- यूएनईपी एमिशन गैप रिपोर्ट 2025 ने चेतावनी दी है कि अगर सभी देशों ने अपनी जलवायु योजनाएँ पूरी तरह लागू भी कर दीं, तो भी दुनिया का तापमान 2.3°C से 2.5°C डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।
- रिपोर्ट के मुताबिक, 2023-24 के बीच भारत में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की मात्रा सबसे अधिक रही।
- यूएनईपी ने देशों से, खासकर बड़े प्रदूषक देशों से, तुरंत और बड़े कदम उठाने की अपील की है ताकि उत्सर्जन का अंतर कम किया जा सके।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने चेतावनी दी है कि वैश्विक जलवायु कार्रवाई अब भी पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बहुत कमज़ोर है। 4 नवंबर को जारी हुई यूएनईपी एमिशन गैप रिपोर्ट 2025 में कहा गया है कि अगर सभी देश अपनी मौजूदा जलवायु योजनाएँ पूरी तरह लागू भी कर दें, तो भी इस सदी में धरती का तापमान 2.3°C से 2.5°C तक बढ़ सकता है।
मौजूदा नीतियों के तहत, धरती 2.8°C तक गर्म हो सकती है। यह पिछले साल के अनुमान (3.1°C) से थोड़ा बेहतर है, लेकिन अब भी सुरक्षित सीमा से बहुत ज़्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार, यह 0.3°C का सुधार आंशिक रूप से उत्सर्जन के नए आँकड़ों में तकनीकी सुधारों के कारण है। फिलहाल अमेरिका पेरिस समझौते से बाहर निकलने की योजना बना रहा है। अगर ऐसा होता है तो इस 0.3°C का सुधार में 0.1°C की कमी आ जाएगी।
रिपोर्ट ने आगाह किया है कि वैश्विक तापमान अस्थायी रूप से पेरिस समझौते के 1.5°C लक्ष्य से ऊपर चला जाएगा। सबसे अच्छे हालात में तापमान लगभग 0.3°C तक अस्थायी रूप से बढ़ेगा और फिर इस सदी के अंत तक घटेगा, लेकिन यह तभी संभव है जब अभी से उत्सर्जन में तेजी से भारी कटौती शुरू की जाए।
रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर 2025 से “तेज़ कार्रवाई” वाला रास्ता अपनाया जाए, तो 66% संभावना है कि तापमान बढ़ोतरी को लगभग 0.3°C तक सीमित रखा जा सके और साल 2100 तक इसे फिर से 1.5°C पर लाया जा सके। इसके लिए 2019 के उत्सर्जन के स्तर से 2030 तक 26% और 2035 तक 46% की कटौती करनी होगी।
यूएनईपी की कार्यकारी निदेशक इन्गर एंडरसन ने कहा कि देशों को पेरिस समझौते के वादे पूरे करने के तीन मौके मिले, लेकिन हर बार वे लक्ष्य से पीछे रह गए। उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं से कुछ प्रगति हुई है, लेकिन यह काफी नहीं है। हमें अब बहुत कम समय में, बेहद कठिन वैश्विक हालात के बीच, पहले से कहीं ज़्यादा बड़े पैमाने पर उत्सर्जन घटाने की ज़रूरत है।”

उन्होंने कहा कि लक्ष्यों को पाने के लिए हमारे पास पहले से ही आज़माए हुए समाधान मौजूद हैं।
“सस्ती नवीकरणीय ऊर्जा की तेज़ी से बढ़ती उपलब्धता से लेकर मीथेन उत्सर्जन पर नियंत्रण तक, हमें पता है कि क्या करना है। अब वक्त है कि सभी देश पूरी ताकत से आगे बढ़ें और महत्वाकांक्षी जलवायु कदम उठाएँ, जो तेज़ आर्थिक विकास, बेहतर स्वास्थ्य, ज़्यादा रोज़गार, ऊर्जा सुरक्षा और मजबूती लाएँ।”
एमिशन गैप रिपोर्ट, जो अब अपने सोलहवें वर्ष में है, यह बताती है कि दुनिया 2°C से कम और 1.5°C के पेरिस समझौते के लक्ष्य के कितनी नज़दीक पहुँच रही है।
भारत में उत्सर्जन में सबसे तेज़ बढ़ोतरी दर्ज
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2023 के तुलना में 2024 में ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन की मात्रा विश्व में सबसे अधिक रही।
वर्तमान में कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के मामले में छः सबसे बड़े देश हैं: चीन, अमेरिका, भारत, यूरोपीय संघ, रूस और इंडोनेशिया। ऐतिहासिक रूप से देखें तो अब तक सबसे ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन अमेरिका ने किया है, उसके बाद चीन और यूरोपीय संघ का स्थान है।
हालाँकि भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अभी भी वैश्विक औसत से कम है, लेकिन औद्योगिक गतिविधियों और ऊर्जा की बढ़ती मांग के कारण उसका कुल कार्बन प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। भारत के बिजली क्षेत्र में कोयले का दबदबा बना हुआ है, जो देश की लगभग आधी बिजली पैदा करता है। इसके अलावा परिवहन और सीमेंट उद्योगों ने भी उत्सर्जन में बढ़ोतरी की है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत समेत 100 से ज़्यादा देशों ने अभी तक अपने कॉमन रिपोर्टिंग टेबल्स (CRTs) जमा नहीं किए हैं। ये राष्ट्रीय स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का विवरण देने वाले दस्तावेज़ होते हैं, जो पेरिस समझौते के तहत बनाए गए एन्हांस्ड ट्रांसपेरेंसी फ्रेमवर्क का हिस्सा हैं। सीआरटी टेबल्स देशों की उत्सर्जन स्थिति और लक्ष्यों की प्रगति को समान रूप से रिपोर्ट करने के लिए तैयार की गई हैं।

जी-20 देश 2030 के लक्ष्यों की राह पर नहीं
रिपोर्ट का एक हिस्सा जी-20 देशों को समर्पित है, जो मिलकर दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं। रिपोर्ट में पाया गया है कि यह समूह सामूहिक रूप से अपने 2030 के एनडीसी (राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान) लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में नहीं है, और 2035 के और भी महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को पूरा करना तो और मुश्किल दिख रहा है।
इस साल सितंबर तक, पेरिस समझौते के केवल एक-तिहाई सदस्य देशों ने, जो वैश्विक उत्सर्जन के लगभग 63 प्रतिशत हिस्से को कवर करते हैं, नए एनडीसी प्रस्तुत किए हैं या उनकी घोषणा की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तापमान में बढ़ोतरी को रोकने और अत्यधिक वृद्धि से बचाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
विकासशील देशों का अनुमान है कि उन्हें अपने एनडीसी वादों को पूरा करने के लिए करीब 5.3 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता होगी। यह दिखाता है कि लक्ष्यों और उपलब्ध वित्त के बीच अभी भी बहुत बड़ा अंतर है।
भारत का कहना है कि विकसित देशों ने यूएनएफसीसीसी (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा समझौता) के तहत हर साल 100 अरब डॉलर की मदद देने का वादा पूरा नहीं किया है। उम्मीद है कि भारत के वार्ताकार सीओपी-30 में इस मुद्दे को फिर से उठाएँगे, खासकर जब विकासशील देश 2035 के लिए अपने अगले एनडीसी और उत्सर्जन कटौती लक्ष्यों की तैयारी कर रहे हैं।
विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएँ
यूएनईपी की रिपोर्ट पर दुनिया भर के वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने प्रतिक्रिया दी है। रेचल क्लेटस, जो यूनियन ऑफ कन्सर्न्ड साइंटिस्ट्स (एक गैर-लाभकारी विज्ञान संगठन) में क्लाइमेट और एनर्जी प्रोग्राम की सीनियर पॉलिसी डायरेक्टर हैं, ने इस रिपोर्ट के निष्कर्षों को “चिंताजनक, क्रोधित करने वाला और दिल तोड़ने वाला” बताया। उन्होंने कहा, “वर्षों से अमीर देशों की बेहद कमज़ोर कार्रवाई और जीवाश्म ईंधन कंपनियों की भ्रामक और रुकावट पैदा करने वाली नीतियाँ हमें इस स्थिति तक लाने की ज़िम्मेदार हैं। विश्व नेताओं के पास अब भी मौका है कि वे ठोस कदम उठाएँ और गर्मी फैलाने वाले उत्सर्जन को तुरंत घटाएँ। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो यह मानवता के प्रति उनकी ज़िम्मेदारी से गंभीर लापरवाही होगी।”
रिचर्ड ब्लैक, जो एम्बर (एक वैश्विक ऊर्जा थिंक टैंक) में पॉलिसी और रणनीति निदेशक हैं, ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में प्रगति को एक सकारात्मक संकेत बताया। उन्होंने कहा, “एनडीसी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे पूरी कहानी नहीं बताते। राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा योजनाएँ दिखाती हैं कि कई अर्थव्यवस्थाएँ स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ रही हैं। नवीकरणीय ऊर्जा की तैनाती की दरें और भी आशाजनक हैं। जलवायु परिवर्तन केवल एक कारण है; ऊर्जा सुरक्षा और सस्ती ऊर्जा जैसे दूसरे कारण भी आज के अनिश्चित वैश्विक हालात में और मज़बूत बनकर उभरे हैं। अब सबूत साफ हैं कि चाहे किसी सरकार की प्रेरणा कुछ भी हो, आर्थिक विकास, सुरक्षा, स्वच्छ हवा, रोज़गार या ऊर्जा स्वतंत्रता, स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था जीवाश्म ईंधन मॉडल की तुलना में कहीं ज़्यादा अवसर देती है।”
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कैथरीन अब्रू, जो इंटरनेशनल क्लाइमेट पॉलिटिक्स हब की निदेशक हैं, ने कहा कि समस्या पेरिस समझौते में नहीं, बल्कि उन देशों में है जिन्होंने अपने वादे पूरे नहीं किए। उन्होंने कहा, “इस साल की एमिशन गैप रिपोर्ट साफ दिखाती है कि विफलता पेरिस समझौते की नहीं है, बल्कि जी-20 के कुछ प्रभावशाली देशों की है, जो जलवायु परिवर्तन पर अपने किए वादों को निभाने में नाकाम रहे हैं।”
बैनर तस्वीर: भारत की ऊर्जा जरूरतें अभी भी कोयले का बोलबाला है और कार्बन उत्सर्जन ज्यादा हो रहा है। हजारों लोग अपनी आजीविका के लिए सीधे या किसी ओर तरीके से कोयला पर निर्भर हैं। तस्वीर: श्रीकांत चौधरी/मोंगाबे।