- साल 2024 की शुरुआत में कैप्टिव प्रजनन में पाले गए 37 छोटे घड़ियालों को पश्चिम बंगाल में गंगा नदी में छोड़ा गया, जिससे उनकी पुराने इलाके में वापसी हुई।
- इस कोशिश पर बात करने वाली एक हालिया रिपोर्ट पर वैज्ञानिक और विशेषज्ञों का कहना है कि इस परियोजना में चुनौतियों को नजरअंदाज किया गया है। साथ ही, पूरे देश में प्रजातियों को फिर से बसाने के दशकों से चल रहे प्रयास पहले भी नई प्रजनन आबादी बनाने में नाकाम रहे हैं।
- संरक्षण की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि रेत खनन और नदी के स्वरूप में बदलाव पर रोक लगाकर नदियों में प्राकृतिक आवासों की रक्षा किस तरह की जाए, स्थानीय समुदायों की भागीदारी पक्की की जाए और घड़ियालों को मछली पकड़ने के जाल में फंसने से बचाया जाए।
पश्चिम बंगाल के रसिकबील मिनी चिड़ियाघर से फरवरी 2024 में 37 छोटे घड़ियालों (गैवियलिस गैंगेटिकस) को 550 किलोमीटर दूर राज्य के मुर्शिदाबाद में गंगा नदी के किनारे ले जाया गया।
ये घड़ियाल 2021 के आखिर में कैप्टिव प्रजनन कार्यक्रम से पैदा हुए थे। इन्हें हवादार पीवीसी पाइप में अलग-अलग रखा गया था। रात भर में पूरे हुए 15 घंटे के सफर के दौरान, वन कर्मचारियों ने जानवरों पर हर एक-दो घंटे में पानी का छिड़काव किया, ताकि उनके शरीर में नमी बनी रहे। इस प्रजाति के लिए यह पुराने घर में वापसी जैसा था। डबल्यूडबल्यूएफ–इंडिया में जलीय आवास के प्रमुख शाहनवाज खान ने मोंगाबे-इंडिया को ईमेल से भेजे गए जवाब में बताया कि वहां मौजूद संरक्षणवादियों के लिए यह “शांत और संतुष्ट करने” वाला पल था।
खान याद करते हैं कि लंबे सफर के बाद जानवरों की हालत को लेकर चिंता थी। लेकिन, टीम ने तब राहत की सांस ली, जब घड़ियालों को “सतर्क, तुरंत प्रतिक्रिया देने वाले और अच्छी सेहत में देखा गया।” ये जलीय जीव नदी में जाने से पहले थोड़ी देर वहां रुके भी थे।
घड़ियालों को फिर से बसाने की यह परियोजना पश्चिम बंगाल के वन निदेशालय और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ–इंडिया के बीच सहयोग का नतीजा था। रेप्टाइल्स एंड एम्फीबियंस जर्नल में छपी एक हालिया रिपोर्ट में इस प्रोजेक्ट के बारे में बताया गया है, जिसका मकसद निचली गंगा घाटी में घड़ियालों के लंबे समय तक जिंदा रहने की संभावना को बढ़ाना है।
पिछले कुछ सालों में घड़ियालों की आबादी में काफी कमी आई है। इसकी वजह बांध बनाने, रेत खनन, शिकार और बहुत ज्यादा मछली पकड़ना रहा है। प्राकृतिक आवासों में अब महज 650 बड़े घड़ियाल ही बचे हैं।

घटती आबादी
घड़ियालों के स्क्यूट्स (पपड़ी) लंबी और पतले होते हैं, जबकि मगरमच्छों की शल्कें अपेक्षाकृत चौड़ी होती हैं। किसी वयस्क नर की लंबाई सात मीटर तक हो सकती है, जबकि मादाएं आम तौर पर लगभग चार से पांच मीटर लंबी होती हैं।
पारंपरिक रूप से घड़ियाल पाकिस्तान, भारत, भूटान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार में पाए जाते थे। अब वे बांग्लादेश, नेपाल और भारत में ही बचे हैं। भारत के पश्चिम बंगाल में 20वीं सदी के मध्य तक गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों में घड़ियाल देखे जाते थे। इसके बाद नदी में बहुत ज़्यादा बदलाव (बांध, बैराज और पानी के बहाव पर असर डालने वाली दूसरी संरचनाएं), मछली पकड़ने के गलत तरीकों और इंसानों की दखलअंदाजी से यह प्रजाति तेजी से कम होती गई और स्थानीय स्तर पर खत्म हो गई।
1950 के दशक से दुनिया भर में इसी तरह के दबाव से घड़ियाल की आबादी में 94% से अधिक की कमी आई है। इस वजह से यह प्रजाति इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में बहुत ज्यादा संकटग्रस्त श्रेणी में आ गई है।
दुनिया भर में मौजूद वयस्क घड़ियालों की आबादी का लगभग 77% से 80% हिस्सा एक ही नदी चंबल में सीमित है जो राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बहती है। यह इलाका भारत के पश्चिमी और मध्य भागों में है।
मगरमच्छों (घड़ियालों) के एक ही इलाके में होने से पूरी प्रजाति खतरों के प्रति ज्यादा अधिक संवेदनशील हो जाती है।
खान बताते हैं कि 2007–2008 में चंबल में बड़े पैमाने पर मौत ने इस प्रजाति की बहुत ज्यादा संवेदनशीलता को उजागर कर दिया। जमीनी जांच से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार, इस घटना में निचले चंबल के लगभग 40 किलोमीटर के क्षेत्र में 100 से ज्यादा घड़ियालों की किडनी फेल होने से मौत हो गई, जिसका संभावित कारण कोई अज्ञात विषैला पदार्थ था।
आईयूसीएन में क्रोकोडाइल स्पेशलिस्ट ग्रुप के सदस्य और फिर से बसाने की इस परियोजना का हिस्सा नहीं रहे तरुण नायर ने कहा, “किसी एक बीमारी का प्रकोप या कोई बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजना इस प्रजाति के बड़े हिस्से के लिए खतरा बन सकती है।”

फिर से बसाने पर उठते सवाल
हालांकि, फिर से बसाना ‘अत्यंत संकटग्रस्त’ आबादी को अलग-अलग इलाकों में बांटने में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, ताकि वे सभी एक ही जगह सीमित ना रहें और एक जैसे जोखिमों का सामना ना करें। लेकिन, कुछ विशेषज्ञों की दलील है कि यह प्रयास भारत में केंद्र और राज्य सरकारों तथा अन्य गैर-सरकारी संगठनों द्वारा पिछले पचास सालों से चल रही फिर से बसाने से जुड़ी परियोजनाओं की चुनौतियों को नजरअंदाज करता है।
जानकार इस बात पर जोर देते हैं कि घड़ियाल संरक्षण से जुड़ी कोशिशों में आवास संरक्षण को भी शामिल करना जरूरी है और नदी पर पड़ने वाले दबावों—जैसे रेत खनन, बांध निर्माण, सीवेज का बहाव और छोड़े गए मछली पकड़ने के जाल से जुड़ी समस्याओं को भी दूर किया जाना चाहिए।
हालिया रिपोर्ट पर भारत में घड़ियाल संरक्षण पर काम कर चुके विशेषज्ञों ने ऐसी कोशिशों की सफलता को लेकर संदेह जताया है, खासकर गंगा नदी के मुर्शिदाबाद वाले हिस्से में, जहां घड़ियालों को फिर से बसाया गया है।
घड़ियालों को यौन परिपक्वता तक पहुंचने में लगभग एक दशक (कभी-कभी दो दशक) तक लग जाते हैं। आईयूसीएन क्रोकोडाइल स्पेशलिस्ट ग्रुप के नायर ने कहा कि सफलता का आखिरी मानदंड सिर्फ जीवित रहना नहीं, बल्कि “खुद से प्रजनन करने वाली आबादी” बनाना है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि 1970 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर आज तक भारत में 10,000 से 12,000 घड़ियाल छोड़े जा चुके हैं, लेकिन “लगभग ऐसा कोई सबूत नहीं है कि इससे नई प्रजनन आबादियां बनाने में सफलता मिली हो।”
मद्रास क्रोकोडाइल बैंक ट्रस्ट के तहत घड़ियाल इकोलॉजी प्रोजेक्ट के निदेशक जेलाब्दीन ए. बताते हैं कि सरीसृपों में अंडों से निकलने वाले शिशुओं की स्वाभाविक तौर पर जीवित रहने की दर अक्सर एक फीसदी से भी कम होती है। उनके अनुसार, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की फिर से बसाने की परियोजना में एक बार में महज 37 घड़ियाल छोड़ना टिकाऊ आबादी पक्की करने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है। जेलाब्दीन इस परियोजना से जुड़े हुए नहीं थे।
नॉर्थ डकोटा विश्वविद्यालय के एमेरिटस प्रोफेसर और भारत में घड़ियाल इकोलॉजी प्रोजेक्ट के वरिष्ठ वैज्ञानिक सलाहकार और मार्गदर्शक जेफ्री डब्ल्यू. लैंग ने बताया कि कैप्टिव प्रजनन से तैयार किए गए हर घड़ियाल को पकड़ने, पालने और छोड़ने से पहले उस पर लगभग एक लाख से लेकर तीन लाख रुपए तक खर्च होता है। वह कहते हैं कि सीमित संसाधनों को देखते हुए हमें अपने पिछले कार्यक्रमों से सीखना चाहिए। उन्होंने जोड़ा, “ऐसे प्रयासों में छोड़ जाने के बाद व्यापक और लंबी अवधि की निगरानी को अनिवार्य घटक के रूप में शामिल करना बेहद जरूरी है।”
जैलाब्दीन ने कहा, “[रीइंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट्स] की कोशिश ठीक है, लेकिन अभी संरक्षण का फोकस आवास को सुरक्षित बनाने पर होना चाहिए। घड़ियालों की लगभग 80% आबादी चंबल में है, जिसे रेत खनन से खतरा है। अगर हम उसे नहीं बचा सकते, तो कहीं और बसाने से मदद नहीं मिलेगी।”

जगह का चयन
फिर से बसाने की परियोजना के तहत सही आवास (हैबिटैट सूटेबिलिटी) का आकलन किया गया। खान ने बताया कि गंगा–ब्रह्मपुत्र घाटी, अपनी मुक्त रूप से बहने वाली नदियों, उपयुक्त रेतीले तटों और ऐतिहासिक विस्तार क्षेत्र के कारण घड़ियालों को फिर से बसाने के लिए सही पाया गया।
टीम ने टिक्टिकपाड़ा की कई धाराओं वाली नदी-धारा (ब्रेडेड चैनल) को युवा घड़ियालों को छोड़ने के लिए “शांत वातावरण” प्रदान करने वाली जगह के रूप में चुना।
हालांकि, जेलाब्दीन ने इस आवास आकलन की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसा मूल्यांकन और ज्यादा गहराई से किया जाना चाहिए।
लैंग ने कहा, “अध्ययन में बताई गई जगह पर छोड़े गए घड़ियालों से सफलता मिलने की संभावना लगभग नहीं के बराबर है, क्योंकि मौजूदा आवास का सही (जैसा कि इस परियोजना के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और वन विभाग द्वारा आकलन किया गया) होना ही पर्याप्त नहीं है।”
उन्होंने आईयूसीएन रेड लिस्ट के हालिया ग्रीन स्टेटस आकलन का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि निचली गंगा और घाटी क्षेत्र घड़ियाल आबादी को टिकाऊ रूप से बनाए रखने के लिए सही नहीं हैं। लैंग ने कहा कि इस आकलन में “घड़ियाल की छह ऐसी आबादियों की पहचान की गई है जहां प्रजनन के कुछ सबूत मिले हैं और ऐसी 14 जगहें स्थान चिन्हित की गई हैं जहां पहले घड़ियालों की बड़ी आबादी थी, लेकिन अब वे सीमांत आबादियां हैं और/या सिर्फ अस्थायी रूप से दिखाई देते हैं। निचली गंगा इन्हीं बाद वाली श्रेणी में शामिल है।”
नदी के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्र की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि गंगा का हुगली वाला इलाका “निश्चित रूप से” सही नही है।
हालांकि, पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा दक्षिण डिवीजन के प्रभागीय वन अधिकारी प्रदीप बाउरी ने कहा, “हमारे आकलन में मुर्शिदाबाद क्षेत्र सही पाया गया। उसी नदी में, उन्हीं [मानवजनित] दबावों के बीच डॉल्फिन अच्छी तरह फल-फूल रही हैं।”
सीमा से नजदीकी
अध्ययन से जुड़े नहीं रहे जानकारों ने डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की फिर से बसाने की परियोजना के रिलीज वाली जगह के बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास होने का भी मुद्दा उठाया, जहां गतिविधियों को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) नियंत्रित करता है। ऐसे क्षेत्र में निगरानी करना मुशकिल होगा। तरुण के अनुसार, लोगों की आवाजाही के कारण यह “सीमा पार संदेह भी पैदा कर सकता है।”
जैलाब्दीन ने कहा, “अगर मानसून के दौरान घड़ियाल बांग्लादेश में चले जाते हैं, जैसा कि पंजाब की ब्यास नदी में हुआ था, तो उन्हें वापस लाना कूटनीतिक और लॉजिस्टिक रूप से मुश्किल काम बन जाएगा।”
हालांकि, खान इस चुनौती को सीमा पार से बेहतर तालमेल के अवसर के तौर पर देखते हैं। वह कहते हैं, “हालांकि सीमा पार पारंपरिक निगरानी मुमकिन नहीं है, लेकिन यह स्थिति सैटेलाइट टेलीमेट्री जैसी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने का अच्छा मौका देती है।” अभी इस तकनीक का इस्तेमाल निगरानी में नहीं किया जा रहा है और टीम ने नाव से दोनों तरफ से निगरानी की है।

रेत खनन, मछली पकड़ना और छोड़े गए जाल
नायर और जैलाब्दीन दोनों का कहना है कि मछली पकड़ने के जाल और रेत खनन इस जगह पर दोबारा बसाए गए घड़ियालों के लिए कुछ और खतरे हैं।
पश्चिम बंगाल में छोड़े जाने से पहले 15 दिनों के भीतर ही तीन घड़ियाल मछली पकड़ने वाले जाल में फंस गए और डूबकर मर गए। वन निदेशालय ने तुरंत कार्रवाई करते हुए ऐसे 150 किलो जाल हटा दिए। नायर ने कहा, “यह अच्छी बात है कि वे छोड़े जाने के बाद निगरानी कर रहे हैं, जो कई कार्यक्रम में नहीं होता है, लेकिन आदर्श रूप से यह काम पहले ही हो जाना चाहिए था।”
फिर से बसाने की परियोजना से जुड़ी टीम ने यह भी बताया कि नदी पर निर्भर समुदायों, जिन्होंने घड़ियाल पहले नहीं देखे हैं, उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल करना जरूरी है। खान ने बताया कि उनके जागरूकता कार्यक्रमों में “शुरुआती प्रतिक्रियाएं अक्सर डर पर आधारित थीं, क्योंकि कई लोग पतली थूथन वाले घड़ियाल को ज्यादा आक्रामक दलदली मगरमच्छ (मगर) समझ लेते थे। जब टीम ने समझाया कि घड़ियाल खास तौर पर मछली खाने वाले होते हैं और आम तौर पर इंसानों से दूर रहने वाले (संकोची) होते हैं, तो प्रतिक्रिया जिज्ञासा और मदद में बदल गई।”
लैंग ने बताया, “कैप्टिव में पाले गए घड़ियाल, जिन्हें मरी हुई मछलियां खिलाई जाती हैं… जाल में फंसी मछलियों को खाने की कोशिश करते हैं और खुद भी फंस जाते हैं और अधिकतर मामलों में जल्दी ही डूब जाते हैं।” “जब तक वे [मछुआरे] रिलीज वाले क्षेत्र में मछली नहीं पकड़ने के लिए मान नहीं जाते, तब तक जाल से मछली पकड़ना जारी रहेगा, जिसके बुरे नतीजे घड़ियालों को भोगने होंगे।”
मोंगाबे-इंडिया ने जिन विशेषज्ञों से बात की, वे जानवरों के “कैप्टिव में पालने” की भी आलोचना की। उनका कहना है कि टैंक में पले-बढ़े और मरी हुई मछलियां खाने वाले बच्चों में अक्सर तेज बहाव में जिंदा रहने के लिए मसल्स की कमी होती है और जिंदा शिकार करने की आदत भी नहीं होती। इसके अलावा, वे कहते हैं कि कैद में पाले गए घड़ियाल अक्सर अजीब व्यवहार दिखाते हैं, जैसे शर्माने के बजाय खाने के लिए इंसानों के पास जाना, जिससे वे आसान शिकार बन जाते हैं।
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नायर और जैलाब्दीन दोनों “सॉफ्ट रिलीज” के तरीकों पर बात करते हैं: जानवरों को नदी से जुड़े बंद तालाबों में रखना, ताकि वे पूरी तरह छोड़ जाने से पहले वहां के माहौल में ढल सकें और “जगह की समझ” बना सकें।
हालांकि, पश्चिम बंगाल वन विभाग के बाउरी ने कहा, “सॉफ्ट रिलीज आम तौर पर तब किया जाता है जब जानवरों को बचाया जाता है।”
उन्होंने फिर से बसाने का संदर्भ देते हुए कहा, “ये स्वस्थ, कैप्टिव-प्रजनन से पाले गए लगभग एक साल के किशोर घड़ियाल थे। इन्हें रातों-रात लाकर तुरंत छोड़ दिया गया।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि हालांकि घड़ियालों को गंगा के एक बहाव में छोड़ा गया, जो व्यवहार में सॉफ्ट रिलीज जैसा ही था, लेकिन औपचारिक सॉफ्ट रिलीज संभव नहीं हो सका, क्योंकि वहां पास में वनकर्मी तैनात नहीं थे और छोड़े जाने वाली जगह संरक्षित क्षेत्र के बाहर थी।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 4 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में छोटे घड़ियाल को छोड़ते हुए मोहम्मद शाहनवाज खान। तस्वीर सौजन्य: मोहम्मद शाहनवाज खान/डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया।