- उत्तर प्रदेश के इटावा और मैनपुरी जिलों मे स्थित समन वेटलैंड कॉम्प्लेक्स एक महत्वपूर्ण अभयारण्य है, जो महाद्वीपों से आने वाले प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण शीतकालीन आवास प्रदान करता है।
- जनवरी 2020 और नवंबर 2021 के बीच, शोधकर्ताओं ने क्षेत्र में जलपक्षियों की विविधता, जनसंख्या प्रवृत्तियों और आवास खतरों पर एक व्यापक सर्वेक्षण किया।
- अध्ययन ने सिफारिश की कि इस क्षेत्र की बहाली के प्रयासों में सख्त सुरक्षा नीतियों, सक्रिय सामुदायिक भागीदारी और बड़े पैमाने पर आवास पुनर्स्थापना को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
भारत, दुनिया के प्रमुख जैव विविधता वाले देशों में से एक है और यहां पक्षियों की 1,306 प्रजातियां पाई जाती हैं। यह दुनिया की कुल पक्षी प्रजातियों का 12.5% है। उत्तर प्रदेश में भी पक्षियों की अच्छी खासी तादात है। यहां 31 ऐसे इलाके हैं जिन्हें इम्पोर्टेंट बर्ड्स एंड बायोडाइवर्सिटी एरिया (आईबीए) कहा जाता है और ये क्षेत्र 500 से अधिक पक्षी प्रजातियों की मेजबानी करते हैं। विशेष रूप से इसके वेटलैंड पक्षी आबादी के लिए महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में काम करते हैं।
इन्हीं में से एक है राज्य के इटावा और मैनपुरी जिलों में स्थित समन वेटलैंड कॉम्प्लेक्स। यह एक महत्वपूर्ण पक्षी अभयारण्य के रूप में सामने आया है, जो महाद्वीपों में यात्रा करने वाले प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण शीतकालीन आवास प्रदान करता है। इतने पारिस्थितिक महत्व के बावजूद, इस जगह पर पक्षियों के बारे में ज्यादा रिसर्च नहीं की गई है और न ही पक्षियों से जुड़ी पूरी जानकारी उपलब्ध है।
हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस कमी को दूर करने का प्रयास किया और पिछले दो दशकों में मानवीय दबावों से इस आवास को कैसे नुकसान पहुंचा है, इस पर प्रकाश डाला है। अध्ययन के लेखकों में से एक ‘बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ के सिनीयर प्रोजेक्ट फैलो ओमकार जोशी कहते हैं, “इस अध्ययन का उद्देश्य आर्द्रभूमि में जलपक्षी आबादी और विविधता की वर्तमान स्थिति का आकलन करना था।”
संरक्षण और जलपक्षियों का सर्वे
समन वेटलैंड कॉम्प्लेक्स में समन झील (वेटलैंड) और इसके कई सहायक वेटलैंड शामिल हैं जैसे सौज, सरसई नवार झील, कुर्रा झील और कुडैय्या मार्शलैंड। इनमें से समन और कुर्रा वेटलैंड को सेंट्रल एशियन फ्लाईवे (2018-2023) के साथ प्रवासी पक्षियों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए भारत की राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत प्राथमिकता वाले स्थलों के रूप में शामिल किया गया है।
इन सभी पांचों वेटलैंड्स को आईबीए (आईबीए – महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र) के रूप में भी नामित किया गया है। ये खासकर सर्दियों के दौरान जलपक्षियों के बड़े समूहों को आकर्षित करते हैं, जिनमें कॉमन टील, नॉर्दर्न पिनटेल, लेसर व्हिस्लिंग-डक और ग्रेट व्हाइट पेलिकन जैसी प्रजातियां शामिल हैं। यहां पाई जाने वाली कई प्रजातियां वेटलैंड्स इंटरनेशनल (2012) द्वारा तय की गई 1% आबादी की सीमा से ज्यादा है, जिससे पता चलता है कि पक्षियों के संरक्षण के लिए ये वेटलैंड्स दुनिया के लिए कितनी जरूरी हैं। इसलिए, समन पक्षी अभयारण्य और सरसई नवार को 2019 में रामसर साइट्स (अंतरराष्ट्रीय संरक्षण के लिए नामित आर्द्रभूमि) भी घोषित किया गया था।


शुरुआती जानकारी जुटाने के लिए, शोधकर्ताओं ने जनवरी 2020 से नवंबर 2021 के बीच इस क्षेत्र में जलपक्षियों की विविधता, आबादी के रुझानों और आवासों के खतरों पर एक व्यापक सर्वेक्षण किया। जून 2024 में प्रकाशित इस अध्ययन में तीन सर्दियों के मौसम शामिल थे। जलपक्षियों की गणना के लिए कुल गिनती तरीके का उपयोग किया गया, जिसमें पर्यवेक्षक से लगभग 500 मीटर की दूरी पर पक्षियों को देखा गया। बड़े जल निकायों के लिए, सटीकता सुनिश्चित करने के लिए कई पर्यवेक्षकों द्वारा एक साथ गणना की गई। भूमि पक्षियों को जब भी आर्द्रभूमि के अंदर या ऊपर उड़ते हुए देखा गया, तो उन्हें मौके पर ही रिकॉर्ड किया गया। इन पक्षियों की आदतों और भोजन के व्यवहार को जानने के लिए सुबह सूर्योदय से लेकर शाम को सूर्यास्त तक का समय चुना गया। क्योंकि इस समय ये पक्षी सबसे ज्यादा एक्टिव होते हैं।
पक्षियों की प्रजातियों की पहचान के लिए बर्डलाइफ इंटरनेशनल (2021) की शब्दावली का इस्तेमाल किया गया और उनके संरक्षण की स्थिति का आकलन अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट के अनुसार किया गया। सर्वेक्षण के दौरान किए गए अवलोकन और स्थानीय लोगों, बर्ड वाचर्स और वन विभाग के कर्मचारियों से मिली जानकारी के आधार पर आर्द्रभूमि के खतरों और गड़बड़ियों को भी दर्ज किया गया।
निष्कर्ष सामने आए
अध्ययन में 18 गण और 41 परिवारों में 126 पक्षी प्रजातियों को दर्ज किया गया, जिसमें 70 जलपक्षी प्रजातियां शामिल थीं। इनमें से 34 प्रवासी और 36 निवासी पक्षी थे। एनाटिडे परिवार (बत्तख, गीज़ और हंस) में सबसे ज्यादा प्रजातियां (17) थीं, उसके बाद स्कोलोपेसिडे (स्निप्स, कर्ल्यूज और सैंडपाइपर्स) की संख्या 12 थी।
सात प्रजातियां IUCN रेड लिस्ट की लुप्तप्राय और कमजोर श्रेणियों से संबंधित थीं। उनमें से प्रमुख सारस क्रेन (ग्रस एंटीगोन), स्टेपी ईगल (एक्विला निपलेंसिस), कॉमन पोचार्ड (अयथ्या फेरिना) और इजिप्शियन वल्चर (नियोफ्रोन पर्कनोप्टेरस) थे। अन्य प्रजातियों में फरवरी 2020 में देखी गई वेस्टर्न येलो वैगटेल और सिट्रीन वैगटेल की बड़ी बसेरा आबादी और नवंबर 2021 में देखी गई रोजी स्टार्लिंग का झुंड भी था. साथ ही इसमें उसी साल समन पक्षी अभयारण्य में दो घोंसलों और सरसई नवार में एक घोंसले के साथ ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क की घोंसला बनाने की गतिविधि भी शामिल थी।

सबसे ज्यादा जलपक्षियों की विविधता सरसई नवार में दर्ज की गई, जहां 63 प्रजातियां थीं, इसके बाद समन पक्षी अभयारण्य में 52 प्रजातिया देखी गई। इसके विपरीत, कुडैय्या मार्श लैंड में सबसे कम विविधता पाई गई, जहां केवल 30 प्रजातियां दर्ज की गईं। समन वेटलैंड कॉम्प्लेक्स में, 58 भूमि पक्षी प्रजातियों को भी दर्ज किया गया, जिसमें सरसई नवार एक बार फिर से सबसे विविध स्थल के रूप में उभरा, इसके बाद समन पक्षी अभयारण्य था।
जनवरी 2020 में, समन पक्षी अभयारण्य ने एक दिन में 8,210 जलपक्षियों की गणना दर्ज की। हालाकि, ये आंकड़े इस बात की भी याद दिलाते हैं कि पक्षियों की संख्या घट रही है। जोशी कहते हैं, “1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में, वेटलैंड्स में नियमित रूप से 20,000 से अधिक पक्षी रहते थे।” वह आगे कहते हैं, “लेकिन पिछले कुछ सालों में, जलपक्षियों की आबादी में 50% से अधिक की गिरावट आई है। कुर्रा झील और कुड्डैया दलदली भूमि जैसी वेटलैंड्स की हालत तो और भी खराब हो गई है। कुर्रा झील तो अब एक छोटे से तालाब जैसा रह गया है।”
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सारस क्रेन और ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क सहित संकटग्रस्त प्रजातियों को आवास के नुकसान और मानवीय गतिविधियों से बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जोशी कहते हैं, “ऐतिहासिक डेटा सीमित होने के कारण, हम आर्द्रभूमियों की विविधता की तुलना नहीं कर सकते हैं, लेकिन पक्षियों की आबादी में गिरावट के स्पष्ट सबूत हैं। साइबेरियाई क्रेन (ल्यूकोगेरानस ल्यूकोगेरानस) पूरी तरह से गायब हो चुका है, और गिद्ध, जो कभी आम थे, अब बहुत कम दिखाई देते हैं। यहां तक कि सारस क्रेन, जो पहले काफी संख्या में थे, अब खतरे में है। हालांकि, सरसई नवार झील इस प्रजाति के लिए एक महत्वपूर्ण बसेरा स्थल बनी हुई है।”
वेटलैंड के लिए खतरा
अध्ययन के अनुसार, समन वेटलैंड कॉम्प्लेक्स को मानवीय गतिविधियों से भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। शुष्क मौसम के दौरान कृषि अतिक्रमण के कारण आवास का काफी नुकसान हुआ है, तो वहीं रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल से पोषक तत्व बह जाते हैं। इसने जलकुंभी जैसी आक्रामक प्रजातियों के प्रसार को तेज कर दिया है, जो खुले पानी की सतहों और घुलित ऑक्सीजन के स्तर को कम करते हैं। इससे आर्द्रभूमि कई जलपक्षी प्रजातियों के लिए अनुपयुक्त हो जाती है।

यूट्रोफिकेशन एक प्रक्रिया जो तब होती है जब एक जलाशय पोषक तत्वों से समृद्ध होता है जिससे शैवाल की अधिकता और ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इससे जलीय जीवन को नुकसान पहुंचता है। इसने विशेष रूप से कुर्रा झील और कुडैया दलदली भूमि जैसे आर्द्रभूमि को प्रभावित किया है, जहां घने वनस्पतियों ने खुले पानी के आवासों की जगह ले ली है। इसके अलावा गाद, मवेशियो की चराई, कमल कंद संग्रह और अनुचित अपशिष्ट निपटान भी एक बड़ी समस्या हैं, जो आवास क्षरण को बढ़ाते हैं। जोशी कहते हैं, “कभी-कभार अवैध शिकार, आवारा कुत्ते और भूमि मुआवजे को लेकर सामुदायिक संघर्ष अतिरिक्त चुनौतियां पैदा करते हैं। इन सबके अलावा, हाई-टेंशन वायर से विशेष रूप से सारस क्रेन जैसे बड़े पक्षियों के लिए बड़े खतरे पैदा हो रहे हैं।”
संरक्षण के लिए जरूरी उपाय
शोधकर्ताओं का कहना है कि इन झीलों और दलदलों को फिर से बेहतर बनाने के लिए, सबसे पहले सख्त कानून बनाने चाहिए, फिर स्थानीय लोगों को इसमें शामिल करना होगा और बड़े स्तर पर इनके आसपास के वातावरण को ठीक करना होगा। इसके अलावा, लंबे समय तक पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए नियमित निगरानी और अनुकूली प्रबंधन रणनीतियां भी आवश्यक हैं।
प्रमाण बताते हैं कि आर्द्रभूमि बहाली गतिविधियों से ठोस परिणाम मिल सकते हैं। जोशी कहते हैं, “हालांकि कुर्रा झील और कुडैय्या मार्श लैंड की हालत बहुत खराब है, लेकिन दूसरी झीलों को अभी भी ठीक किया जा सकता है। जैसे, स्थानीय लोगों ने बताया कि सरसई नवार झील से गाद निकालने पर पानी ज्यादा समय तक रुका रहा और अगले साल पक्षियों की संख्या, खासकर बत्तखों की संख्या में, काफी बढ़ोतरी हुई।” दूसरी कोशिशें, जैसे आक्रामक पौधों को हटाना, कृषि अतिक्रमण को नियंत्रित करना और कचरा प्रबंधन में सुधार करना, इन झीलों को और भी बेहतर बना सकती है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 6 फरवरी 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कोलकाता, पश्चिम बंगाल में एक नर और मादा नोर्दन पिनटेल (अनस एकुटा) देखी गई, जिन्हें समान पक्षी अभयारण्य में भी देखा जा सकता है। तस्वीर- J.M. गर्ग, विकिमीडिया कॉमन्स, (CC BY-SA 3.0)