- हाल ही के दिनों में गैस आपूर्ति में आई गिरावट से भारत की ‘स्वच्छ ईंधन’ रणनीति की आयत की गई एलपीजी पर निर्भरता उजागर हुई है।
- गैस की कमी के कारण से कम आय वाले परिवारों, छात्रावासों और भोजनालयों में, अस्थायी रूप से लकड़ी जैसे प्रदूषण फ़ैलाने वाले ईंधन का उपयोग फिर से शुरू हो गया है।
- विश्लेषकों का कहना है कि यह व्यवधान भारत के खाना पकाने के ऊर्जा मिश्रण पर पुनर्विचार करने और अधिक विश्वसनीय, विकेन्द्रीकृत विकल्पों जैसे बिजली और बायोगैस में निवेश करने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
उत्तर-पश्चिम दिल्ली के भलस्वा इलाके की गलियों में रमा को “सिलेंडर वाली मैडम” के नाम से जाना जाता है। सालों से, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए रसोई गैस (एलपीजी) कनेक्शन की व्यवस्था करती आ रही हैं। रमा लोगों को लकड़ी और कोयले वाले चूल्हे छोड़ने के लिए प्रेरित करती हैं और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) के तहत सब्सिडी पर रसोई गैस लेने में उनकी मदद करती हैं। हालांकि, पिछले एक महीने से, हजारों किलोमीटर दूर चल रहे इजरायल-ईरान संघर्ष के कारण एलपीजी आपूर्ति में हो रही देरी के चलते रमा के सारे प्रयास विफल हो रहे हैं।
“विडंबना यह है कि मेरे उपनाम (सिलेंडर वाली मैडम) के बावजूद, मुझे खुद एलपीजी सिलेंडर पाने में मुश्किल हो रही है,” रमा ने मोंगाबे-इंडिया को बताया। इस दौरान सरकार द्वारा गैस के मौजूदा स्टॉक को नियंत्रित करने और लम्बी अवधि के लिए बचाने के लिए कदम उठाए गए हैं। शहरी क्षेत्रों में सिलेंडरों की बुकिंग के बीच 25 दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिन के अंतराल के प्रतिबंध को लागू किया है। सिलेंडरों की मांग में अचानक आई तेजी से घरेलू गैस के वितरण में देरी हो रही है, खासकर दिल्ली, गोवा, केरलम, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में, जहां जमाखोरी के बाद 15,000 सिलेंडर जब्त किए गए।
अमेरिका और इजरायल की सेनाओं द्वारा ईरान पर हमले के बाद भारत में एलपीजी की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। कुछ रेस्तरां, हॉस्टल और घरों में गैस कनेक्शन की जगह लकड़ी का इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत में घरेलू एलपीजी खपत का लगभग 60% आयात किया जाता है, जिसमें से 90% पश्चिमी एशिया क्षेत्र से आता है।
भलस्वा की रहने वाली 32 वर्षीया चांदनी चार बच्चों की मां हैं और पिछले डेढ़ साल से उज्ज्वला सब्सिडी की लाभार्थी हैं। उन्हें पिछले महीने तक गैस मिलती रही। जब उनका सिलेंडर रिफिल होना बंद हो गया, तो उन्होंने एक ऐसे ईंधन स्रोत का सहारा लिया जो उनके अनुसार एलपीजी से कहीं अधिक स्थिर और भरोसेमंद साबित हुआ – लकड़ी। उन्होंने पूछा, “मैं गैस के लिए इधर-उधर भटकते-भटकते थक गई हूं। जब मुझे चार बच्चों की देखभाल करनी है, तो सिलेंडर रिफिल करवाने के लिए मैं कितनी ही मशक्कत कर सकती हूँ?”
चांदनी ने बताया, “दिल्ली में लकड़ी की कीमतें दोगुनी हो गई हैं, पहले जो भाव 10 रुपए किलो थे अब 20 रुपए प्रति किलो हो गए हैं। एलपीजी इस्तेमाल करने से पहले हम पूरे हफ्ते के लिए 30-40 किलो लकड़ी जमा करके रखते थे। जब से यह कमी शुरू हुई है, न तो हमारे पास गैस है और न ही पर्याप्त लकड़ी। बाजार में सिलेंडर दोगुनी कीमत पर बिक रहे हैं। ईंधन का हर स्रोत महंगा हो गया है।”

एलपीजी आपूर्ति में दिक्कतें
भारत में घरेलू एलपीजी नेटवर्क की व्यापक पहुँच और विस्तार ही वर्तमान स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना रहा है। भारत में लगभग 33.20 करोड़ सक्रिय घरेलू एलपीजी कनेक्शन हैं, जिनमें से 10.4 करोड़ उज्ज्वला योजना के अंतर्गत हैं। इनमें से अधिकांश कनेक्शन शहरी क्षेत्रों में हैं, जहाँ मौजूदा संकट का प्रभाव सबसे ज़्यादा महसूस किया जा रहा है।
17 मार्च को सरकार ने एक बयान जारी कर कहा था कि देश में एलपीजी वितरकों में आपूर्ति में कमी की कोई रिपोर्ट नहीं मिली है। 9,271.2 करोड़ टन एलपीजी (भारत की एक दिन की आपूर्ति) ले जा रहे दो टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करने के बाद सफलतापूर्वक भारत में डॉक कर गए, लेकिन 22 अन्य जहाज अभी भी फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं।
भारत ने इस संकट से निपटने के लिए एलपीजी उत्पादन में 38% की वृद्धि की है, हालाँकि इससे गैस की आपूर्ति में आई कमी के पूरे होने की संभावना नहीं है। आईआईएसडी के नीति सलाहकार सुनील मणि ने बताया, “कच्चे तेल की प्रोसेसिंग से एलपीजी का उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है, आमतौर पर प्रोसेस्ड कच्चे तेल का लगभग 1-4%। इसका मतलब यह है कि रिफाइनरियां पेट्रोल और डीजल का उत्पादन बढ़ाए बिना एलपीजी उत्पादन में वृद्धि नहीं कर सकतीं। और भारत भले ही पेट्रोलियम उत्पादों का शुद्ध निर्यातक है, रिफाइनरियां एक निश्चित उत्पाद मिश्रण के लिए अनुकूलित हैं, इसलिए सिर्फ कच्चे तेल की प्रोसेसिंग ज्यादा करने से भारत में एलपीजी के उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ जाती है।”
व्यावसायिक प्रतिष्ठान गैस आपूर्ति की कमी के शुरुआती झटके को झेल रहे हैं। लेकिन शहरों में रहने वाले परिवारों में, चांदनी जैसी उज्ज्वला योजना की लाभार्थियों के सबसे ज़्यादा प्रभावित होने की आशंका हैं। दिल्ली के भीतर भी, पहाड़गंज जैसे कम आय वाले इलाकों में जलाऊ लकड़ी का स्टॉक धड़ल्ले से बिक रहा है। “इस दुकान में आठ साल काम करने के दौरान मैंने जलाऊ लकड़ी की इतनी ज्यादा मांग कभी नहीं देखी,” जलाऊ लकड़ी के विक्रेता, गिरिधर मल तारा चंद के यहां काम करने वाले एक कर्मचारी सुभाष ने बताया।
लोधी कॉलोनी जैसे अमीर इलाके में लकड़ी की दुकान चलाने वाली नीलम मैनी की उम्मीदों के मुताबिक बिक्री में तेजी नहीं आई है। उन्होंने कहा, “लोग गुजारा करने के लिए शायद बिजली के चूल्हे का इस्तेमाल कर रहे होंगे।”

लकड़ी के चूल्हों पर निर्भरता
अध्ययनों से पता चला है कि एलपीजी नेटवर्क के विस्तार से कई लाभ हुए हैं, जिनमें महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार भी शामिल है। झारखंड में, ग्रामीण परिवारों में एलपीजी को अपनाने में वृद्धि 2016 से 2020 तक हरित आवरण में वृद्धि से संबंधित थी, जिससे पता चलता है कि उज्ज्वला योजना ने “जिम्मेदार पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन” को बढ़ावा देने में उल्लेखनीय प्रभाव डाला है।
“दुर्भाग्य से, सबसे गरीब समुदायों के लिए चूल्हे और जलाऊ लकड़ी पर वापस लौटना सबसे आसान होगा, भले ही यह अब व्यवहार या मांग का मुद्दा न हो,” असर सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स की सलाहकार नेहा सैगल ने कहा। “अगर यह स्थिति बनी रहती है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में आपूर्ति, जहां अंतिम छोर तक डिलीवरी हमेशा से एक समस्या रही है, और भी कमजोर हो सकती है। शहरी क्षेत्रों में एलपीजी की बढ़ती कीमत के कारण यह उपयोगकर्ताओं के लिए पहुंच से बाहर हो सकती है,” उन्होंने आगे कहा।
भारत की लगभग 49% आबादी ईंधन के प्राथमिक स्रोत के रूप में लकड़ी का इस्तेमाल करती है। भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार, देश के पंजीकृत वन क्षेत्रों से प्रतिवर्ष 8.5 करोड़ टन जलाऊ लकड़ी निकाली जाती है, जिसमें सबसे अधिक मात्रा महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान से दर्ज की गई है।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने एलपीजी आपूर्ति बहाल होने तक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में लकड़ी और कोयला जलाने पर लगी पाबंदियों को अस्थायी रूप से हटा दिया है। भोपाल में लकड़ी के थोक विक्रेता शाहिर अली ने बताया कि उन्होंने छात्रावास जैसी जगहों से लकड़ी की मांग में तेजी देखी है। उन्होंने कहा, “मैं मध्य प्रदेश वन विभाग के डिपो से लकड़ी लेता हूँ। इस स्थिति ने सभी को परेशान कर दिया है और मुझे समय पर ग्राहकों तक लकड़ी पहुँचाने में कठिनाई हो रही है।”
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दूसरी ओर, कर्नाटका के वन मंत्री ईश्वर खंड्रे ने राज्य के वन अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए कि वे एलपीजी की मौजूदा कमी के मद्देनजर पेड़ों की अवैध कटाई को रोकने के लिए गश्त तेज करें।
हालांकि, सभी राज्यों और क्षेत्रों का अनुभव एक जैसा नहीं है। महाराष्ट्र के उत्पादन और प्रबंधन के पीसीसीएफ संजीव गौर ने कहा, “वन विभाग के अनुसार, हमें जलाऊ लकड़ी की मांग या आपूर्ति में कोई बदलाव देखने को नहीं मिला है। नीलामी पहले की तरह ही हो रही है।” ओडिशा में भी, आईएफएस अधिकारी और ओडिशा वन विकास निगम (ओएफडीसी) के प्रबंध निदेशक प्रेम कुमार ने कहा कि जलाऊ लकड़ी की मांग में कोई वृद्धि नहीं हुई है और उन्होंने इस बारे में आगे कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

स्रोतों और खपत में विविधता
मणि और सैगल दोनों इस बात से सहमत हैं कि एलपीजी आपूर्ति में व्यवधान घरेलू ईंधन के वैकल्पिक स्रोतों में निवेश करने का अवसर है। मणि ने कहा, “सबसे बेहतर तरीका धीरे-धीरे, लेकिन निर्णायक रूप से बिजली से खाना पकाने की ओर बढ़ना है, विशेष रूप से शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जहां बिजली ग्रिड का बुनियादी ढांचा अपेक्षाकृत मजबूत है।”
साल 2021 तक, भारत के केवल 5% परिवार ही खाना पकाने के लिए बिजली के उपकरणों, मुख्य रूप से एलपीजी के उपयोग के पूरक के रूप में, पर निर्भर थे।
प्रदूषण मुक्त कुकिंग पर आईआईएसडी की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड के जिन परिवारों ने बायोगैस का उपयोग शुरू किया, उन्होंने लकड़ी के उपयोग में 70% की कमी दर्ज की। इन परिवारों ने रखरखाव संबंधी चुनौतियों में आई कमी की जानकारी भी दी और पाया कि बायोगैस एलपीजी जितनी ही कुशल है और इसमें खाना पकाने का समय भी लगभग समान है।
इलेक्ट्रिक कुकर और बायोगैस संयंत्रों को बढ़ावा देने के लिए सरकार से सब्सिडी और जागरूकता के रूप में काफी समर्थन की आवश्यकता है। मणि ने आगे कहा, “विविधीकरण का मतलब एलपीजी या पीएनजी को रातोंरात बदलना नहीं है। इसका मतलब खाना पकाने की एक अधिक संतुलित और सुरक्षित ऊर्जा प्रणाली का निर्माण करना है जो कम आय वाले परिवारों की रक्षा करे, राजकोषीय स्थिरता को बढ़ावा दे और तेजी से अनिश्चित होते वैश्विक वातावरण में भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करे।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी वेबसाइट पर 19 मार्च, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: अमेरिका और इजरायल की सेनाओं द्वारा ईरान पर हमले के बाद भारत में एलपीजी की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। कुछ रेस्तरां, हॉस्टल और घरों में गैस की जगह लकड़ी का इस्तेमाल किया जा रहा है। (प्रतीकात्मक तस्वीर – ए.जे.टी. जॉनसिंह, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और एनसीएफ द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0) के माध्यम से)।