- नेपाल अपने अत्यंत संकटग्रस्त पक्षी चरस या बंगाल फ्लोरिकन की कैप्टिव-ब्रीडिंग पर विचार कर रहा है। लेकिन जानकारों का कहना है कि यह मजबूत हैबिटैट प्रोटेक्शन का विकल्प नहीं होना चाहिए।
- दुनिया भर में इस पक्षी की आबादी 1,000 से भी कम बची है और नेपाल में तो बस कुछ दर्जन ही बचे हैं। खेती, कीटनाशक और इनके आवास स्थानों में इंसानी दखल से इनकी संख्या में कमी आ रही है।
- कंबोडिया में फ्लोरिकन इंसानी निगरानी में पैदा हुए हैं, और नेपाल का भी गिद्धों के साथ ऐसा ही अनुभव है। लेकिन जानकार चेतावनी देते हैं कि फ्लोरिकन मुश्किल से मिलते हैं, तनाव के प्रति संवेदनशील होते हैं, और ऐसे में उनका प्रजनन मुश्किल होता है।
नेपाल में पाया जाने वाला चरस या बंगाल फ्लोरिकन एक अत्यंत संकटग्रस्त पक्षी है। इस पक्षी की घटती आबादी को देखते हुए नेपाल में इसके निगरानी में किये जाने वाले प्रजनन या ‘बंदी प्रजनन’ (कैप्टिव ब्रीडिंग) पर विचार किया जा रहा है। साल 2024 के एक सरकारी प्लान में चिड़ियाघरों और एवियरी में इनके प्रजनन का प्रस्ताव सुझाया गया है। इस कदम को इस पक्षी की आबादी को इसके प्राकृतिक आवास में बढ़ाने के लिए ज़रूरी माना गया है। हालाँकि, संरक्षणवादियों का कहना है कि इस प्रजाति के संरक्षण के लिए इसके घोंसले बनाने की जगहों और घास के मैदानों की लंबे समय तक सुरक्षा बहुत जरूरी है।
“अगर बंगाल फ्लोरिकन की आबादी का यही सिलसिला जारी रहा, तो हम अगले कुछ सालों में उन्हें पूरी तरह से खो सकते हैं,” एक पुराने पक्षी विज्ञानी राजेंद्र सुवाल ने हाल ही में काठमांडू में नेपाली पक्षी संघ द्वारा आयोजित एक आयोजन में कहा। “कैप्टिव ब्रीडिंग उनकी आबादी बढ़ाने के अल्पकालिक उपायों में से एक हो सकता है।”
बंगाल फ्लोरिकन (हाउबारोप्सिस बेंगालेंसिस), जिसे बंगाल बस्टर्ड भी कहा जाता है, अपने खास प्रणय प्रदर्शन या मेटिंग डिस्प्ले के लिए जाना जाता है। इसके लिए यह पक्षी अपने पंख फड़फड़ाता है और खुद को हवा में ऐसे उछालता है जैसे ट्रैम्पोलिन पर कूद रहा हो। अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संस्था IUCN के अनुमान के मुताबिक, पिछले तीन दशकों में बंगाल फ्लोरिकन की आबादी तेजी से कम होने की आशंका है। IUCN के आकलन के मुताबिक, इस पक्षी की संख्या में कमी का एक मुख्य कारण “इसके घास के मैदानों वाली रहने की जगह को बड़े पैमाने पर” खेती के लिए इस्तेमाल किया जाना है।

नेपाली फ्लोरिकन एक बड़ी उप-जनसंख्या का हिस्सा है जो उत्तरी भारत और, ऐतिहासिक रूप से, बांग्लादेश तक फैली हुई है। हालांकि, बांग्लादेश वाले समूह को अब विलुप्त हो चुका माना जाता है। एक दूसरी सब-पॉपुलेशन कंबोडिया और शायद वियतनाम में मौजूद है। इन उप-जनसंख्याओं को मिलाकर इस प्रजाति की दुनिया भर में आबादी लगभग 1,000 से भी कम वयस्क पक्षियों की है।
इस पक्षी की सब-पॉपुलेशन की कैप्टिव ब्रीडिंग कंबोडिया की टोनले सैप झील, जो मौसम के हिसाब से पानी से भर जाती है, में पहले से ही की जा रही है और इसमें कुछ सफलता भी मिली है।
ख़बरों के मुताबिक, गैर लाभकारी संस्था अंगकोर सेंटर फॉर कंजर्वेशन ऑफ बायोडायवर्सिटी (ACCB) ने 2019 में शुरू किए गए एक एक्स-सीटू (प्राकृतिक आवासों के बाहर) कार्यक्रम के तहत में बंगाल फ्लोरिकन के अण्डों से 15 चूज़े निकले हैं। IUCN के अनुसार, जब टोनले सैप के घास के मैदानों में अण्डे दिखते हैं, तो उन्हें स्थानीय समुदाय के वालंटियर्स के साथ मिलकर सावधानी से इकट्ठा करके आर्टिफिशियल इनक्यूबेशन में लाया जाता है। इन अण्डों को सेने के बाद, चूजों को ख़ास देखरेख में पाला जाता है। इस प्रक्रिया से इस प्रजाति के लिए एक एश्योरेंस कॉलोनी बनती है, जिसका आखिरी लक्ष्य उन्हें वापस जंगल में लाना होता है।
गैर लाभकारी संस्था बर्ड कंज़र्वेशन नेपाल (BCN) के कंज़र्वेशन मैनेजर अंकित बिलाश जोशी, जिन्होंने पिछले साल की शुरुआत में कंबोडिया में ACCB का दौरा किया था, ने मोंगाबे को बताया, “अगर हो सके तो नेपाल को कैप्टिव ब्रीडिंग जैसे एक्स-सीटू कंज़र्वेशन प्रयासों पर भी ध्यान देना चाहिए।” “लेकिन अगर हमें कंबोडियाई मॉडल अपनाना है, तो हमें पर्याप्त रिसोर्स इन्वेस्ट करने के लिए तैयार रहना होगा।”
साल 2023 के एक सर्वे के मुताबिक, नेपाल में ज़्यादातर बंगाल फ्लोरिकन देश के पूर्व में कोशी टप्पू वाइल्डलाइफ़ रिज़र्व और उसके आस-पास पाए जाते हैं, जो भारत की सीमा के पास है। उस सर्वे में वहाँ 24 फ्लोरिकन रिकॉर्ड किए गए थे, जबकि चितवन नेशनल पार्क में सिर्फ़ दो और पश्चिम में शुक्लाफांटा नेशनल पार्क में पाँच फ्लोरिकन थे। पहले की पड़ताल में कोशी में 47, शुक्लाफांटा में 17, चितवन में 11 और बर्दिया नेशनल पार्क में नौ फ्लोरिकन देखे गए थे।
नेपाल में, इस प्रजाति के घटने की मुख्य वजह घास के मैदानों का खत्म होना और खराब होना, इमारती लकड़ी वाले पौधों का फैलना, बाहर से आई प्रजातियाँ और गलत वक्त पर आग लगाना है। ये दिक्कतें बढ़ती खेती और कीटनाशकों के इस्तेमाल से और बढ़ जाती हैं, जिससे इस पक्षी के खाने वाले कीड़े कम हो जाते हैं। इसके साथ ही प्रजनन के मौसम में शिकार करना, चोरी-छिपे शिकार और इंसानी दखल भी अन्य कारण हैं।
नेपाल में पक्षियों के बंदी प्रजनन का सबसे हालिया प्रयोग सफेद-पूंछ वाले गिद्धों (जिप्स बेंगालेंसिस) और पतली-चोंच वाले गिद्धों (जिप्स टेनुइरोस्ट्रिस) के साथ किया गया था। ये दोनों प्रजातियां गंभीर रूप से लुप्तप्राय हैं। साल 2008 से 2022 तक चले इस प्रजनन कार्यक्रम के तहत, चितवन राष्ट्रीय उद्यान ने गिद्धों के 18 चूजों को पाला और इन्हें इनकी जंगली आबादी में शामिल होने के लिए उन्हें जंगल में छोड़ दिया।
डिपार्टमेंट ऑफ़ नेशनल पार्क्स एंड वाइल्डलाइफ़ कंज़र्वेशन के प्रवक्ता बेद कुमार ढकाल ने कहा कि हालांकि बंगाल फ्लोरिकन के लिए इस तरह के कार्यक्रम को चलाए जाने का फिलहाल कोई ठोस प्रस्ताव तैयार नहीं किया गया है। लेकिन, उनके अनुसार, यह कुछ-कुछ गिद्धों के प्रजनन कार्यक्रम जैसा हो सकता है। उन्होंने मोंगाबे को बताया कि गिद्ध के बच्चों को पालने के लिए इस्तेमाल किए जाने प्रक्रिया को बंगाल फ्लोरिकन के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालांकि, अन्य जानकारों का मत है कि गिद्ध सामान्य प्रजातियां हैं और उन्हें फलने-फूलने के लिए विशिष्ट आवासों की आवश्यकता नहीं होती है। उसके उलट, बंगाल फ्लोरिकन को अपने आवास के लिए एक प्रकार की घास के मैदान की आवश्यकता होती है जो एक “गोल्डीलॉक्स” क्षेत्र में आता है जहां घास न तो बहुत लंबी होती है और न ही बहुत छोटी। इसके साथ ही इसके आवास क्षेत्र में किसी भी प्रकार के व्यवधान कम होने चाहिए, ताकि पक्षी घास में छिप सकें और अपने अण्डे दे सकें। इसके अतिरिक्त, जोशी ने कहा कि तनाव के कारण पक्षियों के कैद में मरने का जोखिम भी है।
कंबोडियाई कार्यक्रम को अपनाने में एक और बाधा यह भी है कि प्रजनन के लिए अण्डे इकट्ठे करने के लिए पक्षियों के घोंसलों का पता लगाना हमेशा से ही बहुत कठिन रहा है।
कोशी टप्पू वन्यजीव अभयारण्य का बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण करने वाले शोधकर्ता आदित्य पाल ने कहा, “मुझे कभी बंगाल फ्लोरिकन का घोंसला नहीं मिला, और इस क्षेत्र में लंबे समय से नेचर गाइड रहे लोग भी यही रिपोर्ट करते हैं।” “सालों के लम्बे प्रयास के बाद भी घोंसले का पता नहीं चल पाता है।”
पाल और उनकी टीम ने कुछ मौकों पर फ्लोरिकन के कुछ जोड़ों को बार-बार देखकर घोंसला बनाने की गतिविधि का अनुमान जरूर लगाया है, लेकिन वे कभी भी वास्तविक घोंसला ढूंढकर इसकी पुष्टि नहीं कर पाए हैं।

चीन के शिशुआंगबन्ना ट्रॉपिकल बॉटनिकल गार्डन में पक्षी विज्ञानी हेम बहादुर कटुवाल ने कहा कि फ्लोरिकन के दिखाई देने की कम दर यह भी संकेत दे सकती है कि इस पक्षी की मौजूदा आबादी बूढ़ी हो रही है और प्रजनन करने में कम सक्षम है, जिससे उनके अस्तित्व का जोखिम और बढ़ रहा है। इसका असर बंदी प्रजनन के लिए अंडे इकट्ठा करने पर पड़ता है। अण्डों को इकठ्ठा कर पानी की संभावना नेपाल के संदर्भ में कम लगती है।
अण्डे सेने के लिए जगह खोजने के अलावा, कैप्टिव-ब्रीडिंग कार्यक्रम में प्रजनन के लिए वयस्क नर और मादा पक्षियों को भी पकड़ा जा सकता है। लेकिन, पाल ने कहा कि यह फ्लोरिकन जैसे पक्षियों के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है, जो बहुत शर्मीले हैं और इंसानी दखल के प्रति संवेदनशील हैं।
उन्होंने कहा, “इससे तनाव, हैबिटैट को छोड़ना, या यहां तक कि मृत्यु भी हो सकती है।”
दशकों तक, यह पक्षी अपने प्रजनन के मौसम को छोड़कर बाकी के समय में बहुत कम दिखते थे फिर, 2018 में, इस बारे में वर्षों की अटकलों के बाद कि वे साल के इस आधे हिस्से में कहाँ जाते थे, एक उपग्रह-टैगिंग अध्ययन में पाया गया कि बंगाल फ्लोरिकन अपने संरक्षित, मौसमी रूप से बाढ़ वाले प्रजनन क्षेत्रों को छोड़कर असुरक्षित कृषि क्षेत्रों और अन्य ऊपरी घास के मैदानों को पसंद करते हैं।
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हालांकि, कैप्टिव ब्रीडिंग एक अल्पकालिक उपाय हो सकता है, सुवाल ने कहा कि इसे एक लम्बी अवधि के या स्थाई उपाय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। लम्बी अवधि के उपायों में पहला है घास के मैदानों के मैनेजमेंट शेड्यूल का सख्ती से पालन करना, जो नेशनल पार्कों में पक्षियों के घोंसला बनाने के समय में दखल न दें। पार्क अधिकारी मानसून से ठीक पहले और बाद में निचले इलाकों में घास काटते हैं या उसमें आग लगा देते हैं। पहले, यह फ्लोरिकन ब्रीडिंग सीजन के साथ होता था। हालांकि, नए हैबिटैट मैनेजमेंट नियमों के आने के बाद, अब आमतौर पर मानसून के पहले ब्रीडिंग सीजन शुरू होने से पहले घास जलाई जाती है। लेकिन इस शेड्यूल का वास्तविकता में सख्ती से पालन नहीं होता है।
विशेषज्ञों का दूसरा दीर्घकालिक उपाय यह है कि इस प्रजाति के ‘नॉन-ब्रीडिंग हैबिटैट’ या प्रजनन के लिए उपयोग नहीं किए जाने वाले क्षेत्रों को सुरक्षित किया जाए। इन क्षेत्रों में खेत बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसके लिए, रिसर्चर सूरज बराल के नेतृत्व में नेपाली ऑर्निथोलॉजिकल यूनियन की एक टीम स्थानीय किसानों को लेमनग्रास की खेती शुरू करने के लिए एक कार्यक्रम चला रही है। बराल ने कहा कि आइडिया यह है कि किसान इस हाई-वैल्यू फसल को उगाएं जिससे किसानों का भी फायदा हो और ये खेत बंगाल फ्लोरिकन के लिए नॉन-ब्रीडिंग हैबिटैट का भी काम कर सकें।
उन्होंने कहा कि ऐसी पहलों को स्थानीय समुदायों के लिए जागरूकता बढ़ाने वाले कार्यक्रम के साथ-साथ चलाने की ज़रूरत है।
ऑर्निथोलॉजिकल यूनियन के अध्यक्ष हथन चौधरी ने कहा कि यह भी हो सकता है कि नेपाल में बंगाल फ्लोरिकन की मौजूदा आबादी की गिनती कम हो गई हो। अभी आबादी की गिनती नर पक्षियों के मेटिंग डिस्प्ले पर निर्भर करती है, लेकिन चौधरी ने कहा कि रिसर्चर्स को अनदेखी आबादी की तलाश में नए संभावित हैबिटैट भी खोजने चाहिए।
उन्होंने कहा, “इस पक्षी की संख्या बताती है कि इसकी आबादी घट रही है, लेकिन हो सकता है कि हम उन्हें गलत जगहों पर ढूंढ रहे हों।”
यह खबर मोंगाबे टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी ग्लोबल वेबसाइट पर 1 सितम्बर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: नेपाल में गंभीर रूप से लुप्तप्राय बंगाल फ्लोरिकन की तस्वीर। तस्वीर – आदित्य पाल के सौजन्य से।