- ‘भारत का नियाग्रा’ कहा जाने वाला बस्तर का चित्रकोट जलप्रपात, इस साल मार्च में ही लगभग सूख गया है, जो इसके बदलते स्वरूप और बढ़ते संकट की गंभीर चेतावनी देता है।
- जानकारों का कहना है कि चित्रकोट जलप्रपात और इंद्रावती नदी के घटते बहाव के पीछे बारिश के बदलते ढंग, बांधों का असर, जंगलों की कटाई और अन्य मानवीय हस्तक्षेप जैसे कई कारण मिलकर काम कर रहे हैं।
- चित्रकोट जलप्रपात का यह बदलता रूप केवल एक पर्यटन स्थल की समस्या नहीं, बल्कि मध्य भारत की नदियों और पर्यावरण में हो रहे गहरे बदलावों का संकेत है।
इंद्रावती नदी पर स्थित बस्तर का चित्रकोट जलप्रपात संकट में है। अभी मार्च का महीना खत्म ही हुआ है लेकिन इस जलप्रपात की अधिकांश जलधाराएं सूख चुकी हैं। चट्टानों के बीच बहती पतली जलधाराओं को देख कर यकीन करना मुश्किल होता है कि यह वही जलप्रपात है, जिसे ‘भारत का नियाग्रा’ कहा जाता है। जहां कभी पानी का विशाल सैलाब गिरता था, वहां अब केवल लाल बलुआ पत्थर की नग्न चट्टानें और उनके बीच से रिसती कुछ बेहद मामूली जलधाराएं बची हैं।
दंडकारण्य के घने जंगलों और गहरी नदी घाटियों से घिरे बस्तर के पठारी भूभाग में स्थित चित्रकोट जलप्रपात लंबे समय से मध्य भारत के सबसे प्रभावशाली प्राकृतिक दृश्यों में गिना जाता रहा है। लगभग 90 फीट ऊंची घोड़े की नाल जैसी अर्धवृत्ताकार चट्टान से गिरती जलधारा, मानसून के महीनों में कई सौ मीटर चौड़ी हो जाती है और दूर से देखने पर यह एक विशाल दूधिया परदे की तरह दिखाई देती है। यह जलप्रपात जिस इंद्रावती नदी पर स्थित है, वह पूर्वी घाट की पहाड़ियों से निकलकर लगभग 535 किलोमीटर की यात्रा के बाद दक्षिण की ओर बहते हुए गोदावरी नदी में मिलती है।
दशकों तक मानसून के बाद भी इस जलप्रपात की चौड़ाई और प्रवाह लंबे समय तक बना रहता था और यह बस्तर की भौगोलिक तथा सांस्कृतिक पहचान का स्थायी प्रतीक माना जाता था। लेकिन स्थानीय निवासियों के अनुसार पिछले दो दशकों में इस दृश्य में एक धीमा परन्तु स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देने लगा है।
चित्रकोट इलाके के 55 वर्षीय रामजीत बघेल कहते हैं, “मैं बचपन से इस जलप्रपात को देख रहा हूं। लेकिन ऐसी हालत कभी नहीं थी। जलप्रपात में पानी नहीं होने के कारण पर्यटन भी प्रभावित होता है और खेती भी। पर्यटन के कारण सैकड़ों लोगों की दाल-रोटी चलती थी, वह लगभग बंद हो चुकी है। मुझे तो यही लगता है कि हमने प्रकृति के साथ जो कुछ किया है, उसे ही हम भुगत रहे हैं।”
असल में पिछले कुछ सालों से बरसात खत्म होने के कुछ महीनों के भीतर ही जलप्रपात की चौड़ी जलधारा कई पतली धाराओं में सिमटने लगती है। कई बार गर्मियों की शुरुआत तक पहुंचते-पहुंचते यह प्रवाह इतना कम हो जाता है कि चट्टानों के बीच केवल संकरी जलरेखाएं ही दिखाई देती हैं। लेकिन इस साल जलप्रपात, जिस तरीके से सूखा है, उसने लोगों को चिंता में डाल दिया है।

राजधानी रायपुर स्थित पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के भूगर्भ एवं जल संसाधन अध्ययनशाला के प्रमुख निनाद बोधनकर कहते हैं, “मूल बात जल स्रोत की है। चित्रकोट जलप्रपात की पूरी ज़िंदगी उस नदी पर निर्भर करती है, जो इसे पानी देती है, यानी इंद्रावती नदी। पिछले कुछ सालों में इसके बहाव में परिवर्तन हुआ है, जिसका असर अब और साफ-साफ नज़र आ रहा है। इसके कुछ कारण प्राकृतिक हैं और कुछ मानव निर्मित। आने वाले दिनों में चित्रकोट जलप्रपात में पानी का संकट और गहरा जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।”
जिस महानदी पर यह जलप्रपात है, वह बंगाल की खाड़ी में जल और गाद के प्रवाह के मामले में भारत की दूसरी सबसे बड़ी प्रायद्वीपीय नदी है। यह गोदावरी की सहायक नदी है और उसका जलग्रहण क्षेत्र लगभग 40 से 41 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह इलाका दंडकारण्य के पठारी भूभाग में आता है, जहां घने उष्णकटिबंधीय जंगल, मध्यम ढाल वाली पहाड़ियां और गहरी घाटियां मिलती हैं।
मौसम विभाग और नदी बेसिन के अध्ययन के अनुसार इस इलाके में औसतन हर साल लगभग 1400 से 1600 मिलीमीटर वर्षा होती है। लेकिन इस वर्षा का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के बीच आने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान ही गिरता है। इसलिए नदी का स्वभाव बहुत हद तक मानसून पर निर्भर रहता है। मानसून के महीनों में नदी अचानक भर जाती है और उसका प्रवाह कई गुना बढ़ जाता है। लेकिन जनवरी से मई के बीच पानी तेजी से कम होने लगता है।
इसके बावजूद पहले इस नदी में इतना आधार प्रवाह बना रहता था कि चित्रकोट जलप्रपात पूरे साल सक्रिय दिखाई देता था। पुराने भूगोल अभिलेख बताते हैं कि 1980 और 1990 के दशक तक गर्मियों में भी जलप्रपात की चौड़ाई बनी रहती थी। यात्रियों के विवरणों और सरकारी पर्यटन रिकॉर्ड में भी लिखा मिलता है कि फरवरी-मार्च में भी यहाँ गिरते पानी की धुंध कई मीटर ऊपर तक उठती दिखाई देती थी। लेकिन पिछले लगभग 20 वर्षों में यह तस्वीर धीरे-धीरे बदलने लगी है। अब हालत ये है कि मार्च के महीने में ही जलप्रपात की चौड़ी धाराएँ टूटकर, पतली लकीरों में बदल जाती हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में नदी के दीर्घकालिक प्रवाह में बदलाव के कारण ये स्थितियां बनी हैं। गोदावरी नदी प्रणाली के अलग-अलग हाइड्रोलॉजिकल स्टेशनों के 1965 से 2015 तक के प्रवाह डेटा का अध्ययन करने पर पता चलता है कि कई सहायक नदियों में औसत प्रवाह धीरे-धीरे कम हो रहा है। वैज्ञानिक इसके लिए मैन्-केन्डल प्रवृत्ति परीक्षण (Mann-Kendall trend test) और सेन का ढाल आकलन (Sen’s slope estimator) जैसी सांख्यिकीय तकनीकों का उपयोग करते हैं। इन विश्लेषणों से संकेत मिला है कि 1990 के दशक के बाद कई स्थानों पर नदी प्रवाह में गिरावट की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी।
इन अध्ययन के अनुसार इंद्रावती नदी के अंतिम गेजिंग स्टेशन पर औसत वार्षिक प्रवाह लगभग 22.96 × 10⁹ घन मीटर दर्ज किया गया है। लेकिन आँकड़ों का विश्लेषण यह भी दिखाता है कि खासकर गर्मियों के महीनों में नदी का आधार प्रवाह धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया। 1960 और 1970 के दशक में प्रवाह लगभग स्थिर था, 1980 के दशक के बाद हल्की गिरावट दिखने लगी और 2000 के बाद यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हो गई।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जब नदी के प्रवाह में ऐसे दीर्घकालिक बदलाव होते हैं तो उनका असर सबसे पहले उन जगहों पर दिखाई देता है जहाँ नदी का पानी किसी खास प्राकृतिक संरचना को बनाए रखता है, जैसे जलप्रपात। इस वजह से चित्रकोट का बदलता रूप वैज्ञानिकों के लिए एक तरह का प्राकृतिक संकेतक बन सकता है।
लेकिन केवल वर्षा की मात्रा देखकर इस बदलाव को समझना संभव नहीं है। नदी के जलविज्ञान में तलछट यानी मिट्टी और रेत के बहाव की भी बड़ी भूमिका होती है। गोदावरी नदी प्रणाली पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले पाँच दशकों में समुद्र तक पहुँचने वाली तलछट की मात्रा बहुत कम हो गई है। 1970 के दशक में यह नदी प्रणाली हर साल लगभग 150 मिलियन टन तलछट समुद्र तक पहुँचाती थी। हाल के वर्षों में यह घटकर लगभग 47 मिलियन टन प्रति वर्ष रह गई है।

इस गिरावट का एक बड़ा कारण नदी पर बने बांध और जलाशय हैं। ये संरचनाएँ तलछट को अपने भीतर रोक लेती हैं। इसका असर केवल समुद्र के किनारों पर ही नहीं पड़ता बल्कि नदी के ऊपरी और मध्य हिस्सों की भू-आकृति भी बदल सकती है। जलप्रपात जैसे स्थल विशेष रूप से पानी और तलछट के संतुलन पर निर्भर करते हैं। यदि यह संतुलन बदलता है तो लंबे समय में जलप्रपात की संरचना और उसका प्रवाह दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
इंद्रावती नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में किए गए GIS और रिमोट सेंसिंग अध्ययनों से अनुमान लगाया गया है कि इस इलाके से हर साल लगभग 2.75 से 4.28 घन मीटर प्रति हेक्टेयर तलछट निकलती है। मानसून के दौरान यह बड़ी मात्रा में नदी में पहुँचती है। लेकिन जब रास्ते में बड़े जलाशय मौजूद हों तो यह तलछट आगे नहीं बढ़ पाती और नदी की प्राकृतिक ऊर्जा तथा प्रवाह संतुलन बदल सकता है।
भूमि उपयोग में बदलाव भी इस कहानी का हिस्सा है। इंद्रावती नदी का अधिकांश जलग्रहण क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से घने जंगलों से ढका हुआ रहा है। बस्तर आज भी बड़े वन क्षेत्रों के लिए जाना जाता है, लेकिन उपग्रह चित्र बताते हैं कि पिछले तीन दशकों में कई जगहों पर वन आवरण कम हुआ है। खनन, खेती का विस्तार, सड़क निर्माण और जंगलों में आग जैसी गतिविधियों ने इसमें भूमिका निभाई है।
जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, वे पानी के भंडार भी होते हैं। वे वर्षा के पानी को जमीन में समाने देते हैं और धीरे-धीरे उसे भूजल के रूप में संचित करते हैं। जब जंगल कम होते हैं तो बारिश का पानी तेजी से बहकर नदी में पहुँच जाता है। इससे मानसून के दौरान अचानक बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है, लेकिन मानसून खत्म होते ही नदी का पानी तेजी से घट जाता है।
छत्तीसगढ़ में वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली मीतू गुप्ता कहती हैं, “जंगल के कम होने का असर ये हुआ है कि बारिश का पानी पहले की तरह धीरे-धीरे जमीन में नहीं समाता, बल्कि तेजी से बहकर निकल जाता है। इसका मतलब है कि मानसून में तो नदी भर जाती है, लेकिन कुछ ही महीनों में उसका आधार प्रवाह खत्म होने लगता है। खनन, सड़क और बिखरते जंगल मिलकर उस स्पंज सिस्टम को खत्म कर रहे हैं, जो पानी को रोककर धीरे-धीरे नदी तक पहुंचाता था। जब तक हम जलग्रहण क्षेत्र में जंगलों की निरंतरता और गुणवत्ता को बहाल नहीं करेंगे, तब तक चाहे जितने भी कंट्रोल स्ट्रक्चर बना लें, नदी का प्राकृतिक प्रवाह वापस नहीं आएगा।”
इंद्रावती नदी पर बने जल संसाधन परियोजनाएँ भी इस पूरे समीकरण का हिस्सा हैं। अब जैसे ओडिशा में बनी ऊपरी इंद्रावती जलविद्युत परियोजना को ही लें। यह परियोजना इंद्रावती नदी की सबसे बड़ी संरचनाओं में से एक है। इस परियोजना का ग्रॉस स्टोरेज लगभग 2300 मिलियन क्यूबिक मीटर और लाइव स्टोरेज लगभग 1435 मिलियन क्यूबिक मीटर है। मतलब ये कि मानसून के दौरान यहां बड़ी मात्रा में पानी रोका जा सकता है और बाद में नियंत्रित तरीके से छोड़ा जाता है, जिससे नीचे के हिस्से खासकर बस्तर के चित्रकोट क्षेत्र, में प्राकृतिक प्रवाह का समय और मात्रा दोनों बदल जाते हैं।
इंद्रावती नदी के घटते प्रवाह को समझने में जोरा नाला एक बेहद अहम और ठोस उदाहरण है। ओडिशा-छत्तीसगढ़ सीमा पर सूतापदर के पास इंद्रावती नदी दो धाराओं में बंट जाती है — एक मुख्य धारा के रूप में छत्तीसगढ़ में प्रवेश करती है, जबकि दूसरी धारा जोरा नाला बनकर करीब 12 किलोमीटर बहते हुए शबरी नदी में चली जाती है। समय के साथ इस नाले का बहाव बढ़ गया, जिससे इंद्रावती की मुख्य धारा में आने वाला पानी कम हो गया। इसी असंतुलन को ठीक करने के लिए 2003 में कंट्रोल स्ट्रक्चर बनाया गया, जिसमें गर्मियों में पानी का बंटवारा लगभग 40.71% छत्तीसगढ़ और 59.29% ओडिशा के बीच दर्ज किया गया, यानी तय 50:50 हिस्सेदारी भी व्यवहार में नहीं बन पाई।
हाल के वर्षों में स्थिति इतनी बिगड़ी कि 2018 के बाद इंद्रावती में निरंतर प्रवाह संकट सामने आया और 2025 में हस्तक्षेप से पहले नदी का प्रवाह घटकर करीब 2 क्यूमेक तक पहुंच गया था। बाद में जोरा नाला कंट्रोल स्ट्रक्चर में अस्थायी सुधार किया गया तो यह प्रवाह बढ़कर लगभग 5.32 क्यूमेक तक पहुंचा। इससे साफ होता है कि छोटे स्तर पर पानी की धारा में बदलाव भी इंद्रावती जैसी बड़ी नदी के नीचे के हिस्से खासतौर पर चित्रकोट क्षेत्र के प्रवाह पर सीधा असर डालते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि बड़े बांध कई बार नदी में बहने वाली तलछट की मात्रा को 60 से 80 प्रतिशत तक कम कर देते हैं। जब ऐसा होता है तो नदी के नीचे के हिस्सों में पानी और मिट्टी का संतुलन बदल जाता है और दूर स्थित भू-आकृतिक संरचनाओं पर भी असर पड़ सकता है।

चित्रकोट क्षेत्र के विधायक विनायक गोयल कहते हैं, “ओडिशा के इलाकों में किसान गर्मियों में भी फसल ले रहे हैं, जिससे पानी की खपत वहीं अधिक हो रही है। इसके कारण पानी इस इलाके तक नहीं पहुंच पा रहा और जोरा नाला में भी प्रवाह कम हो गया है। इस मुद्दे पर ओडिशा सरकार से बातचीत जारी है और हमारी कोशिश है कि चित्रकोट तक पर्याप्त पानी पहुंचे।”
लेकिन इसी इलाके से विधायक और सांसद रह चुके प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष दीपक बैज इसे महज राजनीतिक बयान मानते हैं। दीपक बैज का कहना है कि छत्तीसगढ़, ओडिशा और केंद्र, तीनों ही जगहों में भाजपा की सरकार है। लेकिन इंद्रावती में जितना पानी ओडिशा से मिलना था, वह नहीं मिल रहा है। बैज का कहना है कि अभी मार्च में यह हालत है तो आने वाले दिनों में इंद्रावती और चित्रकोट जलप्रपात की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।
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इंद्रावती जैसी नदियों में पानी की कमी के लिए जलवायु परिवर्तन भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। भारतीय प्रायद्वीपीय नदियों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले पाँच दशकों में कुल वर्षा बहुत ज्यादा नहीं बदली, लेकिन उसका पैटर्न बदल गया है। अब बारिश कम दिनों में अधिक तीव्रता से होती है। इसका मतलब है कि पानी जल्दी बह जाता है और जमीन में समाने का समय कम मिलता है। इससे भूजल का पुनर्भरण घटता है और गर्मियों में नदियों का आधार प्रवाह कमजोर हो जाता है।
इन सब प्रक्रियाओं का साफ असर चित्रकोट जलप्रपात पर दिखाई देता है। मानसून के दौरान जब इंद्रावती नदी अपने चरम पर होती है, तब यह जलप्रपात आज भी उतना ही भव्य दिखाई देता है, जितना पहले था। लेकिन मानसून खत्म होने के बाद इसकी चौड़ाई तेजी से घटने लगती है और कुछ ही महीनों में यह कई पतली धाराओं में टूट जाता है। यदि नदी के आधार प्रवाह में यह गिरावट आगे भी जारी रहती है तो संभव है कि भविष्य में चित्रकोट मुख्यतः मानसून के महीनों में ही अपने पूर्ण रूप में दिखाई दे और बाकी समय यह नज़र ही न आए।
ज़ाहिर है, चित्रकोट का बदलता रूप केवल एक पर्यटन स्थल की कहानी नहीं है। यह मध्य भारत की नदी प्रणालियों में हो रहे गहरे पर्यावरणीय परिवर्तनों का संकेत भी हो सकता है। यदि जलग्रहण क्षेत्र में जंगलों का संरक्षण, तलछट प्रबंधन और नदियों के पर्यावरणीय प्रवाह को ध्यान में रखकर नीतियाँ बनाई जाएं तो संभव है कि इस नदी और उससे जुड़े प्राकृतिक स्थलों का संतुलन काफी हद तक फिर से मजबूत हो सके। शायद तभी फिर से वह दिन लौट सकेंगे, जब बस्तर के जंगलों में दूर से आती एक गूँज सुनाई देगी, जो बता देगी कि चित्रकोट जलप्रपात में फिर से भरपूर पानी बह रहा है।
बैनर तस्वीरः चित्रकोट जलप्रपात, बस्तर में इंद्रावती नदी पर स्थित यह जलप्रपात, जिसे ‘भारत का नियाग्रा’ कहा जाता है। तस्वीर- आलोक प्रकाश पुतुल