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		<description>प्रकृति से प्रेरित समाचार</description>
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	<title>Ramjee Kumar आर्काइव - Mongabay हिन्दी</title>
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					<title>नेपाल आपदा: फिर उजागर हुई क्षेत्रीय तैयारी, तालमेल मजबूत करने की ज़रूरत</title>
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					<pubDate>29 अगस्त 2026 09:23:07 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Joydeep Gupta]]>
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							<![CDATA[<p>26 अगस्त की सुबह, तिब्बत-नेपाल सीमा पर ल्हेन्डे खोला नदी में बर्फ और चट्टानों का एक पूरा पहाड़ गिर गया। इस घटना से आए भूकंप और बाढ़ के कारण नदी का जलस्तर नौ मीटर तक बढ़ गया। इस बाढ़ में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई और कम से कम छः बांध व हाइड्रोपावर स्टेशन, [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[26 अगस्त की सुबह, तिब्बत-नेपाल सीमा पर ल्हेन्डे खोला नदी में बर्फ और चट्टानों का एक पूरा पहाड़ गिर गया। इस घटना से आए भूकंप और बाढ़ के कारण नदी का जलस्तर नौ मीटर तक बढ़ गया। इस बाढ़ में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई और कम से कम छः बांध व हाइड्रोपावर स्टेशन, एक दर्जन से ज़्यादा ज़रूरी पुल, कई घरों और सड़कों को नुकसान पहुंचा। इस बाढ़ का वेग इतना तेज था कि हाथियों का एक झुंड नेपाल से बहकर भारत तक पहुँच गया। इस घटना के पहले इस इलाके में बारिश नहीं हुई थी, लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते बहुत ज़्यादा गर्मी थी। इस गर्मी के कारण 7,245 मीटर ऊँची लांगटांग लिरुंग चोटी के किनारे से बर्फ़ ढ़ीली होने लगी, जिससे पहाड़ का वह पूरा हिस्सा — जिसमें एक ग्लेशियर भी शामिल था — लगभग 3,000 मीटर नीचे बह रही नदी में गिर गया। यह पूरा घटनाक्रम इतनी जल्दी हुआ कि किसी भी तरह की चेतावनी जारी करने का समय ही नहीं मिला। पानी, बड़े पत्थरों और कीचड़ की जो लहर बनी, उसने एक मिनट के अंदर ही चीन सरकार की उस बड़ी तीन-मंजिला इमारत को बहा दिया, जिसमें जिलोंग में बॉर्डर लैंड पोर्ट बना हुआ था (यह नेपाल की तरफ़ रासुवागढ़ी के सामने था)। फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली इलाके में भी पहाड़ी के इसी तरह ढहने से भयानक बाढ़ आई थी। नेपाल में खतरा अभी टला नहीं है। इस घटना के एक दिन बाद भी, मलबे की वजह से ल्हेन्डे खोला का एक&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/29/nepal-disaster-reinforces-the-need-for-regional-preparedness/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>जहां बढ़ रहा मानव-बाघ संघर्ष, वहीं खनन परियोजना ने बढ़ाई चिंता</title>
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					<pubDate>27 अगस्त 2026 11:24:02 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Arathi Menon]]>
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							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[टाइगर रिजर्व के बाहर बाघ]]></category>
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							<![CDATA[खनन, नेशनल पार्क, पर्यावरण कानून, पर्यावरण की राजनीति, प्राकृतिक संसाधन, बाघ, लोग, वन, वन अधिकार, वन कटाई, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, और विलुप्त होती प्रजातियां]]>
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							<![CDATA[<p>स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के हफ्तों तक चले विरोध-प्रदर्शनों और भूख हड़ताल के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने चंद्रपुर जिले के ब्रह्मपुरी वन प्रभाग में स्थित लोहारडोंगरी लौह अयस्क खनन परियोजना पर फिलहाल आगे की कार्रवाई रोक दी है। यह परियोजना पिछले कई महीनों से पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चिंता का विषय बनी हुई थी। [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के हफ्तों तक चले विरोध-प्रदर्शनों और भूख हड़ताल के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने चंद्रपुर जिले के ब्रह्मपुरी वन प्रभाग में स्थित लोहारडोंगरी लौह अयस्क खनन परियोजना पर फिलहाल आगे की कार्रवाई रोक दी है। यह परियोजना पिछले कई महीनों से पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चिंता का विषय बनी हुई थी। खनिज (नीलामी) नियम, 2015 के तहत नागपुर की सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड को जंगल की लगभग 36 हेक्टेयर जमीन आवंटित की गई थी। खबरों के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट का रास्ता साफ करने के लिए लगभग 18,000 पेड़ काटे जाने की आशंका जताई गई है। हालाँकि, मोंगाबे-इंडिया काटे जाने वाले पेड़ों की सही संख्या की पुष्टि करने वाले दस्तावेजों तक नहीं पहुंच सका, लेकिन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध 2022 की ट्री एन्यूमरेशन सर्वे रिपोर्ट बताती है कि इस परियोजना के लिए 11,773 से अधिक पेड़ काटे जाने हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में इस संख्या में और पेड़ जुड़ चुके होंगे। स्थानीय निवासियों की सबसे बड़ी चिंता इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण को होने वाला भारी नुकसान है, जिससे बाघों और इंसानों के बीच संघर्ष की घटनाओं के बढ़ने की पूरी आशंका है। मध्य भारत के ग्रेटर ताडोबा क्षेत्र में आने वाले चंद्रपुर जिले के ब्रह्मपुरी वन क्षेत्र में जंगलों के बीच से गुजरती एक सड़क। पर्यावरणविदों को डर है कि प्रस्तावित ओपन-कास्ट खनन प्रोजेक्ट से इस इलाके के जंगलों और वन्यजीवों पर इंसानी दबाव और बढ़ जाएगा। तस्वीर: सौमित्रा शिंदे/मोंगाबे-इंडिया मानव-बाघ संघर्ष की बढ़ती घटनाएं महाराष्ट्र का चंद्रपुर जिला इंसान और बाघों के&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/27/human-tiger-conflict-mining-chandrapur/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>वायु प्रदूषण से और भी जानलेवा हो सकता है डेंगू: अध्ययन</title>
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					<pubDate>26 अगस्त 2026 06:55:16 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Lekha Bandopadhyay]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
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							<![CDATA[<p>साल 2024 में दुनिया भर में डेंगू के 1.4 करोड़ से अधिक मामले और 11,000 से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं, जो कि अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। हालाँकि, डेंगू के प्रसार में जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ते शहरीकरण की भूमिका पहले से मानी जाती रही है, लेकिन इन्हीं दोनों कारणों की [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[साल 2024 में दुनिया भर में डेंगू के 1.4 करोड़ से अधिक मामले और 11,000 से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं, जो कि अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। हालाँकि, डेंगू के प्रसार में जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ते शहरीकरण की भूमिका पहले से मानी जाती रही है, लेकिन इन्हीं दोनों कारणों की वजह से वायु प्रदूषण में वृद्धि होना भी इसका एक सीधा परिणाम है। एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ये जानने की कोशिश की कि क्या हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों (पीएम2.5) के संपर्क में लंबे समय तक रहने से डेंगू से मौत का खतरा बढ़ जाता है? जापान की ओइता यूनिवर्सिटी के रिसर्च सेंटर फॉर ग्लोबल एंड लोकल इंफेक्शियस डिसीज के साकिरुल खान के नेतृत्व में और जापान, बांग्लादेश व ब्रिटेन के शोधकर्ताओं के सहयोग से हुए इस अध्ययन में पाया गया कि हवा में पीएम2.5 का स्तर अधिक होने से डेंगू से होने वाली मौतों में काफी बढ़ोतरी होती है। वर्ष 2020 से 2024 के दौरान एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के (भारत सहित) 20 डेंगू-प्रभावित देशों में यह अध्ययन किया गया। जिन देशों में वार्षिक औसत पीएम2.5 का स्तर 35 µg/m³ से अधिक था, वहां डेंगू से मृत्यु दर उन देशों की तुलना में तीन से पांच गुना अधिक थी, जहां औसत पीएम2.5 का स्तर 15 µg/m³ से कम था प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करना स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में दुनिया भर में वायु प्रदूषण के कारण लगभग 80 लाख मौतें हुईं, जिनमें से 45 लाख&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/26/air-pollution-dengue-severity-pm25-study/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>दिल्ली की हवा में बैक्टीरिया का भारी बोझ, कई पर एंटीबायोटिक बेअसर</title>
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					<pubDate>25 अगस्त 2026 08:00:25 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Aisiri Amin]]>
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										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<![CDATA[<p>दिल्ली में वायु प्रदूषण हर साल एक नया रिकॉर्ड तोड़ता है। इस दौरान पार्टिकुलेट मैटर, धूल और गाड़ियों के धुएं से जुड़ी बातें सुर्खियों में होती हैं। मगर एक नए शोध से पता चलता है कि यह प्रदूषण सिर्फ सामान्य रासायनिक प्रदूषकों तक ही सीमित नहीं है। वायु प्रदूषण हवा में फैलने वाले बैक्टीरिया, खासकर [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[दिल्ली में वायु प्रदूषण हर साल एक नया रिकॉर्ड तोड़ता है। इस दौरान पार्टिकुलेट मैटर, धूल और गाड़ियों के धुएं से जुड़ी बातें सुर्खियों में होती हैं। मगर एक नए शोध से पता चलता है कि यह प्रदूषण सिर्फ सामान्य रासायनिक प्रदूषकों तक ही सीमित नहीं है। वायु प्रदूषण हवा में फैलने वाले बैक्टीरिया, खासकर वे बैक्टीरिया जिन पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं होता, एक बढ़ता हुआ खतरा है जिस पर अब तक ध्यान नहीं दिया गया है। साइंटिफिक रिपोर्ट्स नाम के जर्नल में प्रकाशित इस नए अध्ययन में दिल्ली के अलग-अलग शहरी इलाकों में घरों के अंदर और बाहर की हवा के नमूनों की जांच की गई। इस जांच में ‘स्टैफिलोकोकी’ नाम के बैक्टीरिया का स्तर काफी ज्यादा पाया गया। यह बैक्टीरिया का ऐसा समूह है, जो आमतौर पर कई तरह की दवाओं के प्रतिरोधी होने (मल्टीड्रग रेजिस्टेंस) के लिए जाना जाता है। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एनवायरनमेंटल साइंसेज की शोधकर्ता और इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका माधुरी सिंह कहती हैं, “जब हम वायु प्रदूषण की बात करते हैं, तो आमतौर पर कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, पीएम2.5 और लेड जैसे मानकों को ही नापते हैं। लेकिन, हवा में सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी (माइक्रोबियल लोड) को भी एक अलग पैमाने के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि आम जनता के स्वास्थ्य के लिहाज से यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।” एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस और वायु प्रदूषण के बीच का संबंध विज्ञान में पहले भी साबित हो चुका है। सुपरहीरोज अगेंस्ट सुपरबग्स की सह-संस्थापक और शोधकर्ता सारा हैदर&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/25/drug-resistant-bacteria-delhi-air-pollution/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>‘बंजर’ नहीं हैं ये घास के मैदान, नई मकड़ी की खोज ने दिखाई जैव-विविधता की झलक</title>
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					<pubDate>24 अगस्त 2026 05:10:35 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Ananya Singh]]>
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						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
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							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[Biodiversity]]></category>
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		<category><![CDATA[घास का मैदान]]></category>
		<category><![CDATA[घास के मैदान]]></category>
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							<![CDATA[<p>महाराष्ट्र के अर्ध-शुष्क घास के मैदानों में वनस्पतियों की नियमित निगरानी के लिए किए जा रहे एक सर्वेक्षण की शुरुआत सामान्य तरीके से हुई। लेकिन, इसमें तब अप्रत्याशित मोड़ आ गया जब शोधकर्ताओं ने एक चट्टान को हटाया और उसके नीचे रेशम से बनी परत वाले एक बिल को देखा। उन्होंन इसकी पहचान ट्रैपडोर मकड़ी [&#8230;]</p>
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						</description>
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							<![CDATA[महाराष्ट्र के अर्ध-शुष्क घास के मैदानों में वनस्पतियों की नियमित निगरानी के लिए किए जा रहे एक सर्वेक्षण की शुरुआत सामान्य तरीके से हुई। लेकिन, इसमें तब अप्रत्याशित मोड़ आ गया जब शोधकर्ताओं ने एक चट्टान को हटाया और उसके नीचे रेशम से बनी परत वाले एक बिल को देखा। उन्होंन इसकी पहचान ट्रैपडोर मकड़ी के बिल के तौर पर की। यह मकड़ियों का प्राचीन समूह है, जिसकी कई प्रजातियां अपने बिल के मुहाने को छिपाने और वहां से गुजरने वाले शिकार पर अचानक हमला करने के लिए रेशम और मिट्टी से दरवाजे बनाती हैं। टीम ने मिट्टी की खुदाई की और उस बिल के तह तक गए जहां &#8216;टिजिडिया वंश की मादा ट्रैपडोर मकड़ी गुंबद के आकार वाले कक्ष में मिली। महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में नंदेश्वर महादेव मंदिर के पास पिछले साल नवंबर में इकट्ठा किए गए नमूने की व्यापक जांच में इस नई प्रजाति के बारे में पता चला। शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में इसे टिजिडिया सिंघल का नाम दिया है और यह शोध आर्कियोलॉजी जर्नल में छपा है। इस खोज के बाद भारत में टिजिडिया प्रजातियों की संख्या बढ़कर आठ हो गई है। अब तक, इस वंश की प्रजातियां प्रायद्वीपीय भारत के उष्णकटिबंधीय सदाबहार और पर्णपाती वनों, खास तौर पर पश्चिमी और पूर्वी घाट में पाई जाती थीं। टी. सिंघल इस वंश की अर्धशुष्क खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र से पहली मौजूदगी है। इससे इसके आवास के बारे में ज्ञात जानकारी का उल्लेखनीय रूप से विस्तार हुआ है। अध्ययन के लेखक ऋषिकेश त्रिपाठी और प्रसाद बोल्डे ने मोंगाबे-इंडिया&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/24/ew-trapdoor-spider-deccan-grasslands-maharashtra/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>चार हिस्सों में बांटना होगा कचरा, क्या नए नियम बदल पाएंगे पुरानी व्यवस्था?</title>
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					<pubDate>20 अगस्त 2026 12:56:02 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Jyotsnika Tiwari]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<category><![CDATA[समाधान]]></category>
		<category><![CDATA[कचरा]]></category>
		<category><![CDATA[कचरा प्रबंधन]]></category>
		<category><![CDATA[ठोस कचरा]]></category>
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							<![CDATA[<p>भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने इस साल जनवरी में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट या ठोस कचरे के प्रबंधन के नए नियम (2026) जारी किए। यह नए नियम अब 2016 के नियमों की जगह लेकर नियमों के पालन की व्यवस्था को बेहतर बना सकते हैं। इन नए नियमों में कचरा पैदा करने वालों की ज़िम्मेदारियों की साफ़ [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/20/new-waste-management-rules-implementation-challenges-india/" data-wpel-link="internal">चार हिस्सों में बांटना होगा कचरा, क्या नए नियम बदल पाएंगे पुरानी व्यवस्था?</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने इस साल जनवरी में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट या ठोस कचरे के प्रबंधन के नए नियम (2026) जारी किए। यह नए नियम अब 2016 के नियमों की जगह लेकर नियमों के पालन की व्यवस्था को बेहतर बना सकते हैं। इन नए नियमों में कचरा पैदा करने वालों की ज़िम्मेदारियों की साफ़ रूपरेखा, &#8216;बल्क वेस्ट जनरेटर&#8217; यानी बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करने वालों की परिभाषा में बदलाव, और गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करने को बढ़ावा देने के लिए मिश्रित कचरे के लिए लैंडफिल के इस्तेमाल पर रकम को बढ़ाने जैसे प्रावधान शामिल हैं। यह नए नियम भले ही अच्छी नीयत से बनाए गए हों, लेकिन इस क्षेत्र के जानकारों ने इन्हें लागू करने में आने वाली उन कमियों के बारे में चेतावनी दी है, जो दशकों से भारत में ठोस कचरे के प्रबंधन के लिए समस्या बनी हुई हैं। इसका उदाहरण नई दिल्ली के विशाल लैंडफिल — भलस्वा, गाजीपुर और ओखला — हैं, जो कचरे को उसके स्रोत पर ही अलग-अलग न कर पाने की शहर की पुरानी नाकामी की निशानी हैं। कचरा पैदा करने के मामले में दिल्ली सभी भारतीय शहरों में सबसे आगे है, जहाँ हर व्यक्ति रोजाना लगभग 600 ग्राम कचरा पैदा करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, इकट्ठा किए गए कचरे का लगभग 64% हिस्सा उपचारित किया जाता है, जबकि बाकी 36% यानी 4,241 टन कचरा रोज़ाना असुरक्षित रूप से लैंडफिल तक पहुँच जाता है। ये लैंडफिल पूरे साल वायु प्रदूषण के साथ-साथ गर्मियों में ग्रीन हाउस&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/20/new-waste-management-rules-implementation-challenges-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>केन-बेतवा परियोजना: कौन छूटा, किसे कितना मिला मुआवजा और आंदोलन के बाद क्या बदला</title>
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					<pubDate>19 अगस्त 2026 10:45:45 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Satish Bhartiya]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[लोग]]></category>
		<category><![CDATA[आंदोलन]]></category>
		<category><![CDATA[केन बेतवा नदी जोड़ परियोजना]]></category>
		<category><![CDATA[नदी जोड़]]></category>
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							<![CDATA[गाँव, जल प्रदूषण, नदियां, नदी, नेशनल पार्क, पर्यावरण कानून, पर्यावरण की राजनीति, पानी, बाढ़, बाँध, भूमि अधिकार, भूमि विवाद, और लोग]]>
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							<![CDATA[<p>बराना नदी के किनारे वह जगह अब शांत है, जहां जुलाई में केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित लोगों का पंचतत्व सत्याग्रह चल रहा था। नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद आंदोलन स्थल का काफी हिस्सा बह चुका है, लेकिन चिता और फांसी सत्याग्रह के कुछ निशान अब भी दिखाई देते हैं। पास के पुल के नीचे [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[बराना नदी के किनारे वह जगह अब शांत है, जहां जुलाई में केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित लोगों का पंचतत्व सत्याग्रह चल रहा था। नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद आंदोलन स्थल का काफी हिस्सा बह चुका है, लेकिन चिता और फांसी सत्याग्रह के कुछ निशान अब भी दिखाई देते हैं। पास के पुल के नीचे मशीनों के चलने की आवाज लगातार सुनाई देती है। पुल के पास एक जगह बड़ी संख्या में चप्पलें भी पड़ी हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इनमें से कुछ चप्पलें 19 जुलाई को पुलिस की कार्रवाई के दौरान छूट गई थीं। छतरपुर जिले के मैनारी गांव की 60-वर्षीया भागवती सौर भी इस आंदोलन में शामिल थीं। वह अपने गांव से करीब 30 किलोमीटर दूर कूपी गांव में बराना नदी के किनारे चल रहे सत्याग्रह में 4 जुलाई को पहुंची थीं। भागवती के मुताबिक, 19 जुलाई को पुलिस द्वारा आंदोलन स्थल खाली कराए जाने के बाद वह गांव वापस लौटीं। भागवती बताती हैं कि उनके परिवार में पति-पत्नी और छः बच्चे हैं। परिवार के पास पांच कमरों का घर और करीब पांच एकड़ कृषि भूमि है, जहां आम, महुआ और अमरूद के पेड़ लगे हैं। उनका दावा है कि परियोजना से प्रभावित होने के बावजूद अब तक न उन्हें घर और जमीन का मुआवजा मिला है और न ही इससे जुड़ा कोई नोटिस। “उचित मुआवजे के लिए हमने छतरपुर से भोपाल तक गुहार लगाई। जब सुनवाई नहीं हुई तो आंदोलन के जरिए आवाज उठानी पड़ी,” भागवती कहती हैं। भागवती की शिकायत अकेली नहीं है। प्रभावित&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/19/ken-betwa-compensation-protest-survey/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>भारत के इथेनॉल लक्ष्य में सहायक इंफ्रास्ट्रक्चर अहम, मगर कमजोर कड़ी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/18/supporting-infrastructure-is-the-missing-link-in-indias-ethanol-push/</link>
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					<pubDate>18 अगस्त 2026 12:47:57 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
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							<![CDATA[<p>यह रिपोर्ट भारत और ब्राज़ील में इथेनॉल की ओर बढ़ने की प्रक्रिया की तुलना करने वाली सीरीज़ का दूसरा भाग है। ब्राज़ील के कई दशकों के अनुभव से पता चलता है कि इथेनॉल का उत्पादन करना एक बड़ी चुनौती का आधा हिस्सा ही है। यह रिपोर्ट असली चुनौती पर बात करती है, जो खरीद, भण्डारण, [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/18/supporting-infrastructure-is-the-missing-link-in-indias-ethanol-push/" data-wpel-link="internal">भारत के इथेनॉल लक्ष्य में सहायक इंफ्रास्ट्रक्चर अहम, मगर कमजोर कड़ी</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
]]>
						</description>
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							<![CDATA[यह रिपोर्ट भारत और ब्राज़ील में इथेनॉल की ओर बढ़ने की प्रक्रिया की तुलना करने वाली सीरीज़ का दूसरा भाग है। ब्राज़ील के कई दशकों के अनुभव से पता चलता है कि इथेनॉल का उत्पादन करना एक बड़ी चुनौती का आधा हिस्सा ही है। यह रिपोर्ट असली चुनौती पर बात करती है, जो खरीद, भण्डारण, ट्रांसपोर्ट और क्वालिटी कंट्रोल से जुड़ी है — ये वे सिस्टम हैं जो तय करते हैं कि इथेनॉल असल में भरोसेमंद तरीके से पंप तक पहुँचेगा या नहीं। इस सीरीज के पहले भाग में यह देखा गया था कि दोनों देशों में गाड़ी मालिकों के लिए इस अंतर का क्या मतलब है। भोपाल के कटारा हिल्स में एक पेट्रोल पंप पर काम करने वाले 40 साल के एक पंप अटेंडेंट से जब पूछा गया कि क्या उन्होंने ग्राहकों को इथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल के बारे में बात करते हुए सुना है? तो उन्होंने हँसते हुए E20 पेट्रोल का ज़िक्र करते हुए कहा, “लोग आकर मज़ाक करते हैं, ‘गन्ने का जूस भर दो’।” भारत में, इथेनॉल बनाने के लिए गन्ना मुख्य स्रोतों में से एक है। E20 पेट्रोल 20% इथेनॉल और 80% पेट्रोल का मिश्रण है और ‘गन्ने के जूस’ वाला यह ताना E20 के तेज़ी से बढ़ने के बाद हुई लोगों की बातचीत को दिखाता है। इंटरनेट पर मिलने वाले कई वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट में ईंधन के रंग और क्वालिटी, पुरानी गाड़ियों के साथ इसकी कम्पैटिबिलिटी, और माइलेज या परफॉर्मेंस में आए संभावित बदलावों पर सवाल उठाए गए हैं। सरकारी एजेंसियों और ऑटोमोबाइल कंपनियों ने&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/18/supporting-infrastructure-is-the-missing-link-in-indias-ethanol-push/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>रेलवे लाइन के पास रहने वालों पर शोर का असर, स्वास्थ्य जोखिम पर शोध कम</title>
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					<pubDate>17 अगस्त 2026 09:35:40 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Rohan Singh]]>
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						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[लोग]]></category>
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							<![CDATA[पर्यावरण कानून, पर्यावरण की राजनीति, प्रदूषण, और लोग]]>
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							<![CDATA[<p>हर दिन हजारों ट्रेनें भारत के शहरों, कस्बों और घनी आबादी वाली बस्तियों से होकर गुजरती हैं। रेल पटरियों के आस-पास रहने वाले लाखों भारतीयों के लिए कंपन के साथ गुजरती ट्रेन का शोर रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। ज्यादातर दिनों में यह समस्या देर रात तक जारी रहती है। फिर भी, ट्रेनों का [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/17/railway-noise-health-impact-india/" data-wpel-link="internal">रेलवे लाइन के पास रहने वालों पर शोर का असर, स्वास्थ्य जोखिम पर शोध कम</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[हर दिन हजारों ट्रेनें भारत के शहरों, कस्बों और घनी आबादी वाली बस्तियों से होकर गुजरती हैं। रेल पटरियों के आस-पास रहने वाले लाखों भारतीयों के लिए कंपन के साथ गुजरती ट्रेन का शोर रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। ज्यादातर दिनों में यह समस्या देर रात तक जारी रहती है। फिर भी, ट्रेनों का शोर पर्यावरणीय सेहत के ऐसे खतरे के रूप में बना हुआ है, जिसे अभी तक ठीक से समझा नहीं गया है। अब हालिया अध्ययनों में रेल पटरियों के साथ शोर के इस बढ़े हुए स्तर का दस्तावेजीकरण शुरू किया गया है। कुछ समुदाय ऐसे शोर के संपर्क में हैं, जो सुझाई गई आवासीय सीमा से ज्यादा है। जहां शोधकर्ता रेलवे के शोर को पहले से कहीं ज्यादा अच्छी तरह माप पा रहे हैं, वहीं इस बारे में अभी भी बहुत कम जानकारी है कि सालों तक बार-बार इस शोर के संपर्क में आने का नींद, हृदय के स्वास्थ्य, तनाव से जुड़ी शारीरिक प्रक्रिया और जीवन की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ता है। जैसे-जैसे इसके सबूते सामने आ रहे हैं, शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में ट्रेनों के शोर के संपर्क में आने से सेहत पर लगातार पड़ने वाले दुष्प्रभाव की स्पष्ट समझ नहीं बन पाई है। इससे स्वास्थ्य पर असर जैसे अहम सवालों का जवाब नहीं मिल पाया है। शोर की तीव्रता का पता, स्वास्थ्य संबंधी सबूत गायब हाल के सालों में हुए अध्ययन धीरे-धीरे यह बता रहे हैं कि रेल पटरियों के आस-पास रहने वाले समुदायों का जीवन कैसा होता है। दिल्ली तकनीकी&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/17/railway-noise-health-impact-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>लुप्तप्राय घड़ियालों के लिए सुरक्षित बसेरा बनी बिहार की गंडक नदी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/14/gharial-conservation-gandak-river-bihar/</link>
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					<pubDate>14 अगस्त 2026 10:01:00 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Pushyamitra]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[गंडक]]></category>
		<category><![CDATA[घड़ियाल]]></category>
		<category><![CDATA[घड़ियाल संरक्षण]]></category>
		<category><![CDATA[घड़ियालों]]></category>
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							<![CDATA[जल संरक्षण, नदियां, नदी, नेशनल पार्क, पानी, बाढ़, मछली, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, विलुप्त होती प्रजातियां, और सरंक्षित क्षेत्र]]>
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							<![CDATA[<p>संरक्षण प्रयासों से बिहार में मगरमच्छ की एक विलुप्तप्राय प्रजाति की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ  है। वर्ष 2010 में जहाँ मात्र 10–15 घड़ियाल पाए गए थे, वहीं अब इन जीवों की संख्या लगभग एक हज़ार पहुँच गयी है। प्रकृति संरक्षण में जुटी संस्था इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर (आई.यू.सी.एन.) की रेड लिस्ट के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/14/gharial-conservation-gandak-river-bihar/" data-wpel-link="internal">लुप्तप्राय घड़ियालों के लिए सुरक्षित बसेरा बनी बिहार की गंडक नदी</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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						</description>
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							<![CDATA[संरक्षण प्रयासों से बिहार में मगरमच्छ की एक विलुप्तप्राय प्रजाति की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ  है। वर्ष 2010 में जहाँ मात्र 10–15 घड़ियाल पाए गए थे, वहीं अब इन जीवों की संख्या लगभग एक हज़ार पहुँच गयी है। प्रकृति संरक्षण में जुटी संस्था इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर (आई.यू.सी.एन.) की रेड लिस्ट के अनुसार भारतीय घड़ियाल (गैवियालिस गैंगेटिकस) गंभीर रूप से लुप्तप्राय है। इस श्रेणी में उन प्रजातियों को रखा जाता है जिनकी प्रभावी संरक्षण के बिना विलुप्त होने की प्रबल सम्भावना है। आई.यू.सी.एन. रेड लिस्ट ने वर्ष 1982 में घड़ियाल को लुप्तप्राय और 2007 में गंभीर रूप से लुप्तप्राय घोषित किया था। वर्ष 2010 में जब गैर सरकारी संगठन वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने इस घड़ियाल का सर्वेक्षण किया, तो बिहार में लगभग 300 कि.मी. की लंबाई में बहने वाली गंडक नदी में सिर्फ 10 घड़ियाल दिखे थे। सर्वेक्षणकर्ताओं का अनुमान था कि नदी में अधिक से अधिक पांच ही घड़ियाल और होंगे। इन चिंताजनक आंकड़ों को देख कर बिहार सरकार और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने संरक्षण के प्रयास चालू किये और 2014–15 में पटना के संजय गांधी जैविक उद्यान से 30 किशोर घड़ियालों को लाकर गंडक नदी में छोड़ा। गंडक नदी के किनारे घड़ियाल के अंडों को सुरक्षित करने में जुटा एक वॉलेंटियर। संरक्षण टीम प्रजनन के मौसम में घोंसलों की निगरानी करती है। तस्वीर- वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया से साभार अब गंडक नदी में वयस्क घड़ियालों की संख्या 433 हो गई है। किशोर और शिशु घड़ियालों को मिला कर यह संख्या एक हज़ार के&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/14/gharial-conservation-gandak-river-bihar/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>ज्वालामुखी,  अल-नीनो, औपनिवेशिक नीतियां, भारत में दो भीषण अकाल की कहानी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/13/volcanoes-el-nino-and-colonial-policies-fuelled-two-deadly-famines-in-india/</link>
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					<pubDate>13 अगस्त 2026 10:31:03 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Karthik Vinod]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
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							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[लोग]]></category>
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							<![CDATA[भारत]]>
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							<![CDATA[<p>एक नए अध्ययन के मुताबिक 1830 के दशक में जापान और दूसरा निकारागुआ में दो अलग-अलग ज्वालामुखी फटे। इन दोनों विस्फोटों से बड़ी मात्रा में सल्फर एरोसोल वायुमंडल में फैल गए। इससे धरती का तापमान तेजी से घटा और मानसून में सामान्य बारिश नहीं हो पाई, जिससे ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आगरा और मद्रास क्षेत्रों [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/13/volcanoes-el-nino-and-colonial-policies-fuelled-two-deadly-famines-in-india/" data-wpel-link="internal">ज्वालामुखी,  अल-नीनो, औपनिवेशिक नीतियां, भारत में दो भीषण अकाल की कहानी</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[एक नए अध्ययन के मुताबिक 1830 के दशक में जापान और दूसरा निकारागुआ में दो अलग-अलग ज्वालामुखी फटे। इन दोनों विस्फोटों से बड़ी मात्रा में सल्फर एरोसोल वायुमंडल में फैल गए। इससे धरती का तापमान तेजी से घटा और मानसून में सामान्य बारिश नहीं हो पाई, जिससे ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आगरा और मद्रास क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात पैदा हो गए। वैसे तो सूखे की मुख्य वजह ज्वालामुखी विस्फोट था, लेकिन दशकों तक औपनिवेशिक शासन के दौरान भारी-भरकम कर और पर्यावरण को हुए नुकसान ने मॉनसून की विफलता को अकाल में बदल दिया, जिससे बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। साल 1832 से 1838 के बीच भारत में मानसून कमजोर रहा। इस दौरान दुनिया भर में मौसम के चक्र में बदलाव दिखाई दिया। इनमें से एक था अल-नीनो जो दक्षिणी गोलार्ध से जुड़ी आवधिक जलवायु घटना है और 1833 में सक्रिय हुआ था। इसके असर से मानसून का चक्र प्रभावित हुआ, जिस कारण पूरे भारत में लंबे समय तक सूखा मौसम बना रहा। इस वजह से ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आगरा और मद्रास क्षेत्रों में सूखा पड़ा, जिससे धान, दलहन और अन्य मौसमी फसलों की खेती चौपट हो गई। औपनिवेशिक नीतियों के कारण आर्थिक कुप्रबंधन और बढ़ गया, जिसने सूखे को अकाल में बदल दिया। इस अकाल में 9 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई। जापान व निकारागुआ में इन ज्वालामुखी के फटने तथा अकाल के बीच संबंध स्थापित करने वाला यह अध्ययन दिसंबर में जर्नल ऑफ हिस्टोरिकल जियोग्राफी में प्रकाशित हुआ। अध्ययन में पाया गया कि&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/13/volcanoes-el-nino-and-colonial-policies-fuelled-two-deadly-famines-in-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>असम की बाढ़ के पीछे तेज बारिश, और भी कई कारण</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/12/assam-floods-expose-a-crisis-beyond-heavy-rain/</link>
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					<pubDate>12 अगस्त 2026 13:05:52 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Nabarun Guha]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[लोग]]></category>
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							<![CDATA[<p>जुलाई महीने में 18 और 19 तारीख की दरमियानी रात जब दुनिया भर के फुटबॉल फैन विश्व कप का फाइनल मैच देखने के लिए तैयार हो रहे थे। लगभग उसी समय, नेपालीखुटी गांव के घरों में इस कदर पानी घुसना शुरू हुआ कि लोगों को अपनी छतों और इमारतों पर चढ़ना पड़ा। असम के शिवसागर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/12/assam-floods-expose-a-crisis-beyond-heavy-rain/" data-wpel-link="internal">असम की बाढ़ के पीछे तेज बारिश, और भी कई कारण</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[जुलाई महीने में 18 और 19 तारीख की दरमियानी रात जब दुनिया भर के फुटबॉल फैन विश्व कप का फाइनल मैच देखने के लिए तैयार हो रहे थे। लगभग उसी समय, नेपालीखुटी गांव के घरों में इस कदर पानी घुसना शुरू हुआ कि लोगों को अपनी छतों और इमारतों पर चढ़ना पड़ा। असम के शिवसागर जिले का एक गांव नेपालीखुटी, आस-पास के कुछ गांवों के साथ, राज्य में हाल ही में आई बाढ़ से सबसे ज़्यादा प्रभावित गांवों में से थे। नेपालीखुटी के लगभग 60-65 परिवारों के घर इस बाढ़ में बह जाने के कारण इन परिवारों के सदस्यों ने एक दो-मंज़िला ईमारत में शरण ली, यह बात सामाजिक कार्यकर्त्ता शुभ्राजीत दास ने बताई, जो राहत काम के लिए नेपालीखुटी गए थे। नेपालीखुटी से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर, संतक पांचाली इलाके में, सौरव चौधरी 19 जुलाई के अपने अनुभव के बारे में बताते हैं। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “पानी दोपहर करीब 1 बजे हमारे गांव में घुसा और बीस मिनट में यह हमारे सीने तक पहुंच गया। मेरे परिवार को, 40 दूसरे परिवारों के साथ, हमारे गांव के लोअर प्राइमरी स्कूल की दो-मंज़िला ईमारत में पनाह लेनी पड़ी।” “नेपालीखुटी में, तबाही बहुत बड़ी है क्योंकि वहां करीब 10 लोग मारे गए हैं। मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है क्योंकि कई लाशें कीचड़ में फंसी हो सकती हैं। साथ ही, करीब 5,000 गायें बह गई हैं। वे वहां के लोगों की रोजी-रोटी का मुख्य ज़रिया थीं।” असम में बाढ़ से मरने वालों की संख्या 10 अगस्त तक 100 हो गई&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/12/assam-floods-expose-a-crisis-beyond-heavy-rain/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>असम के पर्यावरण कार्यकर्ता प्रणब डोले की गिरफ़्तारी का विरोध</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/11/assam-activists-detention/</link>
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					<pubDate>11 अगस्त 2026 09:10:51 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Simrin Sirur]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[लोग]]></category>
		<category><![CDATA[Biodiversity]]></category>
		<category><![CDATA[Environment]]></category>
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							<![CDATA[आदिवासी, गाँव, नेशनल पार्क, पर्यटन, पर्यावरण कानून, पर्यावरण की राजनीति, प्राकृतिक संसाधन, वन अधिकार, वन कटाई, और वन्य जीव]]>
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							<![CDATA[<p>भारत के 60 से अधिक मानवाधिकार संगठनों ने असम के पर्यावरण और मूलनिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किए जाने की निंदा की है। उन्होंने इस गिरफ़्तारी को &#8220;सामाजिक कार्यकर्ताओं को उनके संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने की सज़ा देने और उनकी छवि खराब करने की कोशिश&#8221; बताया है। [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/11/assam-activists-detention/" data-wpel-link="internal">असम के पर्यावरण कार्यकर्ता प्रणब डोले की गिरफ़्तारी का विरोध</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[भारत के 60 से अधिक मानवाधिकार संगठनों ने असम के पर्यावरण और मूलनिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किए जाने की निंदा की है। उन्होंने इस गिरफ़्तारी को &#8220;सामाजिक कार्यकर्ताओं को उनके संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने की सज़ा देने और उनकी छवि खराब करने की कोशिश&#8221; बताया है। डोले ने असम के काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व में बनने वाले एक फाइव-स्टार लग्जरी रिसॉर्ट के खिलाफ प्रदर्शनों का नेतृत्व किया था। काजीरंगा एक यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट है, जहाँ दुनिया के सबसे ज़्यादा एक सींग वाले गैंडे पाए जाते हैं। डोले को 12 जुलाई को 28 जून को रिसोर्ट के प्रोजेक्ट के विरोध में किए गए प्रदर्शन का &#8220;मास्टरमाइंड&#8221; होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और उन पर पुलिसकर्मियों पर हमला करने का आरोप लगाया गया था। एक सत्र न्यायालय ने 29 जुलाई को उन्हें यह कहते हुए जमानत दे दी कि पुलिस के खिलाफ हिंसा का कोई सबूत नहीं मिला, और इसके विपरीत यह पाया गया कि उनकी गिरफ्तारी का नोटिस बहुत देर से दिया गया था। “जिन मामलों में पारिस्थितिकी का बचाव और मूल निवासियों का जीवन यापन एक-दूसरे से जुड़ा है, वहां आपराधिक कानून का इस्तेमाल स्थानीय चिंताओं को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। असली कानून व्यवस्था प्रभावित लोगों को चुप कराकर नहीं, बल्कि उनकी बात सुनकर हासिल होती है।” जमानत मिलने के ठीक अगले दिन, 30 जुलाई को असम सरकार ने डोले पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून या एनएसए  लगा दिया, जिसके तहत किसी आरोपी&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/11/assam-activists-detention/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>किरकसाल में भेड़िये, लकड़बग्घे और 600 से ज्यादा प्रजातियां, गांव ने खुद संभाली जैव-विविधता की कमान</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/10/kirkasal-community-biodiversity-survey-606-species-maharashtra/</link>
					<comments>https://hindi.mongabay.com/2026/08/10/kirkasal-community-biodiversity-survey-606-species-maharashtra/?noamp=mobile#respond</comments>
					<pubDate>10 अगस्त 2026 08:48:15 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Vinaya Kurtkoti]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[लोग]]></category>
		<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[समाधान]]></category>
		<category><![CDATA[आवास संरक्षण]]></category>
		<category><![CDATA[कृषि-जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[गांव]]></category>
		<category><![CDATA[जैव विविधता निगरानी]]></category>
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		<category><![CDATA[भेड़िया]]></category>
		<category><![CDATA[भेड़िया संरक्षण]]></category>
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							<![CDATA[महाराष्ट्र]]>
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							<![CDATA[गाँव, जलवायु परिवर्तन, नई प्रजातियां, पर्यावरण कानून, पर्यावरण की राजनीति, पहल, प्राकृतिक संसाधन, लोग, वन, वन अधिकार, वन कटाई, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, विलुप्त होती प्रजातियां, समाधान, और सरंक्षित क्षेत्र]]>
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							<![CDATA[<p>महाराष्ट्र के सतारा जिले के मान तालुका में स्थित छोटा-सा गांव किरकसाल अपने घने झाड़ीदार इलाकों के लिए जाना जाता है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार यह क्षेत्र कभी समृद्ध घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र था, जहां बड़ी संख्या में कृष्ण मृग (ब्लैकबक) और चिंकारा पाए जाते थे। 1950 के दशक के बाद यहां खुर वाले वन्यजीवों [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/10/kirkasal-community-biodiversity-survey-606-species-maharashtra/" data-wpel-link="internal">किरकसाल में भेड़िये, लकड़बग्घे और 600 से ज्यादा प्रजातियां, गांव ने खुद संभाली जैव-विविधता की कमान</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
]]>
						</description>
																					<content:encoded>
							<![CDATA[महाराष्ट्र के सतारा जिले के मान तालुका में स्थित छोटा-सा गांव किरकसाल अपने घने झाड़ीदार इलाकों के लिए जाना जाता है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार यह क्षेत्र कभी समृद्ध घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र था, जहां बड़ी संख्या में कृष्ण मृग (ब्लैकबक) और चिंकारा पाए जाते थे। 1950 के दशक के बाद यहां खुर वाले वन्यजीवों (अंगुलेट प्रजातियों) की स्थानीय आबादी धीरे-धीरे खत्म हो गई। हालांकि, भारतीय भेड़िया, धारीदार लकड़बग्घा, सुनहरा सियार और बंगाल लोमड़ी जैसी प्रजातियां यहां बनी रहीं, लेकिन गांव की जैव-विविधता का कभी व्यवस्थित तरीके से दस्तावेजीकरण नहीं किया गया। मुंबई के वन्यजीव जीवविज्ञानी चिन्मय सावंत (इनके दादा-दादी किरकसाल में रहते हैं) ने इस पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद प्रजातियों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण करने का फैसला लिया। इसी उद्देश्य से उन्होंने कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान पूरा समय किरकसाल में बिताया और गांव का पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (पीबीआर) तैयार करने पर काम किया। सावंत बताते हैं, “किरकसाल पहाड़ी क्षेत्रों और टेबल पर्वतों (सपाट चोटी वाला पर्वत) से जुड़ा हुआ है, लेकिन हमें यह नहीं पता था कि वहां कौन-कौन से जीव रहते हैं। इसे जानने और इस क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन करने की उत्सुकता थी, इसलिए मैं पूरे लॉकडाउन में यहीं रहा। उस समय ग्राम पंचायत के सदस्य रहे अमोल काटकर ने मुझे पीबीआर तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद मैंने प्रकृति संरक्षण में दिलचस्पी रखने वाले युवाओं की एक टीम बनाई।” इसी पहल के साथ ‘किरकसाल संरक्षण परियोजना’ की शुरुआत हुई। इस टीम ने गांव की जैव-विविधता का दस्तावेजीकरण लगातार जारी रखा। बाद में साल 2023 से 2025&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/10/kirkasal-community-biodiversity-survey-606-species-maharashtra/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>भारत की इथेनॉल योजना क्या सीख ले सकती है ब्राज़ील के लम्बे इथेनॉल सफर से</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/07/what-indias-ethanol-push-can-learn-from-brazils-long-ethanol-journey/</link>
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					<pubDate>07 अगस्त 2026 09:45:15 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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							<![CDATA[<p>यह रिपोर्ट भारत और ब्राज़ील के इथेनॉल ट्रांज़िशन की तुलना करने वाली सीरीज़ का पहला हिस्सा है। ब्राज़ील दशकों से इथेनॉल पर चल रहा है, जहाँ वाहन चालाक पेट्रोल स्टेशनों पर पेट्रोल में इथेनॉल के अलग-अलग ब्लेंड में से चुनते हैं। भारत डिफ़ॉल्ट ईंधन ब्लेंड के तौर पर E20 की ओर बढ़ रहा है, जहाँ [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/07/what-indias-ethanol-push-can-learn-from-brazils-long-ethanol-journey/" data-wpel-link="internal">भारत की इथेनॉल योजना क्या सीख ले सकती है ब्राज़ील के लम्बे इथेनॉल सफर से</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
]]>
						</description>
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							<![CDATA[यह रिपोर्ट भारत और ब्राज़ील के इथेनॉल ट्रांज़िशन की तुलना करने वाली सीरीज़ का पहला हिस्सा है। ब्राज़ील दशकों से इथेनॉल पर चल रहा है, जहाँ वाहन चालाक पेट्रोल स्टेशनों पर पेट्रोल में इथेनॉल के अलग-अलग ब्लेंड में से चुनते हैं। भारत डिफ़ॉल्ट ईंधन ब्लेंड के तौर पर E20 की ओर बढ़ रहा है, जहाँ उपभोक्ताओं के पास बहुत कम विकल्प हैं। यह रिपोर्ट इस बात की पड़ताल करती है कि दोनों देशों में गाड़ी मालिकों के लिए इस अंतर का क्या मतलब है। उत्तरी ब्राजील के बेलेम शहर में &#8216;पोस्तो डलास&#8217; नाम के एक पेट्रोल स्टेशन पर एक कार आती है। कार का ड्राइवर स्टेशन पर लगे रेट कार्ड को देखता है और फिर उसके हिसाब से अपने ईंधन का चुनाव करता है। इस स्टेशन पर काम करने वाले 27 साल के जॉन के लिए यह रोज़ का नज़ारा है। “यहाँ ज़्यादातर फ़्लेक्स-फ़्यूल वाली गाड़ियाँ आती हैं। लोग कीमत देखते हैं और उसी हिसाब से ईंधन भरने के लिए कहते हैं,&#8221; जॉन ने बताया। पोस्तो डलास स्टेशन ब्राजील की सरकारी कंपनी पेट्रोब्रास द्वारा संचालित किए जाते हैं। ब्राजील में, ग्राहक कीमत और इस्तेमाल के आधार पर इथेनॉल के अलग-अलग प्रतिशत वाले मिश्रण या शुद्ध पेट्रोल में से अपना ईंधन चुन सकते हैं। यहाँ बिकने वाली ज़्यादातर कारें फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियाँ होती हैं, जिन्हें पेट्रोल और इथेनॉल के अलग-अलग मिश्रणों पर चलने के लिए बनाया गया है। ब्राज़ील में यह विकल्प कई दशकों से उपलब्ध है। वहीं, दुनिया के दूसरे हिस्से में, लगभग 15,000 किलोमीटर दूर, भोपाल के कटारा हिल्स में&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/07/what-indias-ethanol-push-can-learn-from-brazils-long-ethanol-journey/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>शहरों में कौन से पेड़ उग रहे हैं? नीम, अमरूद और अरंडी समेत 742 प्रजातियों की विविधता</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/06/urban-tree-diversity-database-india/</link>
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					<pubDate>06 अगस्त 2026 09:33:30 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Simrin Sirur]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[climate change]]></category>
		<category><![CDATA[Conservation]]></category>
		<category><![CDATA[Environment]]></category>
		<category><![CDATA[क्लाइमेट चेंज]]></category>
		<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[संरक्षण]]></category>
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							<![CDATA[भारत]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[क्लाईमेट चेंज, ग्रीनहाउस उत्सर्जन, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, और वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
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							<![CDATA[<p>भारत में जंगलों की स्थिति बताने वाली ‘इंडिया स्टेट ऑफ़ फ़ॉरेस्ट्स’ रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल भूभाग का 3.41% हिस्सा जंगल के बाहर के पेड़ों से ढका है। ये पेड़ फुटपाथ, बगीचों और खेतों में लगे हैं। हालाँकि, इन पेड़ों की विविधता के बारे में बहुत कम जानकारी है, खासकर उन इलाकों में जहाँ [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/06/urban-tree-diversity-database-india/" data-wpel-link="internal">शहरों में कौन से पेड़ उग रहे हैं? नीम, अमरूद और अरंडी समेत 742 प्रजातियों की विविधता</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[भारत में जंगलों की स्थिति बताने वाली ‘इंडिया स्टेट ऑफ़ फ़ॉरेस्ट्स’ रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल भूभाग का 3.41% हिस्सा जंगल के बाहर के पेड़ों से ढका है। ये पेड़ फुटपाथ, बगीचों और खेतों में लगे हैं। हालाँकि, इन पेड़ों की विविधता के बारे में बहुत कम जानकारी है, खासकर उन इलाकों में जहाँ तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है और गर्मियों में ‘अर्बन हीट आइलैंड इफ़ेक्ट्स’ होने का खतरा है। भारत में शहरी पेड़ों की डाइवर्सिटी या विविधता को दर्शाने वाला एक नया डेटाबेस इस अंतर को कम करने की कोशिश करता है। मौजूदा सर्वे और पुराने रिकॉर्ड का इस्तेमाल करके बनाए गए इस डेटाबेस में कम से कम 742 पेड़ों की प्रजातियां दर्ज की गईं, जो &#8220;ग्लोबल अर्बन ट्री इन्वेंटरी असेसमेंट में रिपोर्ट की गई विश्व भर में शहरी पेड़ों की 4,734 प्रजातियों का लगभग 15.7% हैं,&#8221; स्टडी में कहा गया है। यह डेटाबेस शहरी इलाकों में पौधों की डाइवर्सिटी के डेटा का एक शुरुआती संग्रह है, जिसे उनके गुणों, IUCN रेड लिस्ट स्टेटस और प्रजातियों के फैलाव को डॉक्यूमेंट करने के मकसद से एक साथ जोड़ा गया है। बसे हुए इलाकों में पाए जाने वाले मशहूर पेड़ों की प्रजातियों में सिडियम गुआवा (अमरूद), रिकिनस कम्युनिस (अरंडी का तेल), और एज़ाडिरेक्टा इंडिका (नीम) प्रजातियाँ शामिल हैं। इससे यह भी पता चला कि ज़्यादातर टैक्सा IUCN रेड लिस्ट लीस्ट कंसर्न यानी कि कम चिंताजनक वाली लिस्ट में थे। रिकॉर्ड किए गए लगभग 41% पेड़ बाहरी प्रजातियों के थे, जबकि 58% सदाबहार थे। मिज़ोरम यूनिवर्सिटी के फॉरेस्ट्री डिपार्टमेंट में&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/06/urban-tree-diversity-database-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>देसी मधुमक्खियों के लिए क्यों जरूरी हैं खेत और सड़क किनारे के फूल</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/05/native-bees-roadsides-farms-himalayas/</link>
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					<pubDate>05 अगस्त 2026 12:55:04 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Hirra Azmat]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
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							<![CDATA[क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन, क्लाईमेट चेंज, क्लाईमेट चेंज एडैप्टेशन, जलवायु परिवर्तन, और वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
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							<![CDATA[<p>जम्मू के हिमालय की तलहटी वाले इलाके में सड़क के किनारे उगे जंगली फूलों पर बड़ी हलचल थी। इन फूलों की पंखुड़ियों पर चिपकी नीली पट्टी वाली मधुमक्खियां (अमीगिला), छोटी बढ़ई मधुमक्खियां (सेराटिना), और यहाँ तक कि बड़ी, चमकदार बढ़ई मधुमक्खियां (ज़ाइलोकोपा) इस क्षेत्र में गाड़ियों की आवाजाही के बावजूद अपने काम में लगी हुई [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[जम्मू के हिमालय की तलहटी वाले इलाके में सड़क के किनारे उगे जंगली फूलों पर बड़ी हलचल थी। इन फूलों की पंखुड़ियों पर चिपकी नीली पट्टी वाली मधुमक्खियां (अमीगिला), छोटी बढ़ई मधुमक्खियां (सेराटिना), और यहाँ तक कि बड़ी, चमकदार बढ़ई मधुमक्खियां (ज़ाइलोकोपा) इस क्षेत्र में गाड़ियों की आवाजाही के बावजूद अपने काम में लगी हुई थीं। जम्मू की शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी की शोधकर्ता यूसरा मुख्तार कहती हैं, “यह हमारी स्टडी के सबसे हैरान करने वाले पलों में से एक था।” अक्टूबर 2025 में प्रकाशित हुई इस स्टडी में यह पता लगाया गया कि उत्तर-पश्चिमी हिमालय के जम्मू इलाके में अलग-अलग माहौल में नॉन-हनी बी (नॉन-एपिस) यानी शहद न बनाने वाली देसी मधुमक्खियां, शहद वाली मधुमक्खियों की विविधता कैसे बदलती है। इस स्टडी का मकसद यह समझना था कि देसी मधुमक्खी के समुदाय बढ़ते इंसानी असर पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। स्टडी करने वाली टीम को उम्मीद थी कि उन्हें बिना किसी रुकावट वाले जंगलों या घास के मैदानों में मधुमक्खियों की अच्छी विविधता मिलेगी, ऐसी जगहें जहाँ इंसानी दखल नहीं होता। लेकिन, बार-बार हुए फील्ड सर्वे ने कुछ और ही कहानी बताई। दो साल के इस फील्ड सर्वे में, मुख्तार और उनके साथियों ने बार-बार पाया कि सड़क किनारे के पेड़-पौधों और एग्रो-इकोसिस्टम सहित, थोड़ी खराब हुई जगहों पर बड़ी संख्या में देसी मधुमक्खियां आ रही थीं, जो फूल वाले खरपतवार और अपने आप उग आए पौधों को खा रही थीं। मुख्तार कहती हैं, “यह याद दिलाता है कि बायोडायवर्सिटी हमेशा ‘साफ-सुथरे’ नज़ारों की हमारी उम्मीदों&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/05/native-bees-roadsides-farms-himalayas/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>पवित्र उपवन कैसे बचा रहे हैं सिक्किम की पारंपरिक चिकित्सा परंपरा</title>
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					<pubDate>04 अगस्त 2026 12:10:33 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Shradha Triveni]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<![CDATA[<p>भारत के हिमालयी क्षेत्र के पवित्र उपवन औषधीय पौधों का एक विशाल भंडार हैं। सांस्कृतिक रूप से संरक्षित ये जगहें अनौपचारिक संरक्षण क्षेत्रों के तौर पर काम करती हैं और औषधीय रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों को बचाए रखती हैं। साथ ही, जैव-विविधता के संरक्षण में समुदाय की भागीदारी को भी मज़बूत करने में भी इनका [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[भारत के हिमालयी क्षेत्र के पवित्र उपवन औषधीय पौधों का एक विशाल भंडार हैं। सांस्कृतिक रूप से संरक्षित ये जगहें अनौपचारिक संरक्षण क्षेत्रों के तौर पर काम करती हैं और औषधीय रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों को बचाए रखती हैं। साथ ही, जैव-विविधता के संरक्षण में समुदाय की भागीदारी को भी मज़बूत करने में भी इनका योगदान होता है। इन सभी महत्वपूर्ण योगदानों के बावजूद, इन उपवनों से जुड़े पारिस्थितिक आधार और ज्ञान प्रणालियों का ज़्यादातर कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं है और इनके खत्म होने का खतरा लगातार बना हुआ है। सिक्किम की एसआरएम यूनिवर्सिटी के वनस्पति विज्ञान के एक हालिया अध्ययन में 70 औषधीय पौधों की प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया है। इन पौधों का इस्तेमाल लेप्चा, भूटिया, नेपाली, लिंबू और तिब्बती समुदाय करीब 35 बीमारियों के इलाज के लिए करते हैं। जुलाई 2022 और जून 2024 के बीच हुए इस अध्ययन में पश्चिम सिक्किम में आदिवासी समुदायों और पारंपरिक चिकित्सकों की चिकित्सा पद्धतियों और तरीकों को रिकॉर्ड किया गया। इस अध्ययन के मुख्य लेखकों में से एक और एसआरएम यूनिवर्सिटी में वनस्पति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर, बिस्वजीत बोस का कहना है कि डॉक्यूमेंटेशन से पता चलता है कि कैसे सांस्कृतिक रूप से संरक्षित जंगल के हिस्से जैसे कि सेक्रेड ग्रोव, गुम्पा फॉरेस्ट और मठ गुम्पा फॉरेस्ट, पश्चिम सिक्किम जिले में औषधीय पौधों की विविधता के लिए एक सामाजिक तौर पर संरक्षित इकाई के तौर पर काम करते हैं। गांव की सामुदायिक ज़मीन जो इन उपवनों को बचाती है, यह दिखाती है कि ट्रेडिशनल नॉलेज सिस्टम या पारंपरिक ज्ञान प्रणाली&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/04/sikkim-sacred-groves-traditional-healing-medicinal-plants/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>प्रदूषण और घाटे के बावजूद क्यों बन रहे नए वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्र</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/08/03/waste-to-energy-incineration-plants-india-cost-pollution/</link>
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					<pubDate>03 अगस्त 2026 11:28:55 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Ravleen Kaur]]>
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										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
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							<![CDATA[<p>जब राजपाल सैनी दिल्ली नगर निगम से सेवानिवृत्त हुए, तब उन्होंने यह नहीं सोचा था कि जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें अपने ही पूर्व नियोक्ता के खिलाफ संघर्ष करना पड़ेगा। नगर निगम की ओर से उनके गांव के पास लगाए गए कचरा दहन (इंसिनरेशन) संयंत्र ने उनकी जिंदगी को मुश्किल बना दिया है। दिल्ली [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[जब राजपाल सैनी दिल्ली नगर निगम से सेवानिवृत्त हुए, तब उन्होंने यह नहीं सोचा था कि जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें अपने ही पूर्व नियोक्ता के खिलाफ संघर्ष करना पड़ेगा। नगर निगम की ओर से उनके गांव के पास लगाए गए कचरा दहन (इंसिनरेशन) संयंत्र ने उनकी जिंदगी को मुश्किल बना दिया है। दिल्ली के उत्तर-पश्चिमी छोर पर बवाना के पास स्थित सन्नौठ गांव के निवासी सैनी कहते हैं, “दिल्ली से निकलने वाले पूरे कचरे का प्रसंस्करण केंद्र यहीं है. एक खत्ता (कूड़ा डालने वाली जगह), खतरनाक कचरे के निपटान की जगह, कम्पोस्टिंग संयंत्र और 28 मेगावाट का कचरे से ऊर्जा संयंत्र। इतना ही काफी नहीं था, अब हमारे ऊपर एक और डब्ल्यूटीई संयंत्र थोप दिया गया है।” सैनी ने कहा, &#8220;दुनिया योग और ताजी हवा में सांस लेने की अहमियत समझती है। लेकिन बाहर जाने की तो बात ही छोड़ दीजिए, बदबू से बचने के लिए हमें अपने दरवाजों की दरारों को भी बंद करना पड़ता है। नियमित रूप से प्राणायम करने वाले मेरे चाचा पिछले छह सालों से लकवाग्रस्त हैं और बिस्तर पर हैं।&#8221; सैनी की कार &#8220;सांस लेने के अधिकार&#8221; की वकालत करने वाले पोस्टरों से पटी पड़ी है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में मामला लंबित होने और दिसंबर 2024 से स्थानीय निवासियों के विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद मई में प्रतिदिन 3,000 टन क्षमता वाले 30 मेगावाट के नए डब्ल्यूटीई संयंत्र का निर्माण शुरू हो गया। यह संयंत्र मुनक नहर के ठीक बगल में स्थित है जो दिल्ली के लिए पेयजल का महत्वपूर्ण जरिया  है। यह राजधानी&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/08/03/waste-to-energy-incineration-plants-india-cost-pollution/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>खेतों के बीच प्राकृतिक ठिकाने बचा रहे भालू, लकड़बग्घा और काले हिरण</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/07/31/agropastoral-landscapes-wildlife-refuge-karnataka/</link>
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					<pubDate>31 जुलाई 2026 13:58:50 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Arathi Menon]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/31/agropastoral-landscapes-wildlife-refuge-karnataka/" data-wpel-link="internal">खेतों के बीच प्राकृतिक ठिकाने बचा रहे भालू, लकड़बग्घा और काले हिरण</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[जैव-विविधता संरक्षण के क्षेत्र में एक लम्बे समय से यह अवधारणा रही है जिसमें संरक्षित क्षेत्रों के बेहतर प्रबंधन को ही संरक्षण का अच्छा तरीका माना जाता था। समय-समय पर हुए कई अध्ययनों में जैव-विविधता और प्रजातियों के संरक्षण में खुली प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणालियों जैसे अलग-अलग तरह के परिदृश्यों की भूमिका की जांच की गई है। इन अध्ययनों के नतीजों ने इस पुरानी धारणा को गलत साबित कर दिया है। उत्तरी कर्नाटका के कोप्पल ज़िले के कम बारिश और इंसानी गतिविधिओं वाले इलाके पर किया गया एक नया अध्ययन इस बात को और पुख्ता करता है। इस अध्ययन से पता चलता है कि ऐसे इकोसिस्टम, जिनमें इंसान कभी-कभी आते-जाते रहते हैं, भी दुनिया भर में खतरे में पड़ी प्रजातियों के लिए रहने की जगह बन सकते हैं और उनके संरक्षण में मदद कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने तीन प्रजातियों, धारीदार लकड़बग्घा (Hyaena hyaena), स्लॉथ भालू या रीछ (Melursus ursinus) और काला हिरण (Antilope cervicapra), के फैलाव की जांच करने के लिए चरवाहों के साथ खास जानकारी देने वालों के इंटरव्यू और ‘वन-सीज़न, वन-स्पीशीज ऑक्यूपेंसी’ मॉडलिंग फ्रेमवर्क का इस्तेमाल किया। इस अध्ययन से पता चला कि लकड़बग्घा, रीछ और काले हिरण ने क्रमशः 52%, 26% और 63% इलाके में अपनी जगह बनाई हुई थी, वहीं भारतीय भेड़िया (Canis lupus pallipes) कम से कम 76% इलाके में पाया गया। इस अध्ययन की मुख्य लेखिका इरावती मजगांवकर कहती हैं, “दक्कन प्रायद्वीप के इन इलाकों में बहुत कम संरक्षित क्षेत्र हैं, इसलिए आम लोगों की सोच और सरकारी नीतियों में इन्हें सिर्फ़ खेती वाली&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/31/agropastoral-landscapes-wildlife-refuge-karnataka/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>ज़िगज़ैग भट्टों से घटा प्रदूषण, मजदूरों की मुश्किलें बरकरार</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/07/30/brick-kilns-clean-technology-workers-uncertain-future/</link>
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					<pubDate>30 जुलाई 2026 12:58:28 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Tanvi Bhatia]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[ऊर्जा]]></category>
		<category><![CDATA[ईंट भट्टा]]></category>
		<category><![CDATA[ग्रीन ईंट]]></category>
		<category><![CDATA[जहरीली हवा]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण प्रदूषण]]></category>
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		<category><![CDATA[प्रदूषण नियंत्रण]]></category>
		<category><![CDATA[हवा]]></category>
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							<![CDATA[ऊर्जा, क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन, पर्यावरण कानून, पहल, प्रदूषण, और लोग]]>
						</topic-tags>
					
					
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							<![CDATA[<p>शहरों के तेजी से होते विस्तार, घरों की बढ़ती मांग और बड़े पैमाने पर निर्माण परियोजनाओं के कारण, भारत में निर्माण क्षेत्र की तेजी साफ़ देखी जा सकती है। सरकार की शहरी आवास योजना के तहत, 10 वर्षों की अवधि में 1.18 करोड़ घरों को मंजूरी दी गई, 1.14 करोड़ घरों का निर्माण शुरू हुआ [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/30/brick-kilns-clean-technology-workers-uncertain-future/" data-wpel-link="internal">ज़िगज़ैग भट्टों से घटा प्रदूषण, मजदूरों की मुश्किलें बरकरार</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[शहरों के तेजी से होते विस्तार, घरों की बढ़ती मांग और बड़े पैमाने पर निर्माण परियोजनाओं के कारण, भारत में निर्माण क्षेत्र की तेजी साफ़ देखी जा सकती है। सरकार की शहरी आवास योजना के तहत, 10 वर्षों की अवधि में 1.18 करोड़ घरों को मंजूरी दी गई, 1.14 करोड़ घरों का निर्माण शुरू हुआ और 2024 तक 80 लाख से ज़्यादा घर बनकर तैयार हो गए। वहीं, ग्रामीण आवास योजना के तहत सरकार की योजना 2029 तक 2 करोड़ घर बनाने की है। देश में हर साल लाखों इमारतें बनाई जाती हैं, जो इस विकास के पैमाने और गति, दोनों को दर्शाती हैं। निर्माण क्षेत्र जलवायु परिवर्तन में एक अहम भूमिका निभाता है। वर्ल्ड ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल के अनुसार, दुनिया भर में ऊर्जा से जुड़े कार्बन उत्सर्जन में इमारतों और निर्माण का करीब 39% हिस्सा है, जिसमें अकेले निर्माण सामग्री और निर्माण प्रक्रिया का योगदान 11% है। निर्माण कार्यों की बढ़ती मांग के कारण ईंटों की मांग भी बढ़ी है और ईंट उद्योग का विस्तार हो रहा है। चीन के बाद भारत दुनिया में ईंटों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। फिर भी, इस सेक्टर का एक बड़ा हिस्सा असंगठित, बिखरा हुआ और अनौपचारिक है। ईंट बनाने के पारंपरिक तरीकों में कोयले से चलने वाली और ऊर्जा की ज़्यादा खपत करने वाली भट्टियों का इस्तेमाल होता है। इससे मिट्टी की पकी हुई ईंटों के उत्सर्जन का स्तर बढ़ जाता है। ईंट उद्योग भारत में (कोयले से मिलने वाली) ऊर्जा का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करने वाले उद्योगों में से&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/30/brick-kilns-clean-technology-workers-uncertain-future/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>मध्य प्रदेश से आए बाघों ने बढ़ाई छत्तीसगढ़ की बाघ आबादी</title>
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					<pubDate>29 जुलाई 2026 09:56:44 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Ayushi Sharma]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[छत्तीसगढ़ में बाघ]]></category>
		<category><![CDATA[टाइगर रिजर्व के बाहर बाघ]]></category>
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							<![CDATA[नेशनल पार्क, बाघ, राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव एवं जैव विविधता, और विलुप्त होती प्रजातियां]]>
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							<![CDATA[<p>मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में साल 2018 में एक युवा बाघिन कैमरा ट्रैप में दिखना बंद हो गई। इस बाघिन का इस निगरानी से अचानक गायब हो जाना थोड़ा अजीब था। न तो इसके शव के मिलने या अवैध शिकार की कोई घटना दर्ज की गई थी और न इसके किसी अन्य बाघ [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में साल 2018 में एक युवा बाघिन कैमरा ट्रैप में दिखना बंद हो गई। इस बाघिन का इस निगरानी से अचानक गायब हो जाना थोड़ा अजीब था। न तो इसके शव के मिलने या अवैध शिकार की कोई घटना दर्ज की गई थी और न इसके किसी अन्य बाघ या जानवर से टकराव की कोई आधिकारिक रिपोर्ट मिली थी। इससे पता चलता था कि उसकी मौत टाइगर रिज़र्व के अंदर नहीं हुई थी। हालाँकि, लगभग तीन साल तक मध्य प्रदेश के आधिकारिक मॉनिटरिंग ग्रिड में इस बाघिन की उपस्थिति का कोई भी सबूत या तस्वीर नहीं मिली। फिर, 2021 में पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व (एटीआर) में लगे कैमरा ट्रैप में एक बाघिन को शावकों के साथ साल के जंगल से गुज़रते हुए देखा गया। धारियों के पैटर्न की जाँच से यह पुष्टि हुई कि यह बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व से गायब हुई वही बाघिन थी। इसने मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ आने में लगभग 400 किलोमीटर का सफ़र तय किया। बाद में वन अधिकारियों ने इसका नाम &#8216;झुमरी&#8217; रखा और आधिकारिक मॉनिटरिंग रिकॉर्ड में इसे टीके-8 के तौर पर दर्ज किया गया। जानकारों का कहना है कि जब झुमरी बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व से गायब हुई, तो वह &#8216;डिस्पर्सल एज&#8217; (बिखराव की उम्र) में पहुँच चुकी थी। यह बाघ के जीवन का वह दौर होता है, आमतौर पर दो से तीन साल की उम्र, जब उनके लिए अपने जन्म वाले इलाके में बने रहना मुमकिन नहीं रह जाता। बांधवगढ़ भारत के सबसे ज़्यादा बाघों&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/29/chhattisgarh-tiger-population-forest-corridors/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>मधुमक्खी के बक्सों से आदिवासी महिलाओं की जिंदगी में नई मिठास</title>
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					<pubDate>28 जुलाई 2026 13:14:12 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Arathi Menon]]>
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										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[agriculture]]></category>
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							<![CDATA[आदिवासी, क्लाईमेट चेंज, क्लाईमेट चेंज एडैप्टेशन, गाँव, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, पहल, लोग, और समाधान]]>
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							<![CDATA[<p>तमिलनाडु के नीलगिरि जिले के वाझैथोट्टम गांव की रहने वाली इरुला महिला नीलावथी (37) के पास पिछले कुछ महीनों में जश्न मनाने की कई वजहें रही हैं। उनके पास नया काम है, उनकी आमदनी बढ़ी है और गांव के मरियम्मन कोविल मंदिर में सालाना उत्सव मनाने के लिए पर्याप्त पैसे हैं। वह गर्व से कहती [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/28/indigenous-women-build-new-livelihoods-with-hive-boxes/" data-wpel-link="internal">मधुमक्खी के बक्सों से आदिवासी महिलाओं की जिंदगी में नई मिठास</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[तमिलनाडु के नीलगिरि जिले के वाझैथोट्टम गांव की रहने वाली इरुला महिला नीलावथी (37) के पास पिछले कुछ महीनों में जश्न मनाने की कई वजहें रही हैं। उनके पास नया काम है, उनकी आमदनी बढ़ी है और गांव के मरियम्मन कोविल मंदिर में सालाना उत्सव मनाने के लिए पर्याप्त पैसे हैं। वह गर्व से कहती हैं, &#8220;मैंने अब तक लगभग छह लीटर शहद बेच लिया है। चूंकि घर पर मधुमक्खी पालन की जिम्मेदारी मेरी है, इसलिए परिवार वाले इस काम से होने वाली कमाई मुझे रखने देते हैं।&#8221; नीलावती ने अपने और बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदने के अलावा समय के साथ इस कमाई से पत्थर के दो दोसा तवे भी खरीद लिए हैं। नीलावथी सहित सिगुर पठार की नौ इरुला आदिवासी महिलाएं वाझैथोट्टम के छोटे-से सामुदायिक भवन में एकत्रित हुईं और उन्होंने मोंगाबे-इंडिया के साथ मधुमक्खी पालन सीखने के अपने अनुभव साझा किए। पिछले एक साल के दौरान उन्हें मधुमक्खियों के बक्सों (हाइव बॉक्स) में मधुमक्खी के छत्तों का प्रबंधन करना, मधुमक्खियों के लिए रस उपलब्ध कराने वाले फलदार पेड़ उगाना और शहद निकालना सिखाया गया। इस आजीविका ने उनके परिवारों की आमदनी में जबरदस्त बढ़ोतरी की है। आजीविका के लिए मधुमक्खी पालन यूनेस्को ने अप्रैल 2025 में अपने वुमेन फॉर बी प्रोजेक्ट को भारत लाने के लिए नीलगिरी स्थित गैर-लाभकारी संस्था &#8216;कीस्टोन फाउंडेशन&#8217; के साथ सहयोग किया। देश में इस कार्यक्रम की पहली साइट के तौर पर नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व को चुना गया और केरल व तमिलनाडु में पांच जगहों पर इसकी गतिविधियां शुरू की गईं। केरल&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/28/indigenous-women-build-new-livelihoods-with-hive-boxes/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>झारखंड में सूखे की आहट, रोपाई और बुआई में 20 दिन की देरी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/07/27/signs-of-el-nino-induced-drought-as-paddy-farming-delays/</link>
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					<pubDate>27 जुलाई 2026 08:00:43 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Vishal Kumar Jain]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<![CDATA[कृषि, क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन, क्लाईमेट चेंज, क्लाईमेट चेंज एडैप्टेशन, गाँव, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, नदी, पानी, भूजल, और सूखा]]>
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							<![CDATA[<p>चतरा जिले के रहने वाले 40-वर्षीय बरुण कुमार यादव छत्तीसगढ़ के भिलाई में सुतार का काम करते हैं। पिछले महीने की 29 तारीख को वे धान की रोपाई के लिए भिलाई से अपने गांव पत्थलगडा आए थे। लेकिन, अनुमान के अनुसार बारिश नहीं होने से वे एक महीने बाद धान की रोपाई किए बिना ही [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/27/signs-of-el-nino-induced-drought-as-paddy-farming-delays/" data-wpel-link="internal">झारखंड में सूखे की आहट, रोपाई और बुआई में 20 दिन की देरी</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[चतरा जिले के रहने वाले 40-वर्षीय बरुण कुमार यादव छत्तीसगढ़ के भिलाई में सुतार का काम करते हैं। पिछले महीने की 29 तारीख को वे धान की रोपाई के लिए भिलाई से अपने गांव पत्थलगडा आए थे। लेकिन, अनुमान के अनुसार बारिश नहीं होने से वे एक महीने बाद धान की रोपाई किए बिना ही वापस लौट गए। वहीं इसी गांव के बसंत दांगी ने सामुदायिक कुएं के पानी से धान की पौध या नर्सरी तो लगा ली, लेकिन पर्याप्त पानी नहीं मिलने से उनके खेत में भी अब दरारें आ गई हैं। पास के ही मेराल गांव के आन्द्रियास टोपनो की धान की नर्सरी रोपाई के लायक हो गई है, लेकिन बारिश नहीं होने से वे अभी तक रोपाई नहीं कर पाए हैं। धान की अधिकतर किस्मों के लिए पहले नर्सरी लगाई जाती है और फिर उसकी रोपाई की जाती है। चौथा गांव के किसान शंकर दांगी बारिश में देरी के चलते इस साल धान छोड़कर मक्के की बुआई कर रहे हैं। “बारिश का इतंजार करने से अच्छा है कि मक्का ही बो दें। मक्का बोने में भी 10 दिन की देरी हो चुकी है, इसलिए पैदावार भी घटेगी,” उन्होंने बताया। झारखंड, जहां अर्थव्यवस्था का आधार मॉनसूनी बारिश है, में खरीफ की बुआई में करीब 20 दिन से ज़्यादा की देरी हो चुकी है। झारखंड कृषि निदेशालय के निदेशक विद्यानंद शर्मा पंकज ने कहा, “रोपाई करीब 20 दिन देरी से चल रही है। हालांकि, संथाल परगना जैसे इलाकों में रोपाई देर तक चलती है। फिर भी, पिछले साल के&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/27/signs-of-el-nino-induced-drought-as-paddy-farming-delays/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>पर्यावरण मंजूरी: राज्य निकायों के कार्यकालों के बीच केंद्र संभाल सकता है जिम्मेदारी</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/07/24/centre-state-environmental-clearance-authorities/</link>
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					<pubDate>24 जुलाई 2026 12:45:22 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Simrin Sirur]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<category><![CDATA[खनन]]></category>
		<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरण]]></category>
		<category><![CDATA[जलवायु और पर्यावरण]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण कानून]]></category>
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							<![CDATA[भारत]]>
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							<![CDATA[<p>केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि जब राज्य के पर्यावरण पर असर का आकलन करने वाले निकायों का कार्यकाल खत्म हो जाए या वे काम न कर रहे हों, तो केंद्र सरकार की बनाई एक समिति को उनके अंतरिम फ़ैसले लेने का काम संभाल लेना चाहिए। इस नई व्यवस्था के लिए 5 मार्च को [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/24/centre-state-environmental-clearance-authorities/" data-wpel-link="internal">पर्यावरण मंजूरी: राज्य निकायों के कार्यकालों के बीच केंद्र संभाल सकता है जिम्मेदारी</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि जब राज्य के पर्यावरण पर असर का आकलन करने वाले निकायों का कार्यकाल खत्म हो जाए या वे काम न कर रहे हों, तो केंद्र सरकार की बनाई एक समिति को उनके अंतरिम फ़ैसले लेने का काम संभाल लेना चाहिए। इस नई व्यवस्था के लिए 5 मार्च को एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया गया। चूंकि राज्य की संस्थाएँ अलग-अलग कार्यकाल के बीच पुनर्गठित होती रहती हैं, ऐसे में केंद्र का तर्क है कि इस नई व्यवस्था से फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में &#8220;निरंतरता&#8221; बनी रहेगी। केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक स्थायी संस्था, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के आकलन की प्रक्रिया से जुड़े &#8220;अन्य कार्यों&#8221; के लिए भी ज़िम्मेदार हो सकती है। इन कार्यों को केंद्र सरकार समय-समय पर इस स्थायी संस्था को सौंप सकती है। पर्यावरण प्रभाव आकलन या एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट (EIA) नोटिफिकेशन के तहत, &#8216;कैटेगरी B&#8217; के प्रोजेक्ट्स &#8211; जैसे लेदर टैनिंग इंडस्ट्री, छोटे पैमाने पर माइनिंग और मेटलर्जिकल प्रोसेसिंग &#8211; के लिए पर्यावरण मंज़ूरी देने का काम &#8216;स्टेट एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटीज़&#8217; (SEIAA) का है। इन अथॉरिटीज़ को &#8216;स्टेट एक्सपर्ट अप्रेज़ल कमिटीज़&#8217; (SEAC) सलाह और मार्गदर्शन देती हैं। इन कमिटीज़ का कार्यकाल तीन साल का होता है, जिसे एक साल और बढ़ाया जा सकता है। इन कमिटी के सदस्यों के पास पर्यावरण प्रबंधन, जोखिम मूल्यांकन, जीवन विज्ञान जैसे विषयों या किसी खास क्षेत्र का 15 साल का अनुभव होना ज़रूरी है। केंद्र के अनुसार, आमतौर पर इन निकायों का पुनर्गठन कार्यकाल खत्म होने से छः महीने पहले शुरू किया&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/24/centre-state-environmental-clearance-authorities/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>कितनी सफल होगी नक्सलवाद से उबरते बस्तर में गाय के जरिए विकास की योजना</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/07/23/bastar-dairy-model-tribal-livelihood/</link>
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					<pubDate>23 जुलाई 2026 12:02:14 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Alok Prakash Putul]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[लोग]]></category>
		<category><![CDATA[समाधान]]></category>
		<category><![CDATA[गाय]]></category>
		<category><![CDATA[छत्तीसगढ़]]></category>
		<category><![CDATA[डेयरी]]></category>
		<category><![CDATA[नक्सल प्रभावित क्षेत्र]]></category>
		<category><![CDATA[बस्तर]]></category>
		<category><![CDATA[भारत का डेयरी उद्योग]]></category>
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							<![CDATA[लोग, वन, और समाधान]]>
						</topic-tags>
					
					
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							<![CDATA[<p>मध्यभारत में नक्सली हिंसा के लिए चर्चित रहे बस्तर में गाय फिर लौटने वाली है।  मध्य क्षेत्रीय परिषद की 26वीं बैठक के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि बस्तर संभाग के हर आदिवासी परिवार को एक गाय या एक भैंस उपलब्ध कराई जाएगी। उन्होंने दावा किया कि अगले छः महीने में [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/23/bastar-dairy-model-tribal-livelihood/" data-wpel-link="internal">कितनी सफल होगी नक्सलवाद से उबरते बस्तर में गाय के जरिए विकास की योजना</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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						</description>
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							<![CDATA[मध्यभारत में नक्सली हिंसा के लिए चर्चित रहे बस्तर में गाय फिर लौटने वाली है।  मध्य क्षेत्रीय परिषद की 26वीं बैठक के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि बस्तर संभाग के हर आदिवासी परिवार को एक गाय या एक भैंस उपलब्ध कराई जाएगी। उन्होंने दावा किया कि अगले छः महीने में पूरे बस्तर में डेयरी नेटवर्क खड़ा किया जाएगा। गांवों में दूध संग्रहण केंद्र बनेंगे, सहकारी समितियां काम करेंगी और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड इस पूरी व्यवस्था में सहयोग करेगा।  इससे पहले दिसंबर 2024 में भी गृहमंत्री ने नक्सल प्रभावित इलाकों के आदिवासी परिवारों को गाय या भैंस देने की बात कही थी। लेकिन ताज़ा दावे के बाद सरकार एक्शन मोड में होने का दावा कर रही है। राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का दावा है कि बस्तर में डेयरी मॉडल को तेजी से लागू किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे आदिवासी परिवारों की नियमित नकद आय बढ़ेगी और बस्तर में विकास का नया दौर शुरू होगा।  यह घोषणा नई जरूर है। लेकिन इसका विचार नया नहीं है। करीब 22 साल पहले भी लगभग यही सपना दिखाया गया था। वह 2003 का साल था। छत्तीसगढ़ को राज्य बने अभी तीन साल हुए थे। पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहे थे। नया राज्य था, नई उम्मीदें थीं और हर राजनीतिक दल अपने-अपने विकास मॉडल के साथ जनता के सामने था। भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा-पत्र में एक ऐसा वादा किया, जिसने खासकर आदिवासी इलाकों का ध्यान खींचा। पार्टी ने कहा कि आदिवासी&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/23/bastar-dairy-model-tribal-livelihood/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>शहरों को हरा बनाने वाली योजनाएं जैव-विविधता को क्यों भूल रही हैं?</title>
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					<pubDate>22 जुलाई 2026 13:52:38 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Aisiri Amin]]>
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						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
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							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[Biodiversity]]></category>
		<category><![CDATA[जैव विविधता नीति]]></category>
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							<![CDATA[क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन, क्लाईमेट चेंज, क्लाईमेट चेंज एडैप्टेशन, ग्रीनहाउस उत्सर्जन, ग्लोबल वार्मिंग, जल संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, झील, पक्षी, पर्यावरण कानून, पौधे, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधन, और समाधान]]>
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							<![CDATA[<p>जब दुनिया पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों के लिए लंबे समय तक चलने वाले समाधान ढूंढ रही है, तो ऐसे समय में प्रकृति पर आधारित समाधानों (एनबीएस) को अक्सर एक सकारात्मक समाधान के तौर पर देखा जाता है। &#8216;ग्लोबल साउथ&#8217; या विश्व के दक्षिण में आने वाले देशों के शहरी इलाकों में एनबीएस से जैव-विविधता को [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[जब दुनिया पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों के लिए लंबे समय तक चलने वाले समाधान ढूंढ रही है, तो ऐसे समय में प्रकृति पर आधारित समाधानों (एनबीएस) को अक्सर एक सकारात्मक समाधान के तौर पर देखा जाता है। &#8216;ग्लोबल साउथ&#8217; या विश्व के दक्षिण में आने वाले देशों के शहरी इलाकों में एनबीएस से जैव-विविधता को होने वाले फायदों का आकलन एक नई स्टडी में किया गया है। इस स्टडी का मकसद इस बात को बेहतर ढंग से समझना है कि प्रकृति पर आधारित ये उपाय शहरी चुनौतियों से निपटने में कितने असरदार हैं। &#8216;इकोलॉजिकल इंडिकेटर्स&#8217; नामक जर्नल में छपी इस स्टडी में पाया गया कि शहरी इलाकों में एनबीएस प्रोजेक्ट्स में जैव-विविधता शायद ही कभी मुख्य फोकस होती है। इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स (आईआईएचएस) और अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (एट्री) के शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ज़्यादातर प्रोजेक्ट्स में क्लाइमेट मिटिगेशन (जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने) और जैव-विविधता के संरक्षण के बजाय सामाजिक फायदों, जैसे बाढ़ पर नियंत्रण या गर्मी कम करने, को प्राथमिकता दी गई। समाधानों को लेकर अस्पष्टता इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) के अनुसार, प्रकृति-आधारित समाधान वे &#8220;काम&#8221; हैं जो प्राकृतिक या बदली हुई पारिस्थितिकी की सुरक्षा, टिकाऊ प्रबंधन और बहाली करते हैं। साथ ही, ये समाधान सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए इंसानों और जैव-विविधता को फायदा पहुंचाते हैं। यह शब्द अपेक्षाकृत नया है और इसकी उत्पत्ति पश्चिमी देशों में हुई है। आईआईएचएस में स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी के डीन और इस&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/22/urban-nature-based-solutions-biodiversity/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>भारत की पहली बार बनी जुगनुओं की चेकलिस्ट, दर्ज हुईं 92 प्रजातियां</title>
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					<pubDate>21 जुलाई 2026 13:50:19 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Arathi Menon]]>
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							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
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							<![CDATA[<p>जुगनुओं की टिमटिमाहट से चमकता रात का आसमान एक पुरानी मीठी याद को ताज़ा कर देता है। भले ही इन रोशनी पैदा करने वाले छोटे-छोटे कीड़ों का वर्णन हमारी संस्कृति, कला और साहित्य में बहुत सुन्दर तरीके से किया जाता हो, लेकिन असल में हम जुगनुओं के बारे में कितना जानते हैं? ज़ूटाक्सा नामक एक [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[जुगनुओं की टिमटिमाहट से चमकता रात का आसमान एक पुरानी मीठी याद को ताज़ा कर देता है। भले ही इन रोशनी पैदा करने वाले छोटे-छोटे कीड़ों का वर्णन हमारी संस्कृति, कला और साहित्य में बहुत सुन्दर तरीके से किया जाता हो, लेकिन असल में हम जुगनुओं के बारे में कितना जानते हैं? ज़ूटाक्सा नामक एक जर्नल में छपे एक नए शोध में भारतीय जुगनुओं (कोलियोप्टेरा: लैम्पाइरिडे) की एक पूरी चेकलिस्ट तैयार की गई है। इसमें चार सबफ़ैमिली और 27 जॉनर की 92 प्रजातियों को दर्ज किया गया है। इस चेकलिस्ट में भारत के बायोजियोग्राफिक ज़ोन में बहुत ज़्यादा एंडेमिज़्म और एक बड़ा लेकिन असमान डिस्ट्रीब्यूशन दिखाया गया है। एंडेमिज्म जीवविज्ञान और पारिस्थितिकी में किसी प्रजाति (पौधे या जानवर) की वह स्थिति है, जिसमें वह प्रजाति प्राकृतिक रूप से केवल एक विशिष्ट और सीमित भौगोलिक क्षेत्र में ही पाई जाती है। रिसर्चर्स ने 1881 से अक्टूबर 2025 तक इस प्रजाति पर मौजूद प्रकाशनों का सर्वे किया और पाया कि भारतीय जुगनुओं का 60.86% हिस्सा देश में एंडेमिक है, यानी कि यह सिर्फ भारत में भी पाया जाता है। दुनिया भर में जुगनुओं के लिए उनके आवास का नुकसान, रात की कृत्रिम रोशनी से प्रकाश प्रदूषण और कीटनाशकों को सबसे बड़ा खतरा माना जाता है। तस्वीर- अनस्प्लैश इस शोध के मुख्य लेखक, परवेज़ बताते हैं कि जब वे अपनी पीएचडी की तैयारी कर रहे थे, तो भारत में जुगनू की ज़्यादातर प्रजातियों के बारे में जानकारी की कमी थी, इसी वजह से उन्होंने भारतीय जुगनुओं की अनजान दुनिया के बारे में और&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/21/bharat-jugnu-checklist-92-prajatiyan/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>लू से बचने के लिए रात में काम, लेकिन ईंट-भट्ठा मजदूरों की मुश्किलें बरकरार</title>
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					<pubDate>20 जुलाई 2026 07:36:56 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Shivam Bhardwaj]]>
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		<category><![CDATA[climate change]]></category>
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							<![CDATA[क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन, क्लाईमेट चेंज, क्लाईमेट चेंज एडैप्टेशन, गाँव, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, पहल, लोग, और समाधान]]>
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							<![CDATA[<p>तारीख 22 मई। सुबह के 3 बज रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बरेली जिले के कुरका गांव के पास खुले मैदान में झींगुरों की आवाज गूंज रही है। लेकिन, 30 साल की रीना कश्यप और उनके पति जगदीश कश्यप दो घंटे पहले ही काम करना शुरू कर चुके हैं। वे सौर बिजली की रोशनी में [&#8230;]</p>
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							<![CDATA[तारीख 22 मई। सुबह के 3 बज रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बरेली जिले के कुरका गांव के पास खुले मैदान में झींगुरों की आवाज गूंज रही है। लेकिन, 30 साल की रीना कश्यप और उनके पति जगदीश कश्यप दो घंटे पहले ही काम करना शुरू कर चुके हैं। वे सौर बिजली की रोशनी में ईंट ढाल रहे हैं। उन्होंने कहा, &#8220;हम अब रात में काम कर रहे हैं, क्योंकि दोपहर की चिलचिलाती धूप में यहां रहना नामुमकिन है।&#8221; आदर्श ब्रिक इंडस्ट्री के लिए ईंटें ढालने वाला यह दंपति रात 9 बजे सोता है और फिर रात में ही 12:30 बजे उठ जाता है। उनकी योजना सुबह 11 बजे तक लगातार काम करने की होती है। रीना कहती हैं, “उसके बाद मुझे नहाना, कपड़े धोना, खाना बनाना और बच्चों को खिलाना होता है। फिर शाम को हम ईंट जमाते हैं और अगले दिन के लिए मिट्टी तैयार करते हैं। इस तरह पूरा दिन इसी में निकल जाता है।” जगदीश कहते हैं, &#8220;गर्मियों में हम दिन में मुश्किल से चार घंटे ही सो पाते हैं। दिन में इतनी गर्मी होती है कि सोना नामुमकिन है। भट्ठे पर हमारे पास पंखे, कूलर या बिजली जैसी कोई सुविधा नहीं है।&#8221; यह दंपति जनवरी 2026 में मीरगंज तहसील के ही बुज्हिया जागीर गांव से कुरका स्थित इस ईंट-भट्ठे पर आया था। परिवार अपने चार बच्चों के साथ ईंट और कच्ची मिट्टी से बने टीन की छत वाले अस्थायी कमरे में रहता है। यह कमरा न तो हवादार है और न ही यहां बिजली है।&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/20/night-shifts-help-brick-kiln-workers-avoid-peak-heat/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>औद्योगिक कचरे से प्रदूषित हुआ भूजल, कानपुर देहात के गांवों में जनस्वास्थ्य पर पड़ता असर</title>
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					<pubDate>16 जुलाई 2026 08:37:14 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Rajat Awasthi]]>
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						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
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							<category><![CDATA[लोग]]></category>
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							<![CDATA[कचरा प्रबंधन, जल प्रदूषण, जल संरक्षण, पानी, प्रदूषण, और भूजल]]>
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							<![CDATA[<p>करीब 50 साल की मीना देवी अपने बेटे के साथ कानपुर देहात के रनियां औद्योगिक क्षेत्र से सटे खानचंद्रपुर गांव में रहती हैं। पानी की समस्या का जिक्र होते ही वह घर के भीतर ले गईं और ट्यूबवेल चलाकर पानी दिखाया। इस पानी में हल्का हरापन दिखाई दे रहा था। उन्होंने कहा, “काफी दिक्कत है… [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/16/kanpur-pollution-raniya-chromium/" data-wpel-link="internal">औद्योगिक कचरे से प्रदूषित हुआ भूजल, कानपुर देहात के गांवों में जनस्वास्थ्य पर पड़ता असर</a> appeared first on <a href="https://hindi.mongabay.com" data-wpel-link="internal">Mongabay हिन्दी</a>.</p>
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							<![CDATA[करीब 50 साल की मीना देवी अपने बेटे के साथ कानपुर देहात के रनियां औद्योगिक क्षेत्र से सटे खानचंद्रपुर गांव में रहती हैं। पानी की समस्या का जिक्र होते ही वह घर के भीतर ले गईं और ट्यूबवेल चलाकर पानी दिखाया। इस पानी में हल्का हरापन दिखाई दे रहा था। उन्होंने कहा, “काफी दिक्कत है… मजबूरी में इसी पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है।” खानचंद्रपुर में भूजल के प्रदूषण के चलते पानी की समस्या लोगों की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुकी है। भूजल में औद्योगिक रसायनों के प्रदूषण के कारण गांव में कई सरकारी हैंडपंप निष्क्रिय पड़े हैं। कुछ हैंडपंपों के हत्थे हटा दिए गए हैं, ताकि लोग उनका इस्तेमाल न कर सकें। इसके बावजूद घरों के भीतर लगे निजी हैंडपंप और बोरिंग अब भी चल रहे हैं। मीना के मुताबिक गांव में टैंकर या टंकी से साफ़ पानी की आपूर्ति की जाती है लेकिन यह पानी घर की सभी जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं होता। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से पीने और खाना बनाने में इस्तेमाल हो जाता है। नहाने, कपड़े धोने, सफाई और पशुओं के लिए कई परिवार अब भी घरों में लगे निजी हैंडपंप या बोरिंग पर निर्भर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पानी की टंकी से सप्लाई होती है, लेकिन मात्रा सीमित है। ऐसे में पीने के पानी के लिए कुछ राहत मिल जाती है, पर घरेलू इस्तेमाल और पशुओं के लिए साफ पानी की कमी बनी रहती है। कई लोग पानी के रंग और स्वाद को लेकर भी चिंता जताते हैं। रनियां&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/07/16/kanpur-pollution-raniya-chromium/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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