- आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों में किसान फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को रोकने, परिवहन लागत को कम करने और आय में सुधार करने के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाली कोल्ड स्टोरेज प्रणालियों को अपना रहे हैं।
- किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) स्वामित्व, पट्टे या साझाकरण जैसे मॉडल अपनाकर कोल्ड स्टोरेज को किसानों के लिए किफायती बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
- विशेषज्ञों का कहना है कि सौर ऊर्जा जैसे विकल्प आजीविका को मजबूत कर सकते हैं और उत्सर्जन को कम करने में मदद करते हैं। लेकिन इन्हें बड़े पैमाने पर सफल बनाने के लिए मजबूत नीतियों, आसान लोन सुविधा और अधिक जागरूकता की आवश्यकता है।
आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले के बडांगी गांव के किसान रौथु भारती कहते हैं, “पहले जब हम बाजार में सब्जियां बेचने जाया करते थे, तो बची हुई सब्जियों को खराब होने के डर से बहुत कम दामों पर बेचना हमारी मजबूरी थी। लेकिन 2021 में सौर ऊर्जा से चलने वाली कोल्ड स्टोरेज सुविधा शुरू हुई और हमारे लिए काफी कुछ बदल गया। अब हमें अपनी उपज को फेंकना या फिर कम दामों पर बेचना नहीं पड़ता है।”
गुंटूर जिले के कोल्लिपारा गांव के 53 वर्षीय किसान साम्बी रेड्डी का भी कुछ ऐसा ही अनुभव है। सुबह होते ही, वे दालों और मिर्चों के बंडलों को सौर ऊर्जा से चलने वाली कोल्ड स्टोरेज यूनिट में रखने के लिए अपने घर से निकल पड़ते हैं। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। आठ साल पहले तक, उन्हें भीषण गर्मी से अपने सामान को बचाने के लिए काफी मश्क्कत करनी पड़ती थी।
भारत में 2008 से कोल्ड स्टोरेज योजना लागू है। लेकिन इन किसानों के अनुभव बताते हैं कि उन्हें इससे बहुत कम लाभ मिला, क्योंकि उनके पास ऐसी बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं जो सस्ती हों या जिन पर भरोसा किया जा सके। इसका मतलब यह था कि रेड्डी जैसे किसानों को लगभग एक तिहाई फसल सड़ने या खराब होने के कारण गंवानी पड़ती थी। अब, स्थिति बदल गई है। रेड्डी अब न सिर्फ अपनी फसल को सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं बल्कि किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) से जुड़े अन्य जैविक किसानों से भी फसल खरीद रहे हैं। वे उनकी फसलों को स्टोर करते हैं और बाद में उन्हें सह-उत्पादों के रूप में बेच देते हैं।
10 टन की क्षमता वाली इस कोल्ड स्टोरेज यूनिट की कुल लागत ₹12.5 लाख है, जिसमें से ₹9.37 लाख की सब्सिडी ‘मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर’ (एमआईडीएच) और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) द्वारा दी गई थी। यह राशि सीधे इस यूनिट को बनाने और लागू करने वाली कंपनी इकोफ्रॉस्ट को भुगतान की गई। शेष राशि का भुगतान ‘श्रेष्ठ फार्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन’ (वह एफपीओ जिसका साम्बी रेड्डी हिस्सा हैं) ने किया था। रेड्डी कहते हैं, “यह मेरे जैसे छोटे किसानों या उद्यमियों के लिए बहुत सुविधाजनक और उपयोगी है। मैं किसानों से सिर्फ जैविक रूप से उगाई गई उपज ही खरीदता हूं, उसे यहां स्टोर करता हूं और बाद में अपनी एक दुकान में उन्हें सह-उत्पादों के रूप में बेच देता हूं।”
साल 2022 में अपना खुद का सोलर कोल्ड स्टोरेज लगाने से पहले, रेड्डी दूसरे गांव में किराए पर जगह लेकर उपनी उपज स्टोर करते थे। इसके लिए उन्हें हर साल एक बोरी (70 किलो) के ₹225 देने पड़ते थे।
रेड्डी मुस्कुराते हुए कहते हैं, “कोल्ड स्टोरेज के खर्च के अलावा, अब मैं ट्रांसपोर्ट के खर्च पर भी बहुत बचत कर रहा हूं। यह बहुत सुविधाजनक हो गया है क्योंकि मैं जितनी चाहूं उतनी बोरियां यहां रख सकता हूं।”
ये उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि आंध्र प्रदेश के किसान विकेन्द्रीकृत, सौर-आधारित समाधानों से लाभ उठा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि 2021-22 में 259.99 लाख मीट्रिक टन उत्पादन के साथ आंध्र प्रदेश ने भारत के कुल बागवानी उत्पादन में लगभग 7% का योगदान दिया था। नेशनल सेंटर फॉर कोल्ड-चेन डेवलपमेंट (एनसीसीडी) द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में आंध्र प्रदेश की एक प्रमुख फसल मिर्च के उदाहरण से इसे समझाया गया है। भारत के कुल मिर्च उत्पादन में 32% की हिस्सेदारी रखने वाला यह राज्य मिर्च की 15 से अधिक किस्मों की खेती करता है। वर्ष 2024 में, यहां की मिर्च कोल्ड चेन सुविधाओं का 70-80% तक उपयोग देखा गया। अध्ययन में यह भी रेखांकित किया गया है कि ऐसी सुविधाएं ऊर्जा दक्षता और सौर फोटोवोल्टिक (पीवी) अपनाने के मामले में मध्यम से उन्नत स्तर का प्रदर्शन करती हैं।

एफपीओ संचालित कोल्ड स्टोरेज
सितंबर 2025 में जारी एनसीसीडी की रिपोर्ट बताती है कि आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में किसान उत्पादक संगठन कोल्ड स्टोरेज को अपनाने में सबसे आगे रहे हैं। रिपोर्ट में ‘कूलिंग-एज़-ए-सर्विस’ मॉडल की काफी तारीफ की गई है। यह एक ऐसा सिस्टम है जिसमें किसान को पूरा कोल्ड स्टोरेज खरीदने की जरूरत नहीं होती, बल्कि वह ‘जितना इस्तेमाल, उतना भुगतान’ के आधार पर इसका लाभ ले सकता है। आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र इस प्रणाली को अपनाने वाले पहले राज्य हैं।
रिपोर्ट में मिर्च की आपूर्ति श्रृंखला को सुव्यवस्थित करने में किसान संगठनों (एफपीओ) की बढ़ती भूमिका का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट कहती है, “ये संगठन आपूर्ति श्रृंखला को आसान और व्यवस्थित बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मिर्च के संग्रहण, छंटाई और प्रोसेसिंग का काम खुद संभालकर, ये एफपीओ किसानों को बड़े पैमाने पर लाभ प्राप्त करने और बाजार तक बेहतर पहुंच बनाने में सक्षम बना रहे हैं।”
लगभग 410 किसान उत्पादक संगठनों के साथ, आंध्र प्रदेश सक्रिय किसान संगठनों के मामले में अग्रणी राज्यों में से एक है। इनमें से कई संगठन अपने संचालन के हिस्से के रूप में फार्म गेट स्तर पर कोल्ड रूम का उपयोग करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सुविधाएं स्टोरेज के दौरान मिर्च की गुणवत्ता और ताजगी बनाए रखने में मदद करती हैं, जिससे फसल कटने के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है और बाजार के लिए उत्पाद की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। यह एक ऐसा बिंदु है जिसे किसानों के साथ बातचीत के दौरान भी रेखांकित किया गया था।
गुंटूर के कोल्लिपारा गांव के किसान बोन्थु कोटि रेड्डी कहते हैं, “मैं जैविक तरीके से हल्दी, दालें और मक्का उगा रहा हूं और उन्नत कृषि पद्धति (गुड एग्रीकल्चर प्रैक्टिस) का पालन करता हूं। श्रेष्ठा फार्मर्स एफपीओ के साम्बी रेड्डी मुझसे सीधे उपज खरीदते हैं। मैं बेहद खुश हूं कि मुझे बिचौलियों के बिना अपनी उपज का सही मूल्य मिल रहा है।”
आंध्र प्रदेश के बादांगी में दीक्षा महिला कल्याण सोसाइटी की सीईओ लचिपत्नी शांति संचालन मॉडल के बारे में समझाते हुए कहती हैं, “प्रत्येक 100 किसानों पर एक निदेशक कार्यों की देखरेख करता है। ये संगठन सामूहिक रूप से लगभग 900 किसानों से उपज खरीदते हैं, उन्हें बादांगी कोल्ड स्टोरेज में स्टोर करते हैं और होने वाले लाभ को सभी सदस्यों के बीच साझा करते हैं।”
यह मॉडल अन्य राज्यों में भी अपनाया जा रहा है। उदाहरण के लिए, कर्नाटका में कई किसान संगठन CaaS मॉडल पर विचार कर रहे हैं। धान्या एफपीओ के निदेशक उमाकांत शर्मा कहते हैं, “हमने 2020 में सेल्को फाउंडेशन की मदद से कर्नाटका के सिंधानूर में कोल्ड स्टोरेज सुविधा स्थापित की, जिसमें शुरुआत में टमाटर, बैंगन, नींबू और आम जैसी जल्दी खराब होने वाली सब्जियां रखी जाती थीं।” वह आगे कहते हैं, “पहले सात से आठ महीनों तक किसान अपनी उपज मुफ्त में रख सकते थे, जिसके बाद हमने ₹10 प्रति क्रेट (50 किलो) का मामूली शुल्क लेना शुरू कर दिया। अब हम किसानों से उपज खरीदते हैं, उसे स्टोर करते हैं और बाजार मूल्य बढ़ने पर बेच देते हैं। हम किसानों के साथ लाभ साझा करते हैं।” उन्होंने समझाते हुए कहा कि यह कोल्ड स्टोरेज एआई तकनीक की मदद से काम करता है। चूंकि टमाटर और केले जैसी अलग-अलग उपज के लिए अलग-अलग तापमान की ज़रूरत होती है, इसलिए यह सिस्टम ऐप के जरिए अपने आप एक ऐसा संतुलित या बीच का तापमान सेट कर देता है जिससे दोनों ही तरह की फसलों को सही तरीके से सुरक्षित रखा जा सकता है।”

भारत में हर साल फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान का एक बड़ा हिस्सा सीधे खेत यानी फार्म गेट पर ही होता है। इस समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार कई स्तरों पर प्रयास कर रही है। उदाहरण के लिए, विद्युत मंत्रालय के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के एक संयुक्त उद्यम, ‘एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज लिमिटेड’ ने छोटे और सीमांत किसानों की सहायता के लिए 5 से 10 मीट्रिक टन क्षमता वाली विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा संचालित कोल्ड स्टोरेज यूनिट शुरू की हैं। सरकारी सब्सिडी, आसानी से मिलने वाले लोन और सौर पैनलों की कम होती कीमतों ने इन कोल्ड स्टोरेज को छोटे किसानों के लिए भी अधिक किफायती और सुलभ बना दिया है। एनसीसीडी की रिपोर्ट भी बताती है कि ‘किसान उत्पादक संगठन’ अधिक आत्मनिर्भर बनने के लिए अपने स्वयं के संग्रह केंद्र और फार्म गेट स्तर पर बुनियादी ढांचा तैयार कर रहे हैं।”
कृषि के लिए स्वच्छ ऊर्जा
जुलाई में प्रकाशित नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में फसल कटाई के बाद कुल कृषि उत्पादन का 20-30% हिस्सा बर्बाद हो जाता है। इसका मुख्य कारण फसल का खराब होना, भौतिक क्षति, अनुचित प्रबंधन और भंडारण एवं परिवहन में अक्षमता है। रिपोर्ट में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के अनुमान का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि फसल कटाई के बाद होने वाले इन नुकसानों का वार्षिक मूल्य लगभग ₹920 अरब है।
फल और सब्जियां जल्दी खराब होने वाली फसलें हैं, जिनमें सबसे ज्यादा बर्बादी होती है। टमाटर, आलू और प्याज जैसी फसलों में यह बर्बादी 35-40% तक होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में खराब भंडारण सुविधाओं, अपर्याप्त कोल्ड चेन और प्रसंस्करण इकाइयों की कमी के कारण फसल कटाई के बाद अधिक नुकसान होता है।
अप्रैल में काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) और विलग्रो इनोवेशन फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित एक अलग अध्ययन में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (डीआरई) किस प्रकार किसानों को कोल्ड स्टोरेज जैसे नए समाधान अपनाने में मदद कर रही है और ग्रामीण आजीविका में बदलाव ला रही है। रिपोर्ट कहती है कि कोल्ड स्टोरेज के साथ-साथ सौर ऊर्जा से चलने वाले ड्रायर, डिहाइड्रेटर और कई अन्य समाधान फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को प्रभावी ढंग से कम कर सकते हैं। साथ ही इनमें खाद्य अपशिष्ट से जुड़े उत्सर्जन को भी कम करने की क्षमता है, जो वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 8-10% है। सीईईडब्ल्यू नई दिल्ली स्थित एक थिंक टैंक है और विलग्रो इनोवेशन फाउंडेशन एक सामाजिक उद्यम इनक्यूबेटर है।

सीईईडब्ल्यू की प्रोग्राम लीड दिव्या गौड़ के मुताबिक, डीआरई आधारित आजीविका समाधानों का दायरा काफी बढ़ गया है और ये बड़े स्तर पर उपलब्ध हैं। सौर पंपों के अलावा, अब खेती के लिए (स्प्रेयर, वीडर, राइस मिल, ऑयल प्रोसेसिंग आदि), पशुपालन के लिए (चारा उगाने की इकाई, दूध निकालने की मशीन, मिल्क चिलर आदि) और छोटी खुदरा दुकानों के लिए (रेफ्रिजरेटर, छोटे स्तर के कूलिंग समाधान आदि) बाजार में कई उत्पाद मौजूद हैं। ये उत्पाद उपयोगकर्ताओं की उत्पादकता बढ़ाने और आय के स्रोतों को विविधता देने में मदद कर रहे हैं। वह कहती हैं, “स्थानीय परिस्थितियों और दूरदराज के इलाकों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए ये डीआरई समाधान पारंपरिक तकनीकों की सीमाओं को दूर कर सकते हैं और छोटे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं।”
सीईईडब्ल्यू के शोध के आधार पर गौड़ का दावा है कि केवल 12 डीआरई आजीविका तकनीकें (जिनमें सोलर पंप, सोलर ड्रायर और सोलर रेफ्रिजरेटर शामिल हैं) 3.7 करोड़ लोगों की आजीविका पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। शोध में पाया गया कि ये समाधान उपयोगकर्ताओं की आय, उत्पादकता और उनके सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करते हैं।
हालांकि, भारत की फसल कटाई के बाद की कोल्ड चेन अभी भी मुख्य रूप से एक ही वस्तु के थोक भंडारण की ओर झुकी हुई है, जिसकी लगभग 75% क्षमता केवल आलू के लिए समर्पित है। विशेषज्ञों की मानें तो कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने में डीआरई बड़ी भूमिका निभा सकता है, लेकिन इसके लिए और अधिक मजबूत नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है।
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गौड़ का कहना है कि डीआरई को अपनाने की गति तीन परस्पर जुड़े घटकों, नीति, वित्त (पूंजी) और मांग पैदा करने पर निर्भर करेगी। नीतिगत स्तर पर, सरकारी योजनाओं को डीआरई समाधानों के साथ बेहतर तालमेल और एकीकरण की आवश्यकता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सार्वजनिक धन का उपयोग सीधे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा की पहुंच बढ़ाने के लिए हो रहा है। वित्त को मजबूत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ग्रामीण लोन के विस्तार और लचीले वित्तपोषण विकल्पों के जरिए छोटे किसानों और उद्यमों को शुरुआती लागत का प्रबंधन करने में मदद मिल सकती है। तीसरा घटक ‘मांग पैदा करना’ है, जिसे जागरूकता अभियानों, पायलट प्रोजेक्ट्स और साझेदारियों के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता है। ये प्रयास लोगों में विश्वास पैदा करते हैं, तकनीक के लाभों को प्रदर्शित करते हैं और ग्रामीण बाजारों में डीआरई प्रौद्योगिकियों की पकड़ मजबूत करने में मदद करते हैं।
यह रिपोर्ट आईआईटी कानपुर, क्लाइमेट ट्रेंड्स और अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क द्वारा प्रदान की गई जेटीआरसी फेलोशिप के सहयोग से तैयार की गई है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 14 नवंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के पेडावुप्पुडु गांव में एक खेत से काटी गई फूलगोभी को पैक करते किसान। (एपी फोटो/अल्ताफ कादरी)