- रामनगर मल्टीमॉडल टर्मिनल से जुड़े फ्रेट विलेज के लिए चंदौली के ताहिरपुर और मिल्कीपुर गांवों की लगभग 100 एकड़ जमीन अधिग्रहित की जा रही है, जिसका स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं।
- वाराणसी शहरी विस्तार क्षेत्र में आने के बावजूद जमीन का मुआवजा चंदौली जिले के कम सर्किल रेट पर तय किया जा रहा है, जबकि बाजार मूल्य कई गुना अधिक बताया जा रहा है।
- मल्लाहों का कहना है कि क्रूज पर्यटन को बढ़ावा मिलने से पारंपरिक नाव संचालन के अधिकार सीमित हो रहे हैं और रोजगार के विकल्प घटते जा रहे हैं।
- ड्रेजिंग, बड़े जहाज और क्रूज संचालन से गंगा प्रदूषण, नदी की जैव विविधता और काशी के सांस्कृतिक स्वरूप पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक राष्ट्रीय जलमार्ग योजना के तहत वाराणसी के रामनगर में गंगा नदी के किनारे एक मल्टीमॉडल टर्मिनल बनाया गया है। इसी परियोजना के तहत जहाजरानी मंत्रालय ने दिसंबर 2018 में वाराणसी के मिल्कीपुर में 156 करोड़ की लागत से एक फ्रेट विलेज के निर्माण को मंजूरी दी। सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वेब कांफ्रेंस के जरिए इस फ्रेट विलेज की आधारशिला रखी। करीब 100 एकड़ (40.4685 हेक्टेयर) जमीन पर बनने वाले इस विलेज को एक कार्गो हब के रूप में विकसित किया जाना है जो एक पेशेवर लॉजिस्टिक्स उद्योग के विकास को प्रोत्साहित करेगा।
दिसंबर 2024 को राज्यसभा में पेश संसद की स्टैडिंग कमेटी की रिपोर्ट में जहाजरानी मंत्री की ओर कहा गया कि वाराणसी में फ्रेट विलेज का निर्माण हो जाने से कार्गो के रेल व रोड से जलमार्ग में शिफ्ट करने में सुविधा होगी। इस परियोजना की भूमि का मालिक भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) होगा जो इसके निर्माण के लिए वाराणसी और आसपास के जिलों के कुछ गाँवों की जमीनों का अधिग्रहण करेगा।
हालाँकि, इस फ्रेट विलेज के निर्माण के लिए जिन लोगों से भूमि अधिग्रहण किया जाना है उनमें अधिकतर लोग मल्लाह समुदाय से आते हैं जिनका जीवनयापन कई तरह से गंगा नदी पर निर्भर है। उनका कहना है कि उनसे ये जमीन बहुत ही सस्ते दामों पर ली जा रही है। उनके अनुसार, इस विलेज और इस पूरी परियोजना के कारण गंगा नदी पर निर्भर उनकी सालों से चली आ रही पारम्परिक आजीविका पर असर पड़ेगा। इस ही के साथ वाराणसी में क्रूज नावों के बढ़ने से भी उनके पारम्परिक नौकाटन के व्यवसाय पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।

जमीन के असल दाम से कम मुआवजा
इस बदलाव से वाराणसी से सटे चंदौली जिले की पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर (मुगलसराय) तहसील के ताहिरपुर गांव की 43 वर्षीया छाया देवी अपने गांव की दूसरी महिलाओं की तरह अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। वे कहती हैं, “हम किसी हाल में अपनी जमीन फ्रेट विलेज बनाने के लिए बंदरगाह (आईडब्ल्यूएआई) वालों को नहीं देंगे। अगर हमारी जमीन गई तो हमारा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा, हमारे पास घर की जमीन के अलावा कुछ और नहीं है।”
छाया देवी कहती हैं, “यहां अधिकतर लोग मल्लाह जाति के हैं और वे अपनी आजीविका के लिए गंगा पर निर्भर हैं। हमारे अलावा यहां मुस्लिम, हरिजन, पटेल और यादव भी हैं।”
चंदौली जिला प्रशासन के एक दस्तावेज के अनुसार, इस परियोजना का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा जिले के दो गांवों ताहिरपुर व मिल्कीपुर में होगा जिसके लिए ताहिरपुर की 15.92 हेक्टेयर और मिल्कीपुर की 12.35 हेक्टेयर जमीन ली जानी है। भूमि अधिग्रहण की इस प्रक्रिया में दोनों गांव के कुल 415 परिवार प्रभावित होंगे, जिनमें गांव 170 परिवार यहाँ के मूलनिवासी हैं।
ताहिरपुर की 60 वर्षीया विमला देवी भी छाया देवी की बातों का समर्थन करते हुए कहती हैं, “बंदरगाह वाले हमारी जमीन का निशान लेकर गए हैं। पुलिस-फोर्स बुलाकर वे हमारी जमीन लेना चाहते हैं, लेकिन हमने उनका मजबूती से विरोध किया।”
इसी गांव के युवा ईशान मिल्की कहते हैं, “20 मई 2025 को एसडीएम, मुगलसराय की अगुवाई में पुलिस बल जमीन की निशान करने गांव आया था, जिसका गांव की महिलाओं ने विरोध किया। इसके बाद हमने राज्य के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को पत्र सौंप कर अपनी चिंताओं से अवगत कराया और हस्तक्षेप की मांग की। हमने अपने संसदीय क्षेत्र चंदौली के सांसद वीरेंद्र सिंह से भी हस्तक्षेप का आग्रह किया है।”
चंदौली के सांसद वीरेंद्र सिंह ने मोंगाबे हिंदी से बातचीत में कहा, “यह परियोजना प्रधानमंत्री की जिद है और जमीनी स्तर पर कामयाब होने की स्थिति में नहीं है। फ्रेट कॉरिडोर के निर्माण से प्रभावित होने वाले 90 प्रतिशत परिवार गरीब हैं और मैंने संसद में भी यह मामला उठाया था। सरकार स्थानीय लोगों का सहमति हासिल कर ही जमीन ले और उनका उचित पुनर्वास करे व उन्हें विस्थापित होने का मौका व जगह दे। हमारे देश में कल्याणकारी सरकार है और वह गरीबों के हितों को नजरअंदाज नहीं कर सकती है।”

इस परियोजना के लिए दोनों गांवों में जमीन अधिग्रहण से पूर्व किये गये सामाजिक-आर्थिक सर्वे में भी यह कहा गया है कि अधिकतर लोगों की आर्थिक स्थिति ज्यादा सृदृढ नहीं है।
रामनगर में जहां फ्रेट विलेज बनना है, वहां बौद्धों का पवित्र धार्मिक स्थल तथागत बुद्ध विहार और उस ही के पास संत रविदास की पत्नी माता लोना देवी का मंदिर है। रामनगर के रहने वाले और इस बुद्ध विहार के ट्रस्ट के सदस्य विनय मौर्य बताते हैं, “इसमें ट्रस्ट की साढे आठ बीघा जमीन है और उसे बेचने का अधिकार किसी के पास नहीं है। इसको लेकर हम लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।”
जमीन के सर्किल रेट में अंतर
चंदौली जिला प्रशासन की अधिसूचना के अनुसार मिल्कीपुर में जमीन का सर्कल रेट 75 हजार से एक लाख रुपए प्रति बिस्वा है और यहां अधिग्रहित की जाने वाली जमीन का सर्कल रेट 93,750 रुपए प्रति बिस्वा है। वहीं, ताहिरपुर में अधिग्रहित की जाने वाली जमीन का सर्कल रेट 85 हजार रुपए से 1.18 लाख रुपए प्रति बिस्वा है।
इसके विपरीत इन गाँवों में बाजार दर के हिसाब से यहां की जमीन की कीमत सर्कल रेट से करीब 15 से 20 गुना अधिक है।
तथागत बुद्ध विहार के महासचिव एवं सेवानिवृत्त शिक्षक, 70-वर्षीय विद्याधर कहते हैं, “यहां जमीन की कीमत बाजार दर के अनुसार 15 से 20 लाख रुपए प्रति बिस्वा (एक बिस्वा यानी लगभग 1360 वर्ग फीट) है। जबकि ये (आईडब्ल्यूएआई) यहां के सर्किल रेट के आधार पर भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजा देना चाहते हैं।”
ताहिरपुर पंचायत के पूर्व प्रधान व मिल्कीपुर गांव के निवासी भाई राम साहनी कहते हैं, “इस परियोजना के लिए अधिकांश जमीन इन दोनों सघन बसे गांव से ली जानी है और ऐसी परियोजना से सबसे अधिक पीड़ित स्थानीय लोग होते हैं।” उनका कहना है कि यह जगह वाराणसी विकास प्राधिकरण के अंतर्गत आती है, लेकिन यहां की जमीन के लिए दिए जाने वाले मुआवजे की दर चंदौली जिले के सर्कल रेट के आधार पर है और वाराणसी व चंदौली जिले के सर्कल रेट में कई गुना का अंतर है, जबकि वाराणसी जिले से सटी इस जगह पर दोनों जिलों की जमीन के बाजार दर में अंतर नहीं है।

वाराणसी विकास प्राधिकरण (वीडीए) के एक अधिकारी ने नाम का उल्लेख न करने की शर्त पर मोंगाबे हिंदी से कहा, “वीडीए के तहत किसी गांव को अपने दायरे में लिए जाने पर वहां के सर्कल रेट में हमारे द्वारा कोई बदलाव नहीं होता, इसका एक्सक्लूसिव राइट (विशेषाधिकार) संबंधित जिले के डीएम के पास होता है।” उक्त अधिकारी ने कहा कि हम सिर्फ उक्त गांव के वाराणसी नगर के विस्तारित क्षेत्र के रूप में विकास से जुड़े कार्य करते हैं।
अटल मिशन फॉर रिजुवनेशन एंड अर्बन ट्रांसफार्मेशन के तहत वाराणसी विकास प्राधिकरण के द्वारा तैयार वाराणसी-मुगलसराय-रामनगर महायोजना 2031 में रामनगर व मुगलसराय के 97 राजस्व गांवों को शहरीकरण के लिए चुना गया है। इसमें रामनगर महायोजना-2031 की सीमा के अंदर और रामनगर नगरपालिका सीमा के बाहर चयनित 46 राजस्व गांवों में राल्हूपुर जहां मल्टीमॉडल टर्मिनल स्थित है के अलावा ताहिरपुर, मिल्कीपुर, रसूलगंज व गोपालपुर जैसे गांवों का जिक्र है।
ग्रामीणों ने जमीन अधिग्रहण की किसी भी कार्रवाई के खिलाफ अपना एक सामूहिक हस्ताक्षर भी सार्वजनिक किया है, जिसमें यह संकल्प व्यक्त किया गया है कि “हम अपनी जमीन नहीं देना चाहते हैं”।
पिछले साल अगस्त में उत्तरप्रदेश के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने ताहिरपुर गांव का दौरा किया और चंदौली जिला प्रशासन के प्रतिनिधि के रूप में मुगलसराय के एसडीएम अनुपम मिश्रा के साथ उनकी बैठक हुई। इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल विधायक प्रभुनारायण सिंह यादव ने मोंगाबे हिंदी से कहा, “जिला प्रशासन से बात हुई है, हम फिर बातचीत करेंगे, प्रभावित गांवों के किसानों ने कहा है कि हम जमीन नहीं देंगे, जिला प्रशासन ने भूमि अधिग्रहण के स्वरूप पर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया है।”
नदी पर्यटन पर सरकार का जोर और मल्लाह संगठनों के सवाल
केंद्र सरकार नदी परिवहन के साथ नदी पर्यटन को भी बढावा दे रही है। सरकार नदी पर्यटन के लिए क्रूज सेवा को बढ़ावा दे रही है। केंद्र सरकार ने 30 सितंबर 2024 को क्रूज भारत मिशन शुरू किया। आईडब्ल्यूएआई द्वारा क्रूज ऑपरेटरों को विभिन्न प्रकार का प्रोत्साहन दिया जा रहा है। वर्ष 2029 तक सरकार ने क्रूज पैसेंजर की संख्या 10 लाख प्रति वर्ष तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है जो वर्ष 2023-24 में 4.71 लाख थी।
वाराणसी के घाटों पर नाव चलाने वाले मल्लाहों का संगठन मां गंगा निषाद राज सेवा न्यास के संरक्षक पृथ्वीनाथ साहनी कहते हैं, “मल्लाही हमारा पुश्तैनी पेशा है, हम नहीं चाहेंगे कि इसमें कोई हस्तक्षेप करे, लेकिन सरकार की नीतियों से हमारे लिए वाराणसी के घाटों पर जगह सीमित हो रही है।” वे कहते हैं, “बनारस को तीन आदमी ने सींचा है – मल्लाह, पंडा, डोम। सरकार पंडा और डोम के काम में तो हस्तक्षेप नहीं करती है, लेकिन हमारे काम में लगातार हस्तक्षेप बढा रही है।”
वे कहते हैं, “सरकार पर्यटक क्रूज को प्रोत्साहित कर रही है और हमारी छोटी नाव को लाइसेंस नहीं दे रही है। जहां हम नाव पर पर्यटकों को बैठा कर बनारस की गंगा आरती दिखाते थे, वहां अब सरकार सुरक्षा के नाम पर हमें रोक रही है, जबकि क्रूज वालों को प्रमोट कर रही है।” उनका कहना है कि बनारस में गंगा के घाट पर करीब 1,500 नाव चलती हैं और 10 हजार मल्लाह इस पेशे से जुड़े हैं। साथ ही, जिन घाटों से मल्लाह परंपरागत रूप से तीर्थयात्रियों को नाव यात्रा कराते रहे हैं, वहां क्रूज को प्रवेश नहीं करने दिया जाए, ताकि मल्लाहों की आजीविका सुरक्षित रहे।

वाराणसी के राजघाट के मल्लाह दुर्गा मांझी कहते हैं, “क्रूज वाले हमें नाव चलाने व लगाने दोनों में परेशान कर रहे हैं, वे गंगा जी में मानव मल व मूत्र बहा रहे हैं, ऐसा कर वे गंगा को दूषित कर रहे हैं और धर्मनगरी काशी की पंरपरा को नष्ट कर रहे हैं। वहीं, छोटी नाव से गंगा में किसी तरह की गंदगी नहीं डाली जाती।”
वाराणसी स्थित पर्यावरण थिंकटैंक क्लाइमेट एजेंडा के को-फाउंडर रवि शेखर कहते हैं, “मल्लाह व छोटे मछुआरे नदी का उतना ही दोहन करते हैं, जिससे उनकी आजीविका चल जाए और उसकी पारिस्थितिकी को नुकसान न हो, बनारस में आज भी कई ऐसे घाट हैं जहां मछुआरे मछलियों का शिकार नहीं करते हैं। लेकिन गंगा में ड्रेजिंग कर बड़े जहाजों को चलाये जाने व क्रूज पर्यटन को विस्तार देने से मल्लाहों के अस्तित्व पर संकट आ जाएगा।”
“बनारस एक तीर्थ नगरी है, जहां तीर्थयात्रियों के आने से पैसे हर छोटे दुकानदार, मल्लाह, पंडा-पुजारी के पास जाता रहा है, लेकिन अगर यह पर्यटन की नगरी के रूप में विकसित होता जाएगा तो पैसे का वितरण केंद्रीकृत होता जाएगा,” उन्होंने आगे बताया।
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रवि के अनुसार, यहां बनाया जाने वाला मल्टीमॉडल टर्मिनल या फ्रेट विलेज का नुकसान गंगा की पारिस्थितिकी व उसमें रहने वाले जीव-जंतुओं पर होगा और यह परियोजना व्यावहारिक नहीं लगती है। ऐसे में यह हो सकता है कि सरकारी खर्च पर इसका निर्माण होने के बाद इसका स्थानांतरण निजी हाथों में हो जाए।
चंदौली के सांसद वीरेंद्र सिंह द्वारा संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में सरकार ने हल्दिया से वाराणसी जलमार्ग रूट पर 87 कार्गा व क्रूज जलयान चलने की बात कही थी और बनाए गए एमएमटी व अन्य संयंत्र के संचालन के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल अपनाने की बात कही थी।
मंथन अध्ययन केंद्र के श्रीपद् धर्माधिकारी कहते हैं, “क्रूज पर्यटन के जरिये छोटे मल्लाहों के काम पर व्यापारियों का कब्जा हो रहा है और परंपरागत मल्लाह पेशे से बाहर हो रहे हैं। सुरक्षा के नाम पर छोटे मछुआरों को संचालन की मंजूरी नहीं देते हैं और क्रूज को अनुमति देते हैं। बनारस के घाट की पहचान छोटे मछुआरों व उनकी नाव से है, इस तरह यह शहर भी अपना चरित्र व पहचान खो रहा है।”
बैनर तस्वीरः वाराणसी एमएमटी से कुछ दूरी पर गंगा में खड़ी छोटी नौकाएं। छोटे मछुआरों व मल्लाहों का कहना है कि गंगा में बढते हस्तक्षेप की वजह से हमारी आजीविका का संकट बढ रहा है। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे