- एक अध्ययन से पता चला है कि आक्रामक विलायती बबूल और आवारा कुत्ते थार रेगिस्तान के स्थानीय मांसाहारी जीवों में बदलाव ला रहे हैं।
- सिर्फ घास के मैदानों में ही जीवित रह सकने वाली रेगिस्तानी लोमड़ी जैसी प्रजातियां विलायती बबूल वाले आवासों से दूर रहती हैं और इसके लिए अपनी गतिविधियों में इस तरह बदलाव लाती हैं कि आवारा कुत्तों से उनका सामना कम से कम हो।
- शोधकर्ताओं का कहना है कि संवेदनशील घास के मैदानों में विलायती बबूले के फैलाव को नियंत्रित करना और आवारा कुत्तों पर लगाम लगाना, रेगिस्तान के खास शिकारी जीवों के संरक्षण के लिए बहुत जरूरी है।
दुनिया भर में घास के मैदान बहुत ज्यादा चराई, कृषि भूमि के विस्तार, जलवायु परिवर्तन और जैविक आक्रमण के दबाव में धीरे-धीरे बदल रहे हैं। भारत के थार रेगिस्तान में इस दबाव से यह तय हो रहा है कि कौन-सी प्रजातियां जीवित रहती हैं और वे आपस में इन जगहों का इस्तेमाल किस तरह करती हैं। एक नए पारिस्थितिकी अध्ययन में पाया गया है कि तेजी से फैलने वाले विलायती बबूल के पेड़ और मानव बस्तियों के पास रहने वाले जुड़े आवारा कुत्ते जैसी दो वजहें इस क्षेत्र में सामान्य आकार के स्थानीय मांसाहारी जीवों के चलने-फिरने, शिकार करने और साथ रहने के तरीके को बदल रहे हैं।
वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट के वन्यजीव पारिस्थितिकीविद् और इस अध्ययन के सह-लेखक चेतन मिशेर कहते हैं, “थार मरुस्थल के वन्यजीवों पर अभी भी उम्मीदों के हिसाब से कम अध्ययन हुआ है, जबकि यहां पर तेजी से पारिस्थितिकी से जुड़े बदलाव हो रहे हैं। विलायती बबूल अब लकड़ी देने वाला मुख्य पौधा बन गया है, जिससे आवास की संरचना बदल रही है। दूसरी तरफ, आवारा कुत्ते कई क्षेत्रों में सबसे बड़े या प्रमुख शिकारी की भूमिका निभा रहे हैं। ये दोनों आक्रामक तत्व मिलकर आवास, शिकार के तौर-तरीकों में बदलाव, प्रतिस्पर्धा और हस्तक्षेप के जरिए स्थानीय प्रजातियों को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर ऊपर से नीचे तक असर पड़ रहा है।”
बदलता रेगिस्तानी परिदृश्य
थार रेगिस्तान पश्चिमी भारत और दक्षिणी पाकिस्तान में लगभग 4,46,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्से और गुजरात का कच्छ क्षेत्र शामिल है। इसमें 2,00,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा का इलाका शामिल है।
शोधकर्ताओं ने इस भू-भाग में मौजूद पारिस्थितिकी विविधताओं को समझने के लिए अपने अध्ययन के लिए दो बिल्कुल अलग-अलग जगहों पर ध्यान केंद्रित किया: गुजरात में विलायती बबूल की बहुतायत वाले बन्नी घास के मैदान और राजस्थान में बीकानेर के आस-पास के ज्यादा बंटे हुए और कृषि-प्रभावित घास के मैदान।

इन जगहों को इसलिए चुना गया, क्योंकि यहां एक जैसे वन्यजीव पाए जाते हैं। इनमें व्यापक विविधता वाली मरू बिल्ली और जंगली बिल्ली, मरू लोमड़ी और भारतीय लोमड़ी, सुनहार सियार के साथ-साथ रेगिस्तान के लिए अनुकूलित छोटे स्तनधारी, पक्षी और सरीसृपो शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने वन्यजीवों की मौजूदगी और उनकी गतिविधियों को दर्ज करने के लिए मोशन-ट्रिगर इन्फ्रारेड कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल करते हुए फील्ड सर्वे किए।
इस अध्ययन में जमीन पर उगी हुई वनस्पतियों का पता लगाने के लिए हाई-रिज़ॉल्यूशन वाली सैटेलाइट तस्वीरों का भी इस्तेमाल किया गया जिसमें खुली जगहों पर वनस्पति, आक्रामक प्रजातियां, खेती की जमीन, जल संरचनाएं और पक्की जगहों वाले इलाके शामिल थे। आवास से जुड़ी इन विविधताओं को कई स्थानीय पैमानों पर हर कैमरा लोकेशन से जोड़ा गया। ऑक्यूपेंसी मॉडलिंग का इस्तेमाल करके, इस अध्ययन ने अनुमान लगाया कि मांसाहारी जानवर कहां मिल सकते हैं। साथ ही, छूटे हुए अवलोकनों और पर्यावरण से जुड़े प्रभावों को भी ध्यान में रखा गया। इस अध्ययन में यह जांच करने के लिए समय-आधारित गतिविधि विश्लेषण का भी इस्तेमाल किया गया कि प्रजातियां कब सक्रिय थीं और उनकी दिनचर्या कितनी हद तक एक-दूसरे से मेल खाती थी।
आक्रामक वनस्पतियां और रेगिस्तान
अध्ययन के नतीजों से पता चला कि भारतीय लोमड़ियां उन इलाकों में नहीं रहती थीं जहां रेगिस्तानी लोमड़ियां या कुत्ते रहते थे। लेकिन, वे अक्सर उन जगहों पर पाई जाती थीं जहां सुनहरे सियार मौजूद होते थे। यह महाराष्ट्र के एक अध्ययन के बिल्कुल विपरीत था, जहां भारतीय लोमड़ियां सियारों से दूर रहती हैं। जंगली बिल्लियां भी अक्सर सियारों के साथ ही दिखाई देती थीं। बीकानेर में रेगिस्तानी लोमड़ियां और कुत्ते अधिकतर एक साथ देखे गए, जबकि विलायती बबूल की बहुतायत वाले बन्नी इलाके में सियार और जंगली बिल्लियां ज़्यादा आम थे। बीकानेर में भारतीय लोमड़ियां बिल्कुल भी नहीं देखी गईं, जबकि रेगिस्तानी बिल्लियां दोनों ही इलाकों में लगभग बराबर संख्या में पाई गईं।
रेगिस्तानी लोमड़ियां खुली जगहों पर होने वाली प्राकृतिक वनस्पतियों को प्राथमिकता देती हैं और विलायती बबूल के जंगलों और खेतों से दूर रहती हैं। वे अक्सर मानव बस्तियों के पास भी पाई जाती हैं। ऐसा शायद इसलिए हैं, क्योंकि बीकानेर के गांव उन बचे हुए घास के मैदानों के पास स्थित हैं जिन पर वे निर्भर करती हैं।
वहीं, सुनहरे सियार पर्यावरण की अलग-अलग परिस्थितियों में जीवित रहने वाला सामान्य आवास वाला जीव है। यह विभिन्न प्रकार के आवासों का इस्तेमाल करता रहा और विलायती बबूल के फैलाव वाले क्षेत्रों में भी इसकी मौजूदगी बनी रही। अध्ययन में शामिल कुत्ते की सबसे छोटी प्रजाति भारतीय लोमड़ी ने मरू लोमड़ी और कुत्तों से दूरी बनाई और बीकानेर से पूरी तरह गायब हो गए। इससे संकेत मिलता है कि जहां शिकारी और कुत्तों का दबाव अधिक है, वहां प्रतिस्पर्धात्मक बहिष्करण हो सकता है। सियार के साथ क्षेत्रीय अतिक्रमण चौंकाने वाला था, जिसकी एक संभावित वजह आकार-आधारित प्रतिस्पर्धा हो सकती है। मिशेर कहते हैं, “थार में, मध्यम आकार का होने के कारण मरु लोमड़ी को सियार के साथ ज्यादा सीधी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, जबकि छोटी भारतीय लोमड़ी रेगिस्तानी लोमड़ियों के मजबूत प्रतिस्पर्धी दबाव से बचने के लिए सियारों के साथ भौगोलिक रूप से अतिक्रमण कर सकती है।”

इस अध्ययन में बीकानेर में भारतीय लोमड़ी के होने का पता नहीं चला। पहले की रिपोर्टों में इसकी मौजूदगी की बात कही गई थी, इसके बावजूद इसका न मिलना चिंता का विषय है। मिशेर का कहना है कि यह स्थानीय स्तर पर इनकी संख्या में कमी या विस्थापन का संकेत हो सकता है, जिसका संबंध संभवतः इस क्षेत्र में कुत्तों की बहुत ज्यादा तादाद और उनकी गतिविधियों से है; लेकिन उन्होंने यह भी आगाह किया कि इस बात के सबूत अभी निर्णायक नहीं हैं और इस पर आगे और जांच-पड़ताल जरूरी है।
वहीं जंगली बिल्लियां विदेशी वनस्पति वाली वनभूमि से लाभान्वित होती दिखाई देती हैं, जो विलायती बबूल की बहुलता वाले क्षेत्रों में ज्यादा संख्या में पाई जाती हैं, जबकि मायावी रेगिस्तानी बिल्ली का आवास से जुड़ाव कमजोर प्रतीत होता है, जो शायद कम पहचान दर को दिखाता है। कुल मिलाकर, विलायती बबूल का प्रसार अनुकूलनीय प्रजातियों के पक्ष में जाता दिखता है, लेकिन घास के मैदानों वाली खास प्रजातियों के लिए खतरा पैदा करता है।
वनस्पति में होने वाले ये बदलाव उन शिकारी प्रजातियों पर भी असर डाल सकते हैं जिन पर रेगिस्तान के मांसाहारी जीव निर्भर करते हैं। सेंटर फॉर पॉलिसी डिज़ाइन के डायरेक्टर और अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) के सीनियर फेलो अबी टी. वनाक कहते हैं, “आक्रामक प्रजातियां शाकाहारी और मांसाहारी दोनों समुदायों में बदलाव ला सकती हैं।” “उदाहरण के लिए, विलायती बबूल घास के मैदानों को झाड़ियों वाले इलाकों में बदल सकते हैं और इस तरह उन प्रजातियों को फायदा होता है जो किसी भी तरह के माहौल में ढल जाते हैं। रेट्स जैसी प्रजातियां (चूहों की एक प्रजाति) विलायती बबूल की झाड़ियों में आम तौर पर ज्यादा जबकि मिलार्डिया जैसी प्रजातियां खुले घास के मैदानों में अधिक पाई जाती हैं। आक्रामक प्रजातियों से प्रभावित आवास संरचना और उससे जुड़े शिकार के खतरे, सूक्ष्म जलवायु और भोजन की उपलब्धता में अंतर, किसी क्षेत्र में शाकाहारी और मांसाहारी जीवों के पूरे समुदाय को बदल सकते हैं।”
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कुत्तों से बदलता व्यवहार
अगर विलायती बबूल से आवास में बदलाव आ रहा है, तो कुत्तों से व्यवहार में बदलाव आ रहा है। इंसानों से मिलने वाले भोजन और आश्रय के सहारे, खुले में घूमने वाले कुत्ते प्रमुख शिकारी बन जाते हैं। वहां के मूल मांसाहारी जीव इनसे बचने के लिए या तो इनसे दूरी बनाए रखते हैं या फिर अपनी गतिविधियों में बदलाव लाते हैं।
उदाहरण के लिए, रेगिस्तानी लोमड़ियां मुख्य रूप से रात में घूमती हैं, लेकिन अध्ययन में पाया गया कि कुत्तों के प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में, उनकी गतिविधि कुत्तों की सबसे व्यस्त गतिविधियों से दूर है, जिससे सामना होने की संभावना कम हो जाती है। फिर भी, यह संबंध सिर्फ बचाव का नहीं है। मौजूदगी मॉडल ने एक अप्रत्याशित सकारात्मक स्थानीय संबंध का खुलासा किया, लेकिन रेगिस्तानी लोमड़ी और कुत्तों की मौजूदगी के बीच मजबूत अस्थायी बचाव भी दिखा। आसान शब्दों में कहें तो, वे एक ही क्षेत्रों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन दिन के अलग-अलग समय पर।
इन नतीजों से संरक्षण का साफ संदेश मिलता है: किसी भी जगह की बनावट ही वहां के जीवों के जीवित रहने का आधार होती है। घास के मैदानों वाले मुख्य सुरक्षित इलाकों में विलायती बबूल के फैलाव को रोकना और पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में आवारा कुत्तों पर खास तौर पर नियंत्रण रखना, उन खास शिकारी जीवों पर होने वाले हमले के दबाव, बीमारी के खतरे और उनके आवास में कम नुकसान के लिए बहुत जरूरी होगा। खुले घास के मैदानों और कम पेड़-पौधों वाले इलाकों का मिला-जुला स्वरूप बनाए रखने से खास तरह के शिकारी जीव और आम शिकारी जीव दोनों ही साथ में रह पाएंगे।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 9 मार्च, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: जंगली बिल्ली। अध्ययन में पाया गया कि जंगली बिल्लियों को आक्रामक वनस्पति से फायदा हो रहा है और वे विलायती बबूल की बहुलता वाले क्षेत्रों में अधिक पाई जा रही हैं। विलायती बबूल का फैलाव रेगिस्तानी बिल्ली जैसी अनुकूल प्रजातियों के लिए फ़ायदेमंद लग रहा है, जबकि घास के मैदानों की खास प्रजातियों को इससे खतरा पैदा हो रहा है। तस्वीर: चेतन मिशेर।