- लद्दाख के ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में किए गए एक सर्वे में भूरे भालुओं के रहने की जगहों और उनके अनुकूल आवासों की मैपिंग की गई।
- पश्चिमी लद्दाख की घाटियां, जैसे द्रास, सुरु, शरगोल और ज़ंस्कार, इन भालुओं के लिए सबसे उपयुक्त आवास के रूप में सामने आई हैं, क्योंकि यहां उन्हें पर्याप्त वनस्पति, पानी और मध्यम ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाके मिल जाते हैं।
- हालाँकि, भालुओं के सबसे बेहतरीन आवास ‘संरक्षित क्षेत्रों’ से बाहर स्थित हैं और उन क्षेत्रों में आते हैं, जहां बुनियादी ढांचे का विकास तेजी से हो रहा है। ऐसे में वन्यजीव गलियारों के संरक्षण की मांग उठने लगी है।
हिमालयी भूरे भालुओं (ब्राउन बियर) के उच्च-ऊंचाई वाले आवासों पर अब तक बहुत कम अध्ययन हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत और पाकिस्तान की हिमालयी और ट्रांस-हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं में सिर्फ 130 से 220 भूरे भालू ही बचे हैं। भारत में इनकी घटती संख्या और छोटे-छोटे अलग-थलग समूहों में बंटे होने के कारण यह प्रजाति गंभीर खतरे में है। लद्दाख के ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में वास्तव में इनकी आबादी कहां तक फैली, यह अब तक एक बड़ा सवाल बना हुआ था।
लेकिन 35,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में किए गए एक नए अध्ययन ने इस कमी को पूरा कर दिया है। देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के पीएचडी स्कॉलर और इस शोध के मुख्य लेखक, नियाज़ुल खान बताते हैं, “यह अध्ययन इस क्षेत्र में भूरे भालुओं की मौजूदगी और उनके अनुकूल आवासों का पहला व्यवस्थित और व्यापक आकलन है। यह शोध भविष्य में वन्यजीव संरक्षण और विकास से जुड़ी नीतियों को दिशा देने के लिए ठोस साक्ष्य प्रदान करता है।”
पश्चिमी लद्दाख में सबसे अधिक आबादी
लद्दाख का ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र देखने में भले ही दुर्गम और बंजर लगता हो, लेकिन यह पारिस्थितिक रूप से बेहद समृद्ध है। यहां सर्दियों में तापमान कभी-कभी -30°C से भी नीचे चला जाता है, वनस्पति बहुत कम है, और यहां की पारंपरिक कृषि और पशुपालन व्यवस्था पूरी तरह से साझा चारागाहों पर टिकी है। पिछले एक दशक में, सड़क नेटवर्क के विस्तार, रक्षा से जुड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट्स और तेजी से बढ़ते पर्यटन ने इस क्षेत्र की सूरत पूरी तरह बदल दी है।
माना जाता है कि पश्चिमी लद्दाख, विशेष रूप से ऊपरी सुरु घाटी, शरगोल और ज़ंस्कार घाटी में हिमालयी भूरे भालुओं की सबसे बड़ी आबादी रहती है। इसके बावजूद, अब तक इस प्रजाति के आवासों या उन पर्यावरणीय कारकों का बड़े पैमाने पर कोई अध्ययन नहीं हुआ था, जो यह तय करते हैं कि ये भालू किन परिस्थितियों और क्षेत्रों में जीवित रह सकते हैं।
हिमालयी भूरे भालू बहुत ही शर्मीले और छिपकर रहने वाले जीव हैं। ये ज़्यादातर रात में सक्रिय होते हैं और उनकी संख्या भी काफी कम है, इसलिए सीधे तौर पर उन्हें देखे जाने की घटनाएं भी कम ही हैं। खान बताते हैं, “यही कारण है कि हमारे अध्ययन में उनके पदचिन्हों, मल, ज़मीन की खुदाई के निशानों और सीधे तौर पर देखे गए भालुओं के व्यवस्थित सर्वेक्षणों को शामिल किया गया है।”

पूरे क्षेत्र को 10×10 किमी के ग्रिड में और फिर हर ग्रिड को 5×5 किमी के छोटे हिस्सों (सेल्स) में बांटा गया, ताकि जांच में एकरूपता बनी रहे। सर्वेक्षण टीमों ने लगभग आधे किलोमीटर से लेकर करीब 7 किलोमीटर तक लंबे 4,012 रास्तों पर पैदल चलकर भालुओं के निशानों को ‘MSTrIPES’ नाम के मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए दर्ज किया। दो वर्षों (2019-20) के दौरान, टीमों ने भूरे भालुओं के 2,530 पक्के निशानों का दस्तावेज़ीकरण किया, जिससे लद्दाख के लिए एक व्यापक डेटासेट तैयार हुआ।
भालू किन क्षेत्रों में हो सकते हैं, इसका अनुमान लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने ‘ऑक्यूपेंसी मॉडलिंग’ का इस्तेमाल किया। यह एक ऐसा तरीका है जो इस बात को ध्यान में रखता है कि जानवर वहां मौजूद तो हो सकते हैं, लेकिन वे नज़र नहीं आते। इसके साथ ही, उन्होंने ‘मैक्सएंट’ नामक एक तकनीक का भी उपयोग किया, जो उन जगहों के पर्यावरणीय कारकों के आधार पर यह भविष्यवाणी करती है कि भालुओं के रहने के लिए कौन से क्षेत्र उपयुक्त हैं। भालुओं के स्थानीय स्तर पर रहने के तरीकों और व्यापक भौगोलिक पैटर्न को समझने के लिए भू-भाग, ऊंचाई, तापमान, पेड़-पौधों की मौजूदगी और पानी की उपलब्धता जैसे कारकों का विश्लेषण किया गया।
खान बताते हैं, “मैक्सएंट ने भालू के आवासों को निर्धारित करने में जलवायु संबंधी कारकों के मजबूत प्रभाव को उजागर किया। इससे हमें भविष्य के पर्यावरणीय बदलावों के बीच उन सुरक्षित ठिकानों की पहचान करने में मदद मिली, जो भालुओं के जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण बने रहेंगे।”
आवासों की मुख्य विशेषताएं
विभिन्न मॉडलों के विश्लेषण में एक बात समान रही: हिमालयी भूरे भालू मुख्य रूप से घाटी के चारागाहों पर निर्भर हैं। द्रास, सुरु और ज़ंस्कार जैसी घाटियों में भालुओं के पाए जाने की संभावना सबसे अधिक पाई गई। ये घाटियां उन्हें मौसमी वनस्पति, छोटे स्तनधारी जीव (जैसे मारमॉट) और पानी का नियमित स्रोत उपलब्ध कराती हैं। इस दुर्गम और संसाधनों की कमी वाले वातावरण में ये चीजें भालुओं के जीवित रहने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
भालुओं की आबादी के फैलाव पर ज़मीन की बनावट का भी गहरा असर देखा गया। मॉडलों से पता चलता है कि ये भालू समुद्र तल से 3,000 से 4,500 मीटर की ऊंचाई वाले, मध्यम ऊबड़-खाबड़ इलाकों को पसंद करते हैं। ऐसी मध्यम ऊंचाई वाली जगहें भालुओं को मांद बनाने, भोजन तलाशने और इंसानी बस्तियों से दूर रहने के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करती हैं।
ऊबड़- खाबड़ ढलान और दुर्गम रास्ते खास तौर पर उन मादा भालुओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं जिनके शावक साथ होते हैं, क्योंकि ये जगहें सर्दियों में शीतनिद्रा के दौरान उन्हें सुरक्षित मांद के स्थान उपलब्ध कराते हैं। इन इलाकों में आमतौर पर सड़कें कम है और इंसानी हस्तक्षेप भी न के बराबर हैं। ये दोनों ही कारक भूरे भालुओं की उपस्थिति की संभावना को बढ़ाते हैं। खान कहते हैं, “इसके विपरीत, इंसानी गतिविधियों में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी इन आवासों की उपयुक्तता को काफी कम कर देती है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि यह प्रजाति मानवीय दखल के प्रति कितनी संवेदनशील है।”

आवास की उपयुक्तता का अनुमान लगाने में तापमान से जुड़े कारक भी महत्वपूर्ण साबित हुए। पश्चिमी लद्दाख की तरह, जिन इलाकों में मौसमी तापमान में भारी बदलाव होता है, वे भालुओं के लिए सबसे अनुकूल स्थिति पैदा करते हैं; क्योंकि तापमान में यही अंतर वनस्पतियों के विकास, शिकार (छोटे जीवों) की आवाजाही और मांद बनाने के लिए जरूरी माहौल बनाता है। भालू ऐसे क्षेत्रों में भी रहना पसंद करते हैं जहां दैनिक तापमान में उतार-चढ़ाव कम हो, जो यह बताता है कि सूक्ष्म-जलवायु की स्थिरता उन्हें ऊंचाई वाले वातावरण में भोजन खोजने और सुरक्षित मांद में रहने के बीच संतुलन बनाने में मदद करती है।
खान कहते हैं, “सबसे चौंकाने वाले परिणामों में से एक यह था कि तापमान में बदलाव ने भालुओं के आवासों को गहराई से प्रभावित किया।” शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जलवायु गर्म होने के साथ, तापमान पर निर्भर रहने वाली ये अनुकूल स्थितियां धीरे-धीरे और ऊंचे इलाकों की तरफ खिसक सकती हैं, जिससे भालुओं के लिए उपलब्ध जगहें और भी सीमित और बिखरी हुई हो जाएंगी।
स्थानीय समुदायों को साथ लेकर चलना भी जरूरी
कुल मिलाकर, शोध के परिणाम दर्शाते हैं कि पश्चिमी लद्दाख इस प्रजाति का मुख्य गढ़ है। वहीं नुब्रा घाटी में भी भालुओं की मौजूदगी देखी गई है। अध्ययन से संकेत मिलता है कि विभिन्न समूहों के बीच आपस में जुड़ाव पहले ही कमजोर हो चुका है, जिससे भविष्य में इनके और अधिक अलग-थलग पड़ने का खतरा बढ़ गया है।
नियाज़ुल खान कहते हैं, “हमारी सबसे पहली प्राथमिकता द्रास, सुरु, शरगोल और ज़ंस्कार जैसी प्रमुख घाटी प्रणालियों का संरक्षण होनी चाहिए। मौजूदा समय में, ये क्षेत्र भालुओं के लिए सबसे उच्च-गुणवत्ता वाला आवास हैं, लेकिन ये काफी हद तक संरक्षित क्षेत्रों से बाहर स्थित हैं।” इन इलाकों पर सड़कों के विस्तार, सैन्य निर्माण, खनन और अनियंत्रित पर्यटन का दबाव लगातार बढ़ रहा है। आवासों का यह विखंडन भूरे भालुओं के लिए भोजन की उपलब्धता और सुरक्षित मांद तक पहुंच को बाधित कर सकता है, क्योंकि इन भालूओं को जीवित रहने के लिए बड़े भू-भाग की जरूरत होती है और वे भोजन की तलाश में घाटियों में दूर-दूर तक घूमते हैं।
और पढ़ेंः अधिक नजर आने लगी है लद्दाख की अनोखी बिल्ली रिबिलिक, क्या बढ़ रही है संख्या
इसके अलावा स्थानीय समुदायों को साथ लेकर चलना भी उतना ही जरूरी है। लद्दाख के पशुपालकों को अक्सर पालतू जानवरों के शिकार का नुकसान उठाना पड़ता है और क्षेत्र में बढ़ते मानव-भालू संघर्ष ने संरक्षण की चुनौतियों को और बढ़ा दिया हैं। अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि भालू-रोधी बाड़े बनाना, बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए सख्त नियम बनाना, कचरा प्रबंधन में सुधार करना, चराई को नियंत्रित करना और सोच-समझकर बनाई गई इको-टूरिज्म नीतियां, संघर्ष को कम करने के साथ-साथ भालुओं के आवासों को बचाने में मददगार साबित हो सकती हैं।
खान कहते हैं, “हमें भालुओं की आबादी के सटीक अनुमान और घाटियों के बीच उनके आवासों के आपसी जुड़ाव की जानकारी की भी आवश्यकता है, जिसमें संभावित गलियारों की पहचान करना भी शामिल है। भविष्य में लंबे समय तक निगरानी, आनुवंशिक अध्ययन और जलवायु को ध्यान में रखकर किए गए मॉडलिंग के जरिए इन कमियों को दूर करना, ट्रांस-हिमालय में हिमालयी भूरे भालुओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सबसे जरूरी कदम होगा।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 9 जनवरी 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: हिमालयी भूरे भालू बहुत ही शर्मीले और एकांतप्रिय होते हैं और ये ज्यादातर रात में सक्रिय रहते हैं। इनकी संख्या भी बहुत कम है, जिस कारण इन्हें सीधे तौर पर देख पाना दुर्लभ होता है। तस्वीर: WII कैमरा ट्रैप