में फंसी हुई हैं। अरावली की ये पहाड़ियाँ भारत के एक बड़े हिस्से को पश्चिम में थार के रेगिस्तान की धूल और रेत से बचाती हैं।
उत्तर भारत में मार्च और जून के बीच हर साल पांच से दस धूल भरे तूफान आते हैं। इन तूफानों में लोगों की जाने जाती हैं, संपत्ति को नुकसान होता है, और इस इलाके में पहले से खराब वायु गुणवत्ता और भी खराब हो जाती है। हाल ही में हुए एक अध्ययन में भी बढ़ते तापमान और भारत के वातावरण में बढ़ते एरोसोल लोड के बीच एक सकारात्मक सम्बन्ध पाया गया। अध्ययन के लेखकों में से एक, संगम गिरिराज ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “2019 से 2023 तक के सैटेलाइट डेटा के हमारे एनालिसिस के अनुसार, भारत में बड़े एरोसोल हॉटस्पॉट लद्दाख, वेस्टर्न घाट, थार रेगिस्तान, कच्छ का रण, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से, हरियाणा, और पंजाब के इलाके हैं।”
जानकारों का कहना है कि अरावली रेंज के खराब होने और बढ़ते खनन से रेगिस्तान की धूल के खिलाफ खड़ी यह अहम कुदरती ढाल कमजोर हो रही है, जिससे पूरे उत्तर भारत में वायु प्रदुषण की समस्या और भी गंभीर हो सकती है।
माइनिंग और धूल
“अरावली की पहाड़ियों के पश्चिमी या थार के रेगिस्तान की तरफ पाए जाने वाले रुकावट वाले टीले इस बात का सबसे पक्का सबूत हैं कि अरावली रेगिस्तान की रेत को रोकती है,” चेतन अग्रवाल, जो एक स्वतंत्र फॉरेस्ट और एनवायरनमेंटल सर्विसेज़ एनालिस्ट हैं, ने गूगल अर्थ इमेज के अपने विश्लेषण के आधार पर कहा। अग्रवाल आगे कहते हैं कि ये टीले लाखों सालों में बने हैं क्योंकि अरावली पहाड़ियों ने पश्चिमी रेगिस्तान की हवाओं को धीमा कर दिया, जिससे भारी रेत के कण जमा हो गए।
लेकिन, अरावली की पहाड़ियों के कुछ हिस्सों में खनन से इस जियोलॉजिकल बैरियर का क्षरण हो रहा है। पीपल फॉर अरावलीस कलेक्टिव की एक रिपोर्ट के अनुसार, अजमेर और हरियाणा के बीच अरावली की रेंज में एक दर्जन से ज़्यादा ऐसी जगहें हैं जहां पर इस रेंज में गैप देखे गए हैं।

अग्रवाल कहते हैं, “ज़्यादातर फ़ैसले वित्तीय लागत-लाभ विश्लेषण के आधार पर लिए जाते हैं, पर्यावरण या समाज की भलाई पर ध्यान नहीं दिया जाता। उदाहरण के लिए, किसी शहरी जंगल को रियल एस्टेट में बदलने से ज़मीन की कीमत 50 से 100 गुना बढ़ जाती है। हर सरकार सोचती है कि अरावली इतनी बड़ी है; कुछ हज़ार हेक्टेयर में माइनिंग या रियल एस्टेट की इजाज़त देने में क्या बुराई है? लेकिन, कुल मिलाकर, इन सबका असर पड़ता है।”
इस इलाके में खनन से निकलने वाली धूल की वजह से आस-पास के जंगलों के दम घुटने के भी सबूत मिले हैं। इसमें खदानों के मजदूरों और स्थानीय लोगों में सिलिकोसिस और एस्बेस्टोसिस जैसी कई तरह की सांस की बीमारियों जैसी समस्याएं भी शामिल हैं।
अग्रवाल कहते हैं, “हमें क्वांटिटेटिव कोटा के साथ कंट्रोल्ड माइनिंग की ज़रूरत है, और वह भी उन इलाकों में जिनका जंगल, वन्य जीवन, पारिस्थितिकी और स्थानीय लोगों पर कम से कम असर हो। एक समाज के तौर पर, हमें खपत कम करने और निर्माण के लिए बेहतर और वैकल्पिक सामग्री खोजने की दिशा में काम करने की भी ज़रूरत है।”
हालाँकि, इन जंगलों को ठीक करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन यह हमेशा मुमकिन नहीं होता। नोएडा की संस्था SAFE (सोशल एक्शन फॉर फॉरेस्ट एंड एनवायरनमेंट) के फाउंडर विक्रांत तोंगड़ कहते हैं, “अरावली में माइनिंग अक्सर सैकड़ों मीटर गहरी हो जाती है, जिससे मिट्टी खराब हो जाती है, और ज़मीन पेड़-पौधों से ठीक करने लायक नहीं बचती।” “यह [माइनिंग] इस धूल की रुकावट को खत्म करने का एक और तरीका है, क्योंकि पेड़ों के बिना, बंजर अरावली अकेले धूल को रोक नहीं पाती।”
बढ़ते रोगाणु
वायु प्रदूषण जन स्वास्थ्य के लिए एक खतरा है, जिसकी वजह से 2021 में दुनिया भर में 80 लाख से ज़्यादा मौतें हुईं। प्रदूषित हवा में सांस लेने से फेफड़ों और दूसरे अंगों पर असर पड़ता है, जिससे गंभीर बीमारियां होती हैं। इसके अलावा, शोधों में पाया गया है कि कोहरा मध्य भारत के गंगा के मैदान (IGP) में हवा की गति को रोककर एटमोस्फेरिक माइक्रोबियल लोड को 30% से ज़्यादा बढ़ा देता है, जिससे पश्चिमी IGP से आने वाले माइक्रोब्स के अलावा स्थानीय पैथोजेनिक माइक्रोब्स भी सुरक्षित रूप से इकट्ठा हो जाते हैं। एटमोस्फेरिक माइक्रोबियल लोड से तात्पर्य हवा में मौजूद सूक्ष्मजीवों (बैक्टीरिया, वायरस, कवक/फंगस और परागकण) की मात्रा से है।
“तापमान और मौसमी हवा भी इलाके के पैथोजन्स की विविधता पर असर डालती हैं। इसलिए, हमने पाया है कि मॉनसून के पहले पश्चिमी भारत और गंगा के मैदानों से आने वाली महाद्वीपीय सूखी हवाएं पूर्वी हिमालय में दार्जिलिंग पहाड़ी की चोटी पर 15% खास माइक्रोब्स लाती हैं,” कोलकाता के बोस इंस्टीट्यूट के एसोसिएट प्रोफेसर सनत कुमार दास कहते हैं, जिनकी लैब ने यह स्टडी की।

जब दास और उनकी टीम ने दिल्ली की घनी आबादी बस्तियों में सर्दियों की हवा की पड़ताल की, तो उन्होंने पाया कि सर्दियों के आम दिनों के मुकाबले, ज़्यादा आबादी वाले इलाकों से धुंध वाले दिनों के हवा के सैंपल में 50% ज़्यादा माइक्रोबियल डाइवर्सिटी थी, जबकि कम आबादी वाले इलाकों में सिर्फ़ 25% डाइवर्सिटी दिखी। दास कहते हैं, “हम कुछ नहीं बल्कि छोटे-बड़े पंप हैं जो छींकने, खांसने या अपनी स्किन से निकलने वाले पैथोजन्स को बाहर निकालते हैं।”
भारत में धूल दूर अरब के रेगिस्तान और उत्तरी अफ्रीका के पूर्वी तट से आती है और थार के रेगिस्तान से उठने वाली धूल के साथ मिलकर अंदर तक पहुँचती है। लंबी दूरी की यात्राओं के दौरान, धूल के कण हवा में मौजूद माइक्रोब्स को सुरक्षित रखकर चलते हैं। दास कहते हैं, “खतरनाक अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन से बचाने के अलावा, धूल के कण माइक्रोब्स को लंबी यात्राओं के दौरान ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी न्यूट्रिएंट्स भी देते हैं।”
गर्मियों के धूल भरे दिनों में दार्जिलिंग में हवा में मौजूद माइक्रोबियल बनावट की स्टडी करते हुए, दास की रिसर्च टीम ने हाल ही में पाया कि ये माइक्रोब्स स्थानीय नहीं थे, बल्कि 2,000 किलोमीटर पश्चिम में थार रेगिस्तान से आने वाले धूल के कणों पर लंबी दूरी तक यात्रा कर रहे थे।
वह कहते हैं, “चाहे रेगिस्तान हो या शहर, हरियाली की कमी और पेड़ों की कटाई की वजह से हवा और मिट्टी का जितना ज़्यादा मेल होता है, धूल के ज़रिए हवा में मौजूद माइक्रोब्स तक उतने ही ज़्यादा न्यूट्रिएंट्स पहुँचते हैं, जिससे इन पैथोजन्स को बढ़ने और बीमारियों के फैलने में मदद मिलती है।”

साफ़ हवा और भूमि उपयोग नीतियां
शहरों का फैलाव और ज़्यादा घनी आबादी वाले ग्रामीण इलाकों में भूमि उपयोग में बदलाव से भारत में वन आवरण कम हो रहा है। साल 2022 की एक स्टडी के मुताबिक, 1975 से 2019 के बीच अरावली के वन आवरण में लगभग 8% की कमी आई है।
अशोका यूनिवर्सिटी में एनवायर्नमेंटल स्टडीज़ की विज़िटिंग फ़ैकल्टी ग़ज़ाला शहाबुद्दीन भूमि उपयोग में बदलाव, जंगल के दोहन और पारिस्थितिकी पर काम करती हैं। उनका कहना है कि शहरी और सब-अर्बन हरियाली के लिए कानूनी फ्रेमवर्क की कमी की वजह से गुरुग्राम, अलवर, उदयपुर, दिल्ली और फ़रीदाबाद जैसे बड़े शहरों की सीमा पर बसी निचली अरावली पहाड़ियों में इस तरह के बेतहाशा शहरी फैलाव और गैर-टिकाऊ खनन के तरीकों को बढ़ावा मिलता है। वह कहती हैं, “असल में भारतीय शहरों में भूमि उपयोग की कोई खास पॉलिसी नहीं है, जिसके कारण शहरी हरित क्षेत्रों में लगातार बदलाव होता रहता है, जिसमें शहर के जंगल और सब-अर्बन जगहों पर खाली ज़मीन शामिल है।”
“यह दु:ख की बात है कि जब हम वायु प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से इतना परेशान हैं, तब भी शहर की म्युनिसिपैलिटी के लिए शहर के एक खास हिस्से को ग्रीन कवर में रखने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। न ही कई लेयर वाली, अलग-अलग तरह की देसी पेड़-पौधों, जो धूल और दूसरे प्रदूषकों को रोकने में एग्जॉटिक पौधों और मोनोकल्चर वाले पेड़ों जिनका इस्तेमाल आमतौर पर ‘ग्रीनिंग’ के लिए किया जाता है की तुलना में ज़्यादा असरदार हैं, को बनाए रखने के लिए कोई सख्त गाइडलाइन हैं,” उन्होंने आगे कहा।
तोंगड़ शहाबुद्दीन से सहमत हैं और कहते हैं, “रेवेन्यू रिकॉर्ड में, देश के ज़्यादातर ग्रीन एरिया और वॉटर बॉडीज़ के आधिकारिक रिकॉर्ड भी नहीं हैं। लेकिन, जब कोई क्षेत्र कानूनी तौर पर ग्रीन ज़ोन नोटिफाई हो जाता है — जैसे कि शहर के मास्टर प्लान में या जिला स्तर पर रेवेन्यू रिकॉर्ड में — तो उसका भूमि उपयोग बदलना बहुत मुश्किल हो जाता है। इससे इन ग्रीन एरिया को गैर-पर्यावरण मकसदों के लिए इस्तेमाल करना और मुश्किल हो जाता है, जो पर्यावरण के नज़रिए से फायदेमंद है।”

हालाँकि, दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में कई बिल्डरों ने, कानूनी और गैर-कानूनी दोनों तरह से, अपने फायदे के लिए मास्टर प्लान में चिन्हित किए गए ग्रीन एरिया का भूमि उपयोग बदलने की कोशिश की है। कुछ लोग इसमें कामयाब भी हुए हैं, लेकिन संरक्षणवादियों ने कम से कम 10 ऐसे मामलों का सफलतापूर्वक विरोध किया है, जहां निजी डेवलपर्स ने इन हरित क्षेत्रों पर सिर्फ इसलिए कब्ज़ा करने की कोशिश की क्योंकि वे प्राइम लोकेशन पर थे, तोंगड़ ने बताया।
उन्होंने आगे कहा, “केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के ‘ग्रीन वॉल प्लांटेशन’ प्रोजेक्ट की शुरुआत के साथ, अरावली के खराब हिस्सों में वृक्षारोपण का काम और ज़्यादा आसान होने की उम्मीद है। SAFE अभी बड़े पैमाने पर पौधरोपण का काम करने के लिए पास की ज़मीन, ज़मीन से जुड़े ज़रूरी NOCs (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) और दुसरे संसाधनों को हासिल करने की दिशा में काम कर रहा है।”
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शहाबुद्दीन ने कहा, “हमें कुछ मामलों में निर्माण कार्यों पर रोक लगानी होगी, क्योंकि फिलहाल चल रहा निर्माण कार्य में से ज़्यादातर कार्य वापस बेचने या फायदे के लिए हो सकता है, ना कि लोगों की आवासीय जरूरतों के लिए। शायद रियल एस्टेट अभी हमारे देश की अर्थव्यवस्था को चला रहा है, और बदकिस्मती से अरावली में हो रहे खनन में पत्थर और मार्बल की खदानें शामिल हैं जो शहरों में हो रहे निर्माण कार्यों में उपयोग में ली जाती हैं, जबकि इनसे स्थानीय बस्तियों और खेती पर निर्भर समुदायों की आजीविका ख़त्म हो रही है, जैसा कि पीपल फॉर अरावली कलेक्टिव ने डॉक्यूमेंट किया है।” वह कहती हैं कि भूमि उपयोग की प्लानिंग और उसे सख्ती से लागू करना ज़रूरी है। “नहीं तो भूमि उपयोग में बदलाव की यही प्रक्रिया एक के बाद एक सभी पर्वत श्रृंखलाओं पर असर डालेगी।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेज़ी वेबसाइट पर 21 जनवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: थार के रेगिस्तान में रेत के टीले। थार से उठने वाली धूल के अलावा, अरब के रेगिस्तान और उत्तरी अफ्रीका के पूर्वी तट से भी धूल हवा में मौजूद माइक्रोब्स के साथ भारत आती है। तस्वीर – सुष्मिता बालासुब्रमणि द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 2.0) के माध्यम से।